शनिवार, 27 जुलाई 2024

बच्चों की तरबियत कैसे करें ?

 


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*मॉडर्न जमाने में बच्चो को तरबियत*
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 《│पोस्ट - 01│》
  *हरफे नासिहाना* 

औलाद अल्लाह तआला की एक अज़ीम नेअमत है। मगर उसके साथ वालिदैन पर डाली गईअज़ीम ज़िम्मेदारी भी है। जैसा कि अल्लाह तआला फरमाता है
يَأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوقُو انْفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَا رَا وَقُودُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ
तर्जुमाः ऐ ईमान वालों! अपनी जानों और घर वालों को उस आग से बचाओ जिसके ईंधन आदमी और पत्थर हैं।(कन्जुल ईमान पारा 28, आयात 06)

यानि ऐ ईमान वालो! अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की फरमाँबरदारी इख़्तियार कर के अपने घर वालों और बच्चों कोने की की हिदायत और बदी से दूर करे के उन्हें इल्मो अदब सिखा कर अपनी जानों और अपने घर वालों को उस आग सेबचाव जिसका ईधन आदमी और पत्थर हैं।

लेकिन ब‌द्भिस्मती से आज के अक्सर वालिदैन इस हकीकत से नाआशना हो चुके हैं जिसके नतीजे में वो मुआशरे को बुरे इंसान देने का सबब बनते हैं। आम तौर पर लोगोंके लिए उनकी औलाद सिर्फ मोहब्बत का मौजू होती है। औलाद को लाड़ प्यार करना उनके नखरे उठाना औलाद के लिए कपड़ों और खिलौनोंके ढेर लगा देना उनकी हर जाइज़ और नाजाइज़ ख़्वाहिशोंको पूरा करना उनकी ज़िन्दगी का मकसद बन जाता है। ऐसे वालिदैन के लिए उनकी औलाद इब्तिदा में एक खिलौना होती है मगर आहिस्ता आहिस्ता वो खुद अपनी औलाद के हाथों में एक खिलौना बन जाते हैं। औलाद ख़्वाहिश की डुगडुगी बजाती है और वालिदैन बन्दर की तरह उस डुगडुगी पर नाचते हैं। ऐसे वालिदैन तालीम व तरबियत के ऐतबार से अक्सर अपनी ज़िम्मेदारियों से गाफिल होते हैं ऐसेलोगों के नज़दीक औलाद के हवाले से असल ज़िम्मेदारी यह होती है कि उसे किसी इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिल कर दिया जाये। वह औलाद की तरबियत के तसव्वुर से वाकिफ ही नहीं होते हैं। अच्छे आदाब व अखलाक की तलकीन नेकी और अम्र बिल मअरूफ (हुस्ने सुलूक) केतआल्लुक से बड़े छोटे का लिहाज़ खुदा और बन्दोंके हुकूक की निगेहबानी को बुनियाद बना कर तरबियत करने के बजाये यह लोग औलाद को टी.वी., मोबाईल फोन, इन्टरनेट के हवाले कर देते हैं। क्योंकि औलाद की ज़िदों और शरारतों से निजात का यह फौरी और ज़ूद असर नुस्खा होता है। मगर यह नुस्खा अक्सर उनकी सीरत व शख़्सियत को मन्सूख कर देता है। ऐसे बच्चे जब बड़े होते हैं तो मुआशरे में नुक्सानात और ख़्वाहिशात के बढ़ाने का बाइस बनते हैं, नीज़ सब्र, ईसार, कुरबानी, सादगी, कनाअत, अफ व दरगुज़र, अमानत व दयानत, अदल व इंसाफ और खुश खलकी जैसे आला सिफात से आरी होते हैं, यह लोग मुआशरे को फसादात से भर देते हैं। यह लोग न सिर्फ दूसरे लोगों को दुख देते हैं बल्कि खुद अपने वालिदैन के बुढ़ापे को बाइसे अज़ीयत बना देते हैं। यह गोया वालिदैन की उसकोताही की नकद सज़ा होती है जो उन्होंने अपनी औलाद की तरबियत के मामले में खर्च की थी। औलाद की तरबियत में कोताही शरीअत में एक संगीन गुनाह है और उसकेबारे में वईदें वारिद हुई हैं।

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                    《│पोस्ट - 02│》

🪄 *हरफे नासिहाना* 

👉🏻अल-हदीसः हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रदि अल्लाहो तआला अन्हुमा ने एक शख़्स से फरमाया कि अपने बच्चे की अच्छी तरबियत करो क्योंकि तुमसे तुम्हारी औलाद के बारे में पूछा जायेगा कि तुम ने उसकी कैसी तरबियत की और तुमने उसे क्या सिखाया।

उसके बरअक्स जो लोग अपनी औलाद की आला तरबियत को अपनी ज़िन्दगी का मिशन बना लेते हैं उनकी औलाद दुनिया व आख़िरत दोनों में उनके लिए आँखों की ठंडक साबित होती है। ऐसे वालिदैन के लिए उनकी औलाद कोई खिलौना नहीं होती बल्कि एक भारी ज़िम्मेदारी और एक मक़सद होती है, यह मक़सद बच्चे की पैदाइश के साथ ही शुरू हो जाते हैं। वह इस मक्सद के लिए हर मुमकिन कुरबानी देते हैं और अपनी मौत तक उसे जारी रखते हैं। वह अपने बच्चे को खिलौने ज़रूर दिलाते हैं मगर खुद उनके हाथों में खिलौना नहीं बनते हैं, वह अपने बच्चों की ख़्वाहिशों को मुमकिन हद तक पूरा करने की कोशिश करते हैं। साथ-साथ बच्चों को सब्र और सादगी की तलकीन भी करते हैं। वह बच्चों को आला और अच्छी तालीम ज़रूर दिलवाते हैं मगर उनकी तरबियत से हरगिज़ गाफिल नहीं होते। वह अपने बच्चों पर एतमाद तो करते हैं। मगर उनकी ज़िद के आगे मजबूर होकर उन्हें मोबाईल, टी.वी. और इन्टरनेट के गलत इस्तेमाल की हरगिज़ इजाज़त नहीं देते हैं। वह बच्चों की आज़ादी में तो हाइल नहीं होते लेकिन उन्हें खुदा की बन्दगी का सबक सिखाने में भी कोई कोताही नहीं करते। 
औलाद को अल्लाह तआला ने एक आज़माइश करार दिया है। इरशादे बारी तआला हैः

وَاعْلَمُوا أَنَّمَا أَمْوَالُكُمْ وَأَوْلَادُكُمْ فِتْنَةٌ ، وَأَنَّ اللَّهَ عِندَهُ أَجْرٌ عَظِيمٌ 
तर्जुमाः और जान लो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद एक इम्तिहान है और यह कि अल्लाह के पास बड़ा सवाब है।

इस आज़माइश में सुर्ख रुह होने का वाहिद ज़रिया औलाद की अच्छी तरबियत है। अल्लाह तआला हम सबको अपने अज़ाब से बचाये शरीअत के मुताबिक खुद को चलने और अपनी औलाद को चलाने की तौफीक अता फरमाये।
(आमीन बिजाहिन्नबीइलकरीम सल्लल्लाहो अलैहिवसल्लम)

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                    《│पोस्ट - 03│》

🪄 *तरबियत क्या है ❓* 

👉🏻लफ्जे तरबियत एक वसी मफहूम वाला लफ़्ज़ है। तरबियत का लफ़्ज़ी माना नश व नुमाँ करना। निगरानी करना, तालीम व तहज़ीब सिखाना है, इस लफ़्ज़ के तहत लोगों की तरबियत, ख़ानदान की तरबियत, मुआशरा (समाज) की तरबियत भी शामिल है। 
इंसानी तरबियत, ईमानी तरबियत, अख़लाकी तरबियत, नफ्सियाती तरबियत, अदबी तरबियत, जिस्मानी तरबियत वगैरह भी शामिल है। 
इन तमाम बातों में तरबियत का असल मक़सद उम्दा पाकीज़ा, बा-अखलाक, बा-किरदार, मुआशरेका वुजूद है। आसान लफ़्ज़ों में तरबियत को यूँ कहा जा सकता हैः

1. इंसान अपनी नीयतों में पाकीज़ा और अपनी आरजुओं में पाक हो जाये।

2. इंसान में खुद एहतिसाबी (अपने अमल की इस्लाह) का अमल जारी होकर अपने कमाल तक पहुँच जाये।

3. इंसान अपनी मरज़ी से अपने इख़्तियार का दुरुस्त इस्तेमाल करे ।

तरबियत यह है कि लोगों को उनके इन्तिख़ाब में, समझदार बनाना, लोगों को उनके पसन्द में ज़िम्मेदार बनाना हैं।

तरबियत यह है कि जब बच्चा नमाज़ पढ़े तो वह किसी ख़ौफ़ या किसी लालच की वजह से न पढ़े बल्कि नमाज़ उसका पसन्दीदा अमल हो जाये।

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                    《│पोस्ट - 04│》

🪄 *तरबियते औलाद की अहमियत* 

👉🏻आज के इस तरक्की याफ्ता दौर में हर कोई यह रोना रो रहा है कि मुआशरा बड़ा ख़राब है आज का माहौल अच्छा नहीं, और यह रोना कोई बेजा नहीं है। बल्कि सही है, लेकिन क्या सिर्फ रोने गोने से मुआशरा दुरुस्त हो जायेगा ❓
 *हरगिज़ नहीं, बल्कि मुआशरे को ठीक करने के लिए हमें अमली मेहनत करनी पड़ेगी।*
👉🏻 इस्लाहे मुआशरा के लिए सब से पहले अपने घर की इस्लाह करनी पड़ेगी अपने घर के लोगों को इस्लामी तालीम से वाकिफ़त करानी पड़ेगी। और अहकामे इस्लाम पर अमल करने की तलकीन करनी पड़ेगी और अपने बच्चों की तरबियत इब्तिदा ही से अच्छे अंदाज़ से करनी होगी। क्योंकि यही बच्चे कल खुद अपने बच्चों के माँ-बाप बनेंगे। इसलिए बचपन का जमाना इन्तिहाई अहमियत का हामिल होता है। और बच्चे ही मुआशरे के अफराद हैं। 
मुआशरे के अफराद जब सही हो जायेंगे। मुआशरा खुद बा खुद सही हो जायेगा। गोया इस से मालूम होता है कि इस्लाहे मुआशरा के लिए औलाद की तरबियत रीढ़ की हड्डी की मिस्ल है। अगर हम अपनी औलाद की इस्लाह और अच्छी तरबियत करेंगे। तो यह तरबियत रफ़्ता-रफ़्ता पूरे मुआशरे की इस्लाह हो जायेगी। लेकिन इस ज़माना में मुसलमानों में दीनी तालीम व तरबियत देने और तक़वा परहेज़गारी के बजाये सिर्फ दुनियावी उलूम व फुनून की तालीम व तरबियत पर भरपूर तवज्जो देने की बीमारी आम हो गई है। 
लेकिन अल्लाह तआला कुरआन-ए-मजीद में इरशाद फरमाया हैः
 तर्जुमाः क्या यह ख़्याल कर रहे हैं कि वह जो हम माल और बेटों के साथ उनकी मदद कर रहे हैं तो उनके लिए भलाईयों में जल्दी कर रहे हैं बल्कि उनकों ख़बर नहीं। (सूरह मोमिनून 55, 56 कन्जुल इरफान)

लिहाज़ा मुरब्बी को चाहिए कि बच्चे की तालीम व तरबियत इस्लामी तरीके के मुताबिक अपने ऊपर वाजिब समझें ताकि बच्चे दुनिया व आख़िरत के लिए भलाई का सबब बनें।

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                    《│पोस्ट - 05│》

🪄 *तरबियते औलाद क्यों जरूरी है ❓* 

👉🏻हमारा सब से बड़ा सरमाया और एक कीमती दौलत हमारी औलाद है, उन्हें अच्छी और स्वालेह तरबियत देना जहाँ हमारी आख़िरत की बेहतरी की ज़मानत है वहीं हमारे बुढ़ापे का हुस्न और राहत व आरामदाह और मुआशरती इज़्ज़त का ज़ीया भी हैं। बहुत सारे लोग सुबह से लेकर शाम तक एक ही फिक्र में सारा वक़्त काट देते हैं कि दौलत कैसे कमाई जाये। और किस तरह माल जमा किया जाये, और यह माल औलाद के लिए जमा कर रहे होते हैं, लेकिन जिस औलाद के लिए माल जमा कर रहे थे, वो औलाद बिगड़ गई, शैतान के जाल में फंस गई बुरे अख़लाक का हामिल हो गई। फिर हम सोचते हैं कि जिसके लिए दिन और रात एक कर के कमाया अपना चैन गंवाया अपनी जवानी भी गँवा दी, इन हसीन लम्हों से लुत्फ अन्दोज़ होने के वजाये एक मज़दूर की तरह काम करते रहे तो आज वह औलाद हमारे बुढ़ापे का सहारा नहीं बल्कि हमारे लिए रुसवाई, जिल्लत, सूऊबत और परेशानी दुख व सदमे का ज़रीआ बन रही है। काश हमने अपनी औलाद को अच्छे अखलाक और खूबसूरत किरदार सिखाए होते, उसका नतीजा हम अपनी आँखोंसे देख पाते इस्लाम एक मुकम्मल दीन है। 
उसने अपने मानने वालों की तमाम ज़िन्दगी के हिस्से में पूरी रहनुमाई की है। 
हमें औलाद की तरबियत और उन्हें अच्छे अखलाक का खूगर बनाने के लिए मुसलसल जिद्देजहद करने की तरगीब दी है। ताकि हमारी औलाद एक अच्छे मुआशरे की शक्ल का सबब बने। और हम उस औलाद से दुनिया में इज़्ज़त और फरहत व सुरूर की खुशबू से मोअत्तर हों और हमारी कब्र का चिराग भी रौशन हो और आख़िरत में हमारी इज़्ज़त अफ़‌ज़ाई और बख़्शिश का जरिया बने ।

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