गुरुवार, 25 जुलाई 2024

औरतों की हिकायात (हज़रत हव्वा रदी अल्लाह अन्हा से लेकर आज कल की मॉडर्न औरतों तक)

 

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            📁 *पोस्ट न. - 01* 📂

🌹👉🏻 *हज़रत हव्वा अलैहा अस्सलाम* 

🔅अल्लाह तआला ने जन्नत को पैदा किया तो हजरत आदम अलैहिस्सलाम को जन्नत में ठहराया। आप जन्नत में अकेले थे। एक दफा अल्लाह तआला ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पर नींद गालिब कर दी और वह सो गए। खुदा ने फिर आपकी दाएँ पसली में से एक पसली निकाल कर उससे हव्वा को पैदा फरमाया और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की निकाली हुई पसली की जगह को गोश्त से भर दिया। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम जागे तो अपने सर के पास हज़रत हव्वा को बैठा पाया। आपने पूछा तुम कौन हो। अर्ज किया। मैं औरत हूँ। फरमाया कि तू क्यूं पैदा की गई? अर्ज किया इसलिए कि आप मुझसे सुकून पाएं और मैं आपसे। फरिश्तों ने पूछा। ऐ आदम ! उसका नाम क्या है? फरमाया कि हव्वा। फ्रिश्तों ने पूछा यह नाम क्यों है। फरमाया कि इसलिए कि यह हैय्य (ज़िन्दा) से पैदा की गई है।

👉🏻 *सबक* 

औरत को खुदा तआला ने मर्द के सुकून के लिए पैदा फरमाया है और मर्द को औरत के. सुकून के लिए। चुनांचे खुदा तआला ने कुरआने पाक में फरमाया है "और उसकी निशानियों से है कि तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिंस से जोड़े बनाए कि उनसे आराम पाओ।"

मालूम हुआ कि मियाँ बीवी को अल्लाह तआला ने एक दूसरे के लिए सुकून के वास्ते पैदा फरमाया है, और यह सुकून उसी वक़्त हासिल हो सकता है, जब बीवी अपने मियाँ को मियाँ और मियाँ अपनी बीवी को बीवी समझे और अगर बीवी भी मियाँ बनने लगे, और कहने लगे कि मैं भी मर्द के साथ-साथ चलूँगी तो फिर सुकून का मिलना मुश्किल है।

इसी तरह आज कल के बाज़ मर्द भी ऐसे हैं जो देखने में मियाँ नहीं

बीवी नज़र आते हैं। चुनांचे एक लतीफा भी सुन लीजिए एक डांसर ने कमाल का डांस किया। कुर्सी पर बैठे हुए एक शख़्स ने दाद देते हुए कहा। वाह! रे लड़की कमाल कर दिया तूने !। दूसरा शख़्स जो उस शख़्स के पास ही बैठा था। बोला अरे वह तो मेर। बेटा है। पहले शख्स ने माफी मांगते हुए कहा। मिस साहिबा माफ कीजिए। दूसरा फिर बोला। अरे मैं तो उसका बाप हूँ।"......फरमाईए ऐसे जोड़ों में जिनमें मियाँ बीवी का फर्क ही कोई न हो सुकून पैदा हो सकता है?

हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इर्शाद है - "मेरी उम्मत की औरतों पर सोना और रेशम हलाल हैं। लेकिन मर्दों पर हराम है।"

मालूम हुआ कि सोने का जेवर अंगूठी वगैरा औरतें पहनती हैं मर्द नहीं। लेकिन आज कल शादियों में लड़की वाले दूल्हा मियाँ के लिए सोने की अंगूठी तैयार करके दूल्हा मियाँ को पहनाते हैं और दूल्हा खुश हो जाता है। हालांकि दुल्हन वाले दूल्हा को सोने की अंगूठी पहना कर मेरे शे'र के इस मिसरा की ताईद करते हैं कि यह गोया हो रहा है अक्द लड़की ही से लडकी का यह भी मालूम हुआ कि औरत की पैदाइश पसली से हुई है और हुजूर

सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है कि औरत की पैदाइश पसली से हुई है। और पसली टेढ़ी होती है। इससे नर्मी इख़्तियार करो क्योंकि पसली को अगर सख़्ती के साथ सीधा करना चाहोगे तो वह टूट जाएगी और उसका टूटना क्या है? तलाक। इसलिए हत्तल-इमकान औरत से नर्मी इख़्तियार करो।"

सुब्हानल्लाह ! कैसी मुबारक तालीम है अगर इसी एक हदीस पर अमल हो जाए तो यह आए दिन के तलाक के झगड़े खत्म हो जाएं। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जहाँ मदों के हुकूक औरतों पर ब्यान फरमाए हैं। वहाँ यह भी फरमाया है कि तुममें सबसे अच्छा शख़्स वह है जो अपनी बीवी से अच्छा सुलूक करे और मैं अपनी बीवियों से तुम सबसे अच्छा सुलूक करता हूँ। मर्द का दरजा अगरचे औरत से बड़ा है लेकिन औरत के हुकूक भी मर्दों पर बहुत हैं। एक आदमी की बीवी मर गई तो वह कहने लगा। भाईयो ! मेरी बीवी ही नहीं मरी। मेरा बावर्ची भी मर गया। मेरे घर का मुहाफिज़ भी मर गया। मेरी धोबन भी मर गई। मेरी बावर्चिन भी मर गई और मेरे बच्चों की आया भी मर गई। गोया यह सारे काम एक बीवी किया करती थी। इसीलिए इस्लाम ने औरत से हुस्ने सुलूक का दर्स दिया है।

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🌹👉🏻 *अक्लीमा* 


🔅"अक़लीमा हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की साहबज़ादी हैं तसलसुल के लिए यह हिकायत इसी बाब में दर्ज कर दी गई है।"

हज़रत हव्वा के हमल में एक लड़का और एक लड़की पैदा होते थे और एक हमल के लड़के का दूसरे हमल की लड़की के साथ निकाह किया जाता था। और चूंकि आदमी सिर्फ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की औलाद में मुनहसिर थे इसलिए मुनाकिहत की और कोई सूरत ही न थी।

हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के घर एक हमल में काबील व अकलीमा पैदा हुए और दूसरे हमल में हाबील व यहूदा पैदा हुए। काबील की बहन अक्लीमा हाबील की बहन यहूदा से ज़्यादा खूबसूरत थी। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने इसी दस्तूर के मुताबिक काबील का निकाह यहूदा से जो हाबील के साथ पैदा हुई थी और हाबील का निकाह अक्लीमा से जो काबील के साथ पैदा हुई थी करना चाहा, काबील उस पर राज़ी न हुआ। अक़्लीमा चूंकि ज़्यादा खूबसूरत थी इसलिए उसका तलबगार हुआ। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि वह तेरे साथ पैदा हुई है लिहाज़ा तेरी बहन है उसके साथ तेरा निकाह हलाल नहीं। कहने लगा यह आपकी अपनी राय है। अल्लाह का यह हुक्म नहीं है। आपने फरमाया तो तुम दोनों कुरबानियाँ लाओ। जिसकी कुरबानी मक़बूल हो जाए वही अक्लीमा का हकदार है उस ज़माना में जो कुरबानी मक़बूल होती थी आसमान से एक आग उतर कर उसको खा लेती थी। काबील ने एक अंबार गंदुम का और हाबील ने एक बकरी कुरबानी के लिए पेश की। आसमानी आग ने हाबील की कुरबानी को ले लिया और काबील की गंदुम को छोड़ दिया। उस पर काबील के दिल में बुग्ज़ व हसद पैदा हो गया जब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम हज के लिए मक्का मुकर्रमा तशरीफ ले गए तो काबील ने हाबील से कहा मैं तुझको कत्ल कर दूँगा। हाबील ने कहा। क्यों? कहने लगा। इसलिए कि तेरी कुरबानी मक़बूल हुई मेरी न हुई और अक्लीमा का तू मुस्तहिक ठहरा है। उसमें मेरी ज़िल्लत है। हाबील ने कहा। तो अगर मुझे कत्ल करने को हाथ उठाएगा तो मैं तुझे कत्ल करने के लिए हरगिज़ हाथ न उठाऊँगा। मैं तो अल्लाह से डरता हूँ। काबील ने आख़िर हाबील को कत्ल कर दिया। फिर वह उस कत्ल को छुपाने के लिए हैरान हुआ कि लाश को क्या करे। क्योंकि उस वक़्त तक कोई इंसान मरा ही न था। मुद्दत तक लाश को अपनी पीठ पर लादे फिरा तो अल्लाह ने उसे दो कव्वे दिखाए। दोनों आपस में लड़ पड़े। उनमें से एक ने दूसरे को मार डाला फिर ज़िन्दा कव्वे ने अपनी चोंच और पंजों से ज़मीन को कुरेद कर गढ़ा खोदा और उसमें मरे हुए कव्वे को डाल कर मिट्टी से दबा दिया यह देखकर काबील को मालूम हुआ कि मुर्दे की लाश को दफन करना चाहिए। चुनांचे उसने ज़मीन खोद कर हाबील को दफन कर दिया।


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🌹👉🏻 *अक्लीमा हिकायात का सबक* 


🔅सबसे पहला कत्ल जो हुआ। वह काबील के हाथों हाबील का कत्ल था। और इस कत्ल की वजह औरत थी। चुनांचे आज तक यह बात मश्हूर है कि जर (सोना) जन (औरत) जमीन लड़ाई झगड़े और कत्ल का कारण है। आजकल भी अकसर कत्ल औरत ही की वजह से होते हैं और उसकी बुनियादी वजह इन्कारे हदीस है क्योंकि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के हुक्म को काबील ने उनकी राय कहकर न माना। गहरा परवेज़ीयत की बिना उसने डाली। तो नतीजा बुरा निकला। मालूम हुआ कि पैग़म्बर के हुक्म को खुदा का हुक्म समझना चाहिए। वरना नतीजा बुरा निकलता है आज कल भी जो औरतों का इगवा (अपहरण) और उनकी वजह से कत्ल व गारत तक नौबत पहुँच जाती है उसका हुक्म इंकारे हदीस है। लोग कुरआन की आड़ लेकर कुरआन की आयात को अपनी मर्जी के मुताबिक ढाल कर औरतों को उरयानी व बेहिजाबी (कम कपड़े और बिना नकाब) के साथ घर से निकाल कर बाज़ारों में फिराने लगते हैं हालांकि कुरआन पाक जिस जाते बाबरकत पर नाज़िल हुआ। उसके हुक्म के मुताबिक औरत के लिए उरियानी व बेहिजाबी (बिना कपड़े और बिना नकाब) ओर गैरों से मिलना मिलाना गैरों से हाथ मिलाना हरगिज़ जाइज़ नहीं। हुजूर ने औरतों को नमाज़ पढ़ने के लिए भी यह दर्स दिया है कि वह अपने घर में पढ़ें और आज कल की मार्डन औरतें दिन भर बाज़ारों में और रात कलब में गुज़ारती हैं और यह सब करिश्मे इंकारे हदीस के हैं। औरत का माना ही यह है। छुपाने वाली चीज़। औरतों को मस्तूरात भी इसीलिए कहते हैं यानी सतर व पर्दे में रहने वाली।

यह भी मालूम हुआ कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने में बहन भाई का निकाह जाइज़ था क्योंकि उसके सिवा दूसरी कोई सूरत ही न थी। मगर अब हमारी शरीअत में यह बात हराम है। इस हकीकत को यूं समझए कि बच्चा पैदा होता है तो उसके लिए कपड़ों पर अपने पाजामें में हत्ता की मां-बाप की गोद में पेशाब व पाखाना कर देना जाइज़ है लेकिन बड़ा होकर ऐसा करेगा तो जूते खाएगा बचपन के हुक्म और हैं। जवानी के और बचपन में नंगे फिरना जाइज़ और जवानी में ना जाइज़। बच्चे की कमीज़ छोटी होती जाती है और जूं जूं बच्चा बढ़ता जाता है। पहली कमीज़ तंग होती जाती है। और उसकी कमीज़ का नाप बदलता रहता है हत्ता कि जब वह अपने पूरे शबाब पर पहुँच जाता है तो उस वक़्त उसकी कमीज़ का जो नाप होगा, आखिर उम्र तक वही रहेगा। इसी तरह हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के वक़्त दीन अभी शुरूआती ज़माने में था गोया बच्चा था। और बच्चे के लिए वह बातें जाइज़ होती हैं जो जवान के लिए जाइज़ नहीं होतीं यह बच्चा जूं जूं जवान होता रहा। उसकी कमीज़ का नाप यानी शरीअत भी बदलती रही, यहाँ तक कि जब यह अपने आलमे शबाब (पूरी जवान) पर पहुँचा। और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तशरीफ लाए तो खुदा ने फरमाया।

यानी आज मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन कामिल (पूरा) कर दिया और अपनी नेमत तुम पर मुकम्मल कर दी।"

गोया अब यह दीन अपने शबाब को पहुँच चुका है और अब जो शरीअत हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लेकर आए हैं जिस तरह आलमे शबाब (जवानी के वक़्त) की कमीस का नाप आखिर उम्र तक बाकी रहता है इसी तरह अब यह शरीअत क्यामत तक बाकी रहेगी अब इस शरीअत में बदलाव की ज़रूरत नहीं रही और इसीलिए हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बाद अब कोई नबी भी नहीं आ सकता क्योंकि अब किसी नबी की ज़रूरत ही नहीं रही लिहाज़ा अब जो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही व सल्लम के बाद नुबुव्वत का दावा करे वह झूठा है।

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🌹👉🏻 *वाहिला और वाइका* 

🔅वाहिला हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की बीवी का नाम है और वाइका लूत अलैहिस्सलाम की बीवी का नाम है। यह दोनों दो नबियों की बीवियाँ थीं मगर दोनों अपने मुक़द्दस शौहरों के खिलाफ और काफिरों का साथ देने वाली थीं। वाहिला अपनी कौम से हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के मुतअल्लिक कहती थी कि वह दीवाने हो गए हैं (मआज़ल्लाह) और वाइका हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के खिलाफ जासूसी करके काफिरों को ख़बरें दिया करती थी। खुदा तआला को उनकी यह हरकतें पसन्द न आईं। और उनके जहन्नमी होने का ऐलान फरमा दिया। चुनांचे कुरआन ए पाक में है।

ضَرَبَ اللَّهُ مَثَلًا لِلَّذِينَ كَفَرُوا امْرَأَتَ نُوحٍ وَ امْرَأَتَ لُوطٍ كَانَتَا تَحْتَ عَبْدَيْنِ من عبادنا صَالِحِينَ فَخَانَتَا هُمَا فَلَمْ يُغْنِيَا عَنْهُمَا مِنَ اللَّهِ شَيْئاً وَقِيلَ ادْخُلَا النَّارَ مَعَ الدَّاخِلِينप.28.अ.20.)०)

"अल्लाह काफिरों की मिसाल देता है। नूंह अलैहिस्सलाम की औरत और लूत अलैहिस्सलाम की औरत वह हमारे दो नेक बन्दों के निकाह में थीं फिर उन्होंने उन से दगा की (यानी कुफ्र इख़्तियार किया) तो वह अल्लाह के सामने, उन्हें कुछ काम न आए और फरमा दिया गया, कि तुम दोनों औरतें जहन्नम में जाओ, जाने वालों के साथ।"

चुनांचे यह दोनों काफिरा औरतें इस दुनिया में काफिरों के साथ हिलाक (मर) हो गईं। नूह अलैहिस्सलाम की बीवी तूफान में डूब गई और लूत अलैहिस्सलाम की बीवी भी इस आफत में आकर हिलाक हो गई जो इस कौम पर आई। यह तो दुनिया में हुआ। और क्यामत में जहन्नमियों के साथ-साथ जहन्नम में डाल दी गईं।

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            📁 *पोस्ट न. - 05* 📂

🌹👉🏻 *वाहिला और वाइका की हिकायत से सबक* 

🔅ईमान और नेक काम हर आदमी के लिए ज़रूरी है। चाहे वह किसी पैग़म्बर का कितना बड़ा करीबी और चहिता ही क्यों न हो। कुफ्र और बुरा काम हर पैग़म्बर की बीवी या कोई दूसरा अज़ीज़ भी इख़्तियार करेगा तो उसकी सज़ा उसे ज़रूर मिलेगी। इसीलिए खुदा तआला ने हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि आलेही व सल्लम से भी फरमाया कि ऐ महबूब अपने "करीब तर रिश्तादारों को डराओ।"

मालूम हुआ कि अंबिया-ए-किराम अलैहिमुस्सलाम और औलिया-ए-किराम की औलाद और उनके दीगर रिश्तादारों के लिए भी ईमान व अमल सालेह (नेक अमल) ज़रूरी है यह लोग क़राबत करीबी के गुरूर में अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इताअत (बन्दगी) से ना फरमानी हरगिज़ न करें। खुश अकीदा सैय्यद हज़रात हमारे सर का ताज और आंखों का नूर हैं लेकिन यह बात गलत है कि जो साहिबे सैय्यद हों वह कुछ भी करते फिरें। नमाज़ न पढ़ें। रोज़ा न रखें दाढ़ी मुंडाऐं। शराब पिएं उन्हें कुछ न कहो। इसलिए कि वह सैय्यद बादशाह है। सैय्यद को अगर बादशाह बनना है तो उसे भी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही व सल्लम की इताअत (बन्दगी) करनी पड़ेगी वरना वह कुछ भी नहीं। 

हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही व सल्लम की इताअत अगर गैर सैय्यद के लिए लाज़िम है तो सैय्यद के लिए भी लाज़िम, बल्कि बेहद जरूरी है। रेल गाड़ी के थर्ड क्लास डब्बे को अगर लाहौर से कराची पहुँचने के लिए इंजन के पीछे लगना और रेलवे लाइन पर चलना ज़रूरी है तो फस्ट क्लॉस डब्बे को भी कराची पहुँचने के लिए इंजन के पीछे लगना और रेलवे लाइन पर चलना ज़रूरी है इसी तरह अगर गैर सैय्यद को हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे लग कर उनकी इत्तिबा (पैरवी) करना और शरई लाइन पर चलना ज़रूरी है जिस तरह फस्ट क्लॉस का डब्बा अगर इंजन के पीछे न लगेगा तो लाहौर के यार्ड में ही खड़ा रहेगा और कराची हरगिज़ न पहुँच सकेगा। 

इसी तरह सैय्यद साहब भी अगर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पीछे न लगेंगे तो गुमराही के यार्ड ही में खड़े रहेंगे। जन्नत में हरगिज़ न पहुँच सकेंगे।

इकबाल ने लिखा है कि -

यूं तो सैय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़‌ग़ान भी हो तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो 

यहाँ एक और मसला भी समझ लीजिए कि हो सकता है कि किसी पैग़म्बर की बीवी काफिरा हो जाए लेकिन यह नहीं हो सकता कि किसी पैग़म्बर की बीवी बदकार हो । जिस ख़्यानत का जिक्र है वह ईमान में ख़्यानत है जो उन दोनों बीवियों ने की। किरदार की ख्यानत यानी जनाकारी मुराद नहीं क्योंकि हज़रत इब्ने अब्बास रजि. अल्लाहु अन्हु से मरवी है कि किसी नबी की बीवी बदकार नहीं हुई।

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🌹👉🏻 *हज़रत सारा व हाजरा* 

🔅हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दो बीवियाँ थीं। पहली का नाम सारा और दूसरी का नाम हाजरा था। सरज़मीने शाम में हज़रत हाजरा के बतन (पेट) पाक से हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम पैदा हुए। हज़रत सारा के कोई औलाद न थी इस वजह से उन्हें रश्क पैदा हुआ और उन्होंने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से कहा कि आप हाजरा और उनके बेटे को मेरे पास से जुदा कर दीजिए। हिकमते इलाही ने यह एक वजह पैदा किया था चुनां वहय आई कि हज़रत सारा के कहने के मुताबिक आप हाजरा और उनके बेटे इस्माईल को उस सरज़मीन में ले जाएं जहाँ अब मक्का मुकर्रमा आबाद है। वहय के मुताबिक हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम हाजरा और उनके बेटे को बुराक पर सवार करके शाम से सर ज़मीने हराम में ले आए और काबा मुक़द्दसा के नज़्दीक उतारा। यहाँ उस वक़्त न कोई आबादी थी। न कोई चश्मा (जहां से पानी निकलता हो) न कोई पानी। काबा मुक़द्दसा भी तूफाने नूह के वक़्त आसमान पर उठा लिया गया था। गोया उस वक़्त वह जगह बिल्कुल वीरान खुश्क (सूखी) और गैर आबाद थी। खाने पीने का दूर दूर तक निशान न था। ऐसे भयानक मुकाम पर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने हाजरा व इस्माईल को एक तोशा दान में कुछ खुजूरें और एक बर्तन पानी उनको देकर उतारा। और आप वहाँ से वापस हुए और मुड़ कर उनकी तरफ न देखा। हज़रत हाजरा ने यह सूरते हाल देखकर अर्ज किया कि आप हमें इस वीरान वादी में तन्हा छोड़ कर कहाँ जाते हैं। आपने कुछ जवाब न दिया। हज़रत हाजरा ने फिर पूछा कि क्या अल्लाह ने आपको इसका हुक्म दिया है? आपने फरमाया हाँ। उस वक़्त आपको इत्मीनान हुआ। हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम चले गए। हज़रत हाजरा अपने फरज़न्द (बेटा) इस्माईल को दूध पिलाने लगीं। जब वह पानी खत्म हो गया और प्यास की शिद्दत ग़ालिब हुई और साहबजादे शरीफ का हलक भी खुश्क हो गया तो आप पानी की तलाश में सफा मरवा की पहाड़ियों के दरम्यान सात मरतबा इधर उधर दौड़ीं। यहाँ तक कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के कदमे मुबारक मारने से इस खुश्क ज़मीन से पानी निकल आया जो आज तक ज़मज़म के नाम से मशहूर है। इत्तेफाकन वहाँ से एक कबीला जुरहुम का गुज़र हुआ। उन्होंने दूर से एक परिन्दा देखा। वह हैरान हुए कि इस खुश्क वादी में परिन्दा कैसा? शायद कहीं पानी का चश्मा नमूदार हुआ है चुनांचे वह इस तरफ आए तो देखा एक पानी का चश्मा जारी है। और एक नूरानी शक्ल की औरत अपनी गोद में बच्चा लिए तन्हा बैठी है। यह मंजर देखकर वह हैरान रह गए यहाँ शाहनामा इस्लाम के दो शे'र भी सुन लीजिए।

निदा आई कि ऐ जुरहुम के बच्चो बादिया गरदो

ऐ बूढ़ो और जवानो और ऐ बच्चो औरतो मर्दो यह औरत और उकसी गोद में बच्चा जो लेटा है

यह पैग़म्बर की बीवी है यह पैगम्बर का बेटा है

यह देख सुनकर क़बीला वालों ने हज़रत हाजरा से वहाँ बसने की इजाज़त चाही। आपने इजाज़त दे दी। वह लोग वहाँ बसे और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम जवान हुए तो उन लोगों ने आपके सलाह व तक़्वा को देखकर अपने खानदान में उनकी शादी कर दी। यही वह जगह है जहाँ अब काबा शरीफ और मक्का मुकर्रमा का शहर है और अतराफे आलम से लोग खचे खचे वहाँ हाज़िर होते हैं।

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            📁 *पोस्ट न. - 07* 📂

🌹👉🏻 *हज़रत सारा व हाजरा की हिकायत से सबक* 

🔅खुदा तआला के हर काम में हिकमत छुपी होती है। हज़रत हाजरा के यहाँ फ़ज़न्द (बेटा) पैदा फरमा कर हज़रत सारा के ज़रिआ मां-बेटे को एक ऐसी जगह पहुँचाया जहाँ खाने पीने का कोई सामान न था और फिर उनकी बरकत से उस वीरान जगह को मरकज़े आलम बना दिया मालूम हुआ कि अल्लाह के मकबूल बन्दे किसी वीरान जगह भी तशरीफ फरमा हो जाएं तो वह जगह आबाद हो जाती है और लोग हज़ारों तकालीफ भी बर्दाश्त करके वहाँ पहुँचने लग जाते हैं। चुनांचे मक्का मुकर्रमा का मुक़द्दस शहर हज़रत हाजरा और उनके साहबजादे हज़रत इरमाईल अलैहिस्सलाम के क़दमाने मुबारक की बरकत से आबाद हुआ और यह भी मालूम हुआ कि हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के कदम बचपन के आलम में भी ऐसे बाबरकत थे कि उन की बदौलत जो चश्मा जारी हुआ। आज तक वह खुश्क नहीं हुआ और करोड़ों अरबों, खरबों लोगों की प्यास बुझा चुका है। बुझा रहा है और बुझाता रहेगा। 

हमारे खुदे हुए कुएँ दिन रात मुसलसल इस्तेमाल होने पर खुश्क हो जाते हैं मगर एक नबी के कदमे मुबारक की बरकत देखिए कि यह चश्मा हज़ारों साल से बदस्तूर जारी है। अब भी हर साल लाखों की तादाद में हुज्जाज वहाँ पहुँचते हैं। उसी ज़मज़म के कुएं से नहाते भी हैं। वज़ू भी करते हैं। कफन भी भिगो कर लाते हैं और फिर डरमों में भर भर कर उसका पानी अपने वतन में भी लाते हैं। यह कुआं चौबीस घन्टे दिन रात चलता रहता है ट्यूब वेल से और डोलों से हर वक़्त उससे पानी निकाला जाता रहता है। लेकिन अल्लाह रे बरकते कदमे नबी। कि आज तक इस कुएं से पानी खत्म नहीं हुआ और न होगा और क्यामत तक ऐसा ही रहेगा यह कदमे नबी ही का सदका है कि दुनिया भर की ज़मीन के सारे पानियों से ज़मज़म का पानी अफ़्ज़ल है। सिर्फ एक पानी ज़मज़म के पानी से भी अफ़्ज़ल है और वह पानी है जो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उंगलियों से जारी हुआ था।

यह भी मालूम हुआ है कि आज भी जो हाजी सफा मरवा की पहाड़ियों के दरम्यान सात चक्कर लगाते हैं। यह हज़रत हाजरा की सुन्नत पर अमल और उनकी नकल करना है। इसी तरह हज के दौरान में काबा शरीफ का तवाफ और हजरे असवद को चूमना हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अदा-ए-मुबारक की नकल है। मिना में शैतानों को पत्थर मारने हज़रत इब्राहीम व इस्माईल अलैहिस्सलाम की नकल है। गोया सारा हज ही अल्लाह के मक्बूलों की अदाओं की नकल करना है। मालूम हुआ कि अल्लाह के मक्बूलों की नकल करना ही अल्लाह की इबादत है। 

बाज़ लोग जो गैरुल्लाह! गैरुल्लाह ! की रट लगाए फिरते हैं वह बताएं कि यह क्या बात है? कि हज में नकल हो अल्लाह के मक्बूलों की और इबादत हो अल्लाह की। देखिए यह पाँच नमाजें जो हम पर फर्ज हैं यह भी हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की अदाहा-ए-मुबारक की नकल है वरना अगर नमाज की रकात और रुकू व सुजूद ही असल मसूद होते तो कोई शखा फ़ज़र की दो रकात के बजाए चार रकात और मग़रिब की तीन रकात की बजाए छः रकात पढ़ता तो खुदा को खुश होना चाहिए था कि उसने मेरे लिए रकात और रुकू व सुजूद ज़्यादा कर दिए गगर नहीं ऐसे शख्स पर खुदा खुश नहीं होगा बल्कि उसकी नमाज़ ही अदा न होगी इसलिए कि उसने अल्लाह के महबूब की सही नकल नहीं उतारी। अल्लाह के महबूब ने फ़ज़र की दो रकात पढ़ी हैं तो खुदा को भी दो ही रकात मंजूर हैं। हुजूर ने मग़रिब की तीन रकात पढ़ी हैं तो खुदा को भी तीन ही रकात महबूब है इसलिए कि अल्लाह रकात को नहीं देखता बल्कि अपने महबूब की अदाओं को देखता है। इसी वासते हुजूर ने भी फरमा दिया कि صَلَّوْ أَكَمَارَ أَثِيتُمُونَىٰ أَصَلَّى नमाज़ ऐसी पढ़ो जैसी मुझे पढ़ते हुए देखते हो।


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🌹👉🏻 *हज़रत ज़ुलेखा* 


🔅हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम जब कैद से रिहा हुए तो आपने उस खुशी में एक महीना लगातार खाने का इन्तिज़ाम किया और लोगों को जमा करके हर छोटे बड़े को दावत दी जिब्राईल अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ की हुजूर ! अभी दावत पूरी नहीं हुई फरमाया कौन सी बात रह गई। कहा। वह देखिए। खुजूर की झोपड़ी में एक अंधी बुढ़िया बैठी है उसे खाना नहीं खिलाया गया फरमाया मैं अभी बुलाता हूँ उसे। चुनांचे आपने उसे भी बुलाने के लिए एक आदमी भेजा। बुढ़िया ने कासिद की जुबानी कहला भेजा कि यूसुफ खुद मेरे पास आएं और फिर फिल-बदीह यह शे'र पढ़ा।

لَا تَبْعَثُونَ مَعَ النَّسِيمِ رِسَالَةَ إِنِّي أَفَارُ مِنَ النَّسِيمِ عَلَيْكُم

तुम नसीम को कासिद बना कर मेरे पास न भेजो क्योंकि मुझे नसीम से तुम पर रश्क आता है" कासिद बुढ़िया का यह जवाब सुनकर पलटा और हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम को बुढ़िया के जवाब को बताया। हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम उठे और उसके पास जाकर कहने लगे। 

ऐ बुढ़िया! हमारी दावत कुबूल करके मज्लिस की रौनक बढ़ा। बुढ़िया ने यूसुफ की जुबानी यह कलिमा सुनकर एक ठंडी सांस भर कर कहा हाए एक दिन वह था कि तू मुझे या सैय्यदती कहकर अदब से पुकारता था आज वह दिन है कि तू मुझे बुढ़िया कहकर पुकारता है। मैंने अपना बे-गिनत माल तुझ पर निछावर किया और तेरे कदमों के तले बेश कीमत मोती बिछाए। 

बुढ़िया की इन बातों को सुनकर यूसुफ अलैहिस्सलाम ने शाहाना सख़्ती से फरमाया कि यह क्या गुस्ताखी और ताज़ा करिश्मा है। 

बुढ़िया ने कहा यूसुफ मैं जुलेखा हूँ इस हैरत अंगेज़ इंकिशाफ पर यूसुफ अलैहिस्सलाम के दिल पर बड़ा असर हुआ और आप रोने लगे। जुलेखा वहाँ से उठकर मज्लिसे दावत में आई तो तमाम लोग उठ खड़े हुए हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम ने फिर एक कीमती लिबास उसे पहनाया जुलेखा ने कहा मेरे कब्ज़ा में इससे बहुत कुछ बढ़कर था। अगर मेरा दिली मक़सद इस वक़्त बर लाएं तो बेहतर वरना मैं फिर अपनी झोंपड़ी में चली जाऊँगी फरमाया वह क्या मक़्सद है बोली मेरी गई हुई जवानी और आंखों की रोशनी वापस आ जाए और आप मुझे अपने निकाह में लाकर मुझे इज़्ज़त बख़्शें। 

यूसुफ अलैहिस्सलाम कुछ सोचने लगे कि जिब्राईले अमीन ने आकर अर्ज़ की खुदा तआला फरमाता है। हमने तेरे लिए उसकी जवानी और बीनाई वापस करके उसे अज़्मत बख़्शी सो अब तू निकाह के साथ उसके सर पर इज़्ज़त का ताज रख। आपने देखा जुलेखा जवान और बीना हो गई और आपने उससे निकाह कर लिया।


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🌹👉🏻 *हज़रत ज़ुलेखा की हिकायत से सबक* 


🔅मालूम हुआ कि जुलेखा को अल्लाह के पैग़म्बर से सच्ची मुहब्बत थी और वह आपके हिज्ज व फिराक में बूढ़ी और नाबीना हो गई थी अल्लाह के पैग़म्बर के साथ इस सच्ची मुहब्बत की बदौलत वह जवानी व बीनाई जो जाकर कभी वापस नहीं आती। अल्लाह तआला ने वापस कर दीं और उन्हें फिर से नई जवानी अता फरमा दिया और वह हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम के निकाह में आकर पैग़म्बर की बीवी बन गईं। 

यह भी मालूम हुआ कि जिन सच्चे मुसलमानों को हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुहब्बत होती है। उनके चेहरों पर नूर बरसता नज़र आता है और उनकी शान यह होती है कि जब उन्हें देखा जाए तो खुदा याद आ जाता है और वह लोग हुजूर का नाम सुनकर चूम कर आंखों से लगा लेते हैं।


और उसके बरअक्स जिन्हें हुजूर से मुहब्बत नहीं होती उनके दिल भी सियाह और चेहरे भी बेनूर और हुजूर के फ़ज़ाइल देखने में आंखों के अंधे नज़र आते हैं।


एक आजकल का माडर्न इश्क व मुहब्बत भी है कि यूरोप की फैंसी खुजूर की मार्डन झोंपड़ी में रहकर बुढ़िया मैकअप करके बनावटी जवान बनती है और कमज़ोरी नज़र को छुपाने के लिए काली ऐनक पहन कर निकलती है और सिविल मैरेज के ज़रिया शादी करके थोड़ी देर के बाद ही पसीना आ जाने पर फिर बुढ़िया की बुढ़िया और ऐनक उतारने पर फिर वह अंधी की अंधी नज़र आने लगती है।


यहाँ एक लतीफा सुन लीजिए। एक दोस्त ने अपने दोस्त से कहा। मैंने आराइशे हुस्न की चीजें बनाने वालों के खिलाफ मुकद्दमा दायर करने का इरादा कर लिया है। दोस्त ने पूछा। मगर क्यों? वह बोला कि उन चीज़ों को इस्तेमाल करके एक औरत ने जो बुढ़िया थी जवान बन कर मुझे धोखा दिया है।" मैंने लिखा है।


काली चिमनी पे यह पौडर की सफेदी मल कर बुते अय्यार तू धोखा न दे परवाने को


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🌹👉🏻 *मलिकए-सबा बिल्कीस* 


🔅मुल्क यमन के इलाका सबा की मलिका बिल्कीस बहुत बड़ी हुक्मरान थी और उसे सलतनत के सब साज़ व सामान हासिल थे और उसका जो तख़्त था बहुत बड़ा था सोने और चाँदी का बना हुआ था और बड़े-बड़े कीमती जवाहरात से जड़ा था। 

यह तख़्त अस्सी गज़ लम्बा चालीस गज़ चौड़ा और तीस गज़ ऊँचा था। यह ज़माना हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम का था। हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने एक रोज़ अपने दरबार में हुदहुद परिन्दे को मौजूद न पाकर फरमाया कि हुद-हुद की गैर हाज़री पर मैं उसे सज़ा दूँगा। वरना कोई माकूल उज्र ब्यान करे थोड़ी देर के बाद हुदहुद भी आ गया और उसने मलिक-ए-सबा बिल्कीस का हाल बयान किया कि वह बहुत बड़ी हुक्मरान है। उसके पास एक बड़ा उम्दा और बड़ा भारी तख़्त भी है जिस पर वह बैठती है मगर है वह बुत परस्त वह और उसकी रिआया के लोग सूरज की पूजा करते हैं और अल्लाह को सजदा नहीं करते।

 हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने हुदहुद की बात सुनकर मलिक-ए-सबा बिल्कीस के नाम एक ख़त लिखा जिसका उनवान यह था।


बेशक वह सुलेमान की तरफ से है और बेशक वह अल्लाह के नाम से है जो निहायत मेहरबान रहम वाला है। तुम मेरे पास मुसलमान बनकर हाज़िर हो जाओ, और घमंड न करो।


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🌹👉🏻 *मलिकए-सबा बिल्कीस* (पार्ट-2)


🔅हुदहुद यह ख़त लेकर सबा में जा पहुँचा और मलिका-ए-सबा बिल्कीस के तख़्त पर जा डाला। बिल्कीस ने पढ़ा तो घबरा गई और अपने अरकाने दौलत से जिक्र किया कि लो यह ख़त पढ़ो और अपनी राय ब्यान करो और बताओ कि मैं सुलेमान के पास जाऊँ या ना जाऊँ। उन्होंने कहा हम तो बड़े कवी लड़ने वाले लोग हैं। सुलेमान से हमें कोई ख़तरा नहीं ताहम आपकी जो राय हो वही ठीक है।

 बिल्कीस अक्लमन्द थी उसने कहा। लड़ाई का अंजाम बुरा है। अगर वह ग़ालिब आ गया तो आकर उलट पलट कर देगा। इज़्ज़तदारों को जलील कर देगा। क्योंकि बादशाहों का यही दस्तूर है। सुलह कर लेनी बेहतर है। पहली मरतबा तो उसके पास जाना बेहतर नहीं मसलेहत इसमें है कि पहले कुछ तोहफे देकर ऐल्चियों को भेजा जाए उससे सुलेमान की पूरी कैफियत मालूम हो जाएगी। यह बात सबको पसन्द आई और बड़े-बड़े बेश कीमत हदिए देकर एल्वियों को भेजा ताकि सुलेमान इस माल को देखकर नरम हो जाएं। बिल्कीस की यह भूल थी क्योंकि सुलेमान अलैहिस्सलाम तो अल्लाह के पैग़म्बर थे। 

उनका मक्सद तो उस सूरज परस्त मलिका को इस्लाम में लाना और बुराई से बचाना था इसलिए उसके ऐल्ची जब बेश कीमत हदिए लेकर सुलेमान अलैहिस्सलाम के पास पहुँचे तो आपने उनको कुछ भी खातिर में ना लाकर यह फरमाया कि अल्लाह का दिया मेरे पास सब कुछ है। ऐसे हदियों से तुम्हीं खुश हो जाओ जाकर उससे कह दो कि वह मुसलमान बनकर हाज़िर हो वरना मैं ऐसा भारी लश्कर भेजूंगा कि जिसका कोई मुकाबला न कर सकेगा। और मैं उनको वहाँ से जलील व ख़्वार करके निकाल दूँगा। ऐल्वी तो इधर रवाना हुए और उधर हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने अपने दरबारियों से कहा कि तुममें से है कोई बिल्कीस के आने से पहले मेरे पास उसका तख़्त उठा लाए। एक बड़े कवी जिन्न ने कहा। हुजूर मैं वह तख़्त आपके दरबार से रुख़्सत होने से पहले ले आता हूँ।

एक दूसरे दरबारी ने जो किताब का इल्म रखता था। कहा हुजूर ! मैं उसका तख़्त आपके पलक झपकने से पहले ले आता हूँ चुनांचे पलक झपकते ही उसने वह तख़्त लाकर सुलेमान अलैहिस्सलाम के सामने लाकर खड़ा कर दिया। उसके बाद बिल्कीस जब दरबारे सुलेमान में पहुँची तो अपने से पहले वहाँ अपना तख़्त देखकर हैरान रह गई और कहने लगी। हुजूर! हमें तो पहले ही मालूम हो गया था कि आप बड़े ताक़तवर और खुदा के बरगुज़ीदा हैं और फिर कहने लगी।

तर्जुमा - ऐ मेरे रब मैंने अपने नफ़्स पर जुल्म किया था और अब मैं सुलेमान के साथ अल्लाह की हुक्म बरदार (मुसलमान) होती हूँ जो सारे जहानों का रब है।

उसके बाद हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम ने बिल्कीस से निकाह फरमा लिया।

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🌹👉🏻 *मलिकए-सबा बिल्कीस की हिकायत से सबक* 


🔅अल्लाह के पैग़म्बर शिर्क व कुफ्र से लोगों को बाज़ रखने के लिए तशरीफ लाते हैं और गुमराहों को गुमराही से बचा कर अल्लाह के आगे झुका देते हैं। यह भी मालूम हुआ कि कोई कितनी बड़ी सलतनत का मालिक बादशाह व हुक्मरान भी क्यों न हों। अल्लाह के पैग़म्बर के सामने वह कुछ भी नहीं और उसे दुनियवी जाह व जलाल व मता व माल की कुछ परवाह नहीं होती। मुफ़स्सेरीन ने लिखा है कि सुलेमान अलैहिस्सलाम के दरबार और बिल्कीस के तख़्त के मकाम का दरम्यानी फासला दो महीना की राह का था और तख़्त का तूल व अर्ज आप पढ़ ही चुके हैं कि तीस गज़ ऊँचा, चालीस गज़ चौड़ा और अस्सी गज़ लम्बा था। इस लंबी दूरी और इतने वज़नदार होने के बावजूद सुलेमान अलैहिस्सलाम का एक मुसाहिब (साथी) उसे पल भर में ले आया। तो फिर सैय्यदुल-अंबिया सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के औलिया-ए-उम्मत दूर दराज़ की दूरी से किसी की मदद व हिमायत को क्यों नहीं पहुँच सकते? 

इलके अलावा सुलेमान अलैहिस्सलाम का एक सिपाही अगर दो महीने की दूरी पल भर में तय कर सकता है तो सैय्यदुल-अंबिया सल्लल्लाहु अलैहि व अलैहि वसल्लम शबे मेराज में ज़मीन व आसमान की मसाफ़त पल भर में क्यों तय नहीं कर सकते ?

कुरआन पाक में इस आलमे किताब का तख़्त को पल भर में ले आने का वाक्या इन अल्फाज़ के साथ मज़्क्रूर है।

उसने अर्ज़ की जिसके पास किताब का इल्म था कि मैं उसे आपके हुजूर ले आऊँगा। आपकी आंख झपकने से पहले।


आयते शरीफा में जो آتِيكَ به" का लफ़्ज़ है उसका माना है मैं उसे आपके हुजूर ले आऊँगा।" यह "ले आऊँगा" जभी वाके हो सकता है जबकि वह पहले जाए भी यानी वह पहले जाएगा फिर लेकर आएगा। आने के लिए पहले जाना ज़रूरी है गोया उसने यूं अर्ज़ की कि मैं जाऊँगा और आंख झपकने से पहले ले आऊँगा चुनांचे वह आंख झपकने से पहले इतनी दूर गया भी और आ भी गया और इतनी तेजी के साथ कि दरबार से गायब भी नहीं हुआ। यह है सुलेमान अलैहिस्सलाम के एक सिपाही की करामत कि एक ही वक़्त में यहाँ भी है और वहाँ भी। फिर सैय्यदुल-अंबिया सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का एक वक़्त में मुतअद्दिद जगह होना क्यों मुम्किन नहीं ? और यह भी मालूम हुआ कि जंग और लड़ाई अच्छी चीज़ नहीं। इसीलिए जंग की तमन्ना भी गुनाह है। मुसलमान अमन व सलामती का दाई है। इसी वासते मुसलमानों ने जब भी जंग लड़ी हिफाज़त के लिए लड़ी नुक्सान के लिए नहीं। जारिहाना जंग शेव-ए-कुफ़्फ़ार है मुसलमान के लिए यह सबक है कि खुद जंग न छेड़ो। पहल न करो और अगर दुश्मन पहल करे तो फिर فلا تو لو هم الادبار ' के मुताबिक जंग से पीठ फेरना गुनाह है गोया मुसलमान के लिए यह हुक्म है कि किसी को मत छेड़ो। और अगर कोई छेड़े तो मत छोड़ो।

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🌹👉🏻 *बी-बी रहमत की हिकायत* 


🔅हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीवी का नाम रहमत था। यह आपकी बड़ी फरमाबरदार और जानिसार थी हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम जब बीमार हुए। तमाम जिस्म शरीफ पर आबले पड़े। बदने मुबारक सबका सब ज़ख़्मों से भर गया। सब लोगों ने आपको छोड़ दिया मगर आपकी बीवी ने आपको न छोड़ा। वह आपकी खिदमत करती रहीं और यह हालत कई साल तक रही। एक रोज़ आप बाज़ार गईं तो रास्ते में शैतान तबीब (हकीम) बन कर लोगों का इलाज कर रहा था और ऐलान कर रहा था कि मेरे पास हर मर्ज़ का इलाज है।

 बी बी रहमत न जान सकीं कि यह शैतान है अपने मुक़द्दस शौहर के ग़म में उनका इलाज दरयाप्त करने को उसके पास चली गईं और कहा कि मेरे शौहर बीमार हैं और यह उन्हें शिकायत है शैतान ने इसी गरज़ के लिए तो तबीब (हकीम) का भेस बदला था।

 बी-बी रहमत से कहने लगा कि मैं उनका इलाज कर सकता हूँ वह बिल्कुल अच्छे हो जाएंगे मगर शर्त यह है कि जब वह अच्छे हो जाएं तो मुझसे इतना कह दें। तूने मुझे शिफा दी है बस मेरी फीस सिर्फ यही है और कुछ नहीं। बी-बी रहमत खुशी-खुशी घर आईं और हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को सारा किस्सा सुना दिया। हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम जान गए कि यह तबीब के भेस में शैतान है। आप गुस्से में आ गए और जलाल में आकर फरमाया। तुम उसके पास क्यों गईं? मैं अच्छा हो गया तो बखुदा तुम्हें सौ कोड़े मारूँगा तो जिब्रीले अमीन हाज़िर हुए और कहा कि आपकी बीवी ने आपकी बड़ी खिदमत की है और आपने उसे सौ कोड़े मारने की कसम खा रखी है। अब इस क़सम को यूं पूरा कीजिए कि अपने हाथ में एक झाडू लीजिए जिसकी सौ शाखें हों वह एक दफा मार दीजिए

आपकी कसम पूरी हो जाएगी। चुनांचे खुदा ने फरमाया : 

خُذْ بِيَدِكَ ضِعْنَا فَاضُرِبُ بِهِ وَلَا تَحُنَتْ

अपने हाथ में एक झाडू लेकर उस से मार दे और क़सम न तोड़। चुनांचे आपने ऐसा ही किया और आपकी कसम पूरी हो गई।


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            📁 *पोस्ट न. - 14* 📂


🌹👉🏻 *बी-बी रहमत की हिकायत से सबक* 


🔅शौहर की खिदमत व फर्माबरदारी से खुदा खुश होता है। औरतों को हज़रत बी-बी रहमत के किरदार से सबक हासिल करना चाहिए और अपने शौहर की खिदमत व फरमाबरदारी में कमरबस्ता रहना चाहिए यूं न होना चाहिए कि खाविन्द बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल में दाखिल कराके उसे नर्सों के हवाले करके खुद सैर सपाटे और सिनेमा देखने में दिन रात गुज़ारने शुरू कर दिए जाएं चुनांचे कहते हैं ऐसी ही एक माडर्न औरत सिनेमा देखने में मसरूफ थी उसके दोनों तरफ की जगहें खाली थीं। यकायक एक शख़्स आया। और बोला। 

मोहतरमः! अगर आपको एतराज़ न हो तो आपकी बराबर वाली कुर्सी पर मैं बैठ जाऊँ।

औरत ने जवाब दिया। ज़रूर ! दरअसल बात यह है कि उन दोनों जगहों को मैंने अपने दोस्तों के लिए बुक करा लिया था मगर मेरे सारे दोस्त मेरे शौहर के जनाज़े में गए हुए हैं।"😳


यह है आजकल की माडर्न औरत का किरदार कि शौहर मर कर कब्रिस्तान में बीवी सिनेमा हाल में।

यह भी मालूम हुआ कि शैतान दीन के रास्ते से भटकने के लिए सौ-सौ भेस बदल लेता है कभी तबीब बन जाता है कभी आलिम और कभी सूफी और कभी मुबल्लिग (पढ़े लिखे लोग) भी बन जाता है। कुरआन भी पढ़ने लगता है। हदीसें भी सुनाने लगता है सीधे साधे इंसान तो उसके दाव में आ जाते हैं मगर अहले बसीरत (तबलीग़ करने वाले) जान लेते हैं कि यह शैतान है। इसीलिए मौलाना रूमी ने लिखा है कि

ऐ बसा इब्लीसे आदम रूए हस्त

पस न बायद दादे दर हर दस्त दस्त


यानी बहुत से शैतान इन्सानों के भेस में फिर रहे हैं इसलिए बेगैर समझे बूझे हर एक के हाथ में हाथ न दे देना चाहिए। हर चमकदार धात सोना नहीं। हर दवाई फोश (दवा बेचने वाला) तबीब नहीं और हर कुरआन ख़्वां और हदीस सुनाने वाला और नमाज़ व रोज़ा की तल्कीन करने वाला मुसलमान नहीं मुसलमानों को शैतानों के हर दाव से होशियार रहना चाहिए।


यह भी मालूम हुआ कि शरीअत में हीला करना जाइज़ है जैसे कि सौ कोड़े मारने की कसम को खुदा तआला ने सौ शाखों वाले झाडू मार देने के हीले से पूरा फरमा दिया। साहिबे रूहुल-ब्यान ने लिखा है कि

 लैस-बिन-सअद ने कसम खाई कि वह इमाम अबू-हनीफा रजि. अल्लाहु अन्हु को तल्वार से मारेगा। फिर वह इस कसम पर पशीमान (पछताना) हुआ कि यह कसम मैंने क्यों खाई? और इमाम साहब से दरयाप्त करने लगा कि कोई ऐसी सूरत ब्यान फरमाइए जिससे मैं इस कसम से बरी हो जाऊँ। फरमाया तलवार पकड़ कर उसकी चौड़ान से मुझे मार लो कसम पूरी हो जाएगी।


हम पे यह एहसाने हक है ला कलाम

बू हनीफा हैं हमारे जो इमाम

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🌹👉🏻 *हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बीवी की हिकायत* 


🔅हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जब फिरऔन की मुखालिफ़त शुरू की तो फिरऔन ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को कत्ल कर देने का हुक्म दिया और लोग आपकी तलाश में निकले तो फिरऔनियों में से एक नेक आदमी ने मूसा अलैहिस्सलाम की खैर ख़्वाही से उन्हें मशवरा दिया कि वह अपनी जान बचाने को कहीं और तशरीफ ले जाएं चुनांचे आप उसी वक़्त निकल पड़े और मदीयन की तरफ रुख कर लिया। मदीयन वह मकाम है जहाँ हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम तशरीफ रखते थे। यह शहर फिरऔन की हुदूद व सलतनत से बाहर था। हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम का रोज़ी का ज़रिआ बकरियाँ थीं। दो आपकी साहबज़ादियाँ थीं। मदीयन में एक कुआं था। मूसा अलैहिस्सलाम पहले उसी कुएं पर पहुँचे। आपने देखा कि बहुत से लोग उस कुएं से पानी खींचते और अपने जानवरों को पानी पिला लेते हैं और हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की दोनों लड़कियाँ भी अपनी बकरियों को अलग रोक कर वहीं खड़ी हैं। 

मूसा अलैहिस्सलाम ने उन लड़कियों से पूछा कि तुम अपनी बकरियों को पानी क्यों नहीं पिलातीं। उन्होंने कहा कि हमसे डोल खींचा नहीं जाता। यह लोग चले जाएंगे तो जो पानी हौज़ में बचा रहेगा वह हम अपनी बकरियों को पिला लेंगी। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को रहम आ गया और पास ही जो एक दूसरा कुआं था जिस पर एक बहुत बड़ा पत्थर ढंका हुआ था और जिसको बहुत से आदमी मिलकर हटा सकते थे। आपने तन्हा उसको हटा दिया और उसमें से डोल खींच कर उनकी बकरियों को पानी पिला दिया। घर जाकर दोनों साहबज़ादियों ने हज़रत शुरैब अलैहिस्सलाम से मूसा अलैहिस्सलाम का यह वाक्या ब्यान किया तो हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी बड़ी साहबज़ादी सफूरा से फरमाया। 

जाओ उस मर्द को मेरे पास ले आओ।

तो उन दोनों में से एक उसके पास आई शर्म से चलती हुई।

मुफस्सिरीन (तफसीर लिखने वाले) ने लिखा है कि अपने चेहरा को आसतीन से ढके हुए और जिस्म को छुपाए हुए बड़ी शर्म व हया से चलती हुई हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के पास आई और कहा कि चलिए मेरे वालिद आपको बुलाते हैं। 

चुनांचे आप हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की ज़ियारत की नीयत से चल पड़े और सफूरा से फरमाया कि तुम मेरे पीछे रह कर रस्ता बताती जाओ। यह आपने पर्दे के एहतेमाम से फरमाया और इसी तरह तशरीफ लाए जब हज़रत शुएब  अलैहिस्सलाम के पास पहुँचे तो आपके हालात सुनकर उन्होंने फरमाया। अब कोई फिक्र न करो। ज़ालिम फिरऔनियों से बच कर तुम यहाँ चले आए। अब यहीं मेरे पास रहो।

 चुनांचे आप दस बरस हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम के पास रहे और हज़रत शुएब अलैहिस्सलाम ने अपनी साहबज़ादी का मूसा अलैहिस्सलाम से निकाह कर दिया।


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🌹👉🏻 *हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की बीवी की हिकायत से सबक* 


🔅अल्लाह का नाम लेने वालों की मुखालिफत होती चली आई है और अल्लाह अपने नाम लेवाओं की हिफाज़त फरमाता है और शर्रे आदा (दुश्मन के नुक्सान) से उन्हें बचाता है यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह के पैग़म्बर सारे इन्सानों से मुम्ताज़ व बाला होते हैं।

जिस वज़नी पत्थर को कई आदमी मिल कर हटा सकते थे मूसा अलैहिस्सलाम ने तन्हा उसे हटा दिया। उस मौका पर हमारे आका व मौला सैय्यदुल-अंबिया सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही व सल्लम के मुतअल्लिक आला हज़रत का यह शे'र पढ़िए।

 *जिसको बारे दो आलम की परवाह नहीं ऐसे बाजू की हिम्मत पे लाखों सलाम* 

यह भी मालूम हुआ कि नेक लोगों की नेक लड़कियाँ हज़रत सफूरा की तरह शर्म व हया और पर्दा व हिजाब से चलती हैं। नेक लोग अपनी लड़कियों को शर्म व हया का सबक देते हैं और उन्हें खुले बदनों, नंगे सर, नंगे मुंह, बाज़ारों में फिरने की इजाज़त नहीं दे देते और न ही नेक लड़कियाँ गैरों की मज्लिसों में जाकर बेहयाई के साथ गैर मर्दों से हाथ मिलाती हैं।

लेकिन अफ़सोस आजकल तो कुछ ऐसी रौशन ख़्याली चल पड़ी है कि

 *है बुलन्द अख़्लाक मिस्टर और बड़ा रौशन ख़्याल अपनी बीवी को मिला कर गैर से मसरूर है* 

इस रौशन ख़्याली का नतीजा यह निकला कि

 *और मर्द हाकिम था कभी औरत पे लेकिन आजकल बीवी घर की मालिका है और मियाँ मज़्दूर है* 

यह भी मालूम हुआ कि मूसा अलैहिस्सलाम ने पर्दे के एहतेमाम से हज़रत सफूरा को अपने पीछे रहकर चलने को कहा। इसी तरह आज भी बुरका पोश औरत अपने शौहर के पीछे-पीछे चलती है लेकिन बे-हिजाब माडर्न बीवी आगे और उसका शौहर बीवी के पीछे-पीछे चलता है। उसमें शायद ख़तरे से बचाना मक्सद होता है कि माडर्न औरत नज़रों में रहे और कहीं गायब न हो जाए और पीछे पीछे चलने में इस हकीकत का इज़हार भी होता है कि

 *बीवी घर की मालिक व मुख़्तार है और मियाँ बीवी का ताबेदार है।* 


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🌹👉🏻 *हज़रत मरयम अलैहस्सलाम की हिकायत व सबक* 


🔅हज़रत मरयम किसी की बीवी नहीं हैं। हां एक पैग़म्बर की मां हैं। आपका जिक्र भी इसी बाब में मौजूं है।

हज़रत मरयम अलैहस्सलाम के वालिद इमरान और ज़करिया अलैहिस्सलाम दोनों हम जुल्फ थे। इमरान की बीवी का नाम हन्ना था और ज़करिया अलैहिस्सलाम की बीवी का नाम ईशान था। इमरान की बीवी हज़रत हन्ना से एक ज़माना तक औलाद न हुई यहाँ तक कि बुढ़ापा आ गया और मायूसी हो गई। यह सालेहीन (नेक लोगों) का खानदान था और यह सब लोग अल्लाह के मक़बूल बन्दे थे एक रोज़ हन्ना ने एक दरख़्त के साया तले एक चिड़िया अपने बच्चे समेत देखी तो यह देखकर आपके दिल में औलाद का शौक पैदा हुआ और बारगाहे इलाही में दुआ की या रब अगर तू मुझे बच्चा दे तो मैं उसको बैतुल मुक़द्दस का खादिम बनाऊँ और इस ख़िदमत के लिए हाज़िर कर दूँ चुनांचे खुदा ने दुआ सुन ली और जब वह हामिला हुईं और उन्होंने यह नज़र मान ली तो उनके शौहर ने फरमाया कि यह तुमने क्या किया अगर लड़की हो गई तो वह इस काबिल कहाँ है उस ज़माना में लड़कों को ख़िदमते बैतुल मुक़द्दस के लिए दिया जाता था और लड़कियाँ और मर्दों के साथ न रह सकने के बाइस इस काबिल नहीं समझी जाती थीं। वज़ए हमल से पहले इमरान का इन्तिकाल हो गया और हज़रत हन्ना के यहां लड़की पैदा हुई और अल्लाह के फ़ज़्ल से ऐसी लड़की पैदा हुई जो फरज़न्द से ज़्यादा फ़ज़ीलत रखने वाली थी। यह साहबज़ादी ही हज़रत मरयम थीं और अपने ज़माना की औरतों में सबसे अजमल व अफ़्ज़ल (हसीन और नेक) थीं। उनका नाम मरयम इसलिए रखा गया कि मरयम का माना है। आबिदा (इबादत करने वाली)।


👉🏻 *सबक* 

🔅अल्लाह तआला अपने नेक बन्दों की दुआएँ सुनता और कुबूल करता है। हज़रत हन्ना को बुढ़ापे में बच्चा अता फरमा दिया और हज़रत हन्ना की तमन्ना भी हमारे लिए मशअले राह है। नज़र यह मानी कि खुदा मुझे बच्चा दे तो मैं उसे बैतुल-मुक़द्दस की खिदमत के लिए वाकिफ छोड़ दूँगी आजकल की माओं की तरह नहीं कि खुदा बच्चा अता करे तो उसे मैं लंदन भेजूंगी, उसे डी-सी बनाऊँगी और थानेदार बनाऊँगी, वह अलग बात है कि थानेदार साहब अपनी माँ ही को हथकड़ी लगाने आ धमके मालूम हुआ कि अल्लाह से औलाद की तलब की जाए तो तमन्ना यह होनी चाहिए कि मेरा बच्चा दीन का खादिम बने। मस्जिदें आबाद करे और खुदा को याद करे।

यह नहीं कि दिन भर हाकी का मैच ही खेलता रहे। मैंने लिखा है।

बनी टी और कभी बनती हैं टीमें

रहे हैं आप तो बस टी ही टी में

नमाज़े असर की फुर्सत नहीं है

कि हैं मशरूफ टी पार्टी में।

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🌹👉🏻 *हज़रत मरयम मेहराब में* 


🔅 हन्ना ने जो नज्र मानी थी। खुदा-ए-तआला ने कुबूल फरमा ली। हज़रत हन्ना ने हज़रत मरयम के पैदा होने के बाद एक कपड़े में लपेट कर बैतुल-मुक़द्दस में अहबार के सामने पेश कर दिया। यह अहबार हज़रत हारून अलैहिस्सलाम की औलाद में से थे। चूंकि हज़रत मरयम उनके इमाम की बेटी थीं और उनका खानदान बनी इसराईल में बड़ा ऊँचा खानदान था इसलिए उन सबने जिनकी तादाद सत्ताईस थी हज़रत मरयम को लेने और उनका जिम्मेदार बनने की ख़्वाहिश की। 

हज़रत ज़करिया ने फरमाया मैं चूंकि मरयम का खालू हूँ। इसलिए सबसे ज़्यादा हकदार मैं हूँ। मामला इस पर ख़त्म हुआ कि कुरआ डाला जाए। कुरआ डाला। तो कुरआ हज़रत ज़करिया के नाम ही निकला और आप हज़रत मरयम के ज़िम्मेदार बने। आपने फिर बैतुल मुक़द्दस में हज़रत मरयम के लिए मेहराब के पास एक कमरा बनाया उसमें आपको रखा। 

हज़रत मरयम की यह करामत थी कि आप एक दिन में इतना बढ़तीं जितना दूसरा बच्चा साल भर में बढ़ता है और आपने किसी औरत का दूध भी नहीं पिया बल्कि हज़रत ज़करिया जब कमरा बन्द करके उसे ताला लगाकर बाहर तशरीफ ले जाते और वापस वहाँ आते तो उनके पास रंग-रंग के बे-मौसम फल मौजूद पाते। 

एक रोज़ आपने यह मंज़र देखा तो पूछा। يَا مَرُيَمُ أَنِّىٰ لَكِ هَذه ऐ मरयम ! यह मेवे तेरे पास कहाँ से आए आपने जवाब दिया।

वह अल्लाह के पास से है। यह भी हज़रत मरयम की करामत थी कि बचपन में आपने बात सुनकर उसका जवाब दिया और फरमाया कि यह बे-मौसम का फल अल्लाह के पास से आया है। 

हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम ने जब यह देखा कि अल्लाह तआला मरयम के पास बे-मौसम के फसल भेज रहा है तो फरमाया कि जो जाते पाक मरयम को बे-वक़्त बे-फल और बेगैर सबब के मेवा अता फरमाने पर कादिर है। वह बेशक इस पर भी कादिर है कि मेरी बांझ बीवी को नई तन्दुरुस्ती दे। और मुझे बुढ़ापे की उम्र में उम्मीद ख़त्म हो जाने के बाद बेटा अता फरमाए।

यहाँ पुकारा जकरिया ने अपने रब को बोला ऐ रब मेरे मुझे अपने पास से दे सुथरी औलाद। बेशक तू ही है दुआ सुनने वाला। चुनांचे वहाँ मांगने का यह असर हुआ कि जिब्रीले अमीन हाज़िर हुए और अर्ज किया।


أن اللهَ يُبَشِّرُكَ بِيَحُى


आपको मज़्दा (खुशखबरी) देता है यह्या का। चुनांचे मुक़द्दस बुढ़ापे में आपको अल्लाह तआला ने यह्या अलैहिस्सलाम अता फरमाए।

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🌹👉🏻 *हज़रत मरयम मेहराब में की हिकायत से सबक* 


🔅 करामाते औलिया हक हैं हज़रत मरयम बेगैर किसी औरत का दूध पिए दिन में इतना बढ़तीं जितना दूसरा बच्चा साल भर में बढ़ता है और आपके लिए खाने पीने का सामान जन्नत से आता। मालूम हुआ कि अल्लाह तआला हर चीज़ पर कादिर है यह जो आम क्वानीने कुदरत नज़र आते हैं खुदा तआला उनका पाबन्द नहीं बल्कि यह कवानीन खुद खुदा की मर्जी के पाबन्द हैं वह अपने कानून के खिलाफ भी जो चाहे कर सकता है यानी उसका एक कानून यह भी है कि आम क्वानीन के बरअक्स जो चाहे कर दिखाए जो लोग मोजज़ात व करामात के मुंकिर हैं वह शाने उलूहीयत से बेखबर हैं वह खुदा को उन क्वानीन का ताबे समझते हैं।

 मआज़ल्लाह हालांकि सब कवानीन उसके ताबे हैं। यह भी मालूम हुआ कि खुदा तआला अपने मख़्सूस बन्दों की खास तरबियत फरमाता है और यह भी मालूम हुआ कि जहाँ किसी अल्लाह के नेक बन्दे के कदम लग जाएं। उस जगह में यह तासीर पैदा हो जाती है कि वहाँ जो भी दुआ मांगी जाए अल्लाह कुबूल फरमा लेता है इसीलिए तो हज़रत ज़करिया ने مُنَالِكَ دَعَا ذَكَرِيَّا رَبَّهُ के मुताबिक वहाँ खड़े हो कर दुआ मांगी जहाँ मरयम बैठी थीं गोया हज़रत मरयम के कदमों की बरकत से वह कता ज़मीन ऐसा कता बन गया था कि वहाँ जो दुआ मांगो कुबूल हो जाती थी वरना हज़रत ज़करीया ने वही जगह दुआ के लिए क्यों मुंतख़ब की। बेशक सारी ज़मीन अल्लाह ही की ज़मीन है मगर उस ज़मीन के बाज़ हिस्से शोरज़दा और बाज़ कतए पैदावार के हक में मुफीद होते हैं कुसूर की ज़मीन से मेथी खुशबूदार पैदा होती है पसरूर की ज़मीन हांडियों के लिए मशहूर है हमारे सियालकोट का खित्ता इल्म खेज़ मशहूर है मुल्ला अब्दुल-हकीम सियालकोटी रहमतुल्लाह अलैहि के अलावा यहाँ से बड़े-बड़े अहले इल्म पैदा हुए। नज्द की सरज़मीन फितनों की ज़मीन है इंग्लिस्तान की ज़मीन फरेब और मक्कारी पैदा करती है। मदीना मुनव्वरा की सरज़मीन रश्के जन्नत और मुहीते मलाइका है। अलग़र्ज़ जहाँ किसी अल्लाह के बन्दे के कदम लग जाएं। वह कतआ ज़मीन मुतबर्रक हो जाता है। हज़रत ज़करीया अलैहिस्सलाम ने इसलिए उसी जगह दुआ मांगी जहाँ मरयम बैठी थीं। इसी तरह हम जो दाता साहब के मज़ार पर अजमेर शरीफ की हाज़िरी देकर वहाँ दुआ माँगते हैं इसीलिए कि यह कतआत ज़मीन अल्लाह वालों के कदमों की बरकत से मुक़द्दस हो चुके हैं जहाँ अल्लाह से जो भी दुआ मांगी जाएगी। खुदा दुआ कुबूल फरमाएगा और मदीना मुनव्वरा की हाज़िरी नसीब हो जाए तो फिर कहने ही किया। वह सरज़मीन तो है ही जन्नत और मुहीते मलाइका। वहाँ जो मांगो पाओ।


मंगते का हाथ उठते ही दाता की देन थी

दूरी कुबूल व अर्ज़ में बस हाथ भर की है


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🌹👉🏻 *हज़रत आमिना रज़ि अल्लाहु अन्हा की हिकायत* 


🔅 हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वालिद हज़रत अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु बड़े हसीन व जमील थे आपकी पेशानी में नूरे मुहम्मदी की चमक व दमक से कई औरतें आपसे निकाह करना चाहती थीं। हज़रत अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु एक मरतबा अपने वालिद हज़रत अब्दुल-मुत्तलिब के साथ काबा शरीफ के पास से गुज़रे तो रास्ते में वरका-बिन-नौफल की बहन बैठी थीं जो कुतुबे साबिका की आलिमा थीं उसने जब हज़रत अब्दुल्ला की जबीने अनवर में नूरी मुहम्मदी देखा तो हज़रत अब्दुल्लाह से अर्ज किया कि मुझसे निकाह कर लीजिए। 

आपने फरमाया मैं अपने वालिद की मर्जी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता। हज़रत अब्दुल मुत्तलिब ने वहब-बिन-मनाफ़ जो अरब में हस्बे नसब में बहुत अशरफ थे की बेटी हज़रत आमिना से हज़रत अब्दुल्लाह का निकाह कर दिया। 

हज़रत आमिना सारे कुरैश में हसब व नसब के लिहाज़ से मुम्ताज़ थीं। फिर जब नूर मुहम्मदी हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हा के बतने अनवर में मुन्तकिल हो गया तो एक रोज़ हज़रत अब्दुल्लाह उसी राह से गुज़रे जिस राह में वरका-बिन-नौफल की बहन ने उनसे निकाह कर लेने की दरख्वास्त की थी तो उस रोज़ उसने हज़रत अब्दुल्लाह की तरफ ध्यान न दिया। आपने पूछा किया कि आज क्या बात है तुम मेरी तरफ देखती भी नहीं। बोली वह नूर जो आपकी पेशानी में देखा था वह आज मुझे नज़र नहीं आता।


वह जिसके नूर से तेरी चमकती थी यह पेशानी उसी की थी मैं तालिब और उसी की थी मैं दीवानी मगर मैं रह गई महरूम किसमत मेरी फूटी है सुना है कि वह नेमत आमिना ने तुझसे लूटी है।


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            📁 *पोस्ट न. - 22* 📂


🌹👉🏻 *हज़रत आमिना रज़ि अल्लाहु अन्हा की हिकायत से सबक* 


🔅 मुहद्दिसीने किराम अलैहिमुर्रहमाः ने तसरीह फरमा दी है कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वालिदैन हज़रत अब्दुल्लाह व आमिना रज़ियल्लाहु अन्हा तक हुजूर के जुमला आबा (दादा व परदारा वगैरह) व उम्महात मोमिन और अशरफ थे।

कुरआन में अल्लाह त'आला ने फरमाया है मुफ़स्सेरीने किराम ने उसकी यह तफ्सीर भी फरमाई है कि इस आयत में साजिदीन से मोमिनीन मुराद हैं और मानी यह हैं कि ज़माना हज़रत आदम व हव्वा अलैहिमस्सलाम से लेकर हज़रत अब्दुल्लाह व आमिना खातून तक मोमिनीन के अस्लाब व अरहाम (नस्लों) में आपके दौरे को अल्लाह मुलाहिजा फरमाता है इससे साबित हुआ कि आपके तमाम उसूल आबा व अजदाद (पुर्खे) हज़रत आदम अलैहिस्सलाम तक सबके सब मोमिन हैं।

हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वालिद माजिद का नाम अब्दुल्लाह है इसी से यह बात साबित हो जाती है कि आप मोमिन थे और आपके वालिद अब्दुल मुत्तलिब भी मुशरिक न थे वरना वह अपने फरजंद का नाम अब्दुल्लाह न रखते हुजूर की वालिदा माजिदा का नाम आमिना भी इस हकीकत पर साबित है कि आप मोमिना थीं। अब्दुल्लाह हो और मोमिन न हो। आमिना हो और मोमिना न हो कैसी बेतुकी और गुमराही की बात है। अब्दुल्लाह को अल्लाह ने वह फरजंद (बेटा) अता फरमाया जिसने बुतों के बन्दों को इबादुल्लाह बना दिया और आमिना को वह लख़्ते जिगर अता फरमाया जिसने बेईमान को ईमान अता फरमा कर अमान दे दी। अब्दुल्लाह को मोमिन वही न मानेगा जो खुद अब्दुल्लाह न हो और आमिना को वही मोमिना न मानेगा जो खुद मोमिन नहीं। अक़्ले भी इस हुक्म को तस्लीम नहीं करती कि जो ज़ात बाबरकत सारी काइनात (दुनिया) के लिए बाइसे नजात बन कर आई हो। और जिसकी नज़रों ने बुत परस्तों की खुदा परस्त। डाकुओं को मुहाफ़िज़ अन्धों को बीना (रौशनी) और नारियों (जहन्नमियों) को जन्नती बना दिया हो। उस ज़ात वाला सिफात के अपने मां-बाप नाजी (जहन्नमी) न हों। एक हदीस में आता है हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम फरमाते हैं जिसने कुरआन पढ़ा और उस पर अमल किया।


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🌹👉🏻 *हज़रत आमिना के इर्शादात* 


🔅 हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वालिदा माजिदा फरमाती हैं कि छेः महीने हमल के गुज़र गए लेकिन मुझे कोई आसारे हमल मालूम न हुए और न ही कोई तक्लीफ महसूस हुई। छेः महीने के बाद किसी ने ख़्वाब में मुझसे कहा।


يا ابنَةُ إِنَّكَ حَمَلْتِ بِخَيْرِ العالمين فَإِرْ وَلَدُ تِهِ فَسَتِيهِ مُحَمَّدًا.


 *ऐ आमिना! तेरे हमल में सारे जहानों से अफ़्ज़ल जलवा गर है जब तू उसे जने तो उसका नाम मुहम्मद रखना।"* 


इसी तरह अंबिया-ए-किराम के मुक़द्दस गरोह आपके जुहूरे कुदसी की बशारत (खुशखबरी) सुनाते रहे। जब विलादते शरीफा का वक्त आया मैं घर में अकेली थी हज़रत अब्दुल मुत्तलिब हरमे शरीफ में तवाफ कर रहे थे। मैंने एक खौफ‌नाक आवाज़ सुनी जिससे मैं काँप गई। फिर एक रिश्ता सफेद मुर्ग की शक्ल में आया जिसने अपने पर मेरे सीने पर मले और मेरा ख़ौफ़ जाता रहा और सारी तक्लीफ भी दूर हो गई फिर मेरे लिए कोई एक प्याला शर्बत का लाया जिसको मैंने पिया उसके पीने से मुझे एक बुलन्द नूर नज़र आया मैंने देखा कि अब्दुल मुनाफ की बेटियाँ मेरे गिर्द खड़ी हैं मैं हैरान रह गई इतने में उनमें से एक ने कहा मैं फिरऔन की बीवी आसिया हूँ और दूसरी बोली मैं ईसा अलैहिस्सलाम की मां मरयम हूँ और यह दूसरी औरतें जन्नत की हूरें हैं। हम सब बहुक्मे खुदा तुम्हारी ख़िदमत के लिए जन्नत से आई हैं। फिर फरमाया कि


كَشَفَ اللهُ عَنْ بَصَرِي فَرَايَتُ مَشَارِقَهَا وَمَغَارِبَهَا وَرَايَتُ ثَلَثَةَ أَعْلَامٍ مَضْرُوبَاتٍ عَلَمَا بِاالْمَشْرِقِ وَعَلَمَا بِاالْمَغْرِبِ وَعَلَمَا عَلَىٰ ظَهَرِ الْكَعْبَةِ


अल्लाह ने मेरी आंखों से पर्दा हटा दिया पस मैंने दुनिया के मशरीक (पूरब) व मगरिब (पश्चिम) देख लिए और तीन झण्डे भी देखे एक झण्डा मशरीक में गड़ा था। दूसरा मगरिब (पश्चिम) में। और तीसरा काबा की छत पर। उसके बाद हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पैदा हुए और मैंनें देखा तो आप सजदे में पड़े हुए थे। 


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🌹👉🏻 *हज़रत आमिना के इर्शादात से सबक* 


🔅 हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हा सारी माओं से ज़्यादा खुशनसीब माँ हैं। इतनी खुशनसीब कि आपकी खिदमत के लिए जन्नत से आसिया और ईसा अलैहिस्सलाम की माँ और जन्नत की हूरें खिदमत में हाज़िर हो गई। ऐसी खुशनसीब माँ के खिलाफ कोई बेहद बदनसीब शख़्स ही जुबान खोलेगा। मालूम हुआ कि हज़रत आमिना खैरुल-आलमीन सैय्यदुल-आलमीन की माँ हैं। आपको जन्नत के फरिश्ते और अंबिया-ए-किराम बशारतें देते रहे। आपके लिए जन्नत से शर्बत भेजा गया फिर जिस मुक़द्दस माँ की इस दुनिया में भी जन्नत की हूरें ख़िदमत करें और इस दुनिया में भी जन्नत का शर्बत जिसे मिले क्या यह मुम्किन है कि उस जहाँ में आपको उस जन्नत से दूर रखा जाए? यह भी मालूम हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नूर हैं जभी तो हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हा को तकालीफे हमल का सामना नहीं हुआ और आपने शर्बत पीने के बाद एक बुलन्द नूर देख भी लिया और फिर इसी नूर की बरकत से आपकी आंखों से पर्दे जो हटे तो दुनिया के मशिरक व मगरिब को आपने देखा और मशिरक व मगरिब और काबा की छत पर गड़े हुए झण्डे भी देख लिए। फिर किस कद्र जुल्म व जल की बात है कि जिस जाते नूर की माँ की बसारत व रूयत का यह आलम हो उस जाते नूर के मुतअल्लिक कोई यूं कह लिख दे कि उन्हें तो दीवार के पीछे का भी इल्म न था (मआज़अल्लाह) यह भी मालूम हुआ कि हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सरापा मोजज़ा हैं कि पैदा होते ही सजदे में गिर गए और यह इस तरफ इशारा था कि मैं दुनिया में दुनिया को अल्लाह के हुजूर सजदे में गिराने को आया हूँ और यह भी मालूम हुआ कि हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के इस सजदे से सारी रूए ज़मीन हुजूर के लिए मस्जिद बन गई चुनांचे हुजूर ने फरमाया है। 

मेरे लिए सारी जमीन मस्जिद और पाक कर देने वाली बना दी गई। यह जबीने मुस्तफा के ज़मीन पर लगने का सदका है कि सारी ज़मीन मस्जिद और पाक कुनिन्दा बन गई।


 *मुबारक हो जहाँ में सैय्यदे लौलाक आए हैं! जो थे नापाक सरकार उनको करने पाक आए हैं* 


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🌹👉🏻 *नूर ही नूर* 


🔅 हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की वालिदा माजिदा हज़रत आमिना फरमाती हैं कि जब हुजूर पैदा हुए तो मैंने एक नूर देखा। जिससे शाम के महल मैंने देख लिए। 

हज़रत फातमा बिन्ते अब्दुल्लाह कहती हैं कि विलादते शरीफा के वक्त मैं हाज़िर हुई तो मैंने सारे घर को रौशनी से भरा देखा और सितारों को देखा कि आसमान पर से नीचे उतर आए हैं। मुझे गुमान हुआ कि शायद मुझ पर आ गिरेंगे और हज़रत आमिना फरमाती हैं कि हुजूर सरापा (सर से पैर तक) नूर बनकर पैदा हुए। आपके साथ किसी किस्म की आलाइश (गंदगी) न थी। आप बिल्कुल पाक व साफ पैदा हुए। 


👉🏻 *सबक* 


हमारे हुजूर सरापा नूर बन कर तशरीफ लाए और आपके नूर की बरकत से आपकी वालिदा ने शाम के महल देख लिए। फिर खुद हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नज़रों की ताकत का इन्कार करना क्योंकर गुमराही व तारीकी न होगी। आपका तशरीफ लाना गोया इस शे'र का मिस्दाक है।


 *नूर अन्दर नूर बाहर कूचा कूचा.. नूर है! बल्कि यूं कहिए कि सब दुनिया की दुनिया नूर है* 


यह भी मालूम हुआ कि हमारे हुजूर की बशरीयते मुक़द्दसा नूरानी बशरीयत है। आप पैदा हुए तो बिल्कुल हर किस्म की आलाइश (गंदगी) से पाक साफ और सुथरे। यह जो उनकी मिस्ल बनते फिरते हैं यह होली फैमली अस्पताल में भी पैदा हों तो कई गज़ मुरब्बा ज़मीन गन्दी कर देते हैं। इसीलिए किसी शाइर ने लिखा है कि -


 *खुदा की शान तो देखो कि कलचड़ी गूंजी! हुज़ूरे बुलबुले बुस्तान करे नवा संजी* 


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🌹👉🏻 *अबू लहब की लौंडी की हिकायत* 


🔅 अबू-लहब की एक लौंडी (नौकरानी) थी जिसका नाम सुवैबा था। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब पैदा हुए तो उसने आकर अबू-लहब को बशारत दी और कहा मुबारक हो। आपको खुदा ने भतीजा दिया है। अबू-लहब ने यह बशारत सुनकर कर खुशी में आकर अपनी उंगली उठाकर इशारा किया कि जा तुझे आज़ाद किया। अबू-लहब के मरने के बाद ख़्वाब में देखा गया और उससे हाल पूछा गया तो उसने बताया कि आग में जल रहा हूँ। हाँ जब पीर का रोज़ जिस रोज़ हुजूर पैदा हुए आता है। तो मैं उस उंगली को जिस उंगली के इशारे से मुहम्मद की विलादत की खुशी में मैंने अपनी लौंडी को आज़ाद किया था। अपने मुंह में डाल कर चूसता हूँ तो उससे पानी निकलता है जिसे पीकर मैं आराम पा लेता हूँ।


👉🏻 *सबक* 


हजरत इमाम कतलानी जो शारेह बुखारी भी हैं। यह वाक्या लिख कर कहते हैं। कि अबू-लहब जिसके मुतअल्लिक कुरआन पाक में उसके कतई नारी (जहन्नमी) होने का ज़िक्र आ गया है ऐसे कतई नारी शख्स ने हुजूर की खुशी में जब उंगली के इशारे से अपनी लौंडी को आज़ाद कर दिया तो खुदा तआला ने उसकी इस ख़ुशी मनाने से उस रोज़ उस उंगली के ज़रिआ उसे अज़ाबे नार (जहन्नम) से नजात दे दी फिर जो मुसलमान हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की विलादते शरीफा की खुशी मनाएँगे और आपकी मुहब्बत में खर्च करेंगे। यकीनन उसके बदले में अल्लाह करीम उन्हें अपने फ़ज़्ले से जन्नत में दाखिल करेगा और फिर फरमाया।


यानी इस महीना रबीउल-अव्वल शरीफ में मुसलमान हमेशा महाफिल मिलाद करते है और खुशी का इजहार करते हैं और सदका व खैरात कसरत के साथ करते है। हुजूर की विलादत का जिक्र करते है और लोगों पर हुजूर की बरकात और फज्ले अमीम जाहिर होता है।"


मालूम हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की विलादते तैय्यबा की खुशी मनाना बिलखुसूरा माहे रबीउल-अव्वल शरीफ में हुजूर की विलादते शरीफा के तजकिरा मुबारक सुनने सुनाने के लिए महाफिले मीलाद करना। और माल खर्च करना कुछ पकाना और खिलाना। खुशी में जुलूस निकालना और सदकात व खैरात में करारत करना कोई नई बात नहीं। हमेशा से मुसलमान ऐसा ही करते चले आए हैं। अबू-लहब जैसा नारी जब हुजूर की खुशी मना कर अज्र पा लेता है तो हुजूर के गुलाम यह खुशी मना कर क्यों अज्रे अज़ीम न पाएँगे? यह भी मालूम हुआ कि हुजूर की विलादत की खुशी न मनाना बहुत ही बुरी बात है इतनी कि अबू-लहब ने जिस उंगली को उठा कर इशारे से अपनी लौंडी को आजाद किया था वह उंगली अपने उठने यानी अपने क्याम के बाइस अबू-लहब के लिए नजात की वजह बन गई। गोया हुजूर की खुशी में क्याम करना भी बड़ी अच्छी बात है मगर अफ़सोस कि आज उन उमूरे मुस्तहसना को बिदअत कहा जाने लगा है।


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🌹👉🏻 *हतीमा काहिना की हिकायत* 


🔅 मदीना मुनव्वरा में एक औरत काहिना (नुजूमिया) रहती थी जिस पर एक जिन्न आशिक था और उसका ताबे (कहने मानने वाला) था। एक रोज वह जिन्न हतीमा के घर आया लेकिन दीवार पर खड़ा रहा। अन्दर न आया। हतीमा ने कहा। आज क्या बात है ? कि तुम अन्दर नहीं आते। अन्दर आओ। आपस में बातें करें। जिन्न बोला। अब ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि मक्का में एक नबी पैदा हुआ है जिसने जिना (बलात्कार) को हराम करार दे दिया है। हतीमा ने यह बात मदीना मुनव्वरा में मशहूर कर दी। मदीना वाले सबसे पहले हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुतआरिफ हतीमा के ज़रिआ से हुए।


👉🏻 *सबक* 

हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जिन्न व इन्स के रसूल बन कर तशरीफ लाए और जो खुशनसीब इन्सान और जिन्न थे। वह हुजूर पर ईमान लाकर बुरे कामों से रुक गए। मालूम हुआ कि जिन्न भी एक मख़्लूक है और इन्सानों की तरह उनमें भी काफि और मुसलमान हैं। अच्छे बुरे हैं और अक्सर जिन्न हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबी भी हैं रज़ियल्लाहु अन्हुम। यह जिन्न हुजूर पर ईमान ले आया था और और हुजूर की तालीम के मुताबिक ज़िना से रुक गया। सच्चा ईमानदार वही है जो हुजूर के फरमाए हुए बुरे कामों से रोकने पर रुक जाए और हुजूर जिधर झुकाएं उधर झुक जाए।

मुसलमान वह है जो हुक्मे नबी सुनते ही झुक जाए वह जिस रस्ते से रोकें उस तरफ जाने से रुक जाए।


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            📁 *पोस्ट न. - 28* 📂


🌹👉🏻 *हज़रत हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा* 


🔅अरब वाले का दस्तूर था कि जब उनसे किसी के वहा बच्चा पैदा होता तो अपने कबीला से बाहर किसी दूसरे कबीला में से किसी दूध पिलाने वाली औरत को जो तन्दुरुस्त और खूबसूरत खुशगो खुशरू (अच्छे चाल चलन वाली) होती और जिसमें तमाम खूबियां शरीफाना होते। यह तलाश करके उसके हवाले कर देते। फिर जब मुद्दते रजाअत खत्म हो जाती तो एवज़न (मोअवाजा) न देकर वापस ले लेते। हुजूर जब पैदा हुए तो हस्बे दस्तूर खुद दूध पिलाने वालियों जो बच्चों को दूध पिलाई पर लेने के लिए मक्का मुअज्जमा आया करती थीं आई। उनमें से एक बी-वी कबीला-बनी-सादिया से हलीमा नाम भी थी उन सबने जो आई थी। जिस-जिस घर से किसी को कोई लड़का मिला ले लिया लेकिन हलीमा को कोई लड़का न मिला। वह कहती हैं कि हम जितनी आई थीं सबने हुजूर को देखा मगर यह समझा कर कि यह लड़का यतीम है उसका एवज़ाना कुछ अच्छा नहीं मिलेगा। किसी ने न लिया और खुदा की कुदरत मुझे भी कोई बच्चा न मिला। मायूस होकर मुझे खाली हाथ घर जाना ऐसा बुरा मालूम हुआ कि घर जाने को मेरा जी नहीं चाहता था। मेरे साथ वालियाँ बच्चे लेकर वापस होने के लिए एक जगह इकट्ठी हो रही सही का इन्तज़ार कर रही थीं मगर मैं पुर रंज व मलाल किसी बच्चे की तलाश में रह गई लेकिन जब कोई सूरत नज़र न आई तो मैंने अपने शौहर से कहा कि इतनी औरतों में मेरा खाली जाना बाइसे नंग है। बखुदा मैं तो उसी बच्चे (हुज़ूर) को ले आती हूँ जो अब्दुल मुत्तलिब के घर में है और उसे सब छोड़ आई हैं। उसने कहा ले आ। शायद कि खुदा तआला हमें उसी की बरकत से माला माल कर दे। यह सुनकर मैं अब्दुल मुत्तलिब के घर गई। अब्दुल मुत्तलिब अपने दरे दौलत पे खड़े थे मुझे देखकर पूछा तू कौन और तेरा नाम क्या है ? मैंने कहा मैं बनी सअद से हूँ और हलीमा मेरा नाम है। अब्दुल मुत्तलिब खुश होकर बोले। खूब ! खूब !! सअद और हिल्म दोनों जमा हो गए। उन दो लफ़्ज़ों में हमेशा की खैर व बरकत है। हलीमा ! मेरे पास एक लड़का है जिसका बाप उसके पैदा होने से चन्द रोज़ पहले फौत (इंतकाल) हो गया था और मैं ही उसका कफील (जिम्मेदार) हूँ। 

तुम्हारी कौम की औरतें उसे देख कर छोड़ गई थीं। शायद उनके दिलों में यह वसवसा होगा कि उस यतीम का एवजाना रज़ाअत कौन देगा ? तू उसे ले जा। तेरे लिए अच्छा होगा। मैंने कहा। मैं अपने शौहर से मश्वरा कर लूं। मश्वरा करने पर शौहर ने कहा कि ज़रूर ले आ। उम्मीद है हक तआला हमें उसकी बरकत से खुशहाल कर देगा। मैं वापस आई और अब्दुल मुत्तलिब को कह दिया कि बच्चा मुझे दे दीजिए वह बड़ी खुशी से उठकर मुझे आमिना के घर ले गए। उसने मुझे देखा तो बनजरे इज्जत खुश आमदीद कहकर उस कोठरी में ले गई जहाँ सरवरे आलम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम गहवारा में पड़े थे मैंने देखा कि बहुत सफेद सूफ का कपड़ा आपके ऊपर सब्ज़ रेशमी पार्चा आपके नीचे और आप रूथा आसमान तशरीफ फरमा हैं और कस्तूरी की खुशबू आपसे आ रही है मैं आपका हुस्न व जमाल देख कर दंग रह गई और आपको जगाने से झिझक गई लेकिन अपना हाथ निहायत नर्मी और सुब्की के साथ आपके सीने पर रखा तो आप मुस्कुराए और आंखें खोलीं जिनसे नूरानी शुआएं निकल कर आसमान तक रौशन करती चली गई। मैंने यह देखकर आपकी दोनों आंखों पर बोसा दिया और आपको उठा लिया। अगर मुझे कोई लड़का मिल जाता तो मैं इस नेमत से महरूम रह जाती। फिर मैंने आपको गोद में लेकर अपना दाहिना दूध दिखाया। आपने जितना चाहा पिया। फिर मैंने आपको अपने बाएं दूध की तरफ फेरा लेकिन आपने उसे न पिया क्योंकि मेरा एक और बच्चा भी दूध पीता था चूंकि आपकी जाते अक़्दस में फितरतन ही अदल दियानत, तक़्वा और अमानत मौजूद थी। इसलिए आपने अपने रज़ाई भाई का हिस्सा छोड़ दिया। फिर जब हम अपने डेरे पर वापस आए कि वहाँ से तैयार होकर अपने साथ के साथ घर चलें तो मेरे शौहर ने देखा कि हमारी बकरी जिसे हम अपने बच्चे की खातिर अपने साथ मक्का में लाए थे जो दूध सुखाए और बहुत ही लागर थी मगर हम एक दूधार अपने बच्चे के लिए निकाल ही लेते थे दूध भरे थन खड़ी जुगाली कर रही थी उसने उसके थनों को हाथ लगाया तो दूध निकलने लगा। फौरन बर्तन लेकर दूहने बैठ गया। बकरी ने इतना दूध दिया कि हम उससे खूब सैर हुए और रात आराम से सो रहे। सुबह उठे तो मेरे शौहर ने मुझसे मुखातब होकर कहा। हलीमा! जिस बच्चे को हमने लिया है। बखुदा ! यह बहुत मुबारक है मैंने कहा। हाँ सही है और मुझे भी इस बरकत का यकीन है और उम्मीद है यह जब तक हमारे पास रहेगा। हमारे लिए बाइसे खैर व बरकत होगा।


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            📁 *पोस्ट न. - 29* 📂


🌹👉🏻 *हज़रत हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा की हिकायत से सबक* 


🔅हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को दूध पिलाने की सआदत कबीला-बनी-सअद की हलीमा ही के नसीब में थी। यह सआदत किसी दूसरे को कैसे हासिल हो सकती थी। दूसरी औरतें हुजूर को यतीम समझ कर हुजूर को छोड़ कर चली आईं लेकिन वह कौन थीं जो हुजूर को छोड़तीं यह तो खुद हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उन सबको छोड़ दिया था क्योंकि आपको इल्म था कि मुझे दूध पिलाने वाली दूसरी है वह जिसका नाम हलीमा है। यह सआदत हलीमा सअदिया ही को मिलेगी। इसीलिए हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जब उस सआदत की असल आल को आते देखा तो हुजूर मुसकुरा पड़े। कितनी खुशनसीब है। हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा कि वह जिसके कदमाने मुबारक के बोसा लेने का अर्श भी ख़्वाहां है। हलीमा उसकी आंखों को बोसा ले रही थी। वह जात बाबरकत कल कयामत में जिसके दामाने मुबारक में एक दुनिया पनाह लेगी। आज वह वजूद बा वजूद हलीमा की गोद में नज़र आ रहा है ज़हे नसीब हलीमा।

आजकल के बच्चों को नहला धुला कर और खुश्बूदार पाउडर मल कर रखा जाता है वरना उनसे बू आने लगती है मगर हुजूर पुर नूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ज़ाते अक़्दस ही खुशबू की खज़ाना थी कि हलीमा करीब गई तो कस्तूरी की खुशबू आने लगी। इसी तरह हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वजूद बावजूद हमेशा मख़्ज़ने (खज़ाना) खुश्बू व रहमत ही रहा। जिस राह से भी आप गुज़र जाते खुशबुओं के हिल्ले आने लगते।

यह भी मालूम हुआ कि दयानत व तक्वा और अमानत के भी हुजूर शुरू ही से मख़्ज़न थे इसीलिए अपने रज़ाई भाई के हिस्सा का दूध आपने नहीं पिया गोया बचपन ही में यह तब्लीग फरमा दी कि किसी की हक़ तल्फ़ी करना जाइज़ नहीं। मुसलमानों को अपने आका का मुक़द्दस बचपन भी पेशे नज़र रखना चाहिए और किसी भाई की हक़ तल्फ़ी नहीं करनी चाहिए। मगर आह! इस पुर-फितन दौर में भाई-भाई का दुश्मन और चाहता है कि भाई का जो मिले अपना लो। दूसरों के माल पर नज़रें ललचाने लगती हैं। और राम-राम जपना पराया माल अपना। मुताबिक आजकल के मुसलमान दूसरों के माल को हज़म कर जाते हैं और दावा यह कि हम उस नबी की उम्मत हैं जिसने बचपन में भी अपने रज़ाई भाई का हिस्सा नहीं अपनाया और अपने भाई के लिए ही रहने दिया यह भी मालूम हुआ कि हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का वजूद जो सरापा बरकत है कि आपके आते ही लागर बकरी के सूखे थन दूध से भर गए। अल्हम्दुलिल्लाह ऐसा बाबरकत आका मिला जिनकी बदौलत हमारे सूखे और बुरे आमाल भी इंशाअल्लाह हरे और अच्छे हो जाएंगे। أَوْلَئِكَيُبَدِّلُ اللهُ سَيَّاتِهِمْ حَسَنَاتٍ की आयत इस हकीकत पर शाहिद है कि जो लोग तौबा करके हुजूर के गुलाम बन जाएंगे। अल्लाह तआला उनकी बुराईयों को भी नेकियाँ बना देगा।

 पस ऐ मुसलमानो! हज़रत हलीमा ने जिस मुहब्बत से हुजूर को गोद में लेकर बरकत पाली थी तुम भी मुहब्बत के साथ हुजूर का दामन पकड़ कर दोनों जहाँ की बरकतें हासिल कर लो।


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🌹👉🏻 *हज़रत आमिना ने हलीमा से क्या कहा ?* 


🔅हज़रत हलीमा सादिया रज़ियल्लाहु अन्हा ने जिस वक़्त हुजूर को गोद में लिया तो हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हा ने हज़रत हलीमा से कहा।

जान ले ऐ हलीमा ! तू जिस बच्चे को ले जा रही है। यह बड़ी शान रखता है। मुझे अल्लाह की कसम ! उसके हमल से मुझे कोई ऐसी तकलीफ नहीं हुई जो ऐसे वक़्त में औरतों को होती है और ख़्वाब में किसी आने वाले ने मुझसे कहा था। ऐ आमिना ! तू एक ऐसे बच्चे की माँ बनेगी जो सारे जहानों का सरदार होगा उसका नाम अहमद रखना।


👉🏻 *सबक* 


हज़रत आमिना रज़ियल्लाहु अन्हा ने हज़रत हलीमा को बता दिया कि तू बड़ी खुशनसीब है यह जो बच्चा तेरे हिस्सा में आया है तुम उस पर जितना फख्र करो थोड़ा है। यह सारे जहानों का सरदार है। तुम्हारी साथी औरतें जो जो बच्चे भी लेकर गई हैं और जिन जिन के भी बच्चे लेकर गई हैं यह बच्चा उन सबका सरदार है। खुदा ने दुनिया भर की सरदारी को तुम्हारी गोद में डाल दिया है। गोया ऐ हलीमा !


 *ज़मीं पर अर्शे इलाही के निशान मालूम होते हैं* 

 *तेरी तो गोद में दोनों जहाँ मालूम होते हैं*

 मुसलमानो! हज़रत हलीमा की तरह हम भी बड़े खुशनसीब हैं कि हमें आका वह मिला जो सारे जहानों का सरदार है। 

आला हज़रत ने खूब लिखा है।

 *सबसे आला व औला हमारा नबी, सबसे बाला व वाला हमारा नबी, सारे ऊँचों से ऊँचा जिसे कहिए है, उस ऊँचे से ऊँचा हमारा नबी* 


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🌹👉🏻 *हलीमा हुजूर को लेकर चलीं* 


🔅हज़रत हलीमा फरमाती हैं हम जब हुजूर को लेकर अपने गाँव चलने को तैयार हो गए और मैं हुजूर को अपनी गोद में लेकर अपनी लागर गधी पर बैठी तो वह गधी जो भूख और लागरी के सबब चल न सकती थी और आते वक़्त सबसे पीछे मक्का पहुँची थी। अब साहिबे मेराज की बरकत से इतनी तेज़ रफ़्तार हो गई कि मेरी साथी औरतों की सवारियों से सबसे आगे जा रही थी चुनांचे मेरी साथी औरतें मुझे उसे रोक कर साथ-साथ चलने को कहतीं और हैरान होकर पूछतीं कि यह वही गधी है जिस पर तू आई थी या कोई और ? यह तो ऐसी तेज़ है कि ऊँचा नीचा भी नहीं देखती। यह वह मालूम नहीं होती और मैं कसम खाकर कहती कि वही है मगर उस बच्चे की बरकत से जो मेरी गोद में है उसका सारा जुअफ (बुढ़ापा) और नातवानी (कमज़ोरी) जाती रही है। ग़र्ज़ कि हम आराम से सबसे पहले अपने घर में पहुँच गए।


👉🏻 *सबक* 


हलीमा की गोद में साहिबे मेराज था और हलीमा गधी पर सवार साहिबे मेराज की बरकत से गधी का सारा जुअफ (बुढ़ापा) और नातवानी (कमज़ोरी) जाती रही और वह तेज़ रफ़्तार बन गई। गोया उस वक़्त जुबाने हाल से वह यह कह रही थी कि

 *तेज़ यूं रफ्तार मेरी आज है मुझ पे बैठा साहिबे मेराज है* 


हम जो आज दूसरी अक्वाम से पीछे रह गए हैं। उसकी असल वजह यही है कि हमने साहिबे मेराज सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का दामन छोड़ दिया। यह आजकल की बराए नाम तरक्की जिस पर नादान मुसलमान खुश होते हैं। सच पूछिए तो यह तरक्की नहीं। परती है। तरक्की और आगे बढ़ने के लिए हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तालीमात को अपनाना ज़रूरी है। हमारा दावा है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तालीमात को अपनाने से हम सारी अक्वाम से आगे निकल सकते हैं। हमारी सारी कमज़ोरियाँ जुअफ (बुढ़ापा) व नातवानियाँ (कमज़ोरियाँ) दूर होने का एक इलाज यह है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपना लिया जाए। सहाब-ए-किराम अलैहिमुर्रिज़वान जो सारी अक्वामे जहान पर छा गए और बड़ी-बड़ी जाबिर व काहिर अक्वाम को रौंद कर आगे निकल गए। उसकी असल वजह यही थी कि उनके सीने में हुजूर की मुहब्बत, गोद में हुजूर की तालीमात और हाथों में दामने मुस्तफा था।


यही जज़्बा था उन मर्दाने गैरतमन्द पे तारी दिखाई जिनके हाथों हक ने वातिल को नगों सारी


यह भी मालूम हुआ कि हम अगरचे आखिरी उम्मत हैं और आज हम सबसे पीछे हैं मगर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की निसबत की बरकत से जब अपने घर जन्नत में लौटेंगे तो सबसे पहले हम जन्नत में जाएंगे।


इंशाअल्लाह। इसीलिए हुजूर ने फरमा दिया है। نَحْنُ أَلا خِرُونَ وَنَحْنُ السَّابِقُونَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ. यानी हम आए तो आखिर में हैं लेकिन क्यामत के रोज़ सबसे आगे होंगे।


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🌹👉🏻 *हलीमा के घर बरकत ही बरकत* 


🔅हज़रत हलीमा फरमाती हैं हम जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को घर लेकर आए तो हमारी वह ज़मीन जो सूखा पड़ने की वजह से बंजर पड़ी थी मवेशी बाहर से बिल्कुल भूखे आकर बैठ जाते थे न बाहर ही उनके चरने के लिए कुछ था न घरों में। लेकिन हुजूर को हम साथ क्या लाए बरकत व रहमत की बारिश हम पर होने लगी। हमने देखा कि हमारी ज़मीन सरसब्ज़ हो गई। हमारे माल मवेशी खूब पेट भर कर बाहर से आने लगे और हमारी हर एक भेड़ बकरी के थन दूध से भर गए हालांकि हम जब मक्का शरीफ गए थे तो उस वक़्त हमारी किसी भेड़ बकरी के थनों में एक क़तरा भी दूध न था। अब हम उन्हें दूहते थे और सब सैर होकर आराम करते थे। हमारी इस आसूदगी और राहत को देखकर बाकी दूसरे अपने अपने चरवाहों को ताकीद करते थे कि तुम भी अपनी बकरियाँ उसी तरफ चराने ले जाया करो जिस तरफ हलीमा का चरवाहा बकरियाँ ले जाता है। उन्हें यह मालूम न था कि यह तमाम बरकत हमारे माल व जान में इस मुबारक बच्चे की बदौलत है जिसे हम अपने घर लाए हैं।


👉🏻 *सबक* 


हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रहमतुल-लिल-आलमीन बनकर तशरीफ लाए हैं यह हुजूर की रहमत ही थी कि हज़रत हलीमा आपको लाकर आपकी बरकत से माला माल हो गई। हमें अल्लाह तआला का बेहद शुक्र अदा करना चाहिए कि खुदा तआला ने हमें हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जैसा आकाए रहमत अता फरमाया। हलीमा की बकरियों की तरह अगरचे हम अपने आमाल के लिहाज़ से कुछ भी नहीं। और हमारे आमाल का अगरचे पल्ला खाली है। लेकिन हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बदौलत इंशाअल्लाह कयामत के रोज़ हम राहत व आसूदगी पाएंगे और हुजूर की बदौलत हमारे थोड़े अमल भी ज़्यादा हो जाएंगे। यह भी मालूम हुआ कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मुहसिने काइनात हैं। मख़्लूक में आप पर किसी का कोई ऐहसान नहीं बल्कि सारी मख़्लूक पे आप ही के ऐहसानात हैं। हलीमा ने हुजूर को दूध पिला कर आप पर कोई एहसान नहीं किया बल्कि हुजूर ने हलीमा के घर बरकत ही बरकत पैदा करके हलीमा पर ऐहसान फरमाया और हलीमा को खुश हाल व माला माल कर दिया।


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🌹👉🏻 *हलीमा ने फरमाया* 


🔅हज़रत हलीमा फरमाती हैं कि दो साल जब तक कि आप दूध पीते रहे हमने खैर व बरकत से गुज़ारे और इस दरम्यान में हमारे माल में दिन ब दिन तरक्की होती रही और हुजूर का बढ़ना भी हैरत अंगेज़ था कि दो साल की उम्र में अपने से बड़े बड़े दूसरे बच्चों के मुकाबले में ताक़तवर व मजबूत और कद व कामत में दो-बाला दिखाई देते थे।


आप अभी दो माह के थे तो सहन खाना (आंगन) में हर तरफ फिरने लगे तीन माह के हुए तो पाँव के बल उठ खड़े हुए। चार महीने के हुए तो दीवार के सहारे चलने लगे नौ माह के हुए तो फसीह (फर्राटेदार) बोलने लगे ऐसा कि फुसहा (अच्छे बोलने वाले) आपके मुहावर-ए-कलाम पर तअज्जुब करते। दस माह के हुए तो लड़कों के साथ तीर अन्दाज़ी करने लगे। ऐसी कि कोई निशाना ख़ता न जाता।


👉🏻 *सबक* 

उलमा लिखते हैं कि हुजूर का थोड़ी उम्र में यह हैरत अंगेज़ नशो नुमा (बढ़ना) इसलिए था कि वक़्त थोड़ा, काम बहुत थे। सारी शरीअतों का मंसूख (रद) करना, अगली शरीअतों की मुश्किलों को खोलना, करोड़हा गुनहगारों को बख़्शवाना, सारे जहान में इस्लाम फैलाना, थोड़े वक़्त में ज़्यादा काम करना था इसलिए आप मोजज़ाना अन्दाज़ में बढ़े। एक आज के बच्चे भी हैं जो गराइप वाटर पी-पी कर नहीं बढ़ते और जब बढ़ते हैं तो फसीह (साफ) बोलने के बजाए क़बीह (गन्दी) गालियाँ देना सीखते हैं।

ऐसी कि शुरफा उन गालियों पर हैरान रह जाते हैं और बढ़ते हैं तो बजाए किसी हुनर के कंकवे उड़ाना। बंटे खेलना। गुल्ली डंडा खेलना वगैरा सीखते हैं हालांकि हमारे आका व मौला सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बचपन ही में तीर अंदाज़ी इख़्तियार फरमा कर हमें यह सबक दिया है कि मुसलमान फन्ने हर्ब (लड़ाई) में माहिर हों।

मुसलमान को हुजूर ने खुदा का सिपाही बनने का सबक दिया है और हमें ग़ाज़ी व मुजाहिद बनाया है। मुसलमान के हाथ का ज़ेवर तलवार है। हाकी व फुटबाल नहीं।

अफ़सोस कि आजकल का मुसलमान बेतेग (बिना तलवार) है। अब उसके हाथ में तलवार के बजाए कंघी व आईना है। अँग्रेज़ी बाल नन्हीं-नन्हीं कंघी से संवारता है और शे'र गुनगुनाता है तो यह तेग़ों के साए में हम पल कर जवाँ हुए हैं। गोया यह नन्हीं नन्हीं कंघी उसके लिए तेग है जिसके साए में पल कर यह जवान हुआ है।

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🌹👉🏻 *ला-इला-हा इल्लल्लाह* 


🔅हज़रत हलीमा फरमाती हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब बोलने लगे तो सबसे पहले कलाम जो आपने फरमाया। वह यह था।

لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ قُدَّ وَسَاقُدُو سَانَا مَتِ الْعُيُونِ وَالرَّحْمَنُ لَا تَاءِ خُذُهُ سِنَةٌ وَلَا نَوْمٍ

यानी अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं वह कुद्दूस है। कुद्दूस है। आँखें सो गई और रहमान को न ओंघ आती है न नींद।"


👉🏻 *सबक* 


अहले दुनिया को तौहीद का सबक देने के लिए आने वाले का सबसे पहला कलाम कैसा मुबारक और ईमान अफ़रोज़ कलाम है। मुसलमानों को चाहिए कि वह अपने बच्चों को कलिमा शरीफ सिखाएं पढ़ाएं। न कि उसे गालियाँ देना सिखाएं। आजकल का तो यह आलम है कि मिठाई बट रही है। पूछा जाए कि यह मिठाई किस खुशी में बांटी जा रही है तो जवाब मिलता है। आज खैर से नन्हें ने पहली मरतबा अपने डेडी को गाली दी है। यह है हमारा मुआशरा मुसलमानो !


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🌹👉🏻 *दाफ़े-उल-बला* 


🔅हज़रत हलीमा फरमाती हैं। आपकी बेशुमार बरकतों में से एक यह भी बड़ी बरकत है कि जिस रोज़ हम हुजूर को लेकर आए तो हमारी कौम का कोई ऐसा घर न था जिस घर से कस्तूरी की खूशबू न आती हो।


 *मुअत्तर हुआ जिसकी खुशबू से हर घर यह किस बाग़ से फूल लाई हलीमा*


और अहले देह के दिलों में आपकी बरकत का इस कद्र यकीन हुआ कि अगर किसी को कोई दुख दर्द होता तो आपका हाथ पकड़ कर दर्द की जगह पर रख देता। आपके दस्ते मुबारक की बरकत से फौरन शिफा पाता। इसी तरह अगर किसी के ऊँट बकरी को कोई बीमारी हो जाती तो आपका हाथ मुबारक लगाने से फौरन आराम आ जाता। (हुज्जतुल्लाहि अलल-आलमीन स. २५६) 

हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सरापा नूर और खुशबू बनकर तशरीफ लाए। आपने अन्धेरों को रौशनी से बदल दिया और आपकी खुशबू से घर घर खुशबूदार हो गया। एक उनकी मिस्ल बनने वाले भी हैं कि लक्स साबुन से नहाकर भी उनके बदन की बदबू दूर नहीं होती। आपके हाथ मुबारक की यह बरकत थी कि दुख दर्द और किसी बला में मुब्तला होने वाले पर हाथ मुबारक रख देते तो तमाम दुख दर्द और बलाएँ दूर हो जातीं। एक आज कल के लोगों का हाथ भी है कि जिस जेब पर लग जाए वह जेब ही साफ हो जाए।


 *जो शिफा बनके आया जहाँ के लिए* 

 *दाफे हर मुसीबत पे लाखों सलाम* 


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            📁 *पोस्ट न. - 36* 📂


🌹👉🏻 *उम्मुल-मोमिनीन हज़रत ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा* 


🔅अज़्वाजे मुतहरात (पाक बीवियों) में से सबसे पहली हुजूर की बीवी उम्मुल-मोमिनीन हज़रत खदीजा हैं। उम्मुल मोमिनीन हज़रत खदीजा बेवा थीं। और मालदार व ताजिरा थीं। दौलत व सरवत के अलावा हुस्न व सूरत व हुस्न सीरत में भी वह मुम्ताज़ दर्जा रखती थीं और ताहिरा के लक़ब से मशहूर थीं। उन दिनों कुरैश के तिजारती तअल्लुकात शाम से ज़्यादा थे और हज़रत खदीजा का माल कसरत से वहाँ फरोख्त होता था चुनांचे हज़रत ख़दीजा लोगों को मुलाज़िम रखती थीं और उनके ज़रिए अपना कारोबार चलाती थीं। खुदा ने रुपया पैसा कसरत से दिया था मगर पै दर पै सदमों की वजह तबीअत दुनिया से सैर हो चुकी थी। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की उम्र शरीफ 25 साल की हुई उस वक़्त आपके पाकीज़ा अख्लाक और सतूदा सिफात (अच्छी खूबियों) का काफी शोहरा हो चुका था। अरब के हर गोशा में आप अमीन के लकब से याद किए जाते थे। हजरत खदीजा जिनकी अकीदत नवाज़ आँखें पहले ही ऐसे फर्दे मुक़द्दस की जुस्तजू (खोज) में थीं। बड़े इश्तियाक से आपकी पज़ीराई के लिए आमादा हुई और हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खिदमत में पैगाम भेजा कि अगर आप मेरा माले तिजारत शाम तक ले जाया करें तो मैं अपना गुलाम मैसरा आपके साथ कर दूँ और जितना मुआवज़ा और लोगों को देती हूँ उससे दो गुना आपको दिया करूँगी। उधर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अपने सरपरस्त चचा अबू-तालिब के ज़रिआ से खदीजा की तिजारत का हाल मालूम हो चुका था। इसलिए आपने बिला तकल्लुफ मंजूर फरमा लिया और अशिया-ए-तिजारत (तिजारत का माल) लेकर बसरा का रुख किया इत्तिफाक की बात आप जितना माल ले गए थे वह सब फोख़्त हो गया और मक्का में आकर जब नफा का हिसाब किया गया तो जितना पहले हुआ करता था। उससे दो गुना था। हज़रत ख़दीजा बहुत खुश हुईं और जितनी रकम आपके लिए नामजद की थी उससे दो गुनी नज़र की।


इस दौरान हज़रत ख़दीजा को हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के काफी हालात मालूम हो चुके थे और आपकी निगाहों में रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की इज़्ज़त बढ़ती जाती थी। चुनांचे उन्होंने अपनी एक सहेली नफीसा पयाम्बर बना कर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को प्यामे निकाह भेजा। हज़रत ख़दीजा के बाप का इन्तिकाल हो चुका था। इसलिए उनके चचा अम्र इब्ने असद उनके सरपरस्त थे। आखिरकार हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के चचा अबू-तालिब और खानदान के सभी बड़े लोग हज़रत ख़दीजा के घर पर जमा हुए। अबू-तालिब ने निकाह का खुतबा पढ़ा और 500 दिरहम तिलाई महर करार पाया और हज़रत ख़दीजा हुजूर के निकाह में आ गई। उस वक़्त हुजूर की उम्र शरीफ 25 साल और ख़दीजा रज़ियल्लाहु अन्हा की उम्र 40 साल की थी।


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