मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

अपने बच्चो की तरबियत कैसे करे

 

📚अपने बच्चो की तरबियत कैसे करे 📚

            🔖पोस्ट नम्बर:-01

📝हरफे नासिहाना:- औलाद अल्लाह तआला की एक अज़ीम नेअमत है। मगर उसके साथ वालिदैन पर डाली गई अज़ीम ज़िम्मेदारी भी है। जैसा कि अल्लाह तआला फरमाता है:👇

يأيها الذين امنو قوانفسكم والیم نا وقودها الناس والحجارة

📜तर्जुमा:- ऐ ईमान वालों! अपनी जानों और घर वालों को उस आग से बचाओ जिसके ईधन आदमी और पत्थर हैं।

📕कन्जुलईमान प0 28, आ0 06

📝यानि ऐ ईमान वालो अल्लाह तआला और उसके रसूल सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की फरमाबरदारी इख़्तियार कर के अपने घर वालों और बच्चों को नेकी की हिदायत और बदी से दूर कर के उन्हें इल्मो अदब सिखा कर अपनी जानों और अपने घर वालों को उस आग से बचाव जिसका ईधन आदमी और पत्थर हैं।

📝लेकिन बद किस्मती से आज के अक्सर वालिदैन इस हकीकत से नाआशना हो चुके हैं जिसके नतीजे में वो मुआशरे को बुरे इंसान देने का सबब बनते हैं आम तौर पर लोगों के लिए उनकी औलाद सिर्फ मोहब्बत का मौजू होती है। 

📝औलाद को लाड़ प्यार करना उनके नखरे उठाना औलाद के लिए कपड़ों और खिलौनों के ढेर लगा देना उनकी हर जाइज़ और नाजाइज ख्वाहिशों को पूरा करना उनकी ज़िन्दगी का मकसद बन जाता है। ऐसे वालिदैन के लिए उनकी औलाद इब्तिदा में एक खिलौना होती है मगर आहिस्ता-आहिस्ता वो खुद अपनी औलाद के हाथों में एक खिलौना बन जाते हैं। 

📝औलाद ख्वाहिश की डुगडुगी बजाती है और वालिदैन बन्दर की तरह उस डुगडुगी पर नाचते हैं। ऐसे वालिदैन तालीम व तरबियत के ऐतबार से अक्सर अपनी जिम्मेदारियों से गाफिल होते हैं!

📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.12

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📚अपने बच्चो की तरबियत कैसे करे 📚

            🏷️पोस्ट नम्बर:- 0️⃣2️⃣

📝ऐसे लोगो के नजदीक औलाद के हवाले से असल जिम्मेदारी यह होती है कि उसे किसी इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिल कर दिया जाये। वह औलाद की तरबियत के तसव्वुर से वाकिफ़ ही नहीं होते हैं। 

📝अच्छे आदाब व अखलाक की तलकीन नेकी और अम्र बिल मअरूफ (हुस्ने सुलूक) के तआल्लुक से बड़े छोटे का लिहाज़ खुदा और बन्दों के हुकूक की निगेहबानी को बुनियाद बना कर तरबियत करने के बजाये यह लोग औलाद को टी.वी, मोबाईल फोन, इन्टरनेट के हवाले कर देते हैं।

📝क्योंकि औलाद की जिदों और शरारतों से निजात का यह फौरी और जूद असर नुस्खा होता है। मगर यह नुस्खा अक्सर उनकी सीरत व शख्सियत को मन्सूख कर देता है। ऐसे बच्चे जब बड़े होते हैं तो मुआशरे में नुकसानात और ख्वाहिशात के बढ़ाने का बाइस बनते हैं 

📝नीज़ सब्र, ईसार, कुरबानी, सादगी, कनाअत, अफ व दरगुज़र, अमानत व दयानत, अदल व इंसाफ और खुश ख़लकी जैसे आला सिफात से आरी होते हैं, यह लोग मुआशरे को फ़सादात से भर देते हैं। यह लोग न सिर्फ दूसरे लोगों को दुख देते हैं बल्कि खुद अपने वालिदैन के बुढ़ापे को बाइसे अजीयत बना देते हैं। 

📝यह गोया वालिदैन की उस कोताही की नकद सज़ा होती है जो उन्होंने अपनी औलाद की तरबियत के मामले में खर्च की थी।औलाद की तरबियत में कोताही शरीअत में एक संगीन गुनाह है और उसके बारे में वईदें वारिद हुई हैं।

📚अल-हदीस:- हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रदि अल्लाहो तआला अन्हुमा ने एक शख्स से फरमाया कि अपने बच्चे की अच्छी तरबियत करो क्योंकि तुमसे तुम्हारी औलाद के बारे में पूछा जायेगा कि तुम ने उसकी कैसी तरबियत की और तुमने उसे क्या सिखाया।

📕तरबियते औलाद स0 8662

📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.13


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📚अपने बच्चो की तरबियत कैसे करे 📚


            🏷️पोस्ट नम्बर:- 0️⃣3️⃣

📝उसके बरअक्स जो लोग अपनी औलाद की आला तरबियत को अपनी जिन्दगी का मिशन बना लेते है उनकी औलाद दुनिया व आखिरत दोनों में उनके लिए आँखों की ठंडक साबित होती है। 


📝ऐसे वालिदैन के लिए उनकी औलाद कोई खिलौना नहीं होती बल्कि एक भारी ज़िम्मेदारी और एक मकसद होती है, यह मकसद बच्चे की पैदाइश के साथ ही शुरू हो जाते हैं। वह इस मकसद के लिए हर मुमकिन कुरबानी देते हैं और अपनी मौत तक उसे जारी रखते हैं। 


📝वह अपने बच्चे को खिलौने ज़रूर दिलाते हैं मगर खुद उनके हाथों में खिलौना नहीं बनते हैं, वह अपने बच्चों की ख्वाहिशों को मुमकिन हद तक पूरा करने की कोशिश करते हैं। साथ-साथ बच्चों को सब्र और सादगी की तलकीन भी करते हैं। 


📝वह बच्चों को आला और अच्छी तालीम जरूर दिलवाते हैं मगर उनकी तरबियत से हरगिज़ गाफिल नहीं होते। वह अपने बच्चों पर एतमाद तो करते हैं। मगर उनकी ज़िद के आगे मजबूर होकर उन्हें मोबाईल, टी.वी. और इन्टरनेट के गलत इस्तेमाल की हरगिज़ इजाजत नहीं देते हैं!


📝वह बच्चों की आजादी में तो हाइल नहीं होते लेकिन उन्हें खुदा की बन्दगी का सबक सिखाने में भी कोई कोताही नहीं करते। औलाद को अल्लाह तआला ने एक आजमाइश करार दिया है। इरशादे बारी तआला है


📜तर्जुमा:- और जान लो कि तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद एक फितना  है और यह कि अल्लाह के पास बड़ा सवाब है।


📕सूरह अन्फाल , आयत  28, कन्जुलईमान


📝इस आजमाइश में सुर्खरुह होने का वाहिद ज़रिया औलाद की अच्छी तरबियत है। अल्लाह तआला हम सबको अपने अज़ाब से बचाये । शरीअत के मुताबिक खुद को चलने और अपनी औलाद को चलाने की तौफीक अता फरमाये। आमीन बिजाहिन्नबीइल करीम सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.13,14


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📚अपने बच्चो की तरबियत कैसे करे


            🔖पोस्ट नम्बर:- 0️⃣4️⃣


📝तरबियत क्या है:- लफ्जे तरबियत एक वसी मफहूम वाला लफ्ज है। तरबियत का लफ्जी माना नश व नुमाँ करना। निगरानी करना, तालीम व तहजीब सिखाना है, इस लफ्ज़ के तहत लोगों की तरबियत, खानदान की तरबियत, मुआशरा (समाज) की तरबियत भी शामिल है। 


📝इंसानी तरबियत, ईमानी तरबियत,अखलाकी तरबियत, नफ्सियाती तरबियत, अदबी तरबियत, जिस्मानी तरबियत वगैरह भी शामिल है। इन तमाम बातों में तरबियत का असल मकसद उम्दा पाकीजा, बा-अखलाक, बा–किरदार, मुआशरेका वुजूद है। आसान लफ्जों में तरबियत को यूँ कहा जा सकता है:-👇🏻


📌1.इंसान अपनी नीयतों मे पाकीज़ा और अपनी आरजुओं में पाक हो जाये।


📌2. इंसान में खुद एहतिसाबी (अपने अमल की इस्लाह) का अमल जारी होकर अपने कमाल तक पहँच जाये।


📌3. इंसान अपनी मरजी से अपने इख़्तियार का दुरुस्त इस्तेमाल करे।


👉Making People scanceble in there Choices, Making People Responsible And scanceble in there Choices.


📝तरबियत यह है कि लोगों को उनके इन्तिखाब में, समझदार बनाना, लोगों को उनके पसन्द में जिम्मेदार बनाना हैं।


👉Tarbiyah is Not Training, Tarbiyah is Actually Mentoring.


📝तरबियत यह है कि जब बच्चा नमाज पढ़े तो वह किसी ख़ौफ़ या किसी लालच की वजह से न पढ़े बल्कि नमाज़ उसका पसन्दीदा अमल हो जाये।


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.15


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            🔖पोस्ट नम्बर:- 0️⃣5️⃣

📝तरबियते औलाद की अहमियत:- आज के इस तरक्कीयाफ्ता दौर में हर कोई यह रोना रो रहा है कि मुआशरा बड़ा ख़राब है आज का माहौल अच्छा नहीं, और यह रोना कोई बेजा नहीं है। बल्कि सही है, लेकिन क्या सिर्फ रोने धोने से मुआशरा दुरुस्त हो जायेगा हरगिज़ नहीं, बल्कि मुआशरे को ठीक करने के लिए हमें अमली मेहनत करनी पड़ेगी। 


📝इस्लाहे मुआशरा के लिए सब से पहले अपने घर की इस्लाह करनी पड़ेगी अपने घर के लोगों को इस्लामी तालीम से वाकिफ़त करानी पड़ेगी। और अहकामे इस्लाम पर अमल करने की तलकीन करनी पड़ेगी और अपने बच्चों की तरबियत इब्तिदा ही से अच्छे अंदाज़ से करनी होगी। 


📝क्योंकि यही बच्चे कल खुद अपने बच्चों के माँ-बाप बनेंगे।इसलिए बचपन का ज़माना इन्तिहाई अहमियत का हामिल होता है और बच्चे ही मुआशरे के अफ़राद हैं मुआशरे के अफराद जब सहीहो जायेंगे! मुआशरा खुद बा खुद सही हो जायेगा।


📝गोया इस से मालूम होता है कि इस्लाहे मुआशरा के लिए औलाद की तरबियत रीढ़ की हड्डी की मिस्ल है। अगर हम अपनी औलाद की इस्लाह और अच्छी तरबियत करेंगे। तो यह तरबियत रफ्ता-रफ्ता पूरे मुआशरे की इस्लाह हो जायेगी। 


📝लेकिन इस ज़माना में मुसलमानों में दीनी तालीम व तरबियत देने और तकवा परहेज़गारी के बजाये सिर्फ दुनियावी उलूम व फुनून की तालीम व तरबियत पर भरपूर तवज्जो देने की बीमारी आम हो गई है। लेकिन अल्लाह तआला कुरआन-ए-मजीद में इरशाद फरमाता है:👇🏻


📜तर्जुमा:-  क्या यह ख्याल कर रहे हैं कि वह जो हम माल और बेटों के साथ उनकी मदद कर रहे हैं तो उनके लिए भलाईयों में जल्दी कर रहे हैं बल्कि उनकों ख़बर नहीं।


📕सूरह मोमिनून आयत 55, 56, कन्जुलइरफान


📝लिहाज़ा मुरब्बी को चाहिए कि बच्चे की तालीम व तरबियत इस्लामी तरीके के मुताबिक अपने ऊपर वाजिब समझें ताकि बच्चे दुनिया व आख़िरत के लिए भलाई का सबब बनें।


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.16,17


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📚अपने बच्चो की तरबियत कैसे करे


            🔖पोस्ट नम्बर:- 0️⃣6️⃣


📝तरबियते औलाद क्यों जरूरी है ? हमारा सब से बड़ा सरमाया और एक कीमती दौलत हमारी औलाद है, उन्हें अच्छी और स्वालेह तरबियत देना जहाँ हमारी आख़िरत की बेहतरी की जमानत है 


📝वहीं हमारे बुढ़ापे का हुस्न और राहत व आरामदाह और मुआशरती इज्जत का जरीया भी हैं। बहुत सारे लोग सुबह से लेकर शाम तक एक ही फिक्र में सारा वक़्त काट देते हैं कि दौलत कैसे कमाई जाये। और किस तरह माल जमा किया जाये, और यह माल औलाद के लिए जमा कर रहे होते हैं 


📝लेकिन जिस औलाद के लिए माल जमा कर रहे थे,वो औलाद बिगड़ गई. शैतान के जाल में फंस गई बुरे अख़लाक़ का हामिल हो गई। फिर हम सोचते हैं कि जिसके लिए दिन और रात एक कर के कमाया अपना चैन गंवाया अपनी जवानी भी गँवा दी, इन हसीन लम्हों से लुत्फ अन्दोज होने के वजाये एक मजदूर की तरह काम करते रहे तो आज वह औलाद हमारे बुढ़ापे का सहारा नहीं बल्कि हमारे लिए  रुसवाई, जिल्लत, सूऊबत और परेशानी दुख व सदमे का ज़रीआ बन रही है। 


📝काश हमने अपनी औलाद को अच्छे अखलाक और खूबसूरत किरदार सिखाए होते, उसका नतीजा हम अपनी आँखों से देख पाते इस्लाम एक मुकम्मल दीन है। उसने अपने मानने वालों की तमाम ज़िन्दगी के हिस्से में पूरी रहनुमाई की है।


📝हमें औलाद की तरबियत और उन्हें अच्छे अखलाक का खूगर बनाने के लिए मुसलसल जिद्देजहद करने की तरगीब दी है।ताकि हमारी औलाद एक अच्छे मुआशरे की शक्ल का सबब बने । और हम उस औलाद से दुनिया में इज्जत और फरहत व सुरूर की खुशबू से मोअत्तर हों और हमारी कब्र का चिराग भी रौशन हो और आख़िरत में हमारी इज्जत अफजाई और बख्शिश का जरिया बने।


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.17,18


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📚अपने बच्चो की तरबियत कैसे करे 📚


            🔖पोस्ट नम्बर:- 0️⃣7️⃣

     तरबियत का आगाज़ कब से होता है ?


📝बच्चे की तरबियत का आगाज़ उसी वक्त से हो जाता है जब बच्चा माँ के शिकम में होता है माहिरीन (वैज्ञानिक)कहते हैं कि बच्चे को जब माँ के पेट में चार से पांच महीने गुज़र जाते हैं।


📝चार महीने गुज़र जाने के बाद जो आवाज़ बच्चा माँ के शिकम में सुनता है वो माँ की दिल की धड़कन है। इसलिए वालिद को चाहिए कि जब बच्चे की माँ उम्मीद से हो तो उस वक्त उससे बुलन्द आवाज़ से गुफ्तगू न करे। 


📝डाँट-डपट, गाली-गलौज से परहेज़ करे। चूँकि ऐसा करने से बच्चा जो पैदा होगा उस पर मन्फी असरात, चिढ़चिड़ापन, तल्ख जुबान, बे-अदब हो जाता है।


📝इसलिए वालिद को चाहिए कि जब बीवी पेट से हो तो उसे खुश रखा जाये। उसकी ज़रूरतों को पूरा किया जाये और बच्चे की माँ को चाहिए कि बच्चा जब पेट में हो तो फहशगोई, गाली-गलौज, झगड़ा, लड़ाई न करे


📝आज के इस मौजूदा दौर में अक्सर माँओं का हाल यह है कि बच्चा जब पेट में होता है तो वो फिल्मी एक्टर की बात कर रही होती है, किसी टी.वी. सीरियल की बात कर रही होती है। नाच-गाने में मगन रहती है, लिहाजा उससे परहेज़ करना चाहिए क्योंकि इस से बच्चे पर बुरे असरात पड़ते हैं, आप कहेंगे वो कैसे ?


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.18


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            🔖पोस्ट नम्बर:- 0️⃣8️⃣


     तरबियत का आगाज़ कब से होता है ?


📝आप गौसे आजम रज़िअल्लाहु तआला अन्हु की सीरत पढ़ेंगे तो मालूम होगा कि जब गौसे आज़म अब्दुल कादिर जीलानी (रज़िअल्लाहु तआला अन्ह) माँ के पेट में थे तो उनकी माँ रोज़ाना कुरआन की तिलावत किया करती थीं।


📝जब गौसे आज़म (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) की विलादत हुई तो फिर जब उनकी माँ मदरसा ले गई और कहा इस बच्चे की बिस्मिल्लाह ख्वानी करवानी है तो उस्ताद ने कहा अब्दुल कादिर पढ़ोः 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' तो गौसे आज़म (रज़िअल्लाहु तआला अन्ह) ने बिस्मिल्लाह के साथ कुरआन के 18 पारे सुना दिये।


📝हुजूर गौसे आज़म रज़िअल्लाहु तआला अन्ह से पूछा गया कि आपने कैसे सुना दिये तो गौसे आज़म रज़ि अल्लाहु तआला अन्ह ने फरमाया कि जब मैं अपनी माँ के पेट में था तो मेरी माँ रोज़ाना कुरआने पाक तिलावत किया करती थीं जिसको मैं सुना करता था। और याद किया करता था। लिहाजा इस से पता चला कि बच्चा माँ के पेट में सब कुछ सुन रहा होता है। 


📝इस लिए माँओं को चाहिए कि जब बच्चा पेट में हो तो कुरआन की तिलावत करें, नातें पढ़ें ताकि जब बच्चा पैदा हो तो वह नेक और स्वालेह हो।


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.19


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            🔖पोस्ट नम्बर:- 0️⃣9️⃣

     तरबियत का आगाज़ कब से होता है ?


📝अब बच्चे की पैदाइश के बाद दो साल की उम्र तक इसी तरकीब को जारी रखें, बच्चे के सामने कुरआन की तिलावत की जाये माँ जब कुरआन की तिलावत करे तो बच्चे को साथ बिठा ले अगर वालिद तिलावते कुआन करे तो बच्चे को साथ बिठा ले 


📝बच्चे के सामने नाते पाक के नगमात गुनगुनायें वालिद को चाहिये कि बच्चे के सामने बच्चे की माँ से बुलन्द आवाज़ से बात न करे ।बच्चे की माँ को चाहिए कि बच्चे को पूरे दो साल की उम्र तक दूध पिलाये जैसा कि कुरआने मजीद में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है


📄तुर्जुमा अल-कुरआन: और माँयें अपने बच्चों को पूरे दो साल दूध पिलायें ।


📕सूरह बकराह, आ. 233, कन्जुल ईमान


📝यह हुक्म इसलिए है कि जो दूध पिलाने की मुद्दत माँ मुकर्रर कर लें, कोशिश करे कि बच्चे को बगैर वुजू दूध न पिलाये 


📝अब वह दो साल से चार साल की उम्र तक बच्चो को प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बारे में बतायें! उनकी पैदाइश के वाकियात सुनायें! जब प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की विलादत हुई तो सारे जहान में खुशबू ही खुशबू फैल गई आसमान से सितारे ज़मीन की तरफ़ आगये हूर व मलाइका की कतारें लग गई वगैरह, वगैरह


📝हुजूर के मोजिज़ात के वाकियात सुनायें ताकि बच्चे के दिल में प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की मोहब्बत पैदा हो और हुजूर सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम के तरजे ज़िन्दगी पर चलने की कोशिश करें। चुनांचे माहिरीन कहते हैं कि इस उम्र में बच्चे पसन्द और नापसन्द का इजहार करते हैं।


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.19, 20


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            🔖पोस्ट नम्बर:- 1️⃣0️⃣

     तरबियत का आगाज़ कब से होता है ?


📝अगर वालिदैन शुरू से बच्चे को हुजूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के मोजिज़ात और औलिया-ए-किराम की करामते सुनाएँ तो बच्चे हुजूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम और औलिया-ए-इज़ाम से मोहब्बत और उनके नकशे कदम पर चलेंगे। 


📝उनकी पसन्द वही होगी जो हुजूर सल्लल्लाहोअलैहि वसल्लम को पसन्द थी, वो वही पसन्द करेंगे जो सहाबा और औलिया-ए-किराम की पसन्द थी। लेकिन आज के इस पुर फितन दौर में अक्सर वालिदैन अपने बच्चों को फिल्मी गाने ही सीखाते हैं किसी दुनियादार शख्स की तारीफ़ करते हैं मनगढ़त कहानियाँ सुनाते हैं जो बच्चों के जहन के लिए मुज़िर (नुकसानदेह) है! 


📝माहिरीन कहते हैं कि इस उम्र में बच्चे का ज़हन बन रहा (BUILD) होता है और हम बच्चों से फिजूलगोई और दुनियादारों की बातें करते हैं जिससे बच्चे की पसन्द दुनिया हो जाती है। दीने इस्लाम से कोई रगबत और मोहब्बत नहीं रहती जो कि वालिदैन के लिए बाइसे अज़ाब है लिहाजा वालिदैन को चाहिए कि वह बच्चों को अम्बिया व औलिया व बुजुर्गानेदीन की ज़िन्दगी के वाकियात सुनाएँ।


📚अल-हदीस:- जैसा कि प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं "अपनी औलादों को तीन खस्लतें (आदतें) सिखाओ, नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम से मोहब्बत , अहलेबैत से मोहब्बत और कुरआने करीम से मोहब्बत।"


📕कन्जुल आमाल, जिल्द, 6 स0 40409


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.20, 21


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     तरबियत का आगाज़ कब से होता है


📝अब चार साल से 7 साल की उम्र तक कुरआन अज़ीम की तालीम दें। सुन्नते मुस्तफा सल्लल्लाहों अलैहि वसल्लम और आदाब सिखाएँ खाने-पीने, उठने-बैठने, चलने-फिरने वगैरह की सुन्नत व आदाब सिखाएँ और खुद अमल करके दिखाएँ 


📝अब चूँकि इस उम्र में बच्चे के जहन में सवालात पैदा होते हैं जैसे जमीन क्या है आसमान क्या है ? चाँद क्या है ? सूरज क्या है ? हम कहाँ से आये हैं ? कहाँ जायेंगे ? अल्लाह कौन है ? कहाँ है! मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम कौन हैं ? वगैरह तो मुरब्बी (परवरिश करनेवाला) को चाहिए कि उनके सवालों के जवाब दें और उन्हें बतायें । 


📝ऐ मेरे प्यारे बेटे! हमारा मतलूब व मकसूद अल्लाह तआला है और अल्लाह के महबूब मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम हैं, और मेरे प्यारे बेटे! अल्लाह अज्जा वजल्लाह व रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की फरमाँ बरदारी में और बातों को मानने में ही दुनिया व आख़िरत की कामयाबी है। 


📝और बच्चे के जहन के मुताबिक उनके सवालों के माकूल जवाब दें । बाज़ लोग ऐसे होते हैं कि जब बच्चा सवाल पूछता है तो वो उन्हें धुतकार देतें हैं या उन्हें डाँट देते हैं और उन्हें उनके सवालों के जवाब नहीं देते, जिससे बच्चा मुरब्बी से दूरी इख्तियार कर लेता है, और एक दिन हाथ से निकल जाता है।जिससे बच्चा किसी से भी सवाल पूछने से झिझकता है और अहम उलूम जानने से हमकिनार (दूर ) हो जाता है।


📝अब 7 बरस से 10 बरस की उम्र तक नमाज़ सिखाएँ जैसाकि प्यारे आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं बच्चों को सात बरस की उम्र में नमाज सिखाओ और दस बरस होने पर मारो।"


📕अल-मुसतदरक, जिल्द,1 सफह 258


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.21, 22


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      तरबियत का आगाज़ कब से होता है


📝बच्चों को नमाज़ का पाबन्द बनाने के लिए आसान तरीका यह है कि वालिदैन खुद नमाज़ के पाबन्द बन जायें और वालिद जब मस्जिद को जाये तो बच्चे को साथ लेकर जाये


📚जैसाकि हदीसे पाक में आता है कि नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम मस्जिद में हसन या हुसैन रदि अल्लाहो तआला अन्हु को साथ लाया करते थे।


📕अल-मुस्तदरक जिल्द,3 सफह,165, 66


📝उन्हें तरीके सिखाएँ कि क़याम कैसे करते हैं, सजदा कैसे करते हैं ? वगैरह, उनको करके (Practical) बताये कि क़याम में जब खड़े होते हैं तो सजदे की जगह की तरफ देखते हैं, जब रुकू में जाते हैं तो पैर की तरफ देखते हैं जब सजदे में जाते हैं तो नाक की तरफ देखते हैं कायदे मेंजब बैठते हैं तो दामन की तरफ देखते हैं वगैरह 


📝फिर उन्हें कहें कि बेटा पढ़ो यकीन मानें इस तरीके से बच्चा बहुत जल्द नमाज़ का सही तरीका सीख लेगा और नमाज का पाबन्द हो जायेगा। इंशा अल्लाह बच्चों को नमाज़ की तालीम देना बाप वलिउल अम्र (हुक्म देने वाला) की ज़िम्मेदारी होती है और यह वाजिबात में से है


📝इब्ने कुदामा अल-मुकद्दसी ने बाज़ उलमा से यह बात नकल की है कि बच्चे के सरपरस्त पर यह बात वाजिब है कि बच्चा 7 बरस का हो जाये तो उसे तहारत और नमाज़ की तालीम दें और उसका हुक्म दें।


📕अल-मुगन्ना जि01, स0 647


📝लिहाजा वालिदैन को चाहिए कि इस उम्र में बच्चे को इल्मे तहारत (पाकी) नमाज़ की तालीम बड़े छोटे का अदब और नमाज़ के मसाइल वगैरह बतायें।


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.22, 23

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     तरबियत का आगाज़ कब से होता है


📝अब 10 साल से लेकर 14 साल की उम्र तक के बच्चे, इस उम्र में अपना रोल मॉडल चुनते हैं, उमूमन बच्चे अपने बाप को रोल मॉडल चुनते हैं और बच्ची भी अपनी माँ की तरह बनना चाहती है। इसलिए वालिदैन को चाहिए कि अपनी ज़िन्दगी को सुन्नते मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर ढाल दें। नेक और कामयाब शख्सियत बनें, ताकि आप की औलाद आपको अपना रोल मॉडल बनाने में फख्र महसूस करे 


📝और इस उम्र में चाहिए के बच्चों को प्यारे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के वाकियात सुनाते रहें, औलिया व बुजुर्गाने दीन की ज़िन्दगी के वाकियात सुनाते रहें, ताकि बच्चे किसी दुनियादार बेहूदा अदाकार (Actor) को अपना रोल मॉडल न बनायें और ना उसे अच्छा जानें। बल्कि उनका रोल मॉडल अम्बिया व बुजुरगाने दीन हो। 


📝फी ज़माना बच्चों का हाल यह है कि Tick-Tok या इसी तरह के कई App पर बेहूदापन कर रहे हैं और वालिदैन कुछ नहीं करते । बच्चों का भी यही हाल है, लड़कियाँ मर्द वाले कपड़े, जीन्स, शर्ट पहन लेती हैं और मर्दो की मुशबिहत इख्तियार करती हैं ।


📚अल -हदीस:- प्यारे आका सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन औरतों पर लानत फ़रमाई है जो मर्दो की मुशाबिहत करती हैं और उन मर्दो पर जो औरत की मुशाबिहत इख्तियार करते हैं।


📕जामे तिर्मिजी जिल्द 2, सफह 2784


📝लेकिन हाये अफसोस, आज लड़कियाँ इसी तरह के कई App पर मुजरा करती हैं, ना बाप का अदब व लिहाज़ है न भाई की इज़्ज़त का ख्याल है, ना किसी की शर्म व हया है, गोया कि इनका ज़मीर मर गया है। यह वालिदैन की कोताही का सबब है, क्योंकि वालिदैन बच्चे और बच्चियों को शुरू से इस्लामी लिबास पहनने की तलकीन ही नहीं करते है। 


📝लिहाजा वालिदैन को चाहिए कि बचपन ही से बच्ची को लड़कों के कपड़े पहनने से रोकें और इस्लामी लिबास पहनने का हुक्म दें, ताकि बच्ची बुरे अफआल से बचे और औरों को बचाये। याद रखें वालिदैन अपने घर के निगहबान होते हैं, बच्चों का एहतिसाब करने का हक भी उन्हीं का है और रोजे कयामत उन्हीं से अहलेखाना के बारे में पूछा जायेगा!


📚अल -हदीस:- हज़रते अब्दुल्लाह बिन उमर रदि अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि हुजूर सल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः मर्द अपने घर वालों का निगरान है और उससे उसके मातहत अफराद के बारे में पूछा जायेगा।


📕अलबुखारी व मुस्लिम, अहदम बिन हम्बल 52, सफह, 4495

📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.23,24


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     तरबियत का आगाज़ कब से होता है


🤝🏻अब 14 बरस से 21 बरस तक की उम्र में वालिदैन को चाहिए कि बच्चों को अपना दोस्त बना लें क्यों कि अगर आप अपनी औलाद को अपना दोस्त बनाकर अच्छा इंसान नहीं बनायेंगे तो बुरे लोग उन्हें अपना दोस्त बना कर बुरा इंसान बना देंगे।


📝बच्चा जिस काम को करना चाहता है उस काम के मुताल्लिक दीन के जो मसाइल हैं उससे बच्चे को वाकिफ करायें और निकाह व तलाक़ और हुकूके इंसानियत और दीगर दीन के मसाइल हैं उनसे रूशनास (सिखायें) करायें।


📄चुनाँचे हज़रत अनस रदि अल्लाहो तआला अन्हु से रिवायत है कि


📄तर्जुमा:- फिकह का इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर ज़रूरी और वाजिब है।


📕माखज़ फज़ाइले इल्म व उलमा स0 59


🤲अल्लाह की बारगाह में दुआ है कि अल्लाह तआला हम सब को इल्मे नाफे (फायदा देने वाला) अता फरमाये और अपने घरों की सही निगरानी करने की इस्लाम के बताये हुए कानून। के मुताबिक अपने बच्चों को तालीम व तरबियत देने की तौफीक अता फरमाये । आमीन बिजाहे नबीइलकरीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.24, 25


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     तरबियत का आगाज़ कब से होता है


📝तरबियते औलाद के (4) मवाजे बच्चों की तरबियत चार जगहों से होती है:👇

1. घर

2. मुआशरा

3. मिम्मबर व मेहराब

4. स्कूल


📌1. घर (घर के अफराद) इस दौरे जदीद में घर के बिगड़े हुए माहौल से बच्चों की इस्लामी तरबियत का होना दुशवार है। क्योंकि आज घरों के हालात फिल्मी बे-हयाई लड़ाई झगड़े और वालिदैन का मोबाईल फोन में मशगूल होना बच्चों की तरफ ध्यान न देना वगैरह ऐसे घर के माहौल से बच्चों की तरबियत होना मुमकिन नहीं है। 


📝चुनाँचे वालिदैन को चाहिए कि सबसे पहले अपने घर का इस्लामी माहौल बनायें और बच्चों पर तवज्जो दें। क्योंकि वालिदैन अपने घर के निगरान होते हैं और रोजे कयामत उन्हीं से अहले खाना के बारे में पूछा जायेगा


📚जैसा हदीसे मुबारका में है हज़रते अब्दुल्ला बिन उमर से रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया, मर्द अपने घर वालों का निगरान है और उससे उसके मातहत अफराद के बारे में पूछा जायेगा।


📕अलबुख़ारी व मुस्लिम अहमद बिन हम्बल 52, स. 4495


📝जमीन अच्छी हो लेकिन पानी ठीक न हो तो फसल खराब हो जाती है। घर अच्छा बना हो लेकिन घर में दीन न हो तो नस्ल ख़राब हो जाती है!


📕मॉर्डन जमाने मे बच्चो की तरबियत कैसे करे पेज.25, 26


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