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*परेशान मुसलमान*
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《│पोस्ट - 01│》
🪄 अब्दुल्लाह आज बहुत परेशान है और वह परेशानी यह है कि मुसलमानों में बहुत से फिरके हो गए हैं और हर फिरका अपने आपको हक पर बताता है और एक दूसरे को बुरा भला कहता है। आख़िर यह माजरा क्या है ?अब्दुल्लाह सोच रहा है कि क्या सब हक पर हैं, क्या यह मौलवियों के आपस के झगड़े हैं क्या हमें इसमें नहीं पड़ना चाहिए या सब खाने चाटने के धंधे हैं, आख़िर जायें तो कहाँ जायें। यही सब सोचते सोचते उसे ख़्याल आया कि क्यूँ न मुफ्ती साहब से इस बारे में दरयाफ्त किया जाए और यही सोचते हुए वह मुफ़्ती साहब के घर की तरफ चल दिया।
मुफ़्ती साहब बहुत नेक आदमी हैं। लोगों को मसाइल बताना फतवे देना उनका शौक है, बड़ी दूर दूर से लोग उनके पास फतवा लेने आते हैं, लोग उनसे दुआयें कराने भी आते हैं और उनकी दुआओं में असर भी देखा गया है।
जब अब्दुल्लाह मुफ्ती साहब के घर पहुँचा तो कई लोग अपने अपने काम से आए बैठे थे। मुफ्ती साहब उनसे दीनी गुफ़्तगू कर रहे थे। अब्दुल्लाह भी सलाम व मुसाफा करके बैठ गया। मुफ्ती साहब ने बड़े प्यार से पूछा कि कैसे आना हुआ। तो उसने कहा आप फारिग हो जायें तो बातचीत करें। लोग आते रहे जाते रहे। कुछ देर बात मुफ्ती साहब अब्दुल्लाह की तरफ मुखातिब हुए और कहा साहबजादे फरमाइये। उसने कहा मैंने सोचा कि कुछ फुरसत हो जाए तो पूहूँ तो ज़्यादा बेहत्तर है मगर उन्होंने जोर दिया जोर दिया कि नहीं सबके सामने ही पूछें। और साथ ही एक खादिम को चाय वगैरह लाने को कहा। अब्दुल्लाह जो सोच रहा था वही बात मुफ़्ती साहब के सामने दोहराना शुरू किया।
*मुफ्ती साहब* जैसे सब समझ गए फरमाने लगे आज इल्म की कमी ने हमें यहाँ लाकर खड़ा कर दिया है कि हमें हक को पहचानना मुश्किल हो गया है। आज हम दुनियावी तालीम पर तो हज़ारों रूपये खर्च करते हैं मगर दीनी तालीम जो ज़रूरी है और मुफ़्त मिलती है उसे हासिल नहीं करना चाहते।
*अब्दुल्लाह :* जी हाँ आप बिल्कुल ठीक फरमा रहे हैं, हजारों नहीं बल्कि लाखों रूपये तो कुछ लोग सिर्फ दाखिले के लिए रिशवत्त देते हैं और दीनी तालीम मुफ्त मिले तो दूर भाग रहे हैं।
*मुफ्ती साहब :* अल्लाह व रसूल ने दुनियावी तालीम को मना नहीं फरमाया मगर वह इल्मे दीन जो तुम पर फर्ज़ है उसे छोड़ कर सालों मेहनत करके ज़रूरत से ज़्यादा डिग्री इकट्ठा करना जो कि सब डिग्रीयाँ हमारे काम भी न आयें, कुछ दिनों बाद भूल जायें कि क्या पढ़ा उन्हें इकट्ठा करना अक्लमन्दी नहीं।
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《│पोस्ट - 02│》
🪄 *अब्दुल्लाह -* नहीं साहब पढ़ाई बहुत ज़रूरी है आजकल बेपढ़े की कहीं गुज़र नहीं। हम देखते हैं कि अंगूठाटेक बेचारे कितना परेशान रहते हैं।
*मुफ्ती साहब -* आप गलत समझ रहे हैं मैं दुनियावी तालीम का मुखालिफ (विरोधी) नहीं बल्कि मैं तो कहता हूँ कि मौलवीयों को भी इलाकाई ज़बान और इन्टरनेशनल जबान शायद इंगलिश ज़रूर सीखना चाहिए लेकिन पहले वह सीखें जो हम पर फर्ज़ है।
*अब्दुल्लाह -* क्या मौलवी बनना फर्ज है ?
*मुफ्ती साहब -* मेरा मतलब यह नहीं है बल्कि मैं यह कहना चाहता हूँ कि ज़रूरत के मुताबिक इल्मे दीन सीखना हम पर फर्ज़ है।
*अब्दुल्लाह -* मैं समझ नहीं पा रहा ज़रा वज़ाहत करें।
*मुफ्ती साहब -* बहुत तफसील में न जाकर मेरा कहने का मतलब यह है कि हम पर अल्लाह व रसूल के बारे में बुनियादी अकाइद जानना, कब्र का अज़ाब सवाब, जन्नत दोज़ख़ कियामत के बारे में जानना, वुजु, गुस्ल, पाकी नापाकी, नमाज़, रोज़ा के मसाइल सीखना फर्ज़ है। जब हम पर हज व ज़कात फर्ज हो तो उसके मसाइल सीखना हम पर फर्ज़ है। मुख़्तसर यूँ समझें कि शरीअत पर चलने के लिए जिन जिन मसाइल की जरूरत पड़ती जाए उन मसाइल का सीखना हम पर फर्ज़ है।
*अब्दुल्लाह -* जैसे।
*मुफ्ती साहब -* जैसे सलाम करना, खाने पीने लिबास के मसाइल। कारोबार करने चलें तो कारोबार के मसाइल। निकाह करने के चलें तो निकाह व तलाक के ज़रूरी मसाइल वगैरह वगैरह।
*अब्दुल्लाह -* फिरकों के बारे में जानना क्या फर्ज़ है?
*मुफ्ती साहब -* इस दौर में यह बहुत ज़रूरी है, हाँ बल्कि फर्ज ही कहिए वह इस लिए कि अगर इस बारे में न जानेगा और अपनी कमइल्मी की वजह से किसी बदमज़हब फिरके को मानने लगा तो एक वक्त ऐसा आएगा कि ईमान से हाथ धो बैठेगा और अगर ईमान चला गया तो सब अमल बेकार हैं। यह जानना फर्ज़ है कि अहले सुन्नत के अलावा बाकी सभी फिरके झूटे बालिल गुमराह जहन्नमी हैं।
*अब्दुल्लाह -* हज़रत वो सब कलिमा "ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह" के पढ़ने वाले हैं मेरी समझ में नहीं आ रहा कि सब जहन्नमी कैसे हैं।
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《│पोस्ट - 03│》
🪄 *मुफ्ती साहब -* हिन्दुस्तान पाकिस्तान के आस पास तीन बदमज़हब फिरके ज़्यादा पाए जाते हैं! 1. राफज़ी 2. कादयानी 3. वहाबी (देवबन्दी और तबलीगी जमाअत वाले, अहले हदीस, जमाते इस्लामी यानी मौदूदी जमात सब वहाबियों की शाखें हैं)
राफज़ी तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के सहाबा की तौहीन करके काफिर हुए, मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादयानी को नबी मानकर कादयानी काफिर व मूरतद हुए, वहाबी अल्लाह व रसूल की तौहीन करके और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बारे में बुनियादी अकाइद जैसे इल्मे गैब व हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इख़्तेयारात को न मान कर काफिर व मुरतद हो गए।
*अब्दुल्लाह -* मुरतद किसे कहते हैं?
*मुफ़्ती साहब -* जो सब कुछ जान कर कुफ्र करे और दावा मुसलमान होने का करे मुरतद कहलाता है।
*अब्दुल्लाह -* कुछ लोग कहते हैं कि किसी को काफिर नहीं कहना चाहिए कि क्या मालूम वह कब ईमान ले आए।
*मुफ्ती साहब -* क़ुरआन ने काफिर को काफिर, बुरे को बुरा कहा है। चोर को चोर, डाकू को डाकू और शैतान को शैतान ही कहा जाता है। यूँ तो मुसलामान को मुसलमान भी न कहो कि क्या पता कब काफिर हो जाए। मुसलमान को मुसलमान काफिर को काफिर जानना जरूरयाते दीन में से हैं। यानी किसी मुसलमान को काफिर या काफिर को मुसलमान जानना खुद कुफ्र है। किसी मुसलमान को काफिर कहा और वह वाकई मुसलमान है तो कहने वाले पर कुफ्र का हुक्म लगाया जाएगा। इसी तरह किसी काफिर को मुसलमान कहा और वह काफिर है तो कहने वाले पर कुफ्र का हुक्म लगेगा। इसलिए किसी खास शख्स का नाम लेकर काफिर कहने से बचना चाहिए चूंकि अगर वह काफिर नहीं तो यह फतवा कहने वाले पर उल्टा पड़ता है। अगर किसी ख़ास शख़्स को काफिर कहे तो सुबूत पेश करना पड़ेगा। हाँ अगर किसी के बारे में शक है तो ख़ामोश रहना बेहतर है। ग़र्ज़ यह कि इस मसअले में बहुत एहतियात की ज़रूरत है मगर वो सारे फिरके जो अल्लाह व रसूल की शान में तौहीन करते हैं वो सारे के सारे मुरतद व काफिर हैं साथ ही सब कुछ जानने के बाद भी जो उन्हें मुसलमान समझे काफिर न समझे वह भी काफिर है।
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《│पोस्ट - 04│》
🪄 *अब्दुल्लाह -* कहीं यह ग़ीबत तो नहीं ?
*मुफ्ती साहब -* हरगिज़ नहीं यह गीबत नहीं बल्कि ऐसी गीबत भी जाइज़ बल्कि सवाब है। उसकी ग़ीबत करना सही है जिससे किसी मुसलमान को नुक्सान का अन्देशा हो और यहाँ मुसलमान के ईमान जाने का अन्देशा है। ऐसे लोगों से मुसलमानों को होशयार करना बड़े सवाब का काम है।
*अब्दुल्लाह -* शायद मैं बीच बीच में सवाल करके मौजू से हट जाता हूँ मैं जिस बात को लेकर परेशान हूं उसका जवाब दें।
*मुफ्ती साहब -* देखिए सहबजादे सबसे पहले तो यह बात दिमाग में बैठा लीजिए कि ईमान से बढ़ कर कोई चीज़ नहीं, ईमान गया तो समझिए कि सब कुछ लुट गया बरबाद हो गया हमेशा के लिए जहन्नमी हो गया आग में जलेगा थूहड़, खून व पीप और खौलता पानी उसकी खुराक।
तुम्हारा रब फरमाता है बेशक जिन्होंने कुफ्र किया और अल्लाह की राह से रोका फिर काफिर ही मर गए तो अल्लाह हरगिज उन्हें न बख़्शेगा। (सूरए मुहम्मद)
अल्लाह और उसके हबीब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रहम-ओ-करम से जिसे ईमान की दौलत नसीब हुई वह दुनिया के उन खुश नसीबों में से है जिसे अशरफुल मखलूकात यानी अल्लाह तआला की मख़लूक में सबसे अफज़ल कहा गया है और यह सदका है मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का।
ईमान शर्त है नेक आमाल के क़बूल होने की, ईमान शर्त है नमाज़ों के क़बूल होने की, रोज़े के मकबूल होने की हज व ज़कात क़बूल होने की। जिनके पास ईमान नहीं उनके नेक अमल बेकार हैं वह सारी ज़िन्दगी भी सजदे में रहें तो उनके कुछ काम न आएगा।
ईमान वाला गुनाहगार भी सय्यदे आलम (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की शफाअत और करम से और उनके सदके में एक न एक दिन जन्नत में जुरूर जाएगा। ईमान वालों के लिए ही हमेशगी है जन्नत में। ईमान वालों के लिए कुरआन है ईमान वालों को अल्लाह पाक ने कुरआन में जगह-जगह "ऐ ईमान वालो" कहकर नेक अमल करने के लिये इर्शाद फरमाया है। ईमान वालों ही के लिये जन्नत की खुशखबरी है दोज़ख से नजात है बिना ईमान के नेक अमल मकबूल नहीं हैं।
ईमान वाला अशरफुल मखलूकात है तो बेईमान सबसे बदतरीन मखलूक है, बेईमान जानवरों से भी बदतर है। बेईमान हमेशा जहन्नम में रहेंगे ख्वाह कैसे भी नेक अमल किये हों।
ईमान जन्नत में जाने की पहली और जरूरी सीढ़ी है। बेईमान जन्नत की खुशबु भी न पा सकेंगा। ईमान वालों के लिये सबसे बड़ी नेमत अपने प्यारे रब का दीदार है। यहाँ एक बात बहुत ज्यादा ध्यान देने की है कि अगर इन्सान से एक बात भी कुफ्र की हो जाती है तो उसके हाथ से ईमान निकल जाता है ऐसी हालत में फौरन उस बात से तोबा करके कलिमा-ए-तय्यबा "ला इलाहा इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह" कहकर फिर ईमान में दाखिल हो जाना चाहिये।
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《│पोस्ट - 05│》
🪄 *मुफ्ती साहब -* आम मुसलमान यह जानता है, नहीं जानता तो जान ले कि अल्लाह तआला ने इन्सान को अपनी इबादत के लिये पैदा फरमाया है और वह उसका इम्तिहान भी लेगा और इम्तिहान में बड़े से बड़े गुनाह को अगर चाहेगा तो माफ फरमा देगा मगर कुफ्र व शिर्क को न बख़्शेगा और काफिर हमेशा जहन्नम में रहेगें। लिहाजा ईमान पर रहना उसे बचाये रखना सारी ज़रूरतों में सबसे अहम है। इबादतें ईमान वालों ही की कुबूल हैं नाकि बेईमान की।
याद रखिये दुनिया में दो किस्म के लोग हैं मुसलमान (यानी ईमान वाले) और काफिर, बीच वाले कोई नहीं सिर्फ एक कुफ्र इन्सान को काफिर बना देता है अगर कोई शख़्स हज़ारों काम नेकी के करता है और किसी एक कुफ्र पर कायम रहता है और यूहीं बिना तौबा के मर जाता है तो वह कयामत में काफिर उठेगा और हमेशा हमेशा के लिये दोज़ख में रहेगा।
यहाँ कहना यह है कि सब कुछ चला जाय मगर किसी भी कीमत पर ईमान हरगिज-हरगिज न जाय, कोई भी बात ऐसी न हो कि आदमी इस्लाम के दायरे से बाहर हो जाए, अगर कोई भी बात ऐसी मुँह से निकल जाए या हो जाय तो फौरन जल्द से जल्द तौबा करके कलिमा पढ़कर फिर से दायर ए इस्लाम में दाखिल हो जाना चाहिए।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* आपने बहुत ही अच्छी तरह समझा दिया कि ईमान नहीं तो कुछ नहीं हमे अपने अमल से ज़्यादा ईमान की फिक्र रखना चाहिए। अब तो मेरी फिक्र और ज़्यादा बढ़ गई कि कहीं ऐसी बातें करके मेरा ईमान तो नहीं चला गया।
👉🏻 *मुफ़्ती साहब -* नहीं, यह फिक्र आपके ईमान की दलील है अब आप पर यह सब जानना और ज़्यादा ज़रूरी हो गया।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* राफज़ी कादयानी तो नहीं हाँ वहाबी फिरके के बारे में बताइये।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* बहुत सी हदीसों में इस फिरके के बारे में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लमल ने पहले ही बता दिया था और यह भी बताया था कि मेरी उम्मत 73 फिरकों में बट जाएगी जिसमें एक फिरका हक पर होगा।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* क्या यह हदीस में है कि 73 फिरके हो जायेंगे।
👉🏻 *मुफ़्ती साहब -* इस हदीस को सभी फिरके मानते हैं।
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《│पोस्ट - 06│》
🪄 *अब्दुल्लाह -* अच्छा अब यह बताइये कि इस वहाबी फिरके की शुरूआत कहाँ से है ?
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* इस बेदीन वहाबी फिरके की इब्तिदा इबलीस लईन से है कि अल्लाह तआला ने सय्येदिना आदम अलैहिस्सलाम की ताज़ीम का हुक्म दिया और मलऊन ने न माना और ज़मानए इस्लाम में इसका हादी जुलखवेसरा तमीमी हुआ जिसने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शान में तौहीनी कलमा कहा और उसके बाद पूरा गिरोह ख़वारिज का उस तरीके पर चला जिनको अमीरुल मोमनीन मौला अली ने कत्ल फरमाया। लोगों ने कहा हम्द अल्लाह को जिसने उन की नजासतों से ज़मीन को पाक किया। अमीरुल मोमनीन ने फरमाया यह मुनकता नहीं हुए अभी उनमें के माओं के पेटों में हैं, बापों की पीठों में हैं जब इनमें की एक संगत काट दी जाएगी दूसरी सर उठाएगी, यहाँ तक कि इनका पिछला गिरोह दज्जाल के साथ निकलेगा। बारहवीं सदी के आख़िर में इब्ने अब्दुल वहाब नजदी इस गिरोह का सरगना हुआ।
यह फितना बारह सौ नौ हिजरी (1209) में शुरु हुआ इस मज़हब का गुरु घंटाल अब्दुल वहाब नजदी का बेटा मोहम्मद था। उसने तमाम अरब और खास कर हरमैन शरीफैन में बहुत ज़्यादा फितने फैलाए। आलिमों को कत्ल किया। सहाबा, इमामों, आलिमों और शहीदों की कब्रें खोद डालीं। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रौज़े का नाम सनमे अकबर (बड़ा बुत) रखा था। अल्लामा शामी रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने उसे खारजी बताया।
उस अबदुल वहाब के बेटे ने एक किताब लिखी जिसका नाम "किताबुत्तौहीद" रखा उसका तर्जमा हिन्दुस्तान, में मौ. इस्माइल देहलवी ने किया जिसका नाम "तकवीयतुल ईमान" रखा और हिन्दुस्तान में वहाबियत इसी ने फैलाई। इन वहाबीयों का एक बहुत बड़ा अकीदा यह है कि जो उनके मज़हब पर न हो वह काफिर है। मुशरिक है। यही वजह है कि बात-बात पर बिला वजह मुसलमानों पर कुफ्र और शिर्क का हुक्म लगाते और तमाम दुनिया को मुशरिक बताते हैं। आजकल तरह तरह के नाम से वहाबियों की शाखें पैदा हो चुकी हैं जैसे जैसे तबलीगी जमात, मौदूदी जमाम (जमाते इस्लामी), अहले हदीस और देवबन्दी वगैरह।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* क्या वाकई इन्होने कुफ्री बातें लिखी हैं।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* नामालूम इन लोगों ने क्या क्या लिखा है में इनकी चन्द इबारतें आपको दिखाता हूँ और चैलेन्ज के साथ कहता हूँ कि यह किताबें देवबन्द से आज भी छपती हैं आप यहाँ पर सिर्फ देख लीजिए और देवबन्द जाकर या डाक से मंगा कर इसकी तसदीक कीजिए हालांकि सुनने में आया है कि इनमें से कुछ इबारतें अब नए एडीशन में निकाल दी गई हैं मगर इनके अकाइद वही हैं। बात बात पर शिर्क लगाना, वसीले का इन्कार करना, हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इल्मे गैब को न मानना, अल्लाह ने उन्हें जो इख़्तेयार दिए उनका इन्कार करना, हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत का इन्कार करना, हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को माज़ल्लाह मुर्दा जानना, उनसे मदद मांगने को शिर्क बताना वगैरह वगैरह आज भी इनके मदरसों में पढ़ाया जाता है।
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《│पोस्ट - 07│》
🪄 *अब्दुल्लाह -* हमने तो सुना है कि सुन्नी वहाबी झगड़ा न्याज़ नज़र, फातिहा, तीजा, चालीसवाँ, उर्स, मज़ारात पर जाना, ताज़ियादारी वगैरह का है आप तो कुछ और ही बता रहे हैं।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* हाँ इन फुरूई मसाइल में हमारा उनसे इख़्तेलाफ है मगर हमारा अस्ल झगड़ा इसी बात का है कि यह अपनी किताबों में अल्लाह व रसूल की तौहीन करके काफिर व मुरतद हैं और इसका सुबूत में आपको दिखा चुका।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* सुबूत तो है मगर जब उनकी बातें सुनों तो लगता है कि हम सुन्नी गलत है और कहीं कहीं शिर्क में मुबतला हैं और शिर्क कभी न बख़्शा जाएगा।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* बेशक कुफ्र व शिर्क कभी न बख़्श जाएगा।
काफिर व मुशरिक हमेशा जहन्नम में रहेंगे वो हमें ज़बरदस्ती मुशरिक बनाने पर उतारू हैं जो बातें वह शिर्क बताते हैं उनमें से सभी शिर्क नहीं और जो वाकई शिर्क हैं वह हम कभी नहीं करते न करेंगे हमारे ऊपर झूटा इल्जाम है।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* नज़र तो यही आता है जैसे हम शिर्क कर रहे हैं। कुछ लोग यह कहते हैं कि यह मौलवियों की लड़ाई है इन चक्करों में नहीं पड़ना चाहिए?
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* हाँ कुछ लोग आपको ऐसे मिलेंगे जो कहेगें कि मियाँ क्यूँ इन झगड़ों में पड़ते हो यह सब तो मौलवियों की लड़ाई है। बाज़ कहेंगे चार इमामों के इख़्तेलाफात हैं। याद रखिए ऐसा हरगिज़ हरगिज़ नहीं है चारों इमाम (हज़रत इमामे आज़म इमाम अबू हनीफा, हज़रत इमाम शाफई, हज़रत इमाम हम्बल और हज़रत इमाम मालिक रहमतुल्लाहि तआला अलैहिम) हक पर हैं और इनके आपसी इख़्तिलाफ अकाइद पर हरगिज़ नहीं इन चारों की नज़र में अल्लाह रसूल की तौहीन करने वाला काफिर व मुरतद है यह लोग बेवजह किसी पर कुफ्र और शिर्क नहीं लगाते। इन्होंने हमेशा हक फरमाया। यह चारों अहले सुन्नत व जमात के इमाम हैं।
कुछ लोग यह कहते हैं कि मियाँ अपनी दुकानें चमकाने को मौलवियों ने यह झगड़े पैदा कर दिए हैं इनमें मत पड़ा करो। कुछ लोग आपको इस तरह बहकायेंगे कि देखो मज़ारात पर चन्दा शीरीनी वगैरा या नियाज़ के हलवे मांडे का झगड़ा है या यह कहेंगे कि मौलवियों ने आपस में लड़वाने को ये तरह तरह की बातें पैदा कर दी हैं।
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《│पोस्ट - 08│》
🪄 *अब्दुल्लाह -* आख़िर झगड़ा है किस बात का ?
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* याद रखिए अस्ल इख़्तेलाफ है मुसलमान और मुरतद में फर्क का। अहले सुन्नत वल जमाअत ही सही रास्ते पर यानी अल्लाह व रसूल सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के रास्ते पर है। हम कहते हैं कि वहाबी देवबन्दीयों ने अल्लाह और उसके रसूल की शान में गुस्ताखियाँ कीं और कर रहे हैं जिसका सुबूत उनकी किताबें हैं। वह शख़्स मुसलमान है जो अल्लाह और रसूल की शान में गुस्ताखी को कुफ्र और गुस्ताखी करने वाले को काफिर जानता है। बहुत से लोग ऐसे मिलेंगे जो कहेगें कि हम ऐसा नहीं करते और हमारे ऊपर इल्जाम है तो उनको आप इनकी किताबें या हवालों की फोटो कापी दिखा सकते हैं और फिर उनसे पूछिए कि अब क्या कहते हो। अब अगर वह हीले बहाने बनाए तो समझ लीजिए कि उसके दिल में ख़लिश है और फिर भी वह इन इबारतों को कुफ्र न बताए या ऐसा लिखने वाले को काफिर न जाने तो वह मुरतद है और वही है जिसके बारे में सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पहले ही फरमा चुके हैं।
यहाँ एक बात मैं और कहना चाहूँगा उन लोगों से जो यह कहते हैं कि यह सब झूठ है और ऐसा कुछ भी नहीं लिखा गया, वह बात यह है कि दो बातें हो सकतों है या तो यह सच है या झूट है यानी या तो ऐसा लिखा गया या नहीं। अगर सच है तो इन बातों से तौबा करो कि यह हुजूर की शान में खुली तौहीन हैं और अगर यह बातें झूट हैं यानी सुन्नियों ने अपनी तरफ से यह बातें गढ़ दीं है और देवबन्दियों का नाम लेकर छापं दीं हैं तो फिर तो यह बहुत हीं जलील काम किया जिसने भी किया लेकिन अफ़सोस तो यह है कि आज भी ये किताबें छप रहीं हैं और बिक रहीं हैं और बिल फर्ज़ ऐसा है भी तो सुन्नी मुसलमान कहाँ रहें ऐसा करने से तो फिर देवबन्दी वहाबी लोग हम सुन्नियों के पीछे नमाज़ क्यूँ पढ़ते हैं उनसे निकाह वगैरा क्यूँ करते हैं। मैं आपको वह किताबें दिखाता हूँ जहाँ इन्होंने बकवास की है। मैं आपको सुबूत के लिए सिर्फ चन्द ही किताबें दिखऊँगा अगर आपको शक लगे तो खुद बाजार से खरीद कर देखिएगा कि में झूठ तो नही कह रहा।
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《│पोस्ट - 09│》
🪄 *मुफ़्ती साहब -* देखिए यह इनकी किताब 'यक रोज़ा' जो मौ इस्माईल देहलवी की है इसमे अल्लाह तआला के झूट बोलने को मुमकिन कहा जा रहा है।
दूसरी किताब 'बराहीने कातेआ' है जिसमें शैतान के इल्म को तो नस्स से माना जा रहा है और हुजूर के इल्म को शिर्क कहा गया है।
तीसरी किताब सिराते मुस्तकीम हैं जो उर्दू और फारसी में अलग अलग है जिसमें यह कहा गया है कि नमाज़ में हुजूर का ख़्याल आ जाए तो नमाज़ न होगी भले ही गधे घोड़े और बीवी से हमबिस्तरी का ख़्याल हो जाए तो नमाज़ हो जाएगी।
चौथी किताब हिफजुल ईमान है जिसमें हुजूर के इल्म को पागलो बच्चों और मजनूनों का सा बताया गया है।
पांचवी किताब तहज़ीरुन्नास है इसमें हुजूर के आखरी नबी होने का इन्कार है।
छठीं किताब तक्वीयतुल ईमान है इसमें नीचे लिखी बातें हैं :-
1.हर मख़लूक अल्लाह के आगे चमार से ज़्यादा जलील।
2.जिसका नाम मुहम्मद या अली हो वह किसी चीज़ का मुख्तार नहीं
3.हुजूर गंवार की बात सुनकर मारे दहशत के बदहवास हो गए।
4.बुजुर्गों की ताज़ीम ऐसी करो जैसे बड़े भाई की।
5.हुजूर के लिए मर कर मिट्टी में मिलना लिखा गया है।
सातवीं किताब फतावा रशीदिया में है कि होली दिवाली की पूरियाँ खाना और हिन्दू के प्याऊ से पानी पीना जाइज़ और नियाज़ नज़र का खाना हराम और सबील का पानी और दूध पीना हराम। और यह भी लिखा है कि इस उर्स तक में जाना हराम है जिसमें क़ुरआन ख़्वानी हो और मिठाई बटे।
किताबें तो बहुत हैं मगर और यह आठवीं और आख़री देख लें जिसमें मो अशरफ अली थानवी अपने एक मुरीद से अपने लिए कलिमा पढ़वा रहे हैं। अस्ल लड़ाई हमारी यह है।
नोट : इन कुफ्री इबारतों की फोटोकापी किताब के आख़िर में देखें।
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《│पोस्ट - 10│》
🪄 *मुफ्ती साहब -* अब कुछ ख़ास इन नजदियों के बारे में हदीस व पेशगोई सुने।
*हदीस :* हज़रत अबदुल्लाह इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से हज़रत इमाम बुखारी ने यह हदीस नकल की है कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने शाम और यमन के लिए दुआ फरमाई जिसके अलफाज़ यह हैं:-"खुदावन्दा हमारे शाम और यमन में बरकत नाज़िल फरमा" (दुआ करते वक्त नज्द के कुछ लोग बैठे हुये थे) उन्होने अर्ज किया और हमारे नज्द में या रसूलल्लाह !
इस पर हुजूर ने इर्शाद फरमाया "ख़ुदावन्दा हमारे शाम और यमन में बरकत नाज़िल फरमा" फिर दुबारा नज्द के लोगों ने अर्ज किया और हमारे नज्द में या रसूलल्लाह ! रावी (रिवायत बयान करने वाला) का बयान है कि तीसरी मरतबा में हुजूर ने फरमाया वह ज़लज़लों और फितनों की जगह है और वहाँ से शैतान की सींध निकलेगी।" (बुखारी शरीफ)
*हदीस :* अल्लामा दहलान रहमतुल्लाहि तआला अलैह अपनी किताब अद्दुररुस्सुन्नीय्या में फरमाते हैं कि हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्ल्म ने इरशाद फरमाया :-"कुछ लोग मशरिक की सम्त से जाहिर होंगे जो कुरआन पढ़ेंगे, लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा। जब उनका एक गिरोह ख़त्म हो जाएगा तो वहीं से दूसरा जन्म लेगा यहाँ तक कि उनका आखरी दस्ता दज्जाल के साथ उठेगा।"
*हदीस :* मिशकात शरीफ में हज़रते अबू सईद खुदरी रदियल्लाहु तआला अन्हु से मनकूल है वह कहते हैं कि हम लोग हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर थे और हुजूर माले गनीमत तकसीम फरमा रहे थे कि "जुल्खवेसिरा" नाम का एक शख़्स जो कबीला बनी तमीम का रहने वाला था आया और कहा ऐ अल्लाह के रसूल इन्साफ से काम लो। हुजुर ने फरमाया "अफसोस तेरी जसारत (जुर्रत, हिम्मत) पर मैं ही इन्साफ नहीं करूँगा तो और कौन इन्साफ करने वाला है। अगर मैं इन्साफ नहीं करता तो तू खाएब व खासिर (तहस-नहस) हो चुका होता।" हज़रते उमर से जब नहीं रहा गया तो उन्होंने अर्ज किया कि हुजूर मुझे इजाज़त दीजिए मैं इसकी गर्दन मार दूँ।
हुजूर ने फरमाया इसे छोड़ दो यह अकेला नहीं है इसको बहुत से साथी हैं जिनकी नमाज़ों और रोज़ों को देखकर तुम अपनी नमाज़ों और रोज़ों को हकीर समझोगे, वह क़ुरआन पढ़ेंगे लेकिन उनके हलक से के नीचे नहीं उतरेगा। यानी इन सारी जाहिरी खुबियों के बावजूद वह दीन से ऐसे निकल जाएगें जैसे तीर से शिकार निकल जाता है।
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《│पोस्ट - 11│》
🪄 *हदीस -* हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि मेरी उम्मत में इख़्तेलाफ व तफरीक का वाकेए होना मुकद्दर हो चुका है पस इस सिलसिले में एक गिरोह निकलेगा जिसकी बातें बज़ाहिर दिलफरेब खुशनुमा होगीं लेकिन किरदार गुमराहकुन और खराब होगा वह कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक से नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाएगें जैसे तीर शिकार से निकल जाता है फिर दीन की तरफ लौटना उन्हें नसीब न होगा यहाँ तक कि तीर अपने कमान की तरफ लौट आए। हदीस की मुराद यह है कि उनका दीन की तरफ लौटना मुहाल है जैसे तीर का लौटना मुहाल है वह अपनी तबीयत व सरिश्त के लिहाज से बदतरीन मख़लूक होगें। वह लोगों को कुरआन और दीन की तरफ बुलाएगें हांलाकि दीन से उनका कोई तअल्लुक न होगा जो उनसे जंग करेगा वह ख़ुदा का मुर्कीबतरीन बन्दा होगा। सहाबा ने फरमाया उनकी ख़ास पहचान क्या होगी या
रसूलल्लाह ! फरमाया सर मुंडाना ।
*हदीस -* इस हदीस की खुसूसियत यह है कि अस्ल हदीस बयान करने से पहले हदीस के रावी हज़रते अली रदियल्लाहु तआला अन्हु ने फरमाया कि क़सम खुदा की आसमान से ज़मीन पर गिर पड़ना मेरे लिए आसान है लेकिन हुजूर की तरफ कोई झूठी बात मनसूब करना बहुत मुश्किल है। इसके बाद अस्ल हदीस का सिलसिला यूँ शुरु होता है फरमाते हैं :-
"मैंने हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को यह फरमाते सुना कि आख़िर ज़माने में नौ उम्र और कम समझ लोगों की एक जमाअत निकलेगी, बातें वह बज़ाहिर अच्छी करेगें लेकिन ईमान उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाऐगें जैसे तीर से शिकार निकल जाता है।"
इस हदीस में उम्मत से उम्मते दावत मुराद है यानी वो लोग मुराद हैं जिनको ईमान और अहकामे इस्लाम की दावत देने के लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को भेजा गया। इस मअना में काफिर भी दाखिल हैं। दूसरा मअना उम्मते इजाबत यानी जो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर ईमान लाए और उनकी बात दिल से कबूल की इसमें गैर मुस्लिम दाखिल नहीं।
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《│पोस्ट - 12│》
🪄 *हदीस -* हजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया "आखिर ज़माने में कीड़े-मकोड़े की तरह हर तरफ, 'मुल्लाने' फूट पड़ेगें। बस तुममें से जो शख़्स वह जमाना पाए तो उसे चाहिए कि वह उनसे ख़ुदा की पनाह मागें।
गैब की ख़बरें देने वाले हम हमारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इन मुबारक हदीसों से साफ तौर पर यह ख़बरें पहले ही दे दी गई कि इस उम्मत का 73 फिरकों में बंटना मुकद्दर हो चुका है। (जिसमें सिर्फ एक फिरका हक पा होगा) सुन्नत को बिदअत कहा जाएगा, हलाल को हराम कहा जाएगा, लोग सुबह इस्लाम पर कुफ्र पर शाम करेंगे, बे-पनाह फितने बरसेंगे कोई फितनों से बच न पाएगा, नज्द से फितना उठेगा, ऐसे लोग ज़ाहिर होगें जो बज़ाहिर नमाज़ी, रोज़ा रखने वाले, कुरआन पढ़ने वाले, दीन की तरफ बुलाने वाले होगें मगर उनके पास ईमान न होगा और यह भी कि ऐसे लोगों की इबादत के आगे तुम अपनी इबादत को हकीर जानोगे आखिर ज़माने मैं मुल्लाने कीड़े-मकोड़े की तरह निकलेंगे और इनका आखरी दस्तः दज्जाल के साथ निकलेगा।
खूब गौर करके देखो इन हदीसों की रोशनी में कि वह जन्नती फिरका कौन सा है जिस पर हमें और आपको कायम रहना है और वह 72 फिरके कौन हैं जिनसे दूर रहना है। चूंकि ईमान की सलामती के लिये यह जुरूरी और बहुत ज़्यादा जुरूरी क्योंकि अगर तुम किसी ऐसे के बहकावे में आ गए जो बातिलों में से हैं तो तुम्हारा नमाज़, रोज़ा, हज, ज़कात और तमाम नेक अमाल बेकार हो जाएगें चूंकि आमाल को मकबूलियत ईमान पर मुनहसिर है। होशयार इन दिखावे की इबादत वालों के बहकावे में न आना यह ईमान के दुश्मन तुम्हारा ईमान लेने की फिक्र में हैं एक यही वह दौलत है जिस पर तुम् जितना नाज़ करो कम है, तुम्हारा यह ख़ज़ाना ये फिरके बहरूपये बन कर छीनने आये हैं। ये तुम्हें अपना दोस्त ज़ाहिर करके नेकी की तरफ बुलायेंगे, इसलिए इनको पहचानना बहुत ज़ुरूरी है, क्यूँकि तुम इनके बहकावे में आ सकते हो क्यूँकि भोले मुसलमान को हमेशा धोखे और मक्कारी से हराया गया है।
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《│पोस्ट - 13│》
🪄 जैसा कि सय्यदे आलम गैब की खबर देने वाले नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया था उसके मुताबिक होता गया और होता रहा है और सब आगे होगा क्योंकि हमारा नबी सच्चा उसका फरमान सच्चा। इन बातिल फिरकों में कुछ हिन्दुस्तान से बाहर पैदा हुए और वहीं खत्म हो गए, कुछ हिन्दुस्तान और उसके बाहर पाए जाते हैं जैसे: राफज़ी, वहाबी, गैर मुकल्लदीन (जो अपने आपको अहले हदीस कहते हैं) नैचरी, चिकड़ालवी, जमाअते इस्लामी (मौदूदी जमात वाले), कादयानी वगैरह वगैरह।
और इन सब में सबसे ज्यादा खतरनाक, खबीस, मक्कार और फरेबी फिका फितना-ए-वहाबीयत है और ज्यादातर फिरकों की शाखें इसी से जाकर मिलती है और इनकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि ये अपनी किताबों में अल्लाह और उसके हबीब की शान में गालियाँ बकते हैं तौहीन करते हैं और पेश की गई हदीसों के मुताबिक एकदम फिट बैठते हैं। इस किताब के ज़रिए मैं आपको इसी फिरके से होशियार करना चाहता हूँ।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* मेरा तो दिमाग़ ख़राब हो रहा हैं।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* बेहतर यह होगा आप इन सारे टापिक पर सवाल करते जायें और मैं जवाब देता जाऊँ ताकि हमारी बात साफ हो जाए।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* मैं भी यही चाहता है। यह तो आप बता ही चुके कि वहाबी फिरका कहाँ से शुरू हुआ और हदीसों में भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पहले ही हमें बता दिया था कि ऐसे लोग ज़ाहिर होंगे और इनकी यह कुफ्री इबारतों को देखकर तो एक देहाती भी यह बता देगा कि ऐसा बकने वाला मुसलमान नहीं अब मैं आपसे बुनियादी अकाइद पर एक एक करके सवाब पूछूंगा और फिर फुरूई मसाइल पर पूछूंगा मेहरबानी करके एक एक करके जवाब देते जायें। बताइये सबसे पहले कौन सा टापिक लें।
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《│पोस्ट - 14│》
🪄 *मुफ्ती साहब -* सबसे पहले इल्मे गैब पर बात करते हैं।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* जी बेहतर सबसे पहले हमें यह बताइये कि अहले सुन्नत का इस बारे में क्या अकीदा है। आसान ज़बान में समझायें।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* गैब वह छुपी हुई चीज़ है जिसको इन्सान न तो आँख नाक कान वगैरह से महसूस कर सके और न बिला दलील बदाहतन (बगैर गौर व फिक्र के) अक़्ल में आ सके।
*मसलन :-* मलाइका, जन्नत, दोजख कियामत का इल्म ग़ैब का इल्म है। इन्सान कब मरेगा, औरत के पेट में क्या है और वह नेक है या बद गैब का इल्म है। रंग पहचाना ज़बान व कान के लिए गैब है। बू आँख के लिए गैब है। अगर कोई बू व मज़े को आँख से शक्लों में देख ले तो ग़ैब है।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* यह तो इल्मे गैब की तारीफ हुई। हमें यह बताइये कि हमारे आका के इल्मे गैब के बारे में या नबियों के इल्मे गैब के बारे में अहले सुन्नत का अकीदा क्या है ?
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* अहले सुन्नत का मसलक यह है कि अल्लाह तआला ने नबियों को अपने गैबो पर इत्तिला दी। यहाँ तक कि जमीन और आसमान का हर ज़र्रा हर नबी के सामने है। और हमारे आका हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तमाम नबियों में सबसे अफजल व सबके सरदार हैं लिहाज़ा सबसे ज़्यादा इल्म या इल्मे गैब आप ही को है। अहले सुन्नत का यह अकीदा है कि सारी कायनात का इल्म अल्लाह तआला के किसी भी नबी के इल्म के सामने ऐसा है जैसे समन्दर के सामने कतरा होता है और तमाम नबियों का इल्म मिल कर हुजूर अलैहिस्सलाम के इल्म के सामने ऐसा ही जैसे समन्दर के सामने कतरा हो और हुजूर अलैहिस्सलाम का इल्म ख़ुदा के इल्म के सामने ऐसा भी नहीं जैसे करोड़ों समन्दरो के सामने कतरे के करोड़वें हिस्से का। वह इसलिए कि अल्लाह के इल्म की हद ही नहीं और हुजूर या किसी भी नबी या मखलूक के इल्म की कोई न कोई हद ज़रूर है क्या है कितनी है अल्लाह ही जाने।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* क़ुरआन में जो आया कि गैब का इल्म सिर्फ अल्लाह ही को है तो इसका क्या मतलब है ? क़ुरआन पहले है हदीस बाद में।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* बेशक क़ुरआन पहले हैं और क़ुरआन में ही है कि अल्लाह जिसे चाहता है गैब का इल्म अता फरमाता है। और जो यह आया कि गैब का इल्म सिर्फ अल्लाह ही को हैं तो इससे मुराद जाती इल्म है जो सिर्फ अल्लाह के लिए है जो कोई ज़ाती इल्म किसी और के लिए माने वह काफिर है।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* ज़रा और साफ साफ बतायें।
👉🏻 *मुफ़्ती साहब -* इल्मे गैब दो तरह का है एक इल्मे गैब जाती और दूसरा इल्मे गैब अताई। इल्मे गैब जाती सिर्फ अल्लाह ही को है और इल्मे गैब अताई नबियों और वलियों को अल्लाह तआला के देने से हासिल होता। मख़लूक का इल्म हर हाल में अताई चाहे आम इल्म हो या इल्मे गैब।
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《│पोस्ट - 15│》
🪄 *अब्दुल्लाह -* ज़ाहिर है अल्लाह का इल्म अताई तो हो ही नहीं सकता और ऐसा मानना तो कुफ्र हुआ। अच्छा जिस इल्म को अल्लाह ने सिर्फ अपने लिए बताया वह जाती है और जो अपने ख़ास बन्दों के लिए बताया वह अल्लाह की अता से है। वहाबियों का अकीदा भी बयान करें ताकि फर्क मालूम हो।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* बेहतर तो यही होता कि उनका अकीदा उन्हीं से पूछते फिर भी मैं बताता हूँ। वैसे इनके यहाँ नबियों के लिए इल्मे गैब मानना शिर्क है इनका तो वही हिसाब है कि क़ुरआन में आया कि क़ुरआन की कुछ बातें मानते हैं कुछ का इन्कार करते हैं। अगर आप इनसे पूछेंगे तो यही कहेंगे कि क़ुरआन में आया कि अल्लाह अपने गैब पर किसी को इत्तेला नहीं देता और इस आयत को नहीं सुनायेंगे अल्लाह तआला अपने मुकर्रब बन्दों से जिसे चाहता है चुन लेता है और गैब का इल्म अता फरमाता है। जबकि दोनों बातें हक हैं जहाँ इल्म को अल्लाह ने सिर्फ अपने लिए कहा वहाँ अपने ज़ाती इल्म के लिए कहा और जहाँ इल्मे गैब के देने के लिए बात की वह अताई इल्म के लिए कही।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* क्या वहाबी अताई इल्म को नहीं मानते।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* इन्होंने अपनी किताबों में नबी के लिए अताई इल्म को शिर्क लिखा है हवाला मैं आपको दिखा चुका। बल्कि मैंने आपको मौ. अशरफ अली थानवी की वह कुफ्री इबारत दिखाई जिसमें नबी के इल्म को पागल और मजनून जैसा बताया दूसरी इबारत वह भी दिखाई कि इन्होंने शैतान के इल्म के सुबूत को तो क़ुरआन व हदीस से माना और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इल्म का सुबूत मांगा जबकि क़ुरआन में भी आया और कितनी ही हदीसों से साबित कि हुजूर को इल्मे गैब अता हुआ बल्कि तमाम मख़लूक से ज़्यादा अता हुआ। जब आप हर खूबी में सबसे अफज़ल हैं तो इल्म या इल्मे गैब में क्यूँ न अफज़ल होंगे बहुत मोटी सी बात है।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* कुछ लोग कहते हैं कि अल्लाह व रसूल दोनों के लिए इल्मे गैब मानने से हमने दोनों को बराबर माना और अल्लाह कि बराबर तो कोई हो नहीं सकता न जात में न सिफात में न इल्म में। ज़रा अल्लाह व रसूल के इल्म के फर्क को समझाइये।
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《│पोस्ट - 16│》
🪄 *मुफ्ती साहब -* अल्लाह तआला के इल्म से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इल्म की तुलना मोटे तौर पर इस तरह की जा सकती है।
1.अल्लाह तआला का इल्म जाती है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म अल्लाह की अता से है।
2.अल्लाह तआला का इल्म कदीम है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म हादिस यानी अल्लाह का पैदा किया हुआ।
3.अल्लाह तआला का इल्म लामुतनाही (जिसकी हद न हो) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म मुतनाही (जिसकी कोई हद जरूर हो) है।
4.अल्लाह तआला के लिए अताई इल्म मानना कुफ्र व शिर्क है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए अताई इल्म मानना ऐन ईमान है।
5.अल्लाह तआला के इल्म की मखलूक के इल्म से वह निसबत भी नहीं जो करोड़ों समन्दरों को पानी की एक बूंद के कराड़वें हिस्से से है।
यह हैं अहले सुन्नत के अकाइद।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* कुछ लोग यह कहते हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को वही इल्म होता था जो जिब्रील अलैहिस्सलाम बताते थे यानी अल्लाह पाक जिब्रील अलैहिस्सलाम से कहलवाता।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* देखिए एक तो इसी बात से वसीला साबित हो रहा है और हम आपको बता चुके कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने सबसे ज़्यादा इल्म अता किया। देखिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का इल्म जिब्रील अलैहिस्सलाम, लौह महफूज़ (वह तख़्ती जिस पर सब की तकदीरें लिखी हैं), अर्शे आज़म और तमाम नबियों से ज़्यादा है। अल्लाह पाक कैसा है यह सिर्फ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही को पता है। सारे गैबों से बड़ा गैब तो अल्लाह तआला ही और जब सबसे बड़ा गैब अल्लाह पाक ने अपने सबसे ख़ास महबूब बन्दे से न छुपाया तो आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से और क्या छुपा होगा।
👉🏻 *अब्दुल्लाह -* वाह वाह सुब्हानल्लाह क्या बात कह दी जब अल्लाह पाक ने अपने आप को आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से न छुपाया तो और क्या छुपा होगा।
👉🏻 *मुफ्ती साहब -* हमारा आपका अकीदा है कि क़ुरआन पाक मे हर चीज का बयान है और क़ुरआन को सबसे ज़्यादा कौन समझता है जिब्रील अलैहिस्सलाम या हमारे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम।
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《│पोस्ट - 17│》
🪄 अब्दुल्लाह - बेशक हमारे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ज़्यादा कुरआन को कौन जाने इसमें क्या शुबा।
👉🏻 मुफ्ती साहब - सूरह रहमान की पहली आयत का तर्जमा है कि रहमान ने अपने महबूब को क़ुरआन सिखाया अब यह सिखाना हम जैसों सा तो नहीं होगा कि कभी कुछ तिलावत पढ़ सीख ली कभी कुछ तर्जमा व तफ्सीर.... अरे सिखाने वाले और सीखने वाले पर नज़र रखो सब समझ आ जाएगा और बेकार की अड़ लगा लो कि वह हम जैसे ही बशर थे तो क्या ईमान बचा पाओगे अभी वक्त है उनके इल्म का इन्कार करके उनकी तौहीन न करो।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हज़रत बोलते रहिए ईमान ताज़ा हो रहा है।
👉🏻 मुफ्ती साहब - डाक्टर से दवा लो फायदा भी हो और उससे कहो कि तुम्हें इल्म नहीं है यह कहाँ की शराफत है। ज़रा एक मामूली पुलिस वाले से कहो कि तुम्हारा इल्म इल्म जाती तो हो नहीं सकता अताई है और ऐसा अताई इल्म तो पागलों और बच्चों को भी होता है तो शायद ज़बान से नहीं अपने बेंत से समझाएगा।
👉🏻 अब्दुल्लाह - और हदीसों से हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का कितना इल्म साबित है।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को तमाम अव्वलीन व आखरीन का इल्म अता फमाया गया। मशरिक से मग़रिब तक, अर्श से फर्श तक सब उन्हें दिखाया, आसमानों व ज़मीन का गवाह बनाया रोजे अव्वल से रोज़े आख़िर तक सब माकान व मायाकून (जो कुछ हो चुका और जो होने वाला है) सब उन्हें बताया।
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ मरदूद कहते हैं कि उन्हें दीवार पीछे का इल्म नहीं।
👉🏻 मुफ्ती साहब - ऐसा मानने वाले वाकई मरदूद व काफिर व मुरतद हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - इल्मे गैब के बारे में बहुत कुछ मालूम हो गया अब किसी दूसरे टापिक पर आते हैं लेकिन एक बात और बतायें यह जो क़ुरआन में आया कि पानी कब बरसेगा, माँ के पेट में क्या है, कल क्या होगा, कौन कब मरेगा, कियामत कब आएगी इसका इल्म सिर्फ अल्लाह ही को है।
👉🏻 मुफ्ती साहब - वही जवाब है कि जब अल्लाह पाक ऐसा फरमाए तो समझो कि यह जाती इल्म की बात है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - मौसम विभाग तो पहले ही बता देता है कि पानी कब बरसेगा तूफान कब आएगा, माँ के पेट में लड़का है या लड़की यह अल्ट्रासाउन्ड से पता चल जाता है क्या यह शिर्क होगा ?
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《│पोस्ट - 18│》
🪄 मुफ्ती साहब - हांलाकि मौसम विभाग का अनुमान गलत भी हो सकता है मगर मौसम विभाग जो पेशीनगोई करता है वह किसी उपकरण के वसीले होता है और यह अताई इल्म से है और अल्लाह ही की अता है जो इसे अल्लाह की अता न मान कर सिर्फ साइंसी ईजाद माने वह अपने लिए खुद ही समझ ले कि क्या हुक्म है। अरे जिनकी मुबारक उंगलियों से पानो के चश्मे जारी हो जायें जिनकी दुआ से लगातार हफ्ते भर पानी बरसे उनसे पानी बरसने जैसा इल्म छुपाया जाएगा, हाँ छुपाने का हुक्म दिया जा सकता है और ऐसा ही। बिल्कुल यही बात अल्ट्रासाउन्डा से माँ के पेट या पेट के दूसरे हाल बताना सब अल्लाह की अता से है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या कभी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने पेट का हाल बताया।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हाँ बल्कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के खास यार हज़रते अबूबक्र सिद्दीक रदियल्लाहु तआला अन्हु ने अपनी बेटी हज़रते आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा से फरमाया ऐ बेटी जो बाग तेरे पास है उसमें तेरी बहनों का भी हिस्सा है जबकि वह बहन अभी माँ के पेट में थीं। यहाँ तो कोई अल्ट्रासाउन्ड भी नहीं अल्लाह के अता किए हुए इल्म से ही था।
👉🏻 अब्दुल्लाह - मरने के बारे में।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने जंगे बदर में एक दिन पहले ही बता दिया था कि कौन कहाँ मरेगा और वह वहीं मरा। इसके अलावा आप तो यह भी जानते हैं कि कौन जन्नत में जाएगा कौन जहन्नम में।
👉🏻अब्दुल्लाह : क़ियामत के इल्म के बारे में वजाहत करें।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को क़ियामत का इल्म भी है मगर उसे छुपाने का हुक्म था।
👉🏻 अब्दुल्लाह - मशहूर है कि कियामत तो अशरे को जुमा के दिन आयेगी।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हाँ बेशक इसी बात से साबित कि हमारे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कियामत का इल्म है तभी तो उन्होंने दिन व महीना व तारीख बता और सन् छुपा कर बात भी छुपा दी यानी अल्लाह ने उन्हें यही हुक्म दिया कि बस इतना ही बताना है। अब अगर हम उसी बात पर अड़े रहें कि तो खुद ही फंस गए कि कहाँ जायें और जाती व अताई का फर्क समझ लें तो सब बात हल अकीदा दुरुस्त।
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《│पोस्ट - 19│》
🪄 अब्दुल्लाह - काश हम इतनी सी बात को साफ कर लें कि जाती व अताई का फर्क समझ ले।
👉🏻 मुफ्ती साहब - अरे उन्हें तो यह भी मालूम है कि क़ियामत मैं क्या क्या होगा, कौन जन्नत में जाएगा और कौन जहन्नम में और कब किस किस को आप जहन्नम से निकाल कर लायेंगे। लोग किस किस के पास मदद को जायेंगे। अब जरा अक्ल से सोचो कि क्या अल्लाह ने उनसे सन् छुपाई या छुपाने का हुक्म दिया और बिलफर्ज़ यह मान भी लिया जाए कि उन्हें सन् नहीं मालूम तो हमने कब यह दावा किया कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इल्म अल्लाह के बराबर है या कुल इल्म आपको है कुल इल्म तो सिर्फ अल्लाह ही को है। मख़लूक में जितना भी इल्म किसी को मिलता है तो क्या वह सबका सब दूसरों को बता देता कुछ बताता है कुछ भूलता है कुछ जानबूझ कर नहीं बताता। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भूले नहीं जहाँ दिन तारीख महीना बताया वहाँ सन् भी बता सकते थे बल्कि छुपाने का हुक्म था।
👉🏻 अब्दुल्लाह - एक बात और यह बतायें कि जहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद यह कहा कि मुझे नहीं मालूम यानी इससे ज़ाहिर हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को नहीं मालूम आपने किसी से पूछा कि यह क्या है या वह क्या है तो इससे भी यही मालूम होता है कि उन्हें मालूम नहीं या इल्म नहीं।
👉🏻 मुफ्ती साहब - अब जो ऐब ही निकालना चाहे और उसके नफ़्स की शामत जब अबू जहल जैसे के हाथ में कंकरियों ने कलिमा पढ़ा और वह न माना। फिर भी इसका वही जवाब कि हमारा दावा कुल इल्म का नहीं दूसरे हुजूर के ऐसा फरमाने का मतलब अपने लिए जाती इल्म का इन्कार है
रहा सवाल पूछने की बात तो पूछने से हर बार यह साबित नहीं होता कि इल्म नहीं। क़ुरआन में आया कि अल्लाह पाक ने हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम से पूछा कि ऐ मूसा तुम्हारे हाथ में क्या है तो आपने जवाब दिया कि मेरे हाथ में असा है मैं इससे टेक लगाता हूँ दरख़्त से पत्ते तोड़ लेता हूँ जानवर को भगा देता हूँ। अब जरा सोचिए कि क्या अल्लाह तआला को नहीं मालूम कि हजरते मूसा अलैहिस्सलाम के हाथ में क्या है। हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम ने यह क्यूँ न कहा कि ऐ अल्लाह तू जानता है फिर क्यूँ पूछ रहा है बल्कि असा के काम गिना दिए जबकि अल्लाह तो सब जानता है। अल्लाह ने शैतान से पूछा कि तूने सजदा क्यूँ नहीं किया क्या अल्लाह को नहीं मालूम था। मतलब यह कि हर बार ऐसा नहीं है कि पूछने वाला अन्जान हो।
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《│पोस्ट - 20│》
🪄 अब्दुल्लाह - एक एतराज कुछ लोग करते हैं कि मुनाफिकिन ने जब हज़रते आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा पर तोहमत लगाई तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम क्यूँ कई दिन तक परेशान रहे अगर आपको इल्मे गैब होता तो क्यूँ अपनी बीवी के बारे में खामोश रहते ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - बुख़ारी शरीफ में है हज़रते आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा के हक में आपकी पाकी की आयत नाज़िल होने से पहले आपने इरशाद फरमाया की खुदा की कसम मैं अपनी बीवी के मुताल्लिक सिवाए अच्छाई और पाक दामनी के और कुछ नहीं जानता। परेशान होने की वजह यह घिनौना झूटा इल्ज़ाम था और जब इल्ज़ाम झूटा हो तो कौन परेशान न होगा। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़ामोशी में राज़ यह भी था कि गवाही अल्लाह की आना थी और मुनाफेकीन का निफाक खुलना था। अगर आपको इल्म न होता तो आप कसम न खाते।
👉🏻 अब्दुल्लाह - फ़िरिश्ते अल्लाह तआला का लश्कर हैं और अल्लाह तआला फरमाता है कि अल्लाह तआला के सिवा उनके लश्कर को कोई नहीं जानता।
👉🏻 मुफ्ती साहब - तमाम फिरिश्ते नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर दुरूद भेजते हैं और नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम सुनते हैं तो क्या उनको तादाद न मालूम होगी। और मशहूर हदीस है कि 70,000 फ़िरिश्ते रोज़ अल्लाह तआला पैदा फरमाता है जो आपकी बारगाह में हाज़री देते और दुरूद पढ़ते हैं और दोबारा नहीं आते। काश जाती व अताई का फर्क समझ लेते तो यह न कहते।
👉🏻 अब्दुल्लाह - जंगे खैबर की फतह के बाद यहूदियों ने एक औरत को ज़हर आलूदा गोश्त लेकर नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास भेजा और आपने उसे खाया अगर आपको इल्मे गैब होता तो क्यूँ खाते ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - काश बुखारी शरीफ की पूरी हदीस पढ़ी होती कि इसमें यह भी है कि उन यहूदियों के बापों के नाम आपने सही बता दिए जो कि वो छुपा रहे थे। और आपने उस औरत को बता दिया कि इस गोश्त ने मुझे बताया है कि तूने ज़हर मिलाया है। वह औरत आपके नबी होने का इम्तहान लेने आई थी कि अगर आप नबी होंगे तो गोश्त नुक्सान न करेगा। लिहाज़ा आपने खाया और नुकसान न हुआ और आप सच्चे साबित हुए। इस हदीस से तो आपका सच्चा होना और इल्मे गैब दोनों साबित होते हैं।
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《│पोस्ट - 21│》
🪄 अब्दुल्लाह - एक एतराज़ यह भी है कि मिश्कात शरीफ में है कि नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक मरतबा फरमाया कि कियामत के दिन कुछ लोग मेरे सहाबा में पकड़े जायेंगे और फिरिश्ते उनको पकड़ कर जहन्नम की तरफ ले जा रहे होंगे तो मैं कहूंगा कि ऐ मेरे रब ये तो मेरे सहाबी हैं तो अल्लाह तआला फरमाएगा कि ऐ मेरे महबूब आप नहीं जानते कि आपके बाद ये लोग क्या करते रहे? इस हदीस से साबित हुआ कि हुजूर को मुनाफेकीन का इल्म नहीं था।
👉🏻 मुफ्ती साहब - काश ऐसे एतराज़ करने से पहले जरा गौर कर लेते कि यह होगा अभी हुआ नहीं और हुजूर ने पहले ही ख़बर दे दी तो यह गैब नहीं तो और क्या है। तफसीर ख़ाज़िन जिल्द अव्वल में है कि अल्लाह ने आपको मुनाफेकीन के मक्र व फरेब का भी इल्म दिया था। रहा बख़्श्शि का सवाल तो यह सभी मानते हैं कि मुनाफेकीन और बेईमान न बख़्शे जायेंगे।
👉🏻 अब्दुल्लाह - मेरे ख़्याल से काफी हो गया अब टापिकं चेंज करा जाए। बात साफ हो चुकी। और फिर जिस पर कुरआन उतरा उसे क्या क्या न अता होगा।
👉🏻 मुफ्ती साहब - जी बिल्कुल सही फरमाया। आख़िर में यह भी सुन लीजिए कि कुछ हदीसों का मफहूम है कि एक बार हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कियामत तक जो होने वाला है, जन्नितयों के जन्नत में जाने और दोज़खियों के दोज़ख में जाने तक की बातें बताई जिसे जो याद रहा उसने याद रखा। हवाले भी सुन लीजिए।
1.सहीहैन बुख़ारी व मुस्लिम में हज़रते हुजैफा रयिल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है।
2.अहमद मुसनद में, बुखारी ने तारीख में, तबरानी नें कबीर में हज़रते मुगीरा इब्ने शैबा रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत किया 3. सही बुख़ारी व मुस्लिम में हजरते उमर रदियल्लाहु तआला अन्ह से रिवायत किया। मेरे ख़्याल से कुरआन हदीस अक्ली दलाइल से साबित हो गया हमारे आका हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह ने इल्मे गैब तमाम मख़लूक से ज़्यादा अता फरमाया। नबी के मअना ही गैब की ख़बर देने वाला है और फिर जिसके ज़रिए इतना बड़ा काम होना है तो क्यूँ न उसे इल्म ताकत और इख़्तेयार दिया जाएगा।
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《│पोस्ट - 22│》
🪄 अब्दुल्लाह - हाज़िर ओ नाज़िर के शरई माअना क्या हैं ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - आसान लफ़्ज़ों में हाज़िर को यूँ कहें कि हाज़िर वह है जो एक जगह बैठे हुए ही उस जगह पहुँच सके या मौजूद हो और उस जगह पर तसरूफ कर सके (यानी काम या मदद कर सके) जहाँ के लिए उसे हाज़िर कहा गया और नाज़िर वह जो अपनी आँख से उसे वह देख रहा हो जहाँ के लिए उसे नाज़िर कहा गया है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - एक जगह से बैठे देखे हुए वह कैसे ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - बल्कि एक जगह से बैठे हुए तमाम आलम को ऐसे देखे जैसे अपने हाथ की हथेली को देखता है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - अच्छा ! देखे भी और पहुँच भी जाए और कोई काम या मदद भी कर सके।
👉🏻 मुफ्ती साहब - जी हाँ! देखे ही नहीं बल्कि एक ही आन (चन्द सेकेण्ड) में तमाम आलम की सैर करे और मीलों दूर के हाजतमन्दों की हाजत पूरी करे और रफतार सिर्फ रूहानी हो या जिस्मे मिसाली के साथ हो या उसी जिस्म से जो कब्र में दफ़्न है या किसी जगह मौजूद हो।
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या यह ऐसा बुनियादी अकीदा है कि इसका इन्कार करने वाला काफिर हो जाएगा ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - नहीं हाज़िर ओ नाज़िर के अकीदे का इन्कार करने वाले को काफिर नहीं कहा जएगा।
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या कुरआन से हाज़िर ओ नाज़िर के अकीदे का सुबूत मिलता है ?
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《│पोस्ट - 23│》
🪄 मुफ्ती साहब - मुफ्ती साहब : हाज़िर ओ नाज़िर के सुबूत में कुछ आयते क़ुरआनी का तर्जमा पेश है :-
1.ऐ गैब की खबरें बताने वाले बेशक हमने तुमको भेजा हाज़िर नाज़िर और खुशखबरी देता और डर सुनाता और अल्लाह की तरफ उसके हुक्म से बुलाता और चमका देने वाला आफ़ताब।
2.और अगर जब वह अपनी जानों पर जुल्म करें तो ऐ महबूब तुम्हारे हुजूर हाज़िर हों फिर अल्लाह से माफी चाहें और रसूल उनकी शफाअत फरमा दें तो जरूर अल्लाह को बहुत तौबा कबूल करने वाला मेहरबान पायें।
3.और हमने तुमको न भेजा मगर रहमत सारे जहाँ के लिए हुए है। और दूसरी जगह फरमाया मेरी रहमत हर चीज़ को घेरे
4.नबी मुसलमानों से उनकी जानों से ज़्यादा करीब हैं।
इन आयात से साबित हुआ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम गैब की ख़बर देने वाले, हमें अल्लाह का डर सुनाने वाले, अल्लाह की तरफ बुलाने वाले, शफाअत करने वाले, हमारी जान से ज़्यादा करीब, हमें हर आन देखने वाले, हमारी हर आन बातें सुनने वाले, हमारी मदद करने वाले जब चाहें, हमारे लिए ही नहीं तमाम आलम के लिए रहमत और हाजिर ओ नाज़िर हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ हदीसें जिनसे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के इल्मे गैब और हाज़िर ओ नाज़िर का सुबूत मिलता है सुनाईये
👉🏻 मुफ्ती साहब - चन्द हदीसें हाज़िरे ख़िदमत हैं :-
1.हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया मैं तमाम आलम को अपनी हथेली की तरह देख रहा हूँ। हम पर हमारी उम्मत अपनी सूरतों में पेश हुई और हम उनके नाम उनके बाप दादाओं के नाम उनके घोड़ों के रंग जानते हैं वगैरह वगैरह।
2.कब्र में फिरिश्ते पूछते हैं कि तुम उनके बारे (मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) में क्या कहते थे।
3.एक शब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम घबराए हुए बेदार हुए फरमाते थे कि सुब्हानल्लाह इस रात में किस कद्र ख़ज़ाने और किस कद्र फितने उतारे गए हैं।
4.हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमावा तुम्हारी मुलाकात की जगह हौज़े कौसर है उसको इसी जगह से देख रहा हूँ।
5.हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मदीने पाक की एक पहाड़ी पर खड़े हो कर सहाबए किराम से पूछा कि जो मैं देख रहा हूँ क्या तुम भी देखते हो? अर्ज किया कि नहीं। फरमाया मैं तुम्हारे घरों में बारिश की तरह फितने गिरते हुए देखता हूँ।
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《│पोस्ट - 24│》
🪄 अब्दुल्लाह - वहाबी लोग इस बारे में क्या कहते हैं ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - उनके यहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हाज़िर ओ नाज़िर मानना कुफ व शिर्क है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हाज़िर ओ नाजिर कहने से अल्लाह अ तआला से बराबरी नहीं हो रही है क्या?
👉🏻 मुफ्ती साहब - नहीं! वह इस लिए कि अल्लाह तआला को हाज़िर ओ नाज़िर कहना जाइज़ नहीं। वह इसलिए कि अल्लाह तआला जगह व मकान से पाक है और अल्लाह नाज़िर है मगर अल्लाह आँख से नहीं देखता लिहाज़ा अल्लाह के लिए आँख से देखना नहीं। (अल्लाह की शान इससे कहीं ज़्यादा अरफा व आला है यह हमारी समझ से बाहर है अल्लाह व रसूल ही जानें)
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ लोग घर में जाते हैं तो नबी पर सलाम अर्ज करते हैं क्या इसी लिए कि आप हाज़िर ओ नाज़िर हैं ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - शिफा शरीफ में है जब घर में कोई न हो तो तुम कहो कि ऐ नबी तुम पर सलाम और अल्लाह की रहमतें और बरकतें हों।
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिन्दा हैं और हमें देख रहे हैं?
👉🏻 मुफ्ती साहब - हर नबी ज़िन्दा हैं उन्हें सिर्फ एक आन के लिए मौत आती है। इमाम कुस्तलानी मवाहिब में फरमाते हैं हमारे उल्मा ने फरमाया हुजूर अलैहिस्सलाम की जिन्दगी और वफ़ात में कोई फर्क नहीं अपनी उम्मत को देखते हैं और उनके हालात नियतों, इरादों और दिल की बातों को जानते हैं यह आपको बिल्कुल ज़ाहिर हैं इसमें पोशीदगी नहीं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या मस्जिद में जाने पर भी हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम को सलाम करना चाहिए और दुरूद भी पढ़ना चाहिए?
👉🏻 मुफ्ती साहब - इमाम गज़ाली रदियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि जब तुम मस्जिदों में जाओ तो हुजूर अलैहिस्सलाम को सलाम अर्ज करो क्यूंकि आप मस्जिदों में मौजूद हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - आपने बताया था कि नमाज़ में हुजूर के ख़्याल आने को वहाबी बुरा जानते हैं। मैंने सुना है कि नमाज़ चूंकि अल्लाह ही के लिए ख़ास इबादत है इसलिए वहाबियों का कहना है कि किसी और का ख्याल लाना शिर्क होता है। हमारे बुजुर्गों नें भी इस बारे में कुछ लिखा है
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《│पोस्ट - 25│》
🪄 मुफ्ती साहब - नमाज़ में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ख्याल आने के कुछ कौल ये हैं जिनसे हुजूर के हाज़िर ओ नाज़िर होने का सुबूत भी मिलता है।
1.मदारिजुन्नुबुव्वत में है बाज़ आरफीन ने कहा है कि अत्ताहिय्यात में यह ख़िताब इसलिए है कि हकीकते मुहम्मदिया मौजूदात के ज़र्रा ज़र्रा में और मुमकिनात के हर फर्द में सरायत किए हुए है पस हुजूर अलैहिस्सलाम नमाजियों की ज़ात में मौजूद और हाज़िर हैं नमाज़ी को चाहिए कि इस माना से आगाह रहे और इस से ग़ाफिल न रहे ताकि कुर्ब के नूर और मारिफ़त के भेदों से कामयाब हो जाए।
2.इहयाउल उलूम में इमाम ग़ज़ाली फरमाते हैं नमाज़ के कादा में 'अत्ताहिय्यात' में जब नबी को सलाम करने का वक़्त आए तो अपने दिल में नबी अलैहिस्सलम को और आपकी जाते पाक को हाज़िर जानो और कहो "अस्सलामुअलैका अय्युहन्नबीय्यु व रहमतुल्लाहि व बराकातुह"
3.हजूर अलैहिस्सलाम को नमाज़ में ख़िताब किया गया गोया कि यह इस तरफ इशारा है कि अल्लाह तआला आपकी उम्मत में नमाजियों का हाल आप पर ज़ाहिर फरमा देता है हत्ताकि आप मिस्ल हाजिर के होते हैं उसके आमाल हो समझने में और इसलिए कि आप की हाज़री का ख़ुशुअ व ख़ुज़ूअ की ज़्यादती का सबब हो जाए।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हुजूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के अलावा भी किसी और को हाज़िर ओ नाज़िर कह सकते हैं ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - हाज़िर ओ नाज़िर की परिभाषा के तहत अगर देखें तो मखलूक में कुछ और भी हस्तियाँ हाजिर ओ नाज़िर है तीन मिसाल पेश करता हूँ समझने के लिए काफी हैं जैसे -
1.मलिकुल मौत के लिए सारी ज़मीन तश्त की तरह कर दी गई है कि जहाँ से चाहें लें उन्हें रूहें कब्ज़ करने में कोई दुश्वारी नहीं अगरचे रूहें ज़्यादा हों और अलग अलग जगहों पर हों।
2.जब हम सोते हैं तो हमारी रूह जिस्म से निकल कर आलम में सैर करती है, अचानक जब कोई हिलाता है तो एक आन में रूह वापस आ जाती है।
3.हज़रते जिब्रील का एक आन में हाज़िर व नाज़िर होना।
👉🏻 अब्दुल्लाह - इस तरह क्या शैतान को भी हाज़िर व नाज़िर कह सकते हैं?
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《│पोस्ट - 26│》
🪄 मुफ्ती साहब - शैतान मख़लूक को बहकाने के लिए सबको देख रहा है और हर जगह पहुँच जाता है यहाँ तक कि दिलों में वसवसे डालता है।
और अल्लाह ने उसे बहुत ताकत दी है मगर इसको हाज़िर व नाज़िर कहना मना है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और नबियों के ज़िन्दा होने के सुबूत में कोई ऐसा हवाला दें जिन्हें वहाबी भी मानतें हों?
👉🏻 मुफ्ती साहब - हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत पर शाह मुहद्दिस अब्दुल हक देहलवी की लिखी किताब मदारिजुन्नुबुव्वत के हिस्सा अव्वल के सफा 576 पर लिखा है "अल्लाह के नबी दुनियावी ज़िन्दगी की हयात के साथ ज़िन्दा है"
👉🏻 अब्दुल्लाह - अगर कोई यह कहे कि जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ज़िन्दा हैं हाजिर ओ नाज़िर है तो दिखाई क्यूँ नहीं देते ?
👉🏻 मुफ़्ती साहब - जिस तरह जिन्न व फ़िरिश्ते और कुछ और अल्लाह की मखलूक जैसे हवा, खुशबू, बदबू, मज़ा, सोचना, महसूस करना, आवाज़, बिजली का करन्ट, तस्वीरों का आना जाना, इन्टरनेट वगैरह हमें दिखाई नहीं देते। इसी तरह अम्बिया व औलिया भी मरने के बाद ज़िन्दा हो जाते हैं और हमें दिखाई नहीं देते और अल्लाह की दी हुई ताकत व अपने मरतबे के मुताबिक हाज़िर वा नाज़िर हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हाज़िर व नाज़िर के सुबूत में कुछ और अक्ली दलाइल पेश करें।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - लिजिए बहुत से दलाइल सुनिये :-
1.हदीस में है कि दुनिया काफिर के लिए जन्नत है और मोमिन के लिए कैदखाना। मरने के बाद मोमिन बे रोक टोक जहाँ तक अल्लाह चाहे जाता आता है सैर करता है यानी अपनी हदों में हाज़िर व नाज़िर है।
2.अल्लाह की राह में जो लोग शहीद होते हैं उनका मरने के बाद जिन्दा रहना क़ुरआन से साबित है।
3.अल्लाह की राह शहीद को मरने के बाद एक बहुत बड़ी जगह में हाज़िर व नाजिर कहा जा सकता है।
4.हदीस में नफ़्स से जिहाद करने को शहीदे अकबर बताया गया है क्या इस बड़े जिहाद में कामयाब होने वाले भी ज़िन्दा हैं मसलन औलिया अल्लाह।
5.जब शहीदे असगर व शहीदे अकबर ज़िन्दा हैं तो क्या अम्बिया भी जिन्दा और उनसे भी ज़्यादा दूर जाने आने वाले और सैर करने वाले है।
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《│पोस्ट - 27│》
🪄 मुफ्ती साहब - 6. कसरत से दुरूद पढ़ने वाले को मिट्टी नहीं खाती यानी वह जिन्दा रहता है और उसकी रूह फिर जिस्म में लौट आती है और घूमता फिरता आता जाता सैर करता है जैसा अल्लाह चाहे लिहाजा वह अपनी हदों में हाज़िर वा नाज़िर है।
7.किसी ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ख्वाब में देखा और अपना कोई पेचीदा मसअला उनसे पूछा और उन्होंने उसे जवाब दिया ज़ाहिर है जवाब सही है और एक ही वक़्त में हज़ारों लोगों के साथ ऐसा हुआ क्या इससे साबित होता है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हाज़िर व नाज़िर हैं।
8.मरने के बाद नई ज़िन्दगी आलमे बरज़ख में शुरू होती है जहाँ अजाब व सवाब होता है यह बात सभी के लिए क़ुरआन व हदीस से साबित है और हर ख़ास व आम के लिए है और अजाब व सवाब जिस्म व रूह दोनों पर होता है। मरने के बाद शहीद आम लोगों से अफज़ल हैं और तमाम नबी शहीदों से अफजल हैं।
9.शिफा शरीफ में हैं कि जब तुम किसी ख़ाली मकान में दाखिल हो नबी (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) पर सलाम अर्ज करो क्यूँकि नबी की मुबारक रूह मकान के अन्दर तशरीफ फरमा है। क्या यह सही है।
10.जब मुसलमानों के घरों में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की रूह तशरीफ फरमा है तो क्या महफिले मीलाद में आप (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) की रूह नहीं आ सकती ? बेशक आ सकती है और मुसलमानों के करोड़ों घर है लिहाजा आप हाज़िर व नाज़िर हैं।
11.हदीस में है कि जो मेरा जिक्र करता है मैं उसका हमनशीन होता हूँ और उनका ज़िक्र अज़ान में नमाज़ में तिलावते क़ुरआन में हर जगह हो रहा है और इससे साबित होता है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हर जिक्र करने वाले के पास हाज़िर वा नाज़िर हैं।
12.शबे मेराज तमाम नबियों ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की इमामत में नमाज़ पढ़ी। क्या इससे साबित होता है कि तमाम नबी अपने जिस्म के साथ ज़िन्दा हैं।
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《│पोस्ट - 28│》
🪄 अब्दुल्लाह - कुछ लोग कहते हैं कि हम भी इन्सान हैं हुजूर भी इन्सान लिहाज़ा वह हम जेसे बशर हुए। हालांकि मैं समझता हूँ कि यह बेअदबी है वह तो सरापा नूर हैं, सबसे आला बशर अल्लाह के नूर हैं। उनकी बेमिस्ल बशरियत पर जो बशर तो हैं मगर हम जैसे बशर नहीं ऐसी रोशनी डालें कि ईमान ताज़ा हो जाए।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हालांकि आपके सवाल में ही आपका जवाब है मगर आपका तकाज़ा कुछ और है। जिस तरह अल्लाह तबारक व तआला अपनी ज़ात में अकेला है उसका कोई शरीक और साझी नहीं एक है, उसने अपने महबूब को भी बेमिस्ल बनाया है। अल्लाह ने आपको अपने नूर से पैदा फरमाया और आपके नूर से तमाम मख़लूक को पैदा फरमाया। मखलूक में अपकी मिस्ल आपकी तरह और आप के बराबर कोई न है न हुआ है और न होगा। आप सारे औसाफ में सबसे जुदा हैं आपकी शान निराली है आपकी ज़ात अनोखी है आपकी हर अदा बेमिसाल है आपको अपने जैसा बशर कहना या समझना कुफ्र है क्यूँकि यह क़ुरआन हदीस की मुखलिफ़त है। अब मैं आपको सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की चन्द खुसूसियात बताता हूँ जो कि क़ुरआन और हदीसों से साबित हैं जिसमे जवाब भी हो जाए और ईमान को ताज़गी भी मिले।
🔅अल्लाह तआला का फरमान है कि ऐ महबूब अगर आपको पैदा न करना होता तो कुछ पैदा न करता यहाँ तक कि अपना रब व इलाह (माबूद, पूजा के काबिल) होना भी जाहिर न करता।
🔅आप पैदाइश के एतबार से 'अव्वलुल अम्बिया' यानी सबसे पहले नबी हैं जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को उस वक़्त नुबुव्वत मिल चुकी थी जबकि हज़रते आदम अलैहिस्सलाम जिस्म व रूह की मन्ज़िलों से गुज़र रहे थे।
🔅अल्लाह तआला ने सबसे पहले आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नूर को पैदा फरमाया और आपके नूर से तमाम मख़लूकात को पैदा फरमाया।
🔅जिसको भी जो मिलता है हुजूर सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से ही मिलता है। हर नबी व वली आप ही से फैज़ पाकर किसी मरतने पर पहुँचता है।
🔅आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं अल्लाह देने वाला है और मैं कासिम (बांटने वाला) हूँ।
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《│पोस्ट - 29│》
🪄 अल्लाह तआला हर चीज़ का हकीको मालिक है और हुजूर अल्लाह की अता से हर चीज़ के मालिक व मुख्तार है बल्कि मुख्तारे कुल हैं। अल्लाह तआला ने अपनी शरीअत का आपको मुख़्तार बना दिया है। आप जिसके लिए जो चाहें हलाल फरमा दें और जिसके लिए जो चाहें हराम फरमा दें। मसलन हज़रते सुराका रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए आपने सोने के कंगन पहनना हलाल कर दिए, एक आराबी के लिए तीन ही वक़्त की नमाज़ फ़र्ज़ फ़रमा दी, मौला अली रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए हज़रते फ़ातिमा रदियल्लाहु तआला अन्हा के होते दूसरा निकाह हराम फरमा दिया।
🔅आप बादे विसाल भी ज़िन्दा हैं, नबियों को वादए इलाही के मुताबिक एक आन को मौत आती है। आप मदद फ़रमाते हैं, बलाओं व वबाओं को दूर फरमाते हैं। हुजूर से डाइरेक्ट मांगना भी जाइज़ है। आप जिसे जो चाहें अल्लाह के हुक्म से अता फरमाते हैं। आप मुर्दों तक को ज़िन्दा फरमाते हैं।
🔅नबी के मअना ही हैं गैब की ख़बर देने वाला। तमाम नबियों को गैब का इल्म दिया जाता है जैसा कि अल्लाह का फ़रमान है कि अल्लाह किसी को गैब का इल्म नहीं अता करता मगर चुन लेता है जिसे चाहे और उन्हें गैब दिया जाता है। और बेशक चुनने में सबसे ज़्यादा हकदार अम्बिया ही होते हैं और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम तो तमाम नबियों के इमाम हैं। आपको तमाम मख़लूक़ में सबसे ज़्यादा इल्म और इल्मे गैब अता हुआ यहाँ तक कि खुद अल्लाह पाक ने अपने आपको भी आपसे नहीं छुपाया। आप कियामत तक की हर छुपी हुई बात जानते हैं बल्कि आपने कियामत, जन्नत व दोज़ख़ तक की बातें आने से पहले ही हमें बता दीं। यह सब कुछ अल्लाह की अता ही से है।
🔅हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हाजिर व नाज़िर है। इसका मतलब यह है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जब चाहें अपने जिस्म के साथ हर जगह हाज़िर हो सकते हैं और आप अपनी आंखों से सब कुछ देख रहे हैं यानी नाज़िर है। अर्श से फर्श तक आप हर जगह हाज़िर व नाज़िर हैं। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत क़ुरआन व हदीस से पूरी तरह साबित है। शफाअत सिर्फ उनके लिए नहीं जो शफाअत का इन्कार करें।
🔅आप आखिरी नबी हैं।
🔅आपका मुक़द्दस नाम अर्श और जन्नत की पेशानियों पर तहरीर किया गया।
🔅तमाम आसमानी किताबों में आपकी बशारत दी गई।
🔅आपकी विलादत के वक़्त तमाम बुत औंधे होकर गिर पड़े।
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《│पोस्ट - 30│》
🪄 आपका शक्के सदर हुआ यानी जिब्रीले अमीन ने आपका सीनए मुबारक चीर दिया और दिल निकाल कर उसको ज़मज़म शरीफ से धोकर फिर दुरुस्त कर दिया।
🔅आपको मेराज का शरफ़ अता किया गया और आपकी सवारी के लिए बुराक़ पैदा किया गया।
🔅आप पर नाज़िल होने वाली किताब तब्दील व तहरीफ़ से महफूज़ कर दी गई यानी क़ुरआन ए पाक में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। कियामत तक क़ुरआन की बका व हिफाजत की ज़िम्मेदारी अल्लाह तआला ने अपने ज़िम्मे करम पर ली।
🔅अपको आयतुल कुर्सी अता की गई।
🔅आपको तमाम ज़मीनी ख़ज़ानों की कुजियाँ अता कर के अल्लाह तआला ने आपको मालिक बना दिया।
🔅आपको जामेउल कलिम के मोजिज़े से सरफ़राज़ किया गया यानी आप छोटे जुमलों में वह बात कह देते जो कोई दूसरा नहीं कह सकता और अक़्ल की समझ से यह बात बाहर होती कि ऐसी बात कैसे कह दी।
🔅आपको रिसालते आम्मा के शरफ से मुमताज़ किया गया यानी आप नबियों, फ़िरिश्तों, इन्सानों और जिन्नों सभी के रसूल हैं।
🔅आपकी सच्चाई को साबित करने के लिए, आपको चाँद के दो टुकड़े करने का मोजिज़ा अल्लाह तआला ने अता फ़रमाया।
🔅आपके लिए माले गनीमत को अल्लाह तआला ने हलाल कर दिया।
🔅आपके लिए अल्लाह तआला ने तमाम ज़मीन को मस्जिद बना दिया यानी हर पाक जगह पर आदमी नमाज़ पढ़ सकता है और उससे पाकी हासिल कर सकता है यानी तयम्मुम करना मिट्टी से जाइज़ किया गया।
🔅आपके बाज़ मोजिज़ात मसलन क़ुरआन मजीद क़ियामत तक बाकी रहेंगे।
🔅अल्लाह पाक ने तमाम अम्बिया को उनका नाम लेकर पुकारा मगर आपको अच्छे अल्काब से पुकारा।
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《│पोस्ट - 31│》
🪄 अल्लाह तआला ने आपका सर 'हबीबुल्लाह' को लक़ब से बलन्द फरमाया।
🔅अल्लाह तआला ने क़ुरआन पाक में आपकी रिसालत, आपकी हयात, आपके शहर आपके ज़माने की कसम याद फरमाई।
🔅आप तमाम औलादें आदम के सरदार हैं।
🔅आप अल्लाह पाक के दरबार में अकरमुल-ख़ल्क हैं तमाम मख़लूक़ में सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाले हैं। यानी कब्र में आपकी ज़ात के बारे में मुन्कर नकीर सवाल करेंगे।
🔅आपके बाद आपकी बीवियों के साथ निकाह करना हराम ठहराया गया।
🔅हर नमाज़ी पर वाजिब कर दिया गया कि नमाज़ की हालत में "अस्सलामुअलैका या अय्युहन्नबिय्यु" कह कर आपको सलाम करे।
🔅अगर किसी नमाज़ी को नमाज़ की हालत में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पुकारें तो वह नमाज़ छोड़ कर आपकी पुकार पर दौड़ पड़े। यह उस पर वाजिब है और ऐसा करने से उसकी नमाज़ टूटेगी भी नहीं यानी जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से बात कर ले तो फिर वहीं से नमाज़ पढ़ें जहाँ से छोड़ी थी।
🔅आपके मिम्बर और क़ब्रे अनवर के दरमियान की ज़मीन, जन्नत के बाग़ों में से एक बाग है।
🔅सूर फूंकने पर सबसे पहले आप अपनी क़ब्रे मुनव्वर से बाहर तशरीफ़ लायेंगे।
🔅आपको मक़ामे महमूद अता किया गया।
🔅आपको शफाअते कुबरा जैसी इज़्ज़त से नवाज़ा गया।
🔅आपको कियामत के दिन लिवाउल हम्द अता किया गया। लिवाउल हम्द एक झंडा है जो रोज़े कियामत आपको अता होगा।
🔅आप सबसे पहले जन्नत में दाखिल होंगे।
🔅आपको हौज़े कौसर अता किया गया।
🔅क़ियामत के दिन हर शख़्स का नसब व तअल्लुक मुन्क्ता हो जाएगा मगर आपका नसब व तअल्लुक मुन्कता न होगा।
🔅आपके सिवा किसी नबी के पास हज़रते इसराफिल अलैहिस्सलाम नहीं उतरे।
🔅आपके दरबार में बलन्द आवाज़ से बोलने वाले के नेक आमाल बरबाद कर दिए जाते हैं।
🔅आपको हुजरों के बाहर से पुकराना हराम कर दिया गया।
🔅आपकी अदना सी गुस्ताखी करने वाले की सज़ा कत्ल है।
🔅आपको तमाम अम्बिया अलैहिमुस्सलाम से ज़्यादा मोजिज़ात अता किए गए।
👉🏻आख़िर में बस यही कहना है :
ज़मीनो ज़माँ तुम्हारे लिये मकीनो मकाँ तुम्हारे लिए चुनीनो चुनाँ तुम्हारे लिए बने दो जहाँ तुम्हारे लिए
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《│पोस्ट - 32│》
🪄 अब्दुल्लाह - आपके फज़्ल व कमाल के बारे में अगर बात की जाए तो अपनी तरह बशर कहने वालों के मुँह में ताले लग जायेंगे। ज़रा कुछ बयान करें।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हजरते शाह अब्दुल अज़ीज़ अलैहिर्रहमह ने अपनी किताब तफ्सीर फतहुल अज़ीज़ में सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के फज्लो कमाल के बयान में 44 खुसूसियात इस तरह ज़िक्र की हैं :-
1.हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अपनी पुश्त मुबारक से भी वैसे ही देखते थे जैसा कि अपने सामने से देखते थे।
2.आप 'सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम रात को और अंधेरे में भी वैसा ही देखते थे जैसा दिन में देखते थे।
3.आपके मुँह मुबारक का लुआब कड़वे पानी को मीठा कर देता।
4.दूध पीते बच्चे के मुँह में आप अपने दहन मुबारक से एक कुतरा टपकाते वह बच्चे सारा दिन दूध दूध न मांगते और उनका पेंट भरा रहता जैसा कि आशूरा के दिन अहले बैत के बच्चों पर तजर्बा हुआ।
5.आपके बग़ल मुबारक निहायत सफेद साफ शफ़्फ़ाफ थे उनमें बाल मुतलक न थे।
6.आपकी आवाज़ मुबारक इतनी दूर पहुँचती कि दूसरे लोगो की उससे सौवें हिस्से तक भी न पहुँचती इसी तरह आप इतनी दूरी से सुनते कि दूसरा कोई न सुन सकता।
7.आपकी आंखें मुबारक सो जातीं लेकिन दिल बेदार रहता।
8.सारी उम्र आपको बलगम नहीं आया।
9.आपको कभी एहतिलाम न हुआ।
10.आपका पसीना मुबारक कस्तूरी से भी ज्यादा खुशबूदार था और वह भी इस हद तक कि अगर आप किसी गली में से गुज़र जाते तो लोग आपकी खुशबू से आप तक पहुँच जाते थे।
11.किसी ने आपका फुज़ला ज़मीन पर न देखा क्यूँकि ज़मीन उसे निगल लेती और वहाँ से कस्तुरी की तरह खुशबू आती।
12.आप खतना किए हुए पैदा हुए!
13.आप नाफ कटे हुए पैदा हुए निहायत साफ किसी किस्म की नजासत आपके जिस्म पर न थी।
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《│पोस्ट - 33│》
🪄 14. विलादत के वक़्त जब आप ज़मीन पर तशरीफ लाए उसी वक़्त सजदा फरमाया और अपनी उंगली को आसमान की तरफ उठाया।
15.आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की विलादत के वक़्त ऐसा नूर मुजल्ला हुआ कि आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को वालिदा मुहतरमा ने उसकी रोशनी में शाम के शहर देखे।
16.आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का झूला फ़िरिश्ते झुलाते थे।
17.चांद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से झूले में बातें करता था।
18.गर्मी के मौसम में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर बादल साया करता।
19.अगर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी दरख़्त के पास तशरीफ लाते तो दरख़्त साये के लिए आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर झुक जाता।
20.आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का साया ज़मीन पर नहीं पड़ता।
21.आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को जूंए कभी नहीं पड़ीं।
22.आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के कपड़ों और जिस्मे अतहर पर कभी मक्खी नहीं बैठती थी।
23.अगर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी जानवर पर सवारी फरमाते तो वह जानवर सवारी की मुद्दत पेशाब पाखाना नहीं करता।
24.आलमे अरवाह में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही सबसे पहले पैदा हुए।
25.अल्लाह तआला ने जब फरमाया अलस्तुं बिरब्बिकुम (क्या मैं तुम्हारा रब नहीं) तो इसके जवाब में सबसे पहले आपने ही फ़रमाया 'बला' यानी बेशक तू ही हमारा रब है
26.मेराज की सैर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ ही मख़सूस है।
27.बुराक आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही की सवारी है।
28.आसमानों पर जाना और काबा कौसैन तक पहुँचना और अल्लाह का दीदार करना सिर्फ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के ही लिए था।
29.आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के साथ फरिश्तों का जंग में शरीक होना आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए खास था।
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《│पोस्ट - 34│》
🪄 30. चांद के दो टुकड़े कर देना और दूसरे कई ऐसे मोजिज़ात आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के लिए ख़ास थे।
31.कियामत के दिन जो कुछ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को दिया जाएगा और किसी को अता नहीं होगा।
32.सबसे पहले आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही कब्र से बाहर तशरीफ लायेंगे।
33.मैदाने हश्र में आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही बुराक सवार होंगे।
34.सत्तर हजार फ़िरिश्ते आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही के गिर्द परवानावार घूमते होंगे।
35.अशें आज़म की दाईं जानिब कुर्सी पर आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही को जगह दी जाएगी।
36.मकामे महमूद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ही अता होगा।
37.लिवाउल हम्द (अल्लाह तआला की हम्द व सना का झंडा) आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही के मुबारक हाथ में दिया जाएगा कि हज़रते आदम अलैहिस्सलाम और आपकी तमाम ईमानदार औलाद उसके नीचे होगी।
38.तमाम नबी अपनी उम्मत के साथ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम् ही के पीछे होंगे।
39.अल्लाह पाक का दीदार आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से ही शुरू होगा।
40.शफाअत का सेहरा आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही के मुबारक सर पर होगा।
41.सबसे पहले पुलसिरात पर से आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही गुज़रेंगे और तमाम खलकत को हुक्म होगा कि अपनी निगाहें, नीची कर लें ताकि आपकी साहबज़ादी हज़रते फातिमा रदीयल्लाहु तआला अन्हा पुलसिरात से गुज़रें।
42.आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ही जन्नत का दरवाज़ा खोलेंगे।
43.कियामत के रोज़ आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को वसीले के मरतबे पर मुशर्रफ किया जाएगा जो एक मरतबा है निहायत बलन्द कि मखलूक में किसी और को मयस्सर नहीं।
44.और हकीकत उसकी यह है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम उस दिन ख़ुदा वन्द तआला के हुजूर में बमन्जिला वजीर के होंगे। आख़िर में लिखा कि और भी बहुत सी खुसूसियात हैं जिनका गिनना बहुत मुश्किल अल्लाह ही जाने उनके मर्तबे को।
मेरे ख्याल से पिछले दो सवालों के जवाब में जो कुछ कहा गया तो अब शायद ही इसके सुनने के बाद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को बशर तो कहे मगर अपने जैसा बशर न कहे। फिर भी अगर कोई सवाल या वसवसा बाकी हो तो बतायें।
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《│पोस्ट - 35│》
🪄 अब्दुल्लाह - फिर अल्लाह तआला ने उन्हें बश-रुम्मिस्लुकुम क्यूँ फरमाया ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - क्यूँकि हुस्ने यूसुफ को देख कर औरतों ने उनकी बशरयित का इन्कार कर दिया और तू तो यूसुफ का भी इमाम है और तेरा नाम सुन कर अरब के मर्द गर्दने कटायेंगे फिर कहीं तुझे कुछ और ही कहना न शुरू कर दें लिहाज़ा कह दे अना बश-रुम्मिस्लुकुम हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम ने मुर्दे ज़िन्दा किए तो ईसाइयों ने खुदा कहना शुरू कर दिया ऐ हबीब तू तो पत्थरों और दरख़्तों में जान डाल देगा कहीं तेरे बारे में भी लोग ऐसा न कहना शुरू कर दें लिहाज़ा फरमा दिया बश-रुम्मिस्लुकुम। हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने नमरूद से मुनाज़रा किया तो फरमाया अगर तू ख़ुदा है तो सूरज मग़रिब से निकाल। लोगों के ज़हन में यह बात आई कि शायद जो सूरज मग़रिब से निकाले उसे ख़ुदा कहा जा सकता है तो फरमाया ऐ महबूब तू तो सूरज को पल्टा देगा चांद के टुकड़े कर देगा तो कहीं लोग शक में न पड़ जायें लिहाज़ा कहलवा दिया बश-रुम्मिस्लुकुम सहाबा ने आपसे आपको सजदा करने की इजाज़त मांगी तो सरकार ने फरमा दिया बश-रुम्मिस्लुकुम।
👉🏻 अब्दुल्लाह - वाह क्या नुकता बयान किया है वह न ख़ुदा हैं न खुदा से जुदा हैं?
👉🏻मुफ्ती साहब - शैतान ने उन्हें बशर कहा और मरदूद हुआ। आज शैतान का कहना मानने वाले कुछ लोग उन्हें अपने जैसा बशर कह कर ईमान से हाथ धो बैठे हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - बशर ज़रूर हैं मगर उन जैसा बशर कोई नही है कि जिसके शहर कलाम और बका की कसम अल्लाह ने कलामे मजीद में खाई।
👉🏻 मुफ्ती साहब - सूरह बलद में है' ऐ महबूब मैं इस शहरे मक्का की कसम सिर्फ तेरी वजह से फरमाता हूँ। काश हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की सीरत को गौर से पढ़ा होता इसलिए तो मैं कहता हूँ कि इल्में दीन सीखो सब मअसला हल है।
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《│पोस्ट - 36│》
🪄 अब्दुल्लाह - सूरह फातिहा में है "इय्याका नअबुदु व इय्याका नस्तईन (तर्जमा : हम तेरी ही इबादत करते है और तुझे से मदद चाहते है)" इस आयत से तो यह साबित होता है कि किसी और से मदद मांगना गलत हमें सिर्फ अल्लाह से मांगना चाहिए और अल्लाह के सिवा किसी भी ज़िन्दा या मुर्दा से मांगना शिर्क है।
👉🏻मुफ्ती साहब : अगर यह अकीदा रखे कि कोई जिन्दा या साहिबे मज़ार अल्लाह की दी ताकत से मदद करते हैं तो गैरुल्लाह से मदद मांगना सही है और अगर यह अकीदा रखे कि कोई ज़िन्दा या साहिबे मज़ार अपनी ताकत से मदद करते हैं अल्लाह से मा'ज़अल्लाह कोई मतलब नहीं तो शिर्क व कुफ़ है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - अल्लाह के अलावा किसी और से मदद मांगना शिर्क है मगर लोग गैरुल्लाह से मदद मांगते हैं मसलन या रसूलल्लाह मदद कीजिए, या ग़ौस अलममद वगैरह।
👉🏻 मुफ्ती साहब - सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और आपकी उम्मत के दूसरे वलियों से अपनी हाजत के हल के लिए मदद मांगना और उसके जवाब में उनकी तरफ से मदद होने का काइल होना बिल्कुल जाइज़ है। तकरीबन हर दौर में अल्लाह पाक ने ऐसे लोग पैदा फरमाए हैं जो बन्दों की मदद करते हैं और अल्लाह को यह पसन्द है कि मेरे महबूब बन्दों के पास मदद के वास्ते आओ।
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या अल्लाह तआला की ज़ात पाक के होते हुए किसी और से मदद मांगने की ज़रूरत है क्या अल्लाह तआला को छोड़ कर किसी और की तरफ हाथ फैलाना दुरुस्त है क्या यह शिर्क नहीं है?
👉🏻 मुफ्ती साहब - अल्लाह तआला के कादिरे मुतलक होने का कोई भी इन्कार नहीं कर सकता यकीनन वह वह हर चीज़ पर कादिर है वह चाहे तो तमाम कायनात का कारोबार बगैर किसी वसीले के चला सकता है लेकिन उसको यूँही मन्जूर है कि हर काम किसी न किसी वसीले से हो। जैसे नबियों से अपनी बात कहने के लिए उन पर फ़िरिश्तों के ज़रिए वही उतारी, बल्कि रोज़ी पहुँचाने, बारिश बरसाने, हवा चलाने, माँ के पेट में बच्चे की सूरत बनाने, मुर्दो से सवाल जवाब, रूह कब्ज़ करना, नामए आमाल माल लिखना, अज़ाब देना और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में सलाम् पहुँचाना वगैरह के लिए फिरिश्ते वसीला हैं। अल्लाह चाहता तो सारे काम ख़ुद अकेले कर सकता है मगर उसकी मर्जी यही है कि यह काम और दूसरे काम किसी न किसी वसीले से हों। तब्लीग करना, लोगों को ईमान की दावत देना और अल्लाह के पैग़ाम व अहकाम नबियों के वसीले से होते हैं अल्लाह चाहता तो खुद सब काम अन्जाम देता।
दुनिया में मुल्क चलाने के लिए लीडर, बीमारी के इलाज के लिए डाक्टर हकीम, बीमारी ठीक करने को दवाइयाँ, हाजत पूरी करने के लिए माल व दौलत, सर्दी गर्मी से बचने के लिए कपड़े, जिन्दा रहने को खाना पीना (अल्लाह चाहे तो बगैर खाए पिए भी आदमी व जानवर ज़िन्दा रह सकता है) इल्म हासिल करने के लिए किताबें व टीचर, लड़ने को हथियार, दूर जाने को सवारियाँ वगैरह वगैरह।
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《│पोस्ट - 37│》
🪄 अब्दुल्लाह - मेरा मतलब वसीले से नहीं भांगने से है ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - अगर किसी फैक्ट्री का मालिक अपने सुपरवाइज़र से हर महीने तन्ख्वाह बटवाता है तो हकीकत में तो यह मालिक ही का देना है सुपरवाइज़र तो बाटने वाला है हकीकी मालिक तो फैक्ट्री वाला ही है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हाँ ठीक है तो शिर्क किस सुरत में है?
👉🏻 मुफ्ती साहब - जब कोई यह समझे कि गैरुल्लाह से मांगने मैं अल्लाह से कोई मतलब नहीं यह अपने पास से देता है जैसे कुफ्फार करते हैं तो यह शिर्क होगा। और अगर यह अकीदा रखे कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम् या दूसरे वली अल्लाह की अता से देते है या मदद फरमाते हैं तो हरगिज शिर्क नहीं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - इसका सुबूत कुरआन में भी है ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - सुरह माइदह में है नेकी और परहेज़गारी में एक दूसरे की मदद करो गुनाहों में मदद न करो। क्या अल्लाह तआला इस आयत में बन्दों को एक नाजाइज़ काम का हुक्म दे रहा है और सुरह बकरह में है कि सब्र और नमाज़ से मदद चाहो। नमाज़ को तो कोई यह कह सकता है कि यह तो अल्लाह से मदद मांगना है और सब्र तो गैरुल्लाह ही है क्या अल्लाह बन्दों को नाजाइज़ बात का हुक्म देगा। हरगिज नहीं बल्कि यह नाजाइज़ है ही नहीं। सूरह ताहा में है कि मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह पाक ने फिरऔन की तरफ तबलीग को भेजा तो आपने अल्लाह तआला से अर्ज की मेरे लिए मेरे घर वालों में एक वज़ीर कर दे, वह कौन मेरा भाई हारून, उससे मेरी कमर मज़बूत कर दे। क्या मूसा अलैहिस्सलाम ने शिर्क कह दिया और अल्लाह पाक ने जवाब में यह नहीं कहा कि ए मूसा मेरे होते तुम यह शिर्क की बात क्यूं कह रहे हो और अल्लाह पाक ने ऐसा कहने पर मूसा अलैहिस्सलाम पर कोई ग़ज़ब क्यूँ न फरमाया। मतलब यह है यह शिर्क था ही नहीं और न है।
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《│पोस्ट - 38│》
🪄 अब्दुल्लाह - थोड़ा और क़ुरआन ही से।
👉🏻 मुफ्ती साहब - सूरह मुहम्मद में है अगर तुम दीने खुदा की मदद करोगे अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा। क्या अल्लाह तआला तबलीगे दीने के लिए गैरुल्लाह की मदद का मुहताज है ?
सूरह आले इमरान में कौन मेरे मददगार होते हैं अल्लाह की तरफ। हवारियों ने कहा हम दीने खुदा के मददगार हैं। क्या हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम पर मदद मांगने और हवारियों पर मदद करने पर शिर्क का फतवा लगेगा?
सूरह अनफाल में है वही है जिसने तुम्हें ज़ोर दिया अपनी मदद का और मुसलमानों का।
क्या जिन मुसलमानों की मदद देना अल्लाह ने पसन्द फरमाया वो गैरुल्लाह नहीं ?
इसी सूरह में अल्लाह ने फरमाया ऐ गैब की ख़बरें देने वाले नबी अल्लाह तुम्हें काफी है और जितने मुसलमान तुम्हारे पैरू हुए। क्या अल्लाह खुद काफी नहीं था, अब क्या क़ुरआन पर फतवा कोई लगा सकता है और इस किस्म की बेजा बातें क़ुरआन के ख़िलाफ नहीं।
सूरह आले इमरान में है कि मैं तुम्हारे लिए मिट्टी से परिन्द की सी मूरत बनाता हूँ फिर उसमें फूंक मारता हूँ तो वह फौरन परिन्द हो जाती है अल्लाह के हुक्म से और मैं शिफा देता हूँ मादरज़ाद अंधे और सफेद दाग वाले को और मैं मुर्दे जिलाता हूँ अल्लाह के हुक्म से।
अब अगर इस आयत की रोशनी में कोई मुसलमान यह अकीदा रखे कि नबियों के करम से शिफा हासिल होती और मुर्दे ज़िन्दगी पाते हैं तो क्या यह शिर्क होगा। अगर हाँ (माज़अल्लाह) तो क्या अल्लाह ने एक शिर्क अकीदे की तरफ माइल किया। अगर नहीं तो फिर भोले मुसलमानों को बहकाना कैसा अल्लाह हमें ऐसी बातें करने से बाज़ रखे।
सुलैमान अलैहिस्सलाम का बिलकीस के तख़्त को अपने वजीर से मंगाना अल्लाह से दरख़वास्तं न करना क्या शिर्क है और फिर वज़ीर का पल भर में तख्त का ने आना यानी मदद हो भी जाना क्या यह शिर्क है ?
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《│पोस्ट - 39│》
🪄 मुफ़्ती साहब - सूरह मरयम में है बोला मैं तेरे रब का भेजा हुआ हूँ कि तुझे एक सुथरा बेटा दूँ। बेटा देना अल्लाह का काम है या फ़िरिश्ते का हां हुक्म और अता हर जगह अल्लाह ही की है। इसी तरह अगर कोई यह कहे कि मेरे पीर ने या ख्वाजा ने या गौसे पाक ने बेटा दिया तो यह शिर्क न होगा। हां माज़अल्लाह कोई यह अक़ीदा रखे कि बगैर अल्लाह की अता से है जरूर शिर्क है। मगर जाहिल से जाहिल देहाती गंवार भी यह अक़ीदा नहीं रखता।
👉🏻सूरह निसा में और अगर जब वह अपनी जानों पर जुल्म करें तो ऐ महबूब तुम्हारे हुजुर हाज़िर हों और फिर अल्लाह से माफी चाहें और रसूल उनकी शफाअत फरमाये तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा कबूल करने वाला मेहरबान पायें (और यह हुक्म कियामत तक के मुसलमानों के लिए है) क्या अल्लाह तआला खुद गुनाह न बख़्श सकता है बल्कि वही बख़्शेगा फिर क्यूँ नबी की बारगाह में बुलाया जा रहा है उनसे मदद क्यूँ मंगवाई जारी है अल्लाह को यही पसन्द है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - मैं समझता हूँ क़ुरआन के बहुत हवाले हो गए अब कुछ हदीस से इरशाद फरमाएं।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने एक बार हज़रते रबिआ इब्ने कअब रदियल्लाहु तआला अन्हुम से फरमाया आज कुछ मांग ले। उन्होंने अज़े की मैं आपसे जन्नत में आपका पड़ोस मांगता हूँ। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया इसके अलावा कुछ और भी। अर्ज की बस यही। फरमाया तू अपनी ज़ात पर कसरते सुजूट से मेरी मदद कर।
👉🏻जंगे खन्दक के मौके पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते जाबिर रदियल्लाहु तआला अन्हु को अपना हवारी (यानी मददगार) फरमाया।
👉🏻हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बेशुमार मोजिजात हैं जिसमें सहाबाए किराम हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास मदद मांगने आए और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने कभी भी यह न फरमाया कि अल्लाह से कहो मुझसे मदद मांगना शिर्क होगा। जैसे दम करके, लुआबे दहन लगा के, दुआ करके, अपना मुबारक हाथ लगा के आपने अल्लाह की अता से सहाबियों की मदद फरमाई। शायद ही कोई सहाबी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की मदद लेने से बचा होगा बल्कि सबसे बड़ी दौलत हमें और तमाम मुसलमानों को हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से उनकी मदद से ईमान मिला सब अल्लाह ही की अता से है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया मैं ही हूँ जो जन्नत का दरवाजा खोलूंगा।
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《│पोस्ट - 40│》
🪄 मुफ़्ती साहब - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि मेरा नाम अहीद इस लिए हुआ कि मैं अपनी उम्मत से दोजख की आग को दूर फरमाता हूँ। ईमान मिलना, जन्नत में ले जाना, दोजख से आज़ाद कराना यह सब आपकी मदद व वसीला नहीं तो और क्या है। बात वही है, अल्लाह ने अपने महबूब को इख्तेयार दिया और हुजुर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और तमाम नबी तमाम औलिया सब अल्लाह की देन व अता से ही मदद फरमाते हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - मैंने सुना है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया ऐ फातिमा यह न समझना कि तुम मेरी बेटी हो तुमसे भी आमाल की पुरसिश होगी।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हज़रते फातिमा रदियल्लाहु तआला अन्हा जन्नत की औरतों की सरदार हैं ऐसा भी हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया और आपके फज़ाइल में हदीसें भरी पड़ी हैं तमाम सहाबा के गुनाह हमारी नेकियों से अफज़ल हैं तो क्या इनसे सवाल होने का मतलब यह निकालना कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम किसी की मदद नहीं फरमायेंगे कि वह तो अपनी बेटी की भी मदद न फरमायेंगे। कुछ मरदूद बस ऐब ही ढूंढने की कोशिश करते हैं और वह हदीस भूल जाते हैं कि जब तमाम मखलूक रोज़े कियामत तमाम नबियों के पास जाने के बाद आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के पास आकर ही नजात पायेंगे। अब शायद आप यह पूछेंगे कि तो फिर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ऐसा क्यूँ फरमाया। हकीकत में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का ऐसा फरमाना उम्मत को समझाने के लिए है कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की शफाअत का यह मतलब न निकाल लें कि अब गुनाह करने की छूट और नेकियाँ करने की कोई ज़रूरत ही नहीं रही।
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《│पोस्ट - 41│》
🪄 अब्दुल्लाह - हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बात तो ठीक है अब ज़रा इस बात पर रौशनी डालें कि वफात के बाद भी आप मदद फरमाते हैं और ऐसा करना भी जाइज़ और अल्लाह के वली से मदद मांगना भी सही है और वह मदद करते हैं यह शिर्क नहीं है या कब यह शिर्क होगा।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - औलियाए किराम (बहुत से वली) के बारे में बुखारी शरीफ की एक हदीस सुनिए हज़रते अबू हुरैरह रदियल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि "रसूलुल्लाह मुल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का फरमाने आलीशान है कि अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया जो मेरे किसी वली से दुश्मनी रखे तो मैं उसके खिलाफ ऐलाने जंग करता हूँ और मेरा बन्दा मेरी फर्ज की हुई महबूब चीज़ों से ज़्यादा किसी चीज़ से मेरा क़ुर्ब हासिल नहीं करता और वह नवाफिल के ज़रिए मेरा क़ुर्ब हासिल करता है हत्ताकि मैं उसे अपना महबूब बना लेता हैं और जब उसे अपना महबूब बना लेता हूँ तो उसकी समाअत (सुनना) बन जाता हूँ जिससे वह सुनता है उसकी वसारत बन जाता है जिससे वह देखता है, उसका हाथ बन जाता है जिससे वह पकड़ता है और उसका पैर बन जाता है जिससे वह चलता है और अगर वह मुझसे सवाल करे तो मैं उसे ज़रूर ज़रूर अता करता हूँ और अगर वह मेरी पनाह तलब करे तो मैं ज़रूर ज़रूर उसे अपनी पनाह अता करता है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - समाअत, बसारत, हाथ और पांव बन जाना ज़रा वज़ाहत करें कुछ समझ नहीं आ रहा।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - इस हदीस शरीफ में अल्लाह तआला के समाअत, बसारत, हाथ और पांव बन जाने से इसके ज़ाहिरी मअना मुराद नहीं हैं बल्कि इसकी शरह में बुजुर्गों ने फरमाया कि मतलब यह है कि अब उसके सारे काम बनते चले जाते हैं उसके ज़बान से निकली बात पूरी होती है वह अपनी आंखों से वह देखता है जो दूसरे इन्सान नहीं देखते वह अपने कानों से वह सुनता है जो दूसरे नहीं सुन सकते वह अपने पैरों से एक कदम में न जाने कहाँ कहाँ जाता है वगैरह वगैरह इस हदीस पाक में इन अलफाज़ों की बड़ी अहमियत है कि अगर वह मुझसे सवाल करता है तो मैं उसे ज़रूर जरूर अता करता हूँ और अगर वह मेरी पनाह तलब करे तो मैं ज़रूर जरूर उसे अपनी पनाह अता करता हूँ।
लिहाज़ा इस हदीसे पाक से यह बात साफ हो गई कि अगर आम लोग इन अल्लाह के वलियों के पास हाजत को जायें तो जाइज़ और अगर वह दुआ कर दें या अल्लाह से सवाल करें तो अल्लाह त'आला अता फरमाता है। मतलब यह है कि अपने जाइज़ काम कराने का अल्लाह के वली बहुत ही बढ़िया वसीला हैं।
बुजुर्गों की करामत का शायद हर फिका काइल है और करामत इसी का नाम है कि वली अल्लाह की अता से कुछ ऐसा कर दिखाए जो दूसरा आम इन्सान न कर सके। सुन्नी हो या वहाबी तकरीबन हर शख़्स ने बुजुर्गों की हज़ारहा करामात सुनी होंगी। हाँ अगर इसमें भी शक है तो आप अहले सुन्नत और दूसरे फिरकों की किताबों में करामात पढ़ सकते हैं।
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《│पोस्ट - 42│》
🪄 अब्दुल्लाह - मेरी इस बात का जवाब अभी भी नहीं आया कि वली या नबी से दुनिया से तशरीफ ले जाने के बाद भी मांगना और उनका मदद फरमाना सही है या नहीं ? कुछ लोग कहते हैं कि हज़ारों मन मिट्टी के नीचे दबे कोई हमारी क्या मदद कर सकता है।
👉🏻 मुफ्ती साहब - मैं इधर ही आ रहा हूँ। मैं समझता हूँ कि पहले यह समझाया जाए कि तमाम नबी और वली जिन्दा हैं फिर यह समझाया जाए कि बादे वफात भी ये लोगों की मदद करने की ताकत अल्लाह से पाते हैं और मदद करते हैं। लिहाज़ा जब मदद करते हैं तो मदद मांगना जाइज़ है शिर्क नहीं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - नबी के बारे में तो आया है कि इनकी लाश मिट्टी नहीं खाती। फिर भी नबी व वली दोनों के बारे में बतायें।
👉🏻 मुफ्ती साहब - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया सारे नबी अपनी कब्रों में ज़िन्दा हैं नमाज अदा फरमाते हैं उन्हें रिज़्क दिया जाता है। मेराज की रात रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी कब्र में नमाज़ पढ़ते देखा। अब ज़रा गौर फरमायें कि ज़िन्दा होने का यह मतलब नहीं कि अपने जिस्म व रूह के साथ सिर्फ वहीं लेटे रहें अल्लाह के हुक्म से जहाँ चाहते हैं आते जाते हैं बल्कि इन्सानों व जिन्नों से कहीं ज़्यादा तेज़।
👉🏻 अब्दुल्लाह - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने खुद अपने आपको ज़िन्दा फरमाया।
👉🏻 मुफ्ती साहब - जी हाँ तबरानी हज़रते मुजाहिद इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से रिवायत करते हैं कि हुजूर अलैहिस्सलाम ने फरमाया जिसने हज किया और मेरी वफात के बाद मेरी कब्र की ज़ियारत की वह ऐसा है जैसे उसने मेरी ज़िन्दगी में मेरी ज़ियारत की। हवाला याद नहीं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआंला अलैहि वसल्लम ने यह भी फरमाया जो कसदन मेरी जियारत को आया वह कियामत के दिन मेरा पड़ोसी होगा।
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《│पोस्ट - 43│》
🪄 अब्दुल्लाह - औलिया ए किराम के बारे में बतायें।
👉🏻 मुफ्ती साहब - इसे समझने से पहले एक उसूल को समझना बहुत ज़रूरी है वह यह कि "क़ुरआन पाक में जब कोई हुक्म बयान किया जाए तो जिस चीज़ के बारे में हुक्म फरमाया गया उसके बराबर और उससे आला चीजें उस हुक्म में बगैर ज़िक्र किए ख़ुद-ब-खुद दाखिल हो जाती हैं" मिसाल के तौर पर अल्लाह तआला ने माँ बाप के बारे में इरशाद फरमाया की तू उनसे हुंह न कहना और उन्हें न झिडकना अब इसका मतलब यह होगा कि माँ बाप हुंह से ऊपर जितनी बातें है वो सब नही करना है। मतलब ज़बान चलाना, बुरा कहना, गाली देना, सताना, वगैरह सब की मुमानअत हो गई। अब यह उसूल समझने के बाद समझइये कि क़ुरआन में शहीद जिन्दा हैं हम उनका शऊर नहीं। अब वह लोग जो शहीद से अफजल हैं वह अपने आप ही जिन्दा साबित हुए और नबी तो बिला शक व शुबा शहीद से अफज़ल और औलिया शहीद से अफज़ल बल्कि बाज़ उल्मा भी शहीद से अफज़ल तो यह लोग ज़िन्दा हुए कि नहीं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - उलमा कैसे अफज़ल हैं ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - हदीस में आया कि उल्मा के कलम की सियाही शहीदों के खून से अफज़ल है तो उल्मा अफज़ल हुए कि नहीं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - बाज़ आलिमों के हाल तो बड़े खराब हैं?
👉🏻 मुफ्ती साहब - हाँ उन आलिमों की बात नहीं हो रही जो नाम के आलिम कहलाते हैं और ईमान भी गवां बैठे हैं। उनकी सियाही की बात हो रही जो अल्लाह के नज़दीक आलिम हैं। उनकी बात नहीं हो रही जो इल्म सीख कर भी दोजख में जायेंगे जैसे कि हदीसों में वईदें आई हैं। और फिर हर वली आलिम होता है हर आलिम वली नहीं।
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《│पोस्ट - 44│》
🪄 अब्दुल्लाह - वह कैसे ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - चूंकि विलायत बेइल्म को नहीं मिलती अब चाहे वह इल्म उस वली ने ज़ाहिरी तौर पर हासिल किया हो या उस मरतबे पर पहुँचने से पहले अल्लाह तआला ने किसी और जरिए से उसे इल्म अता किया हो। और भी बहुत सी हदीसें वलियों की शान में आई हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - बात तकरीबन पूरी हो गई कि ज़िन्दा तो सभी हैं कोई जन्नत में कोई दोजख में और नेक लोग आज़ाद और मदद भी फरमा रहे हैं।
👉🏻 मुफ्ती साहब - जी खुलासा यह है कि जब शहीद दुनिया से पर्दा फरमा जाने के बाद हैं तो उनसे अफज़ल व आला यानी उल्मा व औलिया व तमाम नबी की ज़िन्दगी को तसलीम करना ही पड़ेगा। आलाहज़रत इमामे अहले सुन्नत फरमाते हैं तमाम वली मरने के बाद ज़िन्दा हैं मगर नबियों की तरह उनकी हयात नहीं कि नबियों की हयात रूहानी जिस्मानी व दुनियावी है बिल्कुल इसी तरह जिंदा हैं जिस तरह दुनिया में थे और वलीयों की हयात उनसे कम है और शहीदो से ज्यादा है और शहीदों के बारे में दो मरतबा क़ुरआन में आया कि उन्हें मुर्दा मत कहो वो जिन्दा है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - जी बिल्कुल अल्लाह के वली ज़िन्दा हैं।
👉🏻 मुफ्ती साहब - कुछ पॉइंट और नोट कर लें कि काम आयेंगे चूकि वहाबी इन्हीं बातों को ज़्यादा छेड़ता है और हम अपनी कमइल्मी की वजह से जवाब नहीं दे पाते।
1.रूह इन्सानी मौत के बाद भी बाकी रहती है क्यूँकि मौत जिस्म पर तारी होती है रूह पर नहीं।
दलील के लिए हदीस याद रखिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया मोमिन की रूह एक परिन्द की तरह है जिसे जन्नत के दरख़्तों में लटकाया जाता है यहाँ तक कि बरोज़े कियामत अल्लाह तआला उसे उसके जिस्म में लौटाएगा। (नसई)
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《│पोस्ट - 45│》
👉🏻 मुफ्ती साहब - 2.सुनना, देखना, जानना पहचानना वगैरह ये सब रूह की सिफात हैं मौत के बाद इन तमाम सिफात में इजाफा हो जाता है क्यूंकि पहले रूह बदन की कैद में थी जब कि अब वह आजाद है यही वजह है ज़िन्दा इन्सान निगाह उठाए तो ज़्यादा से ज्यादा आसमान तक देख सकता है लेकिन जब यही शख़्स मर कर कब्र में पहुँचता है तो उसकी निगाह सातों आसमानों के पार जन्नत तक पहुँच जाती है और दोजख भी उसे दिखाई जाती है यहाँ तक कि काफिर को भी दिखाई जाती है। यूंही दुनिया में आदमी थोड़ी दूर तक की आवाज़ सुन सकता है लेकिन जो शख्स मर कर कब्र में पहुँचता है तो मनों मिटटी के नीचे से बाहर की आवाज़ सुनता है। अजाब व सवाब को एक ही जगह पड़े पड़े महसूस भी करता है।
3.अब आप ही अक्ल से बतायें कि पावर बढ़ जाने के बाद मदद करना ज्यादा आसान और अच्छा होगा या पावर कम होने पर।
4 सुनने और देखने के बारे में एक नई अक्ली दलील भी सुन लीजिए देखिए आजकल कंप्यूटर व मोबाइल के जरिए आप लाखों मील दूर की चीज़ को देख व सुन सकते हैं बल्कि चाँद पर गए आदमी को देख व सुन सकते हैं अपनी बात कह सकते हैं उसकी सुन सकते हैं और यह बेजानदार चीजे हैं कि सैटेलाइट के वसीले से आप की बातचीत करा रहे हैं तो फिर अल्लाह के वलियों जोकि जिन्दा हैं वो क्यूँ नहीं ये सब कर सकते। बस बात यही है कि कर यही सकता है जिसे अल्लाह ने ताकत दी यानी अल्लाह की अता ही से सब कुछ है जिस सरह बेजान मोबाइल में अल्लाह ही की अता है उसी तरह अल्लाह के ज़िन्दा वलियों में अल्लाह की अता है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - एक एतराज़ और किया गया था कि या गौस अथवा या रसूलल्लाह कह कर मदद मांगना कि यह तो हमसे हज़ारों मील दूर हैं फिर कैसे मदद करेंगे ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - ग़ालिबन यह एतराज़ आपसे किसी ने किया होगा और शायद अब तक की बातचीत में जवाब भी जान गए होंगे। यही सवाल जब आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रहमतुल्लाहि तआला अलैह से किया गया तो आपने फरमाया "शाह अब्दुल अज़ीज़ साहब फरमाते हैं कि रूह के लिए जगह का दूर नज़दीक होना बराबर है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - यूँ तो हर वक़्त हमारी हाजात फौरन पूरी होना चाहिए ? और देखा यह गया है कि कई मरतबा औलिया अल्लाह को पुकारा गया मगर हाजात पूरी न हुई।
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《│पोस्ट - 46│》
👉🏻 मुफ्ती साहब - इसमें अल्लाह की हिकमत है। और अगर एतराज औलिया पर हो तो ऐसा एतराज़ तो अल्लाह तआला पर भी कोई कर सकता है कि हमारी मदद या हमारा काम अल्लाह तआल से मांगने पर क्यूं फौरन नहीं होता।
दृआ की कबूलियत का यह मतलब हरगिज़ नहीं कि हमने मांगा और फौरन वैसे ही अता हो जाए बल्कि इसका मतलब यह होता है कि अल्लाह तआला उसकी दुआ को बेकार नहीं जाने देता चुनांचे कभी तो वही चीज़ जो मांगी है मिल जाती है और कभी उसके बदले में हमारी भलाई पर नज़र फरमाते हुए उससे भली चीज़ हमारी झोली में डाल दी जाती है। कभी दुआ के कबूल न होने की वजह हम खुद होते हैं और वह इस तरह कि हम अल्लाह तआला से ऐसी चीज़ों का सवाल करते हैं कि जिनका मिलना शरई लिहाज़ से जाइज़ नहीं होता और कभी यूं कि हमें बहुत जल्दी पड़ी होती है और हम इन्तज़ार न करके अल्लाह की बारगाह में शिकायत करने लगते हैं और अल्लाह का करम नहीं होता। इस हदीस को मद्देनज़र रखें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो बन्दा भी अपने रब से दुआ मांगता है इसकी दुआ कबूल होती है या तो उसी वक्त दुनिया में ही दे दी जाती है या आखिरत के लिए ज़ख़ीरा बना लिया जाता है या दुआ के मुताबिक उसके गुनाह मिटा दिए जाते हैं बशर्ते कि गुनाह या कतए रहम की दुआ न हो और जल्दी न करे। अर्ज की गई या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) जल्दी कैसे करेगा। आप रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया यह कहना कि या अल्लाह मैंने दुआ मांगी तूने कबूल ही न की।
👉🏻 अब्दुल्लाह - दुआ कबूल करना, मदद या काम करना, करम फरमाना, रहम फरमाना, शिफा देना, बलायें दूर फरमाना और भी बहुत सी सिफतें अल्लाह के लिए हैं तो बन्दों के लिए मानना शिर्क होना चाहिए ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - मसअला यही है कि अल्लाह तआला की सिफ़तों को बिऐनिही (बिल्कुल वैसे ही) किसी मख़लूक के लिए साबित करना शिर्क है। लेकिन अगर अल्लाह तआला की सिफत की मिस्ल कोई सिफत किसी मखलूक में कुछ फर्क के साथ मानी जाए तो उसमें किसी किस्म का कोई हरज नहीं क्यूँकि अगर सिफात में फर्क के बावजूद शिर्क का फतवा जारी किया जाए तो दुनिया का कोई भी मुसलमान, मुसलमान न रहे सब के सब मुशरिक व बेदीन हो जायें। मिसाल के तौर पर देखना सुनना खुश होना जलाल में आना यह सब अल्लाह की सिफात हैं और यही सिफात मख़लूक के लिए भी मानी जाती हैं। कहा जाता है मैं देखता हूँ सुनता हूँ फुला खुश हुआ उसे गुस्सा आ गया वगैरह वगैरह।
कहने का मतलब यह है कि यह बात मानना जरूरी है कि अल्लाह तआला और मख़लूक की सिफ्तों में फर्क साबित कर दिया जाए तो शिर्क लगाना जहालत व गुमराही के सिवा कुछ भी नहीं। तो ऐसे फतवों को लगाकर मुसलमानों को मुशरिक करार देना जुल्म है।
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《│पोस्ट - 47│》
👉🏻 अब्दुल्लाह - अल्लाह तआला और मख़लूक की सिफ्तों में ज़रा प्वाइन्ट वाइस फर्क और समझा दे।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - तीन फर्क ज़हन में रखें बात साफ हो जाएगी जो इल्मे गैब का फर्क करने में भी काम आती है :-
1.अल्लाह पाक की तमाम सिफतें जाती हैं किसी की अता की हुई नहीं जबकि मख़लूक की तमाम सिफ्तें अताई हैं यानी अल्लाह तआला ने अपने करम से अता फरमाई हैं।
2.अल्लाह तआला की सिफतों को कभी फना नहीं जबकि मखलूक की सिफों को फना होना मुमकिन है।
3.अल्लाह तआला की सिफ्तें लामहदूद (जिनकी कोई हद नही) हैं जब के मखलूक की तमाम सिफतें महदूद हैं।
अब अगर कोई गैरुल्लाह के लिए इन फरको को मानते हुए मदद तलब करें तो उस पर शिर्क लगाना हराम व गुनाहे कबीरा होने में क्या शुबा हो सकता है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - वसीले के बारे में बताइए। वहाबी कहते है वसीला कोई चीज़ नही।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - क़ुरआन में है अल्लाह फरमाता है कि अल्लाह की तरफ वसीला ढूंढो।
👉🏻 अब्दुल्लाह - अक्ल यह खूब तसलीम करती है कि हर काम वसीले ही से हो रहा।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - जी हा और सबसे बड़ा वसीला तो खुद हुजूर सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ही हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ और क़ुरआन से?
👉🏻 मुफ़्ती साहब - गुनाहों की मगफिरत कराने के लिए हुजुर सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम को वसीला बनाने का हुक्म क़ुरआन ने दिया है है कि तुम जब अपनी जानों पर जुल्म करो तो हुजूर सल्लल्लाहो त'आला अलैहि वसल्लम की बारगाह में आओ और वह सिफारिश करें तो अल्लाह को बड़ा मेहरबान पायें और यह हुक्म कियामत तक के हर मुसलमान के लिए है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - आप तमाम आलम के लिए रहमत हैं क्या इसमें भी वसीले की तरफ इशारा है ?
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《│पोस्ट - 48│》
👉🏻 मुफ़्ती साहब - जी हाँ। बेशक अल्लाह रहीम रहमान है फिर भी फरमाता है कि ऐ महबूब हमने आपको तमाम आलम के लिए रहमत बना कर भेजा इसका साफ मतलब यही है कि हा नेमत आपके ही वसीले से मिलती है क्यूंकि आप तमाम आलम के लिए रहमत हैं और अल्लाह के सिवा हर चीज आलम में दाखिल है हाँ यह अकीदा रखना जरूरी है फि अल्लाह तआला वसीले का मुहताज नहीं यह हर काम बगैर वसीला भी कर सकता है मगर उसे पसन्द और मन्जूर इसी तरह है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हदीस में भी वसीले के बारे में आया है?
👉🏻 मुफ़्ती साहब - हाँ हदीसों में है खूबसूरत चेहरे वालों से मदद चाहो, नर्म दिल वालों से मदद चाहो, नेक लोगों से मदद चाहों
👉🏻 अब्दुल्लाह - हालांकि वसीले के बारे में पीछे बहुत कुछ आया मगर में चाहता हूँ इस बारे में कुछ और कुरआन व हदीस से बयान करें।
👉🏻 मुफ्ती साहब - सुरह माएदा में है खुदा की तरफ वसीला तलाश करों। अल्लाह पाक ने फरमाया कि मैं जमीन पर अपना नाएब बनाना चाहता हूं। यहां नाएब का मतलब दुनियावी नाएब नहीं है और अल्लाह को किसी नाएब व वसीले की जरूरत नहीं, अल्लाह चाहे तो अपनी पहचान बिना बसीले और बिना नाइब के करा सकता है हाँ उसे वसीला पसन्द है और उसे इसी तरह मन्जूर है कि मुझे मेरे नबी के वसीले से जानों। वसीले की जरूरत इन्सान को थी। तो नाएब बनाया ही इसी लिए गया कि जो बन्दे और इन्सान के बीच वसीला बनेगा और जब उससे इतना बड़ा काम लेना है यानी अल्लाह को अपनी पहचान कराने का काम लेना है तो उसे कुछ पावर व इख़्तेयारात भी दिए जायेंगे और उसे इल्म या इल्मे गैब (गैब का छुपा हुआ इल्म) भी दिया जाएगा। शैतान को यही तो बुरा लगा था कि में आग से पैदा किया गया हूँ मैं बड़ा हूँ और पावर और इल्म इन्सान को मिले। वसीला इन्सानों ही में से बने इसी लिए यह वसीले का इन्कार कराने की पूरी कोशिश में लगा रहता है और वहाबियों को बहका चुका अब सुन्नियों के पीछे पड़ा रहता। अरे अल्लाह को हमने नबियों के ज़रिए और वसीले से ही तो जाना है क्या रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के अलावा किसी ने अल्लाह को देखा है।
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《│पोस्ट - 49│》
👉🏻 अब्दुल्लाह - बहुत बढ़िया बात बताई। मैं समझता हूँ और भी आयात होंगी मगर काफी है अब कोई हदीस सुनायें।
👉🏻 मुफ्ती साहब - 1. हज़रते उसमान इब्ने हुनैफ से मरवी है कि ऐ मुहम्मद ! (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) मैं आपके वसीले से अपने रब की तहफ मुतवज्जेह हुआ।
2.एक नाबीना सहाबी का हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में अपनी नाबीनाई का सवाल करना और आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का अपने वसीले से दुआ कराना मशहूर हदीस है।
3.हज़रते फातिमा बिन्ते असद रदियल्लाहु तआला अन्हा की रिवायत में यह अल्फाज़ आये हैं "ऐ रब यह दुआ कबूल फरमा अपने नबी और उनसे पहले नबियों के वसीले से"
4.हज़रते अबू सईद खुदरी रदियल्लाहु तआला अन्हु की हदीस में यह अल्फाज़ आये हैं "ऐ अल्लाह सवाल करने वालों का तेरे यहाँ जो हक है उसके वसीले से मैं तुझसे सवाल करता हूँ इसमें सारे मुसलमानों का वसीला है इसमें ज़िन्दा भी आ गए और मुर्दा भी।
5.बारिश की दुआ के सिलसिले में हज़रते उमर रदियल्लाहु तआला अन्ह के ये अल्फाज़ आये है "ऐ अल्लाह हम तेरे बारगाह में अपने नबी के चचा का वसीला लाते हैं"
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से पहले के लोग भी वसीला मानते थे ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - हाँ हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से पहले के नबी यहूदी व ईसाई हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से दुआयें मांगते और उनकी दुआयें कबूल होतीं और जंगे फतह होती थीं। हज़रते आदम अलैहिस्सलाम की दुआ हमारे आका सल्लल्लाह तआला अलैहि वसल्लम का वास्ता व वसीला देने से ही हुई थी।
दलाइल और वाकियात बहुत हैं समझदार के लिए इतने ही काफी हैं जो न समझना चाहे उसके लिए वही मिसाल कि अबू जहल के हाथ में कंकरियों ने कलिमा पढ़ा न मानना था न माना। खुलासा यूँ है कि जिस तरह परवरदिगारे आलम बादलों के वसीले से बारिश सूरज के वसीले से धूप और चांद के वसीले से चांदनी अता फरमाता है। बच्चों को माँ बाप के ज़रिए पैदा फरमाता है और उन्हीं के ज़रिए उन्हें पालता है और रोटी रोजी अता फरमाता है और इससे उसकी ज़ात में कोई नुक्स नहीं आता न उसकी शान में कोई फर्क आता है बस यूँ समझिए कि उसकी मर्जी है कि कायनात आलम के ख़ज़ाने ज़ाहिर और बातिनी नेमतें जिसको भी मिलें व बारगाहे हबीबे ख़ुदा मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से मिलें और उन्हीं के गुलामों और नेक बन्दों से बटें और यह अकीदा हरगिज़ तौहीद के ख़िलाफ नहीं है।
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《│पोस्ट - 50│》
ताजीमें नबी
👉🏻 अब्दुल्लाह - अगर हम सही तरीके पर यह समझ लें कि हमें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के बारे में क्या क्या अकीदे रखना चाहिए तो शायद फिर हमारे बहकने की गुंजाइशा लगभग ख़त्म हो जाएगीं।
👉🏻 मुफ्ती साहब - बुनियादी अकाइद सीखें और ताज़ीमे रसूल सीखे। अपने अस्ल मकसद की तरफ रहें कि अल्लाह ने हमें क्यूँ पैदा किया। अल्लाह पाक ने हमें इबादत के लिए पैदा किया है और यह भी ध्यान रहे कि अल्लाह ने यह भी फरमाया है कि ऐ महबूब तुझे पैदा करना मन्जूर न होता तो कुछ पैदा न करता यहाँ तक कि अपना रब होना होना भी ज़ाहिर न फरमाता।
👉🏻 अब्दुल्लाह - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताज़ीम के बारे में कुछ कुरआन व हदीस से फरमायें और इस तरह फ़रमायें कि जिसमें जवाब कुछ इस तरह हो कि हमारे ऊपर लगाया यह इल्ज़ाम भी साफ हो जाए कि यह कहते हैं कि तुम अल्लाह तआला से भी ज़्यादा हुजूर सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम की ताज़ीम करते हो और कभी कभी इससे भी ज़्यादा बढ़ा देते हो।
👉🏻 मुफ्ती साहब - अल्लाह तआला की तारीफ की कोई हद नहीं है और हर मख़लूक की तारीफ की कोई न कोई हद। अब अगर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कोई इतनी तारीफ करे कि माज़ल्लाह उन्हें इबादत के काबिल मानने लगे तो वह काफिर हो जाएगा और ऐसा तो काफिर भी ताज़ीम नहीं करता फिर हम तो मुसलमान हैं। इबलीस ताज़ीम न करने ही की वजह से मरदूद हुआ उसे ताज़ीमी सजदे का तो हुक्म था खैर जो कुरआन पाक ने हमें किस तरह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ताज़ीम का हुक्म दिया वही अर्ज करता हूं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - जी बेहतर हवाला भी बताते जायें।
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《│पोस्ट - 51│》
ताजीमें नबी
👉🏻 अब्दुल्लाह - मदीने की ताज़ीम ज़्यादा है या मक्के की ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - मक्का में एक नेकी एक लाख नेकी के बरादर है और एक गुनाह एक लाख गुनाह के बराबर है और मदीने पाक में एक नेकी पचार हज़ार के बराबर मगर एक गुनाह एक गुनाह ही लिखा जाता जाता है। अब खुद ही फैसला कर लें।
आलाहज़रत फरमाते हैं - तैबा न सही अफज़ल मक्का ही बड़ा ज़ाहिद, हम इश्क के बन्दे हैं क्यूँ बात बढ़ाई है
अलबत्ता वह जमीन जिसमें आप सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम आराम फरमा रहे हैं वह ज़मीन व आसमान काबा व अर्श से भी अफज़ल है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - यह जो सुन्नी लोग हर नमाज़ के बाद मदीने शरीफ की तरफ मुँह करके क्या पढ़ते हैं और यह बिदअत तो नहीं? या यह भी ताज़ीम के लिए खड़े होते हैं
👉🏻 मुफ्ती साहब - यह एक मुस्तहब काम है करें तो अच्छा है ताज़ीम भी है न करें तो कोई गुनाह भी नहीं, रोके तो ऐसा करना बुरा है और यह सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह में मुख़्तसर सा सलाम अर्ज करते हैं इसमें कोई हरज नहीं है। मीलाद शरीफ में विलादत के ज़िक्र के वक्त ताज़ीम के साथ खड़े होकर सलाम पढ़ना एक ज़माने से बिदअते हसना के रूप में होता चला आया और मुसलमानों की मेजारिटी ने इसे पसन्द फरमाया और मैंने तो बाज़ वहाबियों को भी सलाम के वक्त खड़े होते देखा अगर यह बिदअत है तो फिर वह ये अमल क्यों करते हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - क्या कहीं किसी हदीस में खड़े होने को मना भी आया है ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - हा आया है, वह उसके लिए जो चाहता है कि उसके लिए लोग खड़े हों (क्योंकि इसमें गुरूर व तकब्बुर का इमकान है आया है कि जिसको पसंद हो कि लोग उसके लिए खड़े हो वह अपनी जगह दोजख में ढूंढे) जब कोई बड़ा आता है तो तकरीबन हर सोसाइटी में खड़े होने की ताज़ीम समझा जाता है और इसे कोई बुरा नहीं कहा। और रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को खड़े हो कर सलाम अर्ज करने में क्या बिद्दते सइया हो सकती है हरगिज नहीं। हमारे नज़दीक ताज़ीम है और अगर बिदअत भी तसलीम करें तो बिद्दते हसना है।
👉🏻 अब्दुल्लाह - लाखों सलाम करोड़ों सलाम और कि मस्जिद में नमाजियों को नमाज़ में खलल आये यह तो मुनासिब नहीं मालूम होता?
👉🏻 मुफ़्ती साहब - लाखों करोड़ों में हरज नहीं कि हमें अल्लाह ने खूब दुरूद व सलाम पढ़ने का हुक्म दिया है। हां नमाज़ियों को नमाज़ में खलल आये इससे बचना चाहिए।
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ सिरफिरे कहते हैं तेज़ आवाज़ और लाउडस्पीकर से सलाम न पढ़ो कि कोई पाखाने में है तो ताजीम के लिए कैसे खड़ा होगा।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - वह शायद लाउडस्पीकर पर अज़ान के भी ख़िलाफ होंगे कि ऐसा न करो कि पाखाने वाले को अज़ान का जवाब देना पड़ेगा। इन्हें तो सलाम से ही चिढ़ है जब कि सलाम क़ुरआन से साबित है कि अल्लाह तआला फरमाता है "बेशक अल्लाह और उसके फ़िरिश्ते नबी पर दूरूद और सलाम पढ़ते हैं ऐ ईमान वालो तुम भी खूब दुरूद व सलाम भेजो।"
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《│पोस्ट - 52│》
इख्तेयाराते मुस्तफा
👉🏻 अब्दुल्लाह - हमारे आका सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को अल्लाह तआला ने इख़्तेयार दिए हैं इसके बारे में कुछ रोशनी डालें ?
👉🏻 मुफ्ती साहब - कुरआन में बहुत सी आयात हैं जिनसे साबित कि अल्लाह तआला ने हमारे आका को इख़्तेयारात दिए हैं सूरह तौबा में है अगर वह राजी हो जाते इस पर जो अल्लाह और उसके रसूल ने उनको दिया, इसी सूरत में दूसरी जगह है और न बुरा लगा उन्हें मगर यह कि अल्लाह और उसके रसूल ने उन्हें अपने फल से गुनी कर दिया, सुरह अहज़ाब में है अल्लाह ने इस पर इनाम फरमाया और ऐ महबूब आपने इस इनाम फरमाया सूरह हश्र में है और जो तुम्हें रसूल दें वह ले लो और जिससे मना कर दें रुक जाओ। और भी बहुत सी आयात हैं जिससे यह साबित कि हमारे आका सारे जहान को देते हैं और इन आयात से आपकी अता, आपका वसीला, आपकी मदद साबित होते हैं।
👉🏻 अब्दुल्लाह - हदीस से कुछ फरमायें।
👉🏻 मुफ्ती साहब - हदीस में है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते है में ही ख़ाज़िन हूं रखता हूं जहाँ हुक्म होता है (यानी जहाँ अल्लाह फरमाता हैं अल्लाह देने वाला है में बांटने वाला हूं। इसके अलावा अल्लाह तआला ने हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को ऐसे इख़्तेयार भी दिए कि जिसके लिए चाहें शरीअत में आसानी फरमा दें इसकी कुछ मिसाले सुने
1.हज के मौके पर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने दो दो नमाजें जमा फरमा दीं यानी अराफात में जुहर व असर साथ पढ़ना है और मुज़दलेफा में मग़रिब व इशा साथ साथ।
2.हज़रते खुजैमा के लिए अकेले की गवाही को काफी किया।
3.हज़रते सुराका के लिए सोना हलाल किया जबकि सोना मर्द को हराम है।
4.सब मर्दों के लिए रेशम हराम मगर दो सहाबियों के लिए हलाल की।
5.माहे रमज़ान में रोज़े की हालत में बीवी मे मुजामअत करने वाले को न सिर्फ कफ़्फ़ारा माफ फरमाया बल्कि टोकरा खजूरों का भी इनायत किया।
6.हज़रते अस्मा बिन्ते उमैस को उनके ख़ाविन्द की वफात पर सिर्फ तीन दिन सोग करके निकाह की इजाज़त अता कर दी।
7.हज़रते अबू हुरैरह रदियल्लाहु तआला अन्हु के लिए 6 माह का बकरी का बच्चा कुर्बानी के लिए जाइज़ फरमाया।
8.अपनी मस्जिद में मौला अली के लिए हालते जनाबत में आना जाइज़ फरमाया।
9.मौला अली को फातिमा के रहते दूसरा निकाह मना फरमाया।
10.एक शख्स ने कहा कि मैं दो वक्त की नमाज़ पढूंगा ईमान ले आऊंगा इजाज़त अता फरमाई।
11.मुस्लिम वा मिश्कात में है हज़रते इब्राहीम खलीलुल्लाह मक्का को हरम बनाया मैं मदीने को हरम बनाता है।
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《│पोस्ट - 53│》
शफ़ाअत
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ लोग यह कहते हैं कि अपने आमाल से आदमी जन्नत में जाएगा माजअल्लाह कोई सिफारिश नहीं करेगा।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - शर्म नहीं आती ऐसे जलीलों को जरा सोचिए आपके हाथ में कलम दे दिया जाए और कहा जाए कि अपने बारे में खुद फैसला लिखो कि तुम जन्नत में जाओगे या जहन्नम में तो शायद आज का एक आम आदमी यही कहेगा कि कुछ दिन तो जहन्नम में ही रहना पड़ेगा इसके बावजूद उनके सदके में सबसे पहले जन्नत में जा रहे हो अल्लाह तआला फरमाता है ए महबूब जब तक आपकी उम्मत जन्नत में दाखिल ना हो जाए दूसरे नबियों की उम्मत पर जन्नत हराम है। हम जैसे गुन्हेगार दूसरे उम्मत के नबियों तक से पहले जन्नत में जा रहे हैं जो हमसे कहीं ज्यादा नेकोकार हैं यह किसका सदका है। शफाअत क़ुरआन से साबित जैसा कि दूसरे सवालों के जवाबों में भी आया कि अल्लाह ने हमें बुलाया कि मेरे महबूब के दर पर आओ और वह अगर तुम्हारे लिए सिफारिश कर दें तो अल्लाह तुम्हें बख़्श देगा।
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ हदीसें इस बारे में सनायें।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - शफाअते कुबरा की हदीसें जिनमें साफ सरीह इरशाद हुआ कि महशर का दिन बहुत तवील (लम्बा) दिन होगा कि काटे न कटेगा, और सरों पर आफताब और दोजख नज़दीक, उस दिन सूरज में दस बरस कामिल की गर्मी जमा करेंगे और सरों से कुछ ही फासले पर लाकर रखेंग, प्यास की वह शिद्दत कि खुदा न दिखाए, गर्मी वह कयामत की कि अल्लाह बचाए, बांसों पसीना ज़मीन में जज्ब होकर ऊपर चढ़ेगा यहाँ तक कि गले गले बल्कि इससे भी ऊँचा होगा, जहाज़ छोड़ें तो बहने लगें लोग उसमें गोते खायेंगे, लोग इन अज़ीम आफ़तों में जान से तंग आकर शफीअ (शफाअत या सिफारिश करने वाला) की तलाश में जा-ब-जा फिरेंगे।
आदम (यानी आदम अलैहिस्सलाम) व नूह व खलील (यानी हज़रते इब्राहीम अलैहिस्सलाम) व कलीम (यानी मूसा अलैहिस्सलाम) व मसीह (यानी हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम) के पास हाज़िर होकर जवाब साफ सुनेंगे। सब अम्बिया (नबी की जमा) फरमायेंगे हमारा यह मरतबा नहीं हम इस लाएक नहीं हमसे यह काम न निकलेगा।
नफ़्सी नफ़्सी तुम और किसी के पास जाओ यहाँ तक कि सब के बाद हुजूर पुर नूर ख़ातमुन्नबिइयीन (जिन पर नुबुव्वत ख़त्म हुई) सय्येद्दल अव्वलीन व आख़रीन (शुरू वाले और आख़िर वाले सब ही के सरदार) शफीउल मुज़निबौन रहमतुल्लिल आलमीन (तमाम आलम के लिए रहमत), सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर होंगे
हुजूर अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अना लहा अना लहा फरमायेंगे यानी मैं हूँ शफाअत के लिए, मैं हैं शफाअत के लिए फिर अपने रब्बे करीम जल्ला जलालुहु की बारगाह में हाजिर होकर सजदा करेंगे, उनका रब तबारक व तआला इरशाद फरमाएगा से मुहम्मद अपना सर उठाओ और अर्ज करो तुम्हारी सुनी जाएगी और मांगो कि तुम्ह अता होगा और शफाअत करो कि तुम्हारी शफाअत कबूल होगी।
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《│पोस्ट - 54│》
शफ़ाअत
👉🏻 अब्दुल्लाह - कुछ और हादसे सुनाएं बड़ा मजा आ रहा है।
👉🏻 मुफ़्ती साहब - जी हां और सुनिए हदीस यह हदीस सही बुखारी मुस्लिम तमाम किताबों में मजकूर और अहले इस्लाम में मारूफ व मशहूर है यह हदीस जाहिर करेगी कि हमें खुदा व रसूल ने कान खोलकर शफीअ का नाम बता दिया और साफ फरमाया कि वह मुहम्मदुर्ऱसूलुल्लाह है (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) न बात गोल रखी हो जैसे एक बदबख्त कहता है कि उसी के इख्तियार पर छोड़ दिया जाएगा जिसको वह चाहे हमारा शफीअ कर दे उनके रब की कसम जिसने उन्हें शफी उल मुजनीबीन किया उनके शफ़ाअत हम जैसे रूसियाहो और गुनाहों (गुनाहों से भरे हुए) सियाकारों (काले करतूत वाले) सीतमगारों (जुल्मों सितम करने वाले) के लिए है जिनके बाल बाल गुनाह में बंधा है जिनके नाम से गुनाह को भी शर्म आती है हदीस के मफ़हूम पैसे खिदमत है।
1.अल्लाह त'आला ने मुझे इख्तियार दिया कि या तो शफ़ाअत लो या यह कि तुम्हारी आधी उम्मत जन्नत में जाएम मेने शफ़ाअत ली कि यह ज्यादा तमाम और ज्यादा काम आने वाली है। क्या तुम यह समझ लिए हो कि मेरी शफ़ाअत पाकीजा मुसलमान के लिए है, नहीं बल्कि वह उन गुनहगारों के वास्ते हैं जो गुनाहों में आलूदा और सख्तकार है।
2.मेरी शफ़ाअत मेरे उन उम्मतियों के लिए है जिन्हें गुनाहों ने हलाक कर डाला।
3.मेरी शफ़ाअत मेरी उम्मत में उनके लिए है जो कबीरा गुनाह वाले हैं।
4.मेरी शफ़अत मेरे गुनाहगार उम्मतियों के लिए है।
5.रू-ए-ज़मीन पर जितने पेड़ पत्थर ढेले हैं मैं कयामत में उन सबसे ज़्यादा आदमियों की शफ़अत कर लआऊँगा।
6.मेरी शफ़अत हर कलिमागो के लिए है जो सच्चे दिल से कलिमा पढ़े कि ज़बान की तसदीक दिल करता है।
7.शफाअत में उम्मत के लिए ज़्यादा वुसअत (गुन्जाइश) है कि वह हर शख़्स के वास्ते है जिसका ख़तमा ईमान पर हो।
8.मैं जहन्नम का दरवाज़ा खुलवा कर तशरीफ ले जाऊँगा वहाँ ख़ुदा की तारीफें करूँगा ऐसी कि न मुझसे पहले किसी ने कीं न मेरे बाद कोई करेगा फिर दोज़ख से हर उस शख़्स को निकाल लूंगा जिसने ख़ालिस दिल से "ला'इलाहा'इल्लल्लाह" कहा।
9.अम्बिया के लिए सोने के मिम्बर बिछाए जायेंगे वह उन पर बैठेंगे और मेरा मिम्बर बाकी रहेगा कि मैं उस पर जुलूस न फरमाऊँगा यानी बैठूंगा नहीं बल्कि अपने रब के हुजूर सर ओ कुद यानी अदब से खड़ा रहूंगा इस डर से कि कहीं ऐसा न हो कि मुझे जन्नत में भेज दे और मेरी उम्मत मेरे बाद रह जाए फिर अर्ज करूँगा ऐ रब मेरे, मेरी उम्मत मेरी उम्मत अल्लाह तआला फरमाएगा ऐ मुहम्मद तेरी क्या मर्जी है मैं तेरी उम्मत के साथ क्या करूँ? अर्ज करूँगा ए रब मेरे उनका हिसाब जल्द फरमा दे, पस मैं शफाअत करता रहूंगा यहाँ तक कि मुझे उनकी रिहाई की चिट्ठियाँ मिलेंगी जिन्हें दोज़ख भेज चुके थे यहाँ तक कि मालिक दारोगए दोज़ख अर्ज करेगा है मुहम्मद आपने अपनी उम्मत में रब का ग़ज़ब नाम को न छोड़ा।
इन हदीसों में यह बयान हुआ है कि हुजूर शफींउल मुज़निबीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं मैं शफीअ मुकर्रर कर दिया गया और शफाअत ख़ास (शफाअते कुबरा) मुझी को अता होगी मेरे सिवा किसी नबी को यह मनसब न मिला।
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