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🔆नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत (पैदाईश) रबीउल अव्वल के महीने की 12 तारीख को हुई, जिसे मुसलमान हर साल बड़े जोशो खरोश से पुरी दुनिया में मनाते है, इसे ही ईद मिलादुन्नबी यानी नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पैदाईश का त्योहार कहते हैं।
🎍👉🏻 *लफ्ज़े - मिलाद* (मिलाद शब्द)" लफ्ज़े - विलादत से निकला है, जिसका मआना पैदाईश है। इसलिए अरबी जुबान के मुताबिक लफ्ज़े - मिलाद का इशारा पैदाईश की जगह और पैदाईश के वक्त की तरफ है और शरीयत की रोशनी में मिलाद से मुराद वह निशानियाँ हैं जो नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पैदाईश के वक्त जुहूर-पज़ीर (ज़ाहिर) हुई।
🌹👉🏻इस मिलाद के मौके पर हम नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सीरत का बयान करते हैं और नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की बारगाह में दरूदो - सलाम का नज़राना भी पेश करते हैं। और यह वह मौका होता है जब ईमान को नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के इश्क में डुबो कर फिर से मुअत्तर कर दिया जाता है।
• *नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत का वक्त सारे आलम के लिए बहुत खास लम्हा था, जिसकी खुशियाँ कुछ यूँ मनाई गई "नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत के वक़्त सितारों का एक झुण्ड आपके घर की छत पर एक जगह जमा हुआ, फरिशतों ने मशरिक (पूरब) में और मग़रिब (पश्चिम) में और बैतुल्लाह (काबा शरीफ) पर इण्डे लहराये और सारा कुरा - ए - अर्ज़ (वातावरण) फरिशतों की आवाज़ों से गुन्ज रहा था और हुरे आप पर खड़े होकर दरूदो सलाम पढ़ रहीं थीं और एक दुसरे को मुबारकबाद दे रही थीं और खुशियाँ मना रहीं थीं, यहाँ तक कि जानवरों ने भी नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत पर एक - दुसरे को मुबारकबाद दी, काबातुल्लाह (भी) सलामी देने की मानिन्द (तरह) झुक गया, और बातिल (अधर्म) मिट गया और हक के नूर ने सभी सिम्त नूर बिखेर दिया।"*
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🔆नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की वालिदा - माजिदा (माँ) हज़रते - आमिना (रदिअल्लाहु ता’आला अनहा) फरमातीं हैं "(हज़रत) मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत के वक़्त मैनें तीन झण्डे 🇸🇦लगे हुए देखे।
🇸🇦 एक मश्रिक (पूरब) में
🇸🇦एक मग़रिब (पश्चिम) में और
🇸🇦तीसरा बैतुल्लाह (काबा शरीफ) की छत पर।"
🌹बेशक मिलादुन् - नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर सभी खुश होते हैं सिवाए शैतान और उसके साथीयों के, क्योंकि *"इब्लीस चीखकर चार मरतबाह (बार) रोया था, पहली मरतबाह जब अल्लाह (रब्बुल इज़्ज़त) ने उसपर लानत की थी, दुसरी मरतबाह जब वह जन्नत से निकाला गया, तीसरी मरतबाह जब नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत (पैदाईश) हुई, और चौथी मरतबाह जब (कुरआन की) सुरह फातिहा नाज़िल हुई।"
🥰इसपर आला हज़रत शाह अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी (रहमतुल्लाह अलैह) की कलम उठी और इस मंज़र को आपने कुछ यूँ बयां कियाः *"निसार तेरी चहल - पहल पर, हजारों ईदे रबीउल अव्वल, सिवाए इब्लीस के जहां में, सभी तो खुशियाँ मना रहे हैं"*
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🔆 *पहला बाब :- कुरआन - ए - पाक की रोशनी में ईद मिलादुन् - नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
❣️ _अल - कुरआन :- (बिस्मिल्ला-हिर्रहमा-निर्रहीम)_
*“फरमा दीजिए (यह सब कुछ) अल्लाह ही के फ़ज़्ल और उसकी रहमत के बाइस है जो (बे'सते मोहम्मदी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़रिए तुम पर हुई है) पस मुसलमानों को चाहिए कि उसपर खुशियाँ मनाएँ, यह उस (धन - दौलत) से कहीं बेहतर है जिसे वो जमा करते है।"*
📚हवाला : [अल - कुरआन, पारा 11, सूरह यूनुस, सूरह नम्बर 10, आयत नम्बर 58]
❣️ *अल्लाह के फ़ज़्ल पर और उसकी रहमत पर यानी अल्लाह की ने'मतों पर मुसलमानों को खुशियाँ मनाने का हुक्म दिया गया है और हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत सबसे बढ़कर हम पर अल्लाह का फल और सबसे बढ़कर अल्लाह की रहमत है। अल्लाह ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सारे जहानों के लिए रहमत बनाकर के भेज , इसका सबूत हमें कुरआन - ए - पाक में ही मिलता है*
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🔆 (ii) इमाम इब्ने जौज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) सूरह यूनुस की आयत नम्बर 58 की तफसीर में लिखते हैं :- अज् - ज़हाक ने हज़रत इब्ने अब्बास (रदिअल्लाहु ता आला अनहु) से रिवायत किया कि इस आयत में फज़ल से मुराद इल्म है और रहमत से मुराद मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं।
📚 हवाला :- [इमाम इब्ने जौज़ी, ज़ाद अल मसीर फी इल्म अत् तफसीर, जिल्द 4, सफा 40]
❣️ (iii) इमाम जलालुद्दीन सुयुती रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं :- अबु शेख (रहमतुल्लाह अलैह) हज़रत इब्ने अब्बास (रदिअल्लाहु ता आला अनहु) से रिवायत करते हैं कि फज़ल से मुराद { कुरआन और तौहीद का } इल्म है और रहमत से मुराद मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं।
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🔆 (iv) इमाम अबु हय्यान अल अन्दलुसी रहमतुल्लाह अलैह ) भी फरमाते “फज़ल से मुराद इल्म और रहमत से मुराद मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं।"
🌹 (v) अल्लामा आलूसी ( रहमतुल्लाह अलैह ) फरमाते हैं फ़ज़्ल से मुराद भी मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं।
🌹 अल - ख़तीब रहमतुल्लाह अलैह और इब्ने असाकिर (रहमतुल्लाह अलैह) से रिवायत है कि "फज़ल से मुराद नबी ए क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं।"
❣️ 02. अल कुरआन :- "यह {यानी इस रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की आमद और इनका फैज़ो हिदायत अल्लाह का फज़ल है वह जिसे चाहता है इससे नवाजता है, और अल्लाह बड़े फज़ल वाला है।"
🎍 ( i ). हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रदिअल्लाहु ता आला अनहु) अपनी तफसीर में लिखते हैं “(अल्लाह बड़े फज़्ल वाला है) कि (उसने) इस्लाम और नबुवत हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अता फरमाया, और यह भी इससे मुराद है कि (अल्लाह ने) मोमिनों (ईमान वालों) को इस्लाम अता फरमाया, और यह भी इससे मुराद है कि रसूलउल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और क़िताब - ए - मुक़द्दस (कुरआन) को अपनी मखलूक के पास भेजा।”
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🔆इस आयत और इस आयत की तफसीर (तफसीर इब्ने अब्बास) से यह मालूम हुआ कि रसूलउल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की आमद हम पर अल्लाह का बुहत बड़ा फज़ल है जिनके ज़रिये से हमें इस्लाम और कुरआन मिला। यहाँ यह बात पुरी तरह से साबित हो चुकी है कि अल्लाह के फज़्ल और अल्लाह की रहमत से मुराद हज़रत मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं, जिसपर मुसलमानों को अल्लाह ने कुरआन शरीफ (के सूरह यूनुस की आयत 58) में खुशियाँ मनाने का हुक्म दिया है।
ईद मिलादुन्नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर खुशियाँ मनाना अल्लाह के इसी हुक्म पर अमल है।
🌹03. ( i ). अल कुरआन :- "और (यहया पर) सलाम हो उनके मिलाद के दिन और उनकी वफाअत के दिन और जिस दिन वह ज़िन्दा उठाये जायेंगे।”
🌹 ( ii ). अल - कुरआन : "और मुझ पर (ईसा पर सलाम हो मेरे मिलाद के दिन, और मेरी वफाअत के दिन, और जिस दिन मैं ज़िन्दा उठाया जाऊँगा।”
इस आयत से यह मालुम हुआ कि अम्बिया (अलैहिमुस्सलाम) की विलादत का दिन और उनकी वफाअत का दिन और जिस दिन वो ज़िन्दा उठाये जाएँगे ये सरे दिन अल्लाह के नज़दीक ख़ास सलामती वाले दिन होते हैं। इसलिऐ नबी - ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत का दिन (यानी 12 रबीउल अव्वल) इस्लाम में बहुत अहमियत रखता है।
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🔆 04. अल कुरआन :- “और बेशक़ हमने मूसा (अलैहिस् सलाम) को अपनी निशानियों के साथ भेजा कि (ऐ मूसा !) अपनी क़ौम को अंधेरों से निकालकर उजाले की तरफ ले जाओ और उन्हें अल्लाह के दिन याद दिलाओ {जो उनपर और पिछली उम्मतों पर आ चुके थे}। बेशक़ उसमें हर बड़े सब्र वाले (और) खूब शुक्र करने वाले के लिए निशानियाँ हैं।”
📚 हवाला [अल कुरआन, पारा 13 सूरह इब्राहीम, सूरह नम्बर 14, आयत नम्बर 5 ]
❣️ ( i ) अल्लामा आलूसी (रहमतुल्लाह अलैह) लिखते हैं :- इमाम अल बयहकी उनकी किताब 'शो'अबुल ईमान' में रिवायत करते हैं कि नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि 'अल्लाह के दिन वह हैं जिस दिन अल्लाह की रहमत और निशानियाँ ज़ाहिर हुई।'
🎍इससे यह बात मालूम हुई कि अल्लाह की रहमत जिस दिन ज़ाहिर होती है वह दिन अल्लाह के दिन होते हैं जिन्हें याद दिलाते रहने का हुक्म हुआ है, और इससे पहले दर्ज कुरआन की आयतों से यह बात साबित हो चुकी है कि नबी - ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह का सबसे बड़ा फज़ल और अल्लाह की सबसे बड़ी रहमत हैं और अल्लाह की यह नेमत हमें जिस दिन (यानी 12 रब्बीउल अव्वल को) मिली उस दिन की याद हम हर (ईद मिलादुन् - नबी की) खुशियाँ मनाकर मनाते हैं, जैसा कि कुरआन शरीफ में हुक्म हुआ है कि अल्लाह के फज़ल और उसकी रहमत पर मुसलमानों को खूब खुशियाँ मनानी चाहिए और यह भी फरमाया गया कि यह उन सारे माल और दौलत से बेहतर है जिन्हें वो जमा करते हैं।
❣️ 05. अल कुरआन :- “और अपने रब की ने’मतों की चर्चा करो"
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🔆( i ) हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास (रदिअल्लाहु ता आला अनहु) अपनी तफसीर में लिखते हैं
"(और अपने रब की नेमतों का) जो नबुवत और इस्लाम के ज़रिये हमें हासिल हुई है { ( खूब ) चर्चा करो} लोगों को बताओ और इसके बारे में उन्हें जानने दो।"
📚 हवाला : [ हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास, तन्वीर अल - मिकबास मिन तफसीर इब्ने अब्बास, सूरह अद् - दुहा, आयत नम्बर 11
❣️( ii ) इमाम जलालुद्दीन महल्ली और इमाम जलालुद्दीन सुयुती (रहमतुल्लाह अलैही अजमईन) की तफसीर जला'लएन में हैं
“और अपने रब की नेमतों का, जो नबुवत और दुसरे कई तरह से तुम्हे हासिल हुई है, ( खूब ) चर्चा करो, और इसे लोगों को मालूम कराओ।"
📚 हवाला : तफसीर जला'लएन , सूरह अद - दुहा , आयत नम्बर 1
🎍इस आयत में अल्लाह का हुक्म है कि उसकी नेअमतों का खूब चर्चा किया जाए, और जैसाकि तफसीरों में है कि ने मत से मुराद रसूलउल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हैं, इसलिए मुसलमान ईद मिलादुन्नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मनाकर अल्लाह की सबसे बड़ी नेअमत आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत के दिन का, आपकी ज़ाते अक़दस का और आपकी सीरत का रबीउल अब्बल के महीने में बिल - खुसूस खुब चर्चा करते हैं और 12 रबीउल अव्वल को जोकि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत का दिन है उस दिन खूब खुशियाँ मनाते हैं।
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🔆 01. हदीसे पाक़ :- अबु कतादा अल अंसारी (रदिअल्लाहु ता आला अनहु) रिवायत करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पीर (सोमवार) के दिन के रोज़े के बारे में पूछा गया, जिसपर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया “यह वह दिन है जब मेरी विलादत (पैदाईश) हुई थी और कुरआन का नुज़ूल हुआ था।"
❣️अरब मुल्क में यह रिवाज था कि अल्लाह की किसी ने'मत पर उसका का शुक्र अदा करने और खुशियाँ मनाने के लिए रोज़े रखे जाते थे, और इसी नेक रिवाज के तहत नबी ए क़ीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) भी अपनी विलादत के दिन अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए और इस दिन खुशी के इज़हार के लिए रोज़ा रखा करते थे।
🎍( i ) इमाम इब्ने हजर अल अस्कलानी (रहमतुल्लाह अलैह) से नबी ए क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत की याद मनाने के अमले के बारे में पुछा गया, तो आपने जवाब में फरमाया कि “जहाँ तक नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत की याद मनाने की बात है, तो इसकी इब्तिदाह एक बिदअत है जो पिछली तीन सदियों के दीनदार मुसलमानों से हम तक नहीं पहुंची है, बावजूद इसके इसमें दोनों सुरतें शामिल हैं, (एक) वह जो अच्छी है और (दुसरी) वह जो (अच्छी) नही है। अगर इस तरह की याद मनाने में यह ख़याल रखा जाए कि इसमें सिर्फ अच्छी चीजें शामिल हों और बाकी चीज़ों से बचें, तो ये एक 'अच्छी बिदअत' है और जब ऐसा ना किया जाए तो यह नहीं है। पहली बुनियादी असल इबारत मुताबिक जिससे मुझे मज़बुत शरई नतीजा अख़्ज़ (प्राप्त) हुआ है।
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🔆जो सहीह हदीस है और बुखारी और मुस्लिम में दर्ज है कि नबी ए क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मदीना तशरीफ लाए और यहुदीयों को दसवीं मुहर्रम 'आशुरा' का रोज़ा रखते पाया, आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनसे इसके बारे में पुछा तो उन्होंने जवाब दिया कि ‘यह वह दिन है जिसमें अल्लाह ने फिरौन ? (मिस्त्र देश के राजा) को गर्क किया (यानी डुबोया) और मुसा (अलैहिस् सलाम) को वहाँ से निकाला, तो हम इसपर अल्लाह का शुक्र अदा करने के लिए रोज़ा रखते हैं, और अल्लाह सबसे बड़ा है। यह इसकी मजबुत दलील को ज़ाहिर करता है कि अल्लाह की रहमतों पर इसमें फायदा अता फरमाने और तकलीफों को दूर करने के लिए हर साल सालगिराह पर लगातार उस दिन शुक्र अदा करने के लिए किसी भी शक्ल में इबादत की जा सकती है, जैसे- सज्दा करना, रोज़ा रखना, सदका ख़ैरात करना या कुरआन की तिलावत करना। फिर रहमतल्लिल - आलमीन रसूलउल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत के दिन से बढ़कर कौन - सी ने'मत हो सकती है, जिसकी रोशनी में ऊपर के मुसा (अलैहिस् सलाम) के वाक्र्ये और दसवीं मुहर्रम के वाक्ये की बुनियाद पर लोगों को इस दिन { यानी, नबी - ए - क़ीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत के दिन} की याद मनाने का ख्याल रखना चाहिए, जो फर्क नहीं करते हैं वह इस सबब् (रबीउल अव्वल के) महीने के किसी भी दिन इसकी याद मनाते हैं, जबकी कुछ इसके वक्त को और वसीह करते हुए साल के किसी भी दिन (मिलाद) मनाते हैं।
❣️इमाम जलालुद्दीन सुयुती (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते है कि मैंने मिलाद का जायज़ होना सुन्नत (हदीस) के एक दुसरे ममबे (ज़रिए) से अख़्ज़ (प्राप्त) किया है {जोकि इमाम इब्ने हजर अल अस्कूल (रहमतुल्लाह अलैह) की निकाली गई 'आशुरा' वाली हदीस के अलावा है} जो हदीस इमाम अल बयहकी की 'सुनन अल बयहकी' ( जिल्द नम्बर 9, सफा नम्बर 300, हदीस नम्बर 43) में मिलती है, जिसे हज़रत अनस (रदिअल्लाहु ता आला अनहु) ने रिवायत किया है,
कि नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ऐलान - ए - नबुवत के बाद अपना अक़ीका किया, जबकि यह (रिवायतों में) ज़िक्र है कि आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब ने (आपका अकिका) आपकी पैदाइश के सातवें दिन कर दिया था और अकीका दुबारा नहीं किया जाता। इस तरह नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के अमल की वजह अल्लाह का शुक्र अदा करना था कि अल्लाह ने आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सारी दुनियाओं के लिए रहमत बनाकर भेजा, और उनकी उम्मत को इज़्ज़त बख़्शी, उसी तरह जिस तरह से आपने खुद दुआ फरमाई थी। पस यह हमारे लिए लाज़िम है कि हम भी अपने भाईयों के साथ मिलकर, लोगों को खाना खिलाकर और दुसरे नेक काम करके और खुशियाँ मनाकर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विला पर शुक्र का इज़हार करें। यह उस हदीस के मुताबिक़ ही है जिसमें ज़िक्र है कि नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पीर (सोमवर) के दिन पर जोर दिया कि वह आपकी विलादत और नबुवत (यानी वहही के नुज़ूल की शुरुवात) का दिन है।
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🔆 2. हदीस शरीफ :- उर्वा ने रिवायत किया कि सुवैबाह अबु लहब की आज़ाद करदा (रिहा की हुई) गुलाम थी, जिसे उसने आज़ाद किया था, और तब उसने नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को दुध पिलाया था। जब अबु लहब मर गया, उसके रिशतेदारों में से किसी ने उसको ख़्वाब में बहुत बुरी हालत में देखा और उससे पुछा, 'तुम्हारा क्या हश्र हुआ? ' अबु लहब ने कहा, 'जब से मैं तुमसे जुदा हुआ हुँ, मैंने (आज़ाब ए जहान्नम के बाइस) कोई आराम नहीं पाया, सिवाए इसके कि मुझे इसमें {उसके अंगुठे और उंगलियों के दर्मियान (बीच) से पानी पीने को दिया जाता है और वो इसलिए क्योंकि मैंने (मेरे भतीजे मोहम्मद की विलादत पर अपनी गुलाम) सुवैबाह को आज़ाद किया था।
❣️ ( i ) इमाम शम्सुद्दिन दमिशकी (रहमतुल्लाह अलैह) लिखते हैं “यह साबित - शुदा है कि अबु लहब पर जहान्नम का आज़ाब हर पीर के दिन कम कर दिया जाता है, क्योंकि वह नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत पर खुश हुआ था और उस अपनी गुलाम सुवैबाह को आज़ाद किया था। जब अबु लहब, जिसका हमेशा का घर जहान्नम की आग है और जिसके लिए पुरी सूरह तब्बत यदा (यानी सुरह लहब) नाज़िल हुई, वह हर पीर के दिन अपने आहज़ाब में कमी पाता है, तो एक मोमिन (ईमान वाले) का तसव्वुर करें कि वह अपनी पुरी ज़िन्दगी नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत पर खुशियाँ मनाता रहा हो और तौहीद पर वफात पाया हो तो उसकी सुरते- हाल क्या होगी।"
🎍( ii ) शाह अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी (रहमतुल्लाह अलैह) सुवैबाह को आज़ाद करने पर अबु लहब की राहत को ज़िक्र करने के बाद फरमाते है “यह उनको साफ सबूत मुहय्याह कराती है जो नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत की रात को मिलाद शरीफ खुश होकर और ख़ैरात देकर मनाते हैं। मक्काह के लोग 12 रबीउल अव्वल को नबी - ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के उस घर पर इकट्ठा होते हैं जहाँ आपकी विलादत हुई थी। हालाँकि वह (अबु लहब) एक बुत - परस्थ (मुर्ति पुजक) था, लेकिन सिर्फ इसलिए कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उसके भतीजे थे और (वह आपकी विलादत के मौके पर) खुश हुआ था, इस सबब वह अपनी कब्र में हर पीर के दिन (आज़ाब से) राहत पाता है, तो (तसव्वुर कीजिए कि) उसपर और कितनी रहमत उतरेगी जो तज़दीक करेगा कि नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के हबीब ए मुकर्रम हैं और सच्चे रसूल हैं, और जो लगातार मिलाद शरीफ मनाता है।"
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🔆 (iii) मौलाना अब्दुल हयी लखनवी (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते हैं “जब अबु लहब जैसा क़ाफिर नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत पर खुश होने का अजर पा सकता है, तो एक उम्मती जो आपकी विलादत पर खुश होता है और आपकी मोहब्बत में ख़र्च करता है, वह ज़रूर ऊँचा मयार कायम करेगा, वैसे ही जैसे इब्ने जौज़ी (रहमतुल्लाह अलैह) और शेन मुहद्दिस अब्दुल हक देहलवी (रहमतुल्लाह अलैह) ने ज़िक्र किया है।”
❣️ 03. हदीसे पाक़ :- हज़रत अनस बिन मालिक रिवायत करते हैं कि नबी ए क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मेराज का सफर बयान करते हुए फरमाया कि “और उन्होंने {जिब्रईल (अलैहिस् सलाम) ने बेतुल्लहम में} मुझे बुराख्न से उतरने को कहा और मुझे वहाँ नमाज़ पढ़ने को कहा, जिसके बाद उन्होंने कहा { या रसूलउल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)} क्या आप जानते है आपने कहाँ नमाज़ पढ़ी है ? आपने बेतलेहेम में नमाज़ पढ़ी है जहाँ ईसा (अलैहिस् सलाम) की विलादत (पैदाईश) हुई थी।
🎍 इस हदीस से नबी की विलादत की जगह की अहमियत सबित होती है तो तसव्वुर कीजिए कि खुद नबी ए करीम (सल्लल्लाहु नबी - ए - क़रीम अलैहि व सल्लम) की विलादत की अहमियत का आलम क्या होगा।
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★ तीसरा बाब :- अक़वाले आइम्माह की रोशनी में ईद मिलादुन्नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
🔆 01. इमाम जलालुद्दीन सुयुती रहमतुल्लाह अलैह लिखते हैं :- “मिलाद की हकीकत यह है कि लोग अपनी सहुलत के ऐतबार से कुरआन पढ़ने जमा होते है, और उन रिवायतों और निशानियों पर भी गुफ्तगू करते हैं जो नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत के वक़्त जुहूर पज़ीर (ज़ाहिर हुई थीं) फिर उनके लिए खाने का इंतज़ाम किया जाता है और वह इस 'बिदअत अल हसनाह' (अच्छी बिदअत) में बिना कुछ और शामिल किए लौटते हैं। जो इसका इंतज़ाम करते हैं वह नबी - ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के के इज़्ज़तो - मोहब्बत के बाइस सवाब पाते हैं और आपकी विलादत पर शुक्र का इज़हार करते हैं।"
🌹02. इब्ने कसीर शाह मलिक अल - मुज़फ्फर (इस्लाम के अज़ीम मुजाहिद सुल्तान सलाहउद्दीन अय्युबी के बेहनोई) के मुताल्लिक लिखते हैं “वह (शाह मलिक अल - मुज़फ्फर फराख़ दिल , तक़तवर सरबराह, और शानदार हाकिम थे, जिनका काम बहुत ही उम्दा था।
रबीउल अव्वल में वह मिलाद शरीफ बहुत बड़े पैमाने पर मनाया करते, इसके अलावा वह सदक़ा ख़ैरात देने वाले, बहादुर, समझदार, एक आलिम और एक इंसाफ - पसंद शख़्स थे।
शेख अबुल ख़त्ताब (रहमतुल्लाह अलैह) ने उनके लिए ईद मिलादुन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर किताब लिखी और उसका नाम 'अत तनवीर फी मौलिद अल - बशीर अल - नज़ीर' रखा, जिसके लिए उन्होंने उनको हज़ार दीनार दिए।
"अल - सब्त फरमाते हैं कि एक शख़्स ने शाह मलिक अल - मुज़फ्फर की महफिल - ए - मिलाद में शिरकत की, और कहा वो बहुत अच्छे से पके हुए पाँच हज़ार बकरे, दस हज़ार मुर्गे, एक लाख दुध के कटोरे और तीस हज़ार मिठाईयों की थालों से दस्तरख़ान को भर दिया करते थे।”
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★ तीसरा बाब :- अक़वाले आइम्माह की रोशनी में ईद मिलादुन्नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
🔆03. इमाम ज़हबी (रहमतुल्लाह अलैह) शाह मलिक अल मुज़फ्फर (इस्लाम के अज़ीम मुजाहिद सुल्तान सलाहउद्दीन अय्युबी के बेहनोई) के मुताल्लिक़ लिखते हैं “वह (शाह मलिक अल - मुज़फ्फर) सदका को पसंद किया करते थे और (गरीबों और बीमारों के लिए उन्होंने) चार सराए (धर्मशाला) बनाए और (उन्होंने) एक घर औरतों के लिए (बनवाया), एक यतीमों के लिए, एक बेघरों के लिए बनवाया और वह खुद बीमारों को देख जाते थे। उन्होंने शाफईयों (इमाम शाफई के मुकल्लिदों) और हनफियों (इमाम अबु हनीफा के मुकल्लिदों) के लिए मदरसे और सुफियों के लिए ख़ानकाहें बनवाए। उनके मिलाद मनाने के बयान पर अल्फाज़ भी कम पड़ते हैं।
लोग अरब और ईराक़ से इसमें शामिल होने करते। उनके और उनकी ज़ौजा (पत्नियों) के लिए दो लकड़ी की मेजें बनवाई जातीं।
यह जश्न कई दिनों तक चलता और बड़े पैमाने पर बकरे और ऊँट कुर्बानी के लिए लाए जाते और मुख़्तलिफ तरह से बनाए जाते बहुत से पैसे खर्च किये जाते।
इब्ने दिहया अल - कल्बी (शेख अबुल ख़त्ताब) ने उनके लिए मिलाद शरीफ पर कि मुरत्तब की, जिसके लिए उन्हें हज़ार दीनार दिये गए। वह (शाह मलिक अल - मुज़फ्फर) नेक, अच्छी बातों को पसंद करने वाले और एक सच्चे सुन्नी थे जो फिक्ह और हदीस के इमामों का बहुत एहतराम करते थे और शयरों के लिए भी बहुत फराख़ दिल थे। रिवायतों में दर्ज है कि वह जंग में शहीद हुए।"
❣️04. इमाम इब्ने जौज़ी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं “हरमैन (यानी मक्काह और मदीना) में, मिस्त्र में, यमन में बल्कि पुरी अरब दुनिया में हमेशा से ईद मिलादुन् - नबी मनाई जाती रही है। हदों (सीमाओं) को रबीउल अव्वल का चाँद देखते ही उनमें खुशियाँ अपनी छु जातीं और इस सबब वह मिलाद के ज़िक्र की महफिलें मुनक़िद किया करते ताकि इससे वह बहुत ज़्यादा अज्रो- सवाब और कामयाबी हासिल कर सकें।"
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★ तीसरा बाब :- अक़वाले आइम्माह की रोशनी में ईद मिलादुन्नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
🔆05. हज़रत इस्माइल हक्की रहमतुल्लाह अलैह ने फरमाया “मिलाद मनाना नबी ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिए ख्रिराजे अकीदत (मोहब्बत का तोहफा) पेश करने में सबसे अज़ीम (बड़ा) अमल है, लेकिन शर्त यह है कि वह बुरी चीज़ों से पाक हो।
इमाम जलालुद्दीन सुयुती (रहमतुल्लाह अलैह) ने फरमायाः नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत पर खुश होना हमारे लिए मुस्तहब (पसन्दीदा) है।”
❣️06.इमाम क़स्तलानी फरमाते हैं “चाहिए ईमानवालों कि तुम मिलाद - ए - मुस्तफा को ईद के तौर पर मिलाद - ए - मुस्तफा मनाया करो। अल्लाह अपना फज़ल ( इनाम ) और एहसान करे उन लोगों पर जो रबीउल अव्वल की रातों को ईद के तौर पर मनाते हैं, क्योंकि इस महीने को ईद के तौर पर मनाने से उन दिलों पर और उन लोगों पर ग़ज़ब उतरता है जिनके दिलों में बुग्ज़ और मुनाफिकत (पाखण्ड) की बीमारी है।
❣️ इमाम क़स्तलानी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं “जब यह कहा गया कि नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत रात के वक्त हुई तब एक सवाल उठता है कि कौन - सी रात दोनों रातों में बड़ी रात है, यानी शबे केंद्र की रात या नबी ए क़ीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत की रात ? -
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🔆नबी - ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की विलादत रात तीन वजहों से अफज़ल है :
❣️ पहली वजहः आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मिलाद की रात (दुनिया में) तशरीफ लाए, जबकि शबे केंद्र की रात उनको (इसके बाद) अता की गई, इसलिऐ नबी - ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की तशरीफ आवरी अफज़ल है
उससे जो आपको अता किया गया, इसलिए मिलाद की रात फजीलत में ऊपर है।
❣️ दुसरी वजहः- अगर शबे केंद्र की रात फजीलत वली रात है क्योंकि फरिशते इसमें उतरते हैं, तो मिलाद की रात की फजीलत नबी ए करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से है कि आप दुनिया में भेजे गए। नबी - ए - करीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फरिशतों से अफज़ल हैं, इसलिए मिलाद की रात (शबे केंद्र की रात से) अफज़ल है।
❣️ तीसरी वजहः शबे - केंद्र की रात की वजह से मोहम्मद (सल्लल्लाहु लैहि व सल्लम) की उम्मत को फज़ीलत हासिल हुई, जबकि मिलाद की रात की वजह पूरी मखलूक को फजीलत अता फरमाई गई, क्योंकि नबी - ए - क़रीम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सारी दुनिया (यानी सारी मख़लूक) के लिए रहमत बनाकर भेजे गये (अल - कुरआन , 21 : 107), इसलिए पूरी मखलूक के लिए रहमत आम कर दी गई।
📚 हवाला : [इमाम कस्तलानी, अल - मुवाहिब उल - लुदुनिया, जिल्द नम्बर 1, सफा नम्बर 145]
📚 इमाम ज़रकानी, शरह अल मुवाहिब उल लुदुनिया, जिल्द नम्बर 1, सफा नम्बर 255-256]
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