शनिवार, 3 अप्रैल 2021

सलीका ए ज़िंदगी

 


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          _*💞निकाह के फज़ाइल 💞*_


_*✨खालिके कायनात ने मर्दो औरत के दरमियान एक दूसरे की मुहब्बत से सुकून हासिल करने और लुत्फ़ अन्दोज़ होने की जो ख्वाहिश रखी है, उसका नाम 'जिमाअ' है। इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिये शरीअते इस्लामी ने निकाह का तरीका बताया है। निकाह हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की निहायत अहम सुन्नत है। निकाह आपस में उन्सो मुहब्बत, इख्लासो हमदर्दी पैदा होने का सबब है। निकाह से दो अजनबी अफराद रिश्तए इज़्दिवाज में मुन्सलिक हो जाते हैं और एक दूसरे के सच्चे हमदर्द और ज़िन्दगी भर के लिये शरीके हयात बन जाते हैं।*_


_*📓कुर्आन में : - अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है : "तो निकाह मे लाओ जो औरतें तुम्हें खुशआयें।"*_

_( सुरह अन्निसा )_


_*✨और अल्लाह ने तुम्हारे लिए तुम्हारी जिन्स से औरतें बनायीं और तुम्हारे लिए तुम्हारी औरतों से बेटे और पोते और नवासे पैदा किये।"*_

_( सूरह नहल )_


_*📚हदीस न. 1 : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "दुनिया की तमाम चीजें फायदा उठाने के लिए हैं और दुनिया की बेहतरीन फायदा उठाने की चीज़ नेक औरत है।*_


_*📚हदीस न . 2 : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जो मर्द किसी औरत से उसकी इज़्ज़त के सबब निकाह करे,अल्लाह तआला उसकी ज़िल्लत में ज़्यादती करेगा और जो किसी औरत से उसके माल के सबब निकाह करेगा तो अल्लाह तआला उसकी मोहताजी बढ़ायेगा और जो उसके हसब के " सबब निकाह करेगा तो उसके कमीनेपन में ज़्यादती फरमायएगा और जो इसलिए निकाह करे कि इधर उधर निगाह न उठे और पाक दामनी हासिल हो या सिला रहमी करे तो अल्लाह तआल उस मर्द के लिए उस औरत में बरकत देगा और औरत के लिए मर्द में।*_


_*📚हदीस न. 3 : - हज़रत मआज़ बिन जबल रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है : "साहिबे निकाह की नमाज़ बिला निकाह वाले की नमाज़ से चालीस या सत्तर दरजा ज़्यादा अफज़ल है।*_


_*📚हदीस न . 4 :- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जो गुरबत के सबब निकाह न करे वह हम में से नहीं। नीज़ अल्लाह तआला फ़रिश्तों को हुक्म फरमाता है कि उसकी पैशानी पर लिख दो कि ऐ सुन्नते रसूल के छोड़ने वाले ! तुझे किल्लते रिज़्क की बशारत हो।*_


_*📚हदीस न . 5 :- हज़रत जाबिर रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जब तुम में से कोई निकाह करता है तो शैतान कहता है हाय अफसोस इब्ने आदम ने मुझ से अपना दो तिहाई दीन बचा लिया।*_


_*📕सलिक़ -ए- ज़िन्दगी, सफा 7/8*_


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                _*💞निकाह के फवाइद 💞*_


_*✨शरीअते इस्लामिया में निकाह के जरीये मर्द व औरत के दरमियान एक दीनी व मज़हबी लगाव और एक मखसूस कल्बी तअल्लुक पैदा होता है। उनके दरमियान उलफ़त व यगांगत और उखुव्वतो मुहब्बत का माहौल पैदा होता है। दो अजनबी अफराद के दरमियान से अजनबीयत ख़त्म होकर उखुव्वतो मुहब्बत का एक पाकीज़ा रिश्ता पैदा होता है और यह रिश्ता महज़ नफ़सानी और जिन्सी ख्वाहिशात की तकमील का ज़रिया नहीं होता बल्कि इससे मकसूदे असली यह है कि मर्दो औरत के हम - रिश्ता होने से एक कामिल और खुशगवार ज़िन्दगी वजूद में आये और नस्ले इन्सानी का सिलसिला आगे बढ़े। इसलिए रब्बे कायनात ने नौए इन्सान ही से उस का जोड़ा बनाया ताकि दोनों में उलफ़तो मुहब्बत कायम रहे और तख्खलीके इन्सानी का सिलसिला दस्तूर के मुताबिक जारी रहे और नस्ले इन्सानी फलती फूलती रहे। और इन्सान दरिन्दों की तरह ज़िन्दगी न गुज़ार कर फ़रिश्ता सिफत बन जाये और अपने हम - जिन्स से मिलकर तस्कीने कल्ब हासिल करे। निकाह मर्द के लिए सुकूने कल्ब और गुनाहों से बचने का अज़ीम ज़रिया है। निकाह से इन्सान हज़ारों गुनाहों से बच जाता है। बिलखुसूस ज़िना से महफूज़ रहता है। इसी वजह से निकाह को निस्फे ईमान भी कहा गया है।*_


_*📓कुर्आन में : - अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है : "और उसकी निशानियों से है कि तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जिन्स से जोड़े बनाये कि उनसे आराम पाओ और तुम्हारे आपस में मुहब्बत और रहमत रखी।*_

_( सूरह रुम )_


_*📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः "ऐजवानो ! तुम में से जो कोई निकाह की इस्तिताअत रखता है वह ज़रूर निकाह करे कि यह अजनबी औरत की तरफ़ नज़र करने से निगाह को रोकने वाला है और शर्मगाह की हिफाज़त करने वाला है और जिसमें निकाह की ताक़त न हो वह रोज़ा रखे क्योंकि यह शहवतको कम करता है।*_


_*📚हदीस :- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः बन्दे ने जब निकाह कर लिया तो आधा दीन मुकम्मल कर लिया, अब बाकी आधे के लिए अल्लाह से डरे।*_ 


_*📚हदीस : - हज़रत जाबिर से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फरमायाः "औरत आती है शैतान की सूरत में और जाती भी है शैतान की सूरत में, जब तुमको कोई औरत अच्छी लगे और उसका ख्याल दिल में बैठ जाये तो चाहिए कि फ़ौरन अपनी बीवी के पास जाये और उससे मुहब्बत करे क्योंकि यह मुहब्बत उसकी ख्वाहिशे नफ़्सानी को दूर कर देगी।*_


_*📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जब किसी को कोई औरत अच्छी मालूम हो तो चाहिये कि अपने घर जाये और अपनी बीवी के साथ कुरबत करे क्योंकि इस बात में सब औरतें बराबर है।*_


_*📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः "मर्दो औरत के दरमियान जो निकाह के ज़रिये मुहब्बत पैदा होती है, ऐसी कोई मुहब्बत देखने में नहीं आती यानी जो बाहमी मुहब्बत व उलफत निकाह से पैदा होती है उसकी कोई नज़ीर नहीं मिलती।*_


_*📍नोट : - हज़रत इमाम गज़ाली रहमतुल्लाहि अलैहि ने निकाह के बारे में बहुत से फवाइद तहरीर किये हैं , उनमें से बअज़लिखे जाते हैं :*_


_*✨औलाद का हासिल होना, नेक औलाद इन्सान के लिए सदकए जारिया है।*_


_*✨आदमी अपने दीन की हिफाज़त करता है और शहवते नफ़्सानी जो शैतान का हथियार है, अपने से दूर करता है।*_


_*💫इसलिए हुजूर सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया "जिसने निकाह किया उसने अपने निस्फ दीन की हिफाज़त कर ली और जो शख्स निकाह नहीं करता गो फ़र्ज ( शर्मगाह ) को बचा ले लेकिन आँख को बद निगाही और दिल को वसवसे से नहीं बचा सकता।*_


_*💓निकाह की वजह से औरतों से उन्सियतो मुहब्बत होती है, उनके साथ मज़ाहो दिल लगी करने से दिल को राहत होती है और इस आसाईश के ज़रिये शोके इबादत ताज़ा होता है क्योंकि हमेशा इबादत में रहना उदासी लाता है।*_


_*💗औरत घर की गम ख्वारी करती है, खाना पकाने, बर्तन धोने, झाडू देने की खिदमत अन्जाम देती है। अगर मर्द ऐसे कामों में मशगूल होगा तो इल्मो अमल और इबादत से महरूम रहेगा। इसलिए दीन की राह में औरत अपने शौहर की यारो मददगार होती है।*_

_📕( कीमिया - ए - सआदत पेज 255 )_

_*📕सलिक़ -ए- ज़िन्दगी, सफा 8/9/10/11*_


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                💞निकाह के अहकाम 💞


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः "निकाह मेरी सुन्नत है जो मेरी सुन्नत पर अमल न करे वह मेरे तरीके पर नहीं।


📚हदीस :- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जो शख्स अल्लाह तआला के हुजूर तय्यबो ताहिर ( पाक - साफ ) जाना चाहता है तो उसे चाहिये कि आज़ाद औरतों से निकाह करे।


💗निकाह करना सुन्नते अम्बिया अलैहिमुस्सलाम है। जितने अम्बिया ए किराम दुनिया में जलवागर हुए, सभी ने शादियाँ की, हत्ता कि हज़रत यहया अलैहिस्सलाम के बारे में भी हैं की आप ने शादी तो की लेकिन किसी वजह से जिमाअ़  ( हमबिस्तरी ) न किया। इसी तरह हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम भी जब आसमान से नजूल फ़रमायेंगे तो आप शादी करेंगे और आपकी औलाद भी होगी।

📕(तिरमिजी शरीफ जिल्द1 , पेज 128 / रूहुलबयान जिल्द 1 पेज़ 73 )


💗निकाह और उसके हुकूक अदा करने और औलाद की तरबियत मशगूल रहना नवाफिल में मशगूल होन से बेहतर है।


✨मर्द के लिए बअज़ सूरतों में निकाह करना फर्ज़ और बअज सूरतों में वाजिब हो जाता है। मसलन जो आदमी दैन महर और औरत का खर्चा देने पर कुदरत रखता है और उसे यकीन है कि निकाह न करने की सूरत में ज़िना वाके हो जायगा तो उस पर निकाह करना फर्ज इसी तरह जो देन महर और ख़र्चा देने की कुदरत रखता है और उसे शहवत का इतना गलबा हो कि निकाह न करने की सूरत में जिना का अन्देशा है तो उस पर निकाह करना वाजिब है। अगर ऐतिदाल " ( दरमियान ) की हालत हो तो निकाह करना सुन्नते मुअक्कदा है कि निकाह न करने पर मुसिर रहना इसाअत है। अगर आदमी हराम से बचने या इत्तिबाए सुन्नत या औलाद हासिल करने की नियत निकाह कर लेगा तो सवाब भी पायेगा। जो शख्स महज लज्जत या कज़ाये शहवत की नियत से शादी कर ले तो उसके लिये निकाह करना मुबाह है। जिस आदमी को यह यकीन हो कि निकाह कर लेगा तो नानो नफका न दे सकेगा या जो ज़रूरी हुकूक हैं उनको पुरा न कर सकेगा तो उसके लिए निकाह करना हराम है और जिनको इन बातों का अन्देशा हो तो उनके लिए निकाह करना मकरूह है। खुलासा यह है कि बअज़ सूरतों में निकाह करना सुन्नत और बअज़ सूरतों में फर्ज है। न हर सूरत में निकाह करना सुन्नत है और न हर सूरत में फर्ज़ है।

📕( फतावा रिज्विया जिल्द 5 , पेज 581 )

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 11/12


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  ✨किन औरतों से निकाह करना बेहतर है ?✨


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "मुहब्बत करने वाली, ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाली औरतों से शादी करो क्योंकि मैं तुम्हारी वजह से उम्मतों पर फ़खर करूंगा।

📕( मिश्कात शरीफ़ जिल्द 2 , पेज 267 )


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "और न उनसे निकाह करो उनके माल की वजह से कि अनकरीब उनके माल उनको सरकश बना देंगे लेकिन उनसे दीनदारी की वजह से निकाह करो और ज़रूर काली कलूटी, नाक कटी अफ़ज़ल होती है दूसरी खूबसूरत गैर दीनदार औरतों से।

📕( इब्ने माजा पेज 133 )


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "औरतों से महज़ उनके हुस्न की वजह से शादी न करो इसलिए कि जल्द ही उनका हुस्न उनको बर्बाद कर देगा।

📕( इब्ने माजा पेज 133 ) 


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "मोमिन के लिए तकवे के बाद नेक बीवी से बढ़कर कोई चीज़ नहीं कि शौहर उससे जो कहे वह उसकी फरमाबरदारी करे। जब शौहर उसकी तरफ़ देखे तो वह उसको खुश कर दे और अगर शौहर किसी बात पर कसम खाये तो वह उसको पूरी करे और अगर शौहर गायब हो तो उसकी गैर मौजूदगी में अपनी ज़ात और शौहर के माल में खैर ख़्वाही करे।

📕( इब्ने माजा पेज 133 )


✨साहिबे रददुलमोहतार फरमाते हैं : "कुंवारी औरत से और जिससे ज़्यादा औलाद होने की उम्मीद हो, उससे निकाह करना बेहतर है। सन रसीदा (बड़ी उम्र वाली) और बद खुल्क (बुरे अखलाक वाली) और ज़ानिया से निकाह न करना बेहतर है।

📕( रदुलमोहतार जिल्द 2, पेज 269 )


💫साहिबे गुनिय्या फरमाते हैं : "निकाह के लिए ऐसी औरत का इन्तिखाब करे जो आली नसब हो और ऐसी औरतों में से हो जो कसीरून्नस्ल मशहूर हैं। 

📕( गुनिय्या पेज 111 )


✨आलाहज़रत फरमाते हैं : "रज़ील कौम से निकाह न करे कि बुरी रग ज़रूर रंग लाती है। दीनदार लोगों में शादी करे कि बच्चे पर नाना, मामू की आदतों और हरकतोंका भी असर पड़ता है। 

📕( फतावा रज़विया जिल्द 9, पेज 46 )


💫इमाम गज़ाली फरमाते है : " औरत अच्छे नसब वाली शरीफुन्नफ्स हो यानी ऐसे खानदान से तअल्लुक रखती हो जिसमें दयानत और नेक बखती पाई जाये क्यों कि ऐसे खानदान की औरत अपनी औलाद की तालीमो तरबियत का एहतिमाम करती है। 

📕( अहयाउल उलूम जिल्द 2, पेज 42 )


इमाम गज़ाली फरमाते हैं : अगर कोई शख्स किसी ऐसी लड़की से निकाह करे जो अपने साथ खूब मालो दौलत लेकर आये और हसीनो जमील भी हो लेकिन दीनदार न हो तो आप उनके साथ अच्छी और खुशहाली की ज़िन्दगी नहीं गुज़ार सकते। ऐसी औरत से हमेशा घर में झगड़ा और खाना जंगी का माहौल रहता है। नतीजतन मां - बाप से अलैहदा होना पड़ता है। इसलिए जहाँ आप खूबसूरती और मालो दौलत को देखते हैं, वहीं लड़की का तहज़ीबो तमद्दुन, अखलाको किरदार और ख़ानदान को ज़रूर देखिए। तब ही आप एक कामयाब ज़िन्दगी गुज़ार सकते हैं। 


इसलिए हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया 'जो कोई हुस्नो जमाल या मालो दौलत की ख़ातिर किसी औरत से निकाह करेगा तो दोनों से महरूम रहेगा और दीन के लिए निकाह करेगा तो दोनों मकसद पूरे होंगे।

📕(कीमिया ए सआदत पेज 260)

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 13/14/15


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 ✨किन औरतों से निकाह करना बेहतर है ?✨


✨इमाम गज़ाली फ़रमाते हैं कि निकाह करने में औरतो में मुन्दरिजा जेल ( निम्नलिखित ) सिफ़ात देखनी चाहिए :


💫( 1 ) औरत पारसा और दीनदार हो ।

💫( 2 ) उसकी आदत और मिज़ाज अच्छे हों , खुश खुल्क और हंस मुख हो क्योंकि बद मिज़ाज औरत नाशुक्री और ज़बान दराज़ होती है और बात - बात पर झगड़ा करती और बुरा भला कहना शुरू कर देती है ।

💫( 3 ) औरत खूबसूरत और हसीन हो क्योंकि जितनी हसीन होगी , मर्द को उतनी ही उसके साथ मुहब्बतो उलफ़त होगी ।

💫( 4 ) मेहर कम हो क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया " औरतों में वह औरत बहुत अच्छी है जिसका मेहर कम हो ।

💫( 5 ) औरत बांझ न हो क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया " पुराना बोरिया जो घर के कोने में पड़ा हुआ हो वह बांझ औरत से ज़्यादा बेहतर है ।

💫( 6 ) औरत नौजवान और कुंवारी हो क्योंकि ऐसी औरत को खाविन्द ( शौहर ) से ज़्यादा मुहब्बत होगी ।

💫( 7 ) औरत अच्छे और दीनदार खानदान की हो क्योंकि बद दीन घराने की औरत के अखलाको आदात और चालो चलन अच्छे नहीं होते ।


📕( कीमिया एसआदत पेज 260 )


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः " घूरे की हरयाली से बचो । " आप से पूछा गया , " घूरे की हरयाली क्या है ? " आपने फ़रमाया , " बुरी नस्ल में खूबसूरत औरत से ।

📕( अहयाउल उलूम जिल्द 2 पेज 42 )


✨कभी ऐसा होता है कि औरत खूबसूरत तो होती है मगर परहेज़गार व पारसा नहीं होती । बद मिज़ाज , ना शुक्रगुज़ार , ज़बान दराज़ होती है और मर्द पर बेवजह हुकूमत करती है । ऐसी औरत के साथ ज़िन्दगी गुज़ारना बद मज़ा और तल्ख होकर रह जाती है और साथ ही साथ दीन में भी खलल पड़ जाता है ।


📚हदीसः - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " अच्छी नस्ल में शादी करो कि रगे खुफ़या अपना काम करती ‌।

📕( अहया उल उलुम जिल्द 2 , पेज 42 )

 

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 15/17


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 ✨किन औरतों से निकाह करना बेहतर है ?✨


📚हदीस : - हज़रत अबु हुरैरह रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " चार वज्हों से औरतों से निकाह किया जाता है :


💫( 1 ) मालदारी ‌।

💫( 2 ) शराफ़ते खानदान ‌‌।

💫( 3 ) खूबसूरती ‌।

💫( 4 ) दीनदारी | लेकिन तुम दीनदार औरत को इख्तियार करो यानी आमतौर पर लोग औरत के मालो जमाल और ख़ानदान पर नज़र रखते हैं । इन ही चीज़ों को देखकर शादी करते हैं मगर तुम दीनदारी औरत की तमाम चीज़ो से पहले देखो ।


✨इस हदीस से मालूम हुआ कि दीनदार औरत से शादी करना बेहतर है । दीनदार औरत शौहर की फ़रमांबरदार और खिदमतगार होती है । थोड़ी रोज़ी पर कनाअत कर लेती है । शौहर की ऐब जोई नहीं करती है । इसके बरखिलाफ दीन से दूर औरतें नाशुक्रगुज़ार , नाफरमान और शौहर की दूसरों के सामने बुराई बयान करने वाली होती हैं ।


✨इमाम गज़ाली फरमाते है : " औरत की तलब दीन के लिए ही करनी चाहिए , जमाल लिए के नहीं । इसका मतलब यह है कि सिर्फ खूबसूरती के लिए निकाह न करे न यह कि खूबसूरती ढूंडे ही नहीं । अगर निकाह करने से सिर्फ औलाद हासिल करना और सुन्नते नबवी पर अमल करना ही किसी शख्स का मकसद है , खूबसूरती नहीं चाहता तो यह परहेज़गारी है ।

📕( कीमिया ए सआदत पेज 260 )


🔥फ़ासिक आदमी मुत्तकी की लड़की का कुफू नहीं अगरचे वर लड़की खुद मुत्तकिया न हो । लिहाज़ा सुन्नी औरत का कुफू वह बद मज़हब नहीं हो सकता जिसकी बद मज़हबी अगरचे हदे कुफ्र तक न पहुँची हो और बद मज़हब ऐसे हों कि उनकी बद मज़हबी हद्दे कुफ्र तक पहुंच चुकी हो तो उनसे निकाह नहीं हो सकता कि वे मुसलमान ही नहीं , कुफू होना तो बड़ी बात है । जैसे आजकल के देवबन्दी , वहाबी , राफ़ज़ी वगैरह ।

📕( बहारे शरीअत हिस्सा7 , पेज 46 )


✨सुन्नी मर्द या औरत का राफ़ज़ी , वहाबी , देवबन्दी , कादयानी , नेचरी , चकड़ालवी वगैरह जितने मुरतदीन हैं , उनके मर्द औरत में से किसी से निकाह नहीं होगा । अगर निकाह किया तो निकाह बातिल होगा , उनसे हमबिस्तरी खालिस ज़िना होगा और औलाद वलज्जिना होगी ।

📕( अलमलफूज हिस्सा 2 , पेज 107 )


📚हदीसः - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः " जब तुम्हारे पास किसी दीनदार बाअखलाक लड़के का रिश्ता आये तो तुम उस रिश्ते को कबूल कर लो वरना ज़मीन में फितने और बड़े - बड़े फ़साद ज़ाहिर होंगे यानी अगर ऐसे आदमी से निकाह न करोगे बल्कि मालदार जगह तलाश करोगे तो ऐसी सूरत में बहुत सी लड़कियाँ और बहुत से लड़के बिला शादी के रह जायेंगे जिसके बाइस दुनिया में ज़िना की कसरत हो जायेगी ।


📕( तिर्मिज़ी शरीफ़ जिल्द1 , पेज 126 )

 

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 17/18/19


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                💞निकाह का पैगाम 💞


✨जब किसी लड़की या औरत से शादी करने का इरादा हो तो उसे शादी का पैगाम देने से पहले मालूम कर लेना बेहतर है कि उसके लिये किसी और शख्स ने पहले से पैगाम तो नहीं दिया है या किसी से रिश्ते की बात चीत तो नहीं चल रही है । अगर ऐसा है तो उस लड़की के लिए निकाह का पैगाम हरगिज़ न दे । ऐसी हालत में निकाह का पैगाम देना सख्त मना है ।


📚हदीसः - हज़रत अबु हुरैरा व हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रदियल्लाहु तआला अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " कोई शख्स अपने इस्लामी भाई के पैगाम पर अपने निकाह का पैगाम न दे । यहाँ तक कि पहला खुद इरादा तर्क कर दे या उसे पैगाम भेजने की इजाज़त दे दे ।

📕( बुखारी शरीफ़ जिल्द 2 , पेज 772 )


        💞शादी से पहले लड़की को देखना 💞


📚हदीसः - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः " जब तुम में से कोई किसी औरत को निकाह का पैगाम दे तो अगर उसको देखना मुमकिन हो तो देख ले ।*

📕( अबु दाऊद जिल्द 1 , पेज 284 )


📚हदीस : - हज़रत मुगीरा बिन शोअबा से मरवी है , फरमाते हैं , मैंने एक औरत को निकाह का पैगाम दिया , मुझ से रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया " क्या तुमने उसे देख लिया है ? " में ने कहा " नहीं । " फ़रमाया " उसे देख लो कि देखना तुम्हारी आप की दाइमी मुहब्बत का ज़रिया है ।

📕( तिर्मिजी शरीफ़ जिल्द 1 , पेज 129)


📚हदीस : - हज़रत मुहम्मद बिन सल्लमा फरमाते हैं कि मैंने एक औरत को निकाह का पैगाम दिया , मैं उसे देखने के लिए उसके बाग में छिप कर जाया करता था , यहाँ तक कि मैंने उसे देख लिया । " किसी ने आपसे कहा " आप ऐसा काम क्यों करते हैं ? हालांकि आप हुजूर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम के सहाबी हैं ' मैंने उसे जवाब दिया कि हमने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इरशाद फ़रमाते सुना है : " जब अल्लाह तआला किसी के दिल में किसी औरत से निकाह की ख्वाहिश डाले और वह उसे पैगामे निकाह दे तो उसकी जानिब देखने में कोई हरज नहीं ।

📕( इब्ने माजा पेज 134 )


📚हदीस : - हज़रत आयशा रदियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि हजरत जिब्राईल अलैहिस्सलाम मेरी तस्वीर सुर्ख रेशम के कपड़े में लपेट कर हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास लेकर आये और आपसे फरमाया यह आपकी अहलिया हैं दुनिया और आख़िरत में ।


📕( तिर्मिजी शरीफ़ जिल्द 2 , पेज 226)

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 19/20


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     💞शादी से पहले लड़की को देखना 💞


📖मसअलाः - जिस औरत से निकाह करने का इरादा हो तो पैगाम डालने से कब्ल उसको देख लेना मुस्तहब है क्योंकि देखने के बाद अगर दिल को भा गई तो निकाह के बाद मुहब्बत ज़्यादा होगी ।


✨हज़रत इमाम गज़ाली अलैहिर्रहमा फरमाते हैं : " औरत का जमाल मुहब्बतो उलफत का ज़रिया है । इसलिये निकाह करने से पहले औरत को देख लेना सुन्नत है । बुजुर्गों का कौल है कि औरत को देखे बगैर जो निकाह होता है उसका अन्जाम परेशानी और गम है ।

📕( कीमिया ए सआदत पेज 260 )


✨साहिबे गुनिय्या फरमाते है : " मुनासिब है कि निकाह से पहले औरत का चेहरा और ज़ाहिरी बदन यानी हाथ मुँह वगैरह देख ले ताकि बाद में नफरत या तलाक की नौबत न आये ।

📕( गुनिय्यतुत्तालिबीन 112 )


📖मसअला : - मर्द का अजनबीया औरत की तरफ़ बिला ज़रूरत नज़र करना जाइज़ नहीं लेकिन उस औरत से निकाह करने का इरादा है तो इस नियत से देखना जाइज़ है । हदीस शरीफ़ में है जिस औरत से निकाह करना चाहे उसको देख ले कि यह बकाये मुहब्बत का ज़रिया है । इसी तरह औरत उस मर्द को देख सकती है जिसने उसके पास निकाह का पैगाम भेजा हो ।*

📕( रद्दुलमोहतार जिल्द5 , पेज 258 बहारे शरीअत हिस्सा 16 , पेज 79 )


              💖निकाह के औकात💖


💫जुमेरात या जुमा को निकाह करना मुस्तहब है । सुबह के बजाये शाम के वक़्त यानी बादे असर करना औला व अफ़ज़ल है । जुमे के दिन निकाह करना बाइसे बरकत है । हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का निकाह हज़रत हव्वा से , हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम का निकाह हज़रत जुलैख़ा से , हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का निकाह सफूरा से , हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का निकाह बिलकीस से और हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का निकाह हज़रत ख़दीजतुल कुबरा व हज़रत आयशा सिददीक़ा रदियअल्लाहु अन्हा से जुमे के दिन हुआ ।


📕( तफ़सीरे नईमी , पारा 11 , पेज 171 )

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 20/21


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  ✨किन औरतों से निकाह करना मना है ?


📓कुर्आन में : - अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है : "हराम हुई तुम पर तुम्हारी माऐं और बेटियां और बहनें और फूफियां और ख़ालाऐं और भतीजियां और भांजियां और तुम्हारी माऐं जिन्होनें दूध पिलाया और दूध की बहनें और औरतों की माऐं।

( सूरह अल - निसा )


✨इस आयते करीमा से मालूम हुआ कि माँ, बेटी, बहन, फूफी, खाला, भतीजी, भांजी, रज़ाई माँ, रज़ाई बहन, सास वगैरह से निकाह हराम है।


📖मसअलाः - माँ सगी हो या सौतेली, बहन सगी हो या सौतेली बेटी, पोती, नवासी, नानी, दादी ख़्वाह कितनी पुश्तों का फ़ासिला हो इन सब से निकाह हराम है।


📖मसअला :- फूफी, फूफी की फूफी, खाला, ख़ाला की ख़ाला, भतीजी,भान्जी और भान्जी की लड़की या उसकी पोती,नवासी भी मुहरमात में दाखिल हैं। इन सब से भी निकाह हराम है।


📖मसअलाः - ज़िना से पैदा हुई बेटी, पोती, बहन, भतीजी, भान्जी भी मुहरमात में दाखिल हैं। इन से भी निकाह हराम है।

📕( बहारे शरीअत हिस्सा 7 , पेज 19 )


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " तहक़ीक कि रज़ाअत यानी दूध के रिश्तों से भी वही हराम हो जाते हैं जो विलादत से हराम होते हैं ।

📕( मुस्लिम शरीफ़ , जिल्द1 , पेज466 )


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः " दूध के रिश्तों से वही हराम हो जाते हैं जो नसब से हराम होते हैं ।


📕( इब्ने माजा , पेज 138 )


✨यानी किसी बच्चे ने अगर किसी औरत का दूध पिया तो वह और उस बच्चे की माँ हो जायेगी और उसका शौहर जिस से औरत का दूध उतरा , दूध पीने वाले बच्चे का बाप हो जायेगा और उस औरत व तमाम औलादें उसके भाई बहन हो जायेंगे और उन से निकाह हराम हो जायेगा जैसा कि नसब में हराम है ।

 

 📕( बहारे शरीअत हिस्सा 7 , पेज 30 )

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 21/22-


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  ✨किन औरतों से निकाह करना मना है ?


📍नोटः - बच्चे के दूध पीने का ज़माना दो साल तक है जो ख़्वाह अपनी माँ का पिये या दाई का। दो साल के बाद दूध का पिलाना हराम है लेकिन निकाह हराम होने के लिए ढाई साल का ज़माना है यानी अगर कोई अजनबिया औरत किसी पराये बच्चे को ढाई साल के अन्दर दूध पिलायेगी तो हुरमते रज़ाअत साबित हो जायेगी और अगर इसके बाद पिलायेगी तो हुरमते निकाह साबित नहीं होगी, अगरचे पिलाना हराम है।

📕( बहारे शरीअत हिस्सा 7 , पेज 29 )


📖मसअलाः - ज़ौजा - ए - मौतू की लड़कियाँ , जीजा की माँ , दादीयां , नानियां , बाप , दादा वगैरह उसूल की बेटियां , बेटे , पोते वगैरहहुमा फुरूअ की बीबियां , इनसे निकाह हराम है ।

📕( आम्म - ए - कुतुब )


📖मसअलाः - जिस औरत से ज़िना किया उसकी माँ और लड़कियां उस पर हराम हैं । यूंही वह ज़ानिया औरत उस शख्स के बाप दादा और बेटों पर हराम है । उनसे निकाह नहीं हो सकता । यूंही मर्दो औरत में से किसी ने एक दूसरे को शहवत के साथ छुआ तो उससे हुरमते मुसाहरत साबित हो जायगी यानी औरत की माँ और लड़कियाँ मर्द पर और मर्द के बाप दादा औरत पर हराम हो जायेंगे ।

📕( हिदाया जिल्द 2 , पेज 289 बहारे शरीअत हिस्सा 7 , पेज 28 )


📖मसअलाः - जिस औरत को ज़िना का हम्ल ( गर्भ ) है तो जानी व गैर जानी , दोनों से बे वज्ए हम्ल ( गर्भपात कराये बगैर ) निकाह दुरूस्त है कि ज़िना के पानी की शरीअत में अस्लन कोई हुरमतो इज्जत नहीं , मगर फर्क इतना है कि अगर खुद ज़ानी ही ने निकाह कर लिया तो उससे वती भी जाइज़ है और अगर दूसरे ने निकाह किया तो जब तक वज़ए हम्ल न हो जाये हाथ नहीं लगा सकता ।

📕( फतावा रज़विया जिल्द 5 , पेज 225 )


📚हदीसः - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " कोई शख्स भतीजी और उसकी फूफी को , भान्जी और उसकी ख़ाला को निकाह में जमा न करे ।


📚हदीस : " हुजूर सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम ने भतीजी और फूफी भांजी और खाला को निकाह में जमा करने से मना फरमाया ।

📕( मुस्लिम शरीफ़ जिल्द 1 , पेज 452 )


✨औरत की बहन चाहे सगी हो या रज़ाई , बीवी की खाला चाहे सगी हो या रज़ाई , इन सब से बीवी की मौजूद में निकाह हराम हैं । यूही अगर बीवी को तलाक दे दी हो तो जबतक उसकी इददत खत्म न हो जाये उसकी बहन , फूफी , ख़ाला वगैरह से निकाह बातिल है ।


📖मसअलाः - चार औरतों के निकाह में होते हुए पांचवीं से निकाल बातिल है ।

📕( आम्म - ए - कुतुब )


📖मसअलाः - हिजड़ा जिसमें मर्द व औरत दोनों की अलामतें ( निशानियां ) पाई जायें और यह साबित न हो कि मर्द है या औरत , उससे न मर्द का निकाह हो सकता है , न औरत का । अगर किया गया तो निकाह बातिल होगा ।


📖मसअला : - मर्द का परी से या औरत का जिन से निकाह नहीं हो सकता ।


📕( बहारे शरीअत हिस्सा7 , पेज 5 )

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 22/23


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            ✨दूल्हा, दुल्हन को सजाना ✨


💗शादी ब्याह के मौके पर दूल्हा को आरास्ता करना और उसके सर पर सेहरा सजाना मुबाह है । इसमें कोई हरज नहीं । रहा दुल्हन को सजाना , उसको जेवरात से आरास्ता करना और हाथ पांव में मेंहदी लगाना मुस्तहब और कारे सवाब है कि यह औरत के लिए ज़ीनत है।

📚हदीस : - सरकारे दो जहाँ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः " औरतों को चाहिए कि हाथ पांव पर मेंहदी लगायें ताकि मर्दो के हाथ से मुशाबह न हों ।


💫एक हदीस पाक में इरशाद हुआः " ज़्यादा न हो तो नाखुन ही रंगीन रखे । मर्द के लिए हाथ पांव में बल्कि नाखुन ही में मेंहदी लगाना हराम है ।

📕( फतावा रजविया जिल्द9 , पेज 412 )


   🤲🏻दूल्हा , दुल्हन को सजाते वक़्त की दुआ🤲🏻


✨दुल्हन को जो औरतें सजायें , उन्हें चाहिए कि वे दुल्हन को दुआएं दें ।


📚हदीस : - उम्मुलमोमेनीन हज़रत आयशा सिद्दीका रदियल्लाहु अन्हा फ़रमाती हैं कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से जब मेरा निकाह हुआ तो मेरी वालिदा माजिदा मुझे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दौलत कदे पर लायीं , वहाँ अन्सार की कुछ औरतें मौजूद थीं । उन्होंने मुझे सजाया और यह दुआ दी "

٠عَلًی الْخَیْرِ وَالْبَرْ کَۃِ وَعَلٰی خَیْرِ طَائِرٍ٠

अलल खैरि वल बरकति व अला खैरि ताइरिन "

📕( बुख़ारी शरीफ़ जिल्द 2 , पेज 775 )


✨इसी तरह दूल्हा को सजाते वक़्त उसके दोस्तो अहबाब को चाहिए कि यही दुआ दें ।


         💖दूल्हा , दुल्हन को मुबारकबाद 💖


💗शादी होने के बाद दूल्हा को उसके दोस्तो अहबाब और दुल्हन को उसकी सहेलियाँ मुबारकबाद और बरकत की दुआ दें , यह बेहतर है ।


📚हदीस : - जब कोई शख्स निकाह करता तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम उसको मुबारकबाद देते हुए उसके लिए दुआए खैर फ़रमाते ।

٠بَارَکَ اللّٰهُ لَکَ وَبَارَکَ عَلَیْکَ وَجَمَعَ بَیْنَکُمَافِیْ خَیْرٍ٠

बारकल्लाहु लक वबारक अलैक वजमअ़ बैनकुमा फी खेरिन ।


📝तर्जुमाः - " अल्लाह तआला तुम्हें मुबारक करे और तुम पर बरकत नाज़िल करे और तुम दोनों में भलाई रखे । " ( अब और तुम पर बरकत ।


📕( अबु दाऊद पेज 290 )

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  24/25/26


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                 💗रूखसती का बयान 💗


✨जब कोई शख्स अपनी लड़की की शादी करे तो रूखसती वक़्त अपनी लड़की को अपने पास बुलाये । इसके बाद एक प्याले थोड़ा सा पानी लेकर यह दुआ पढ़कर प्याले में दम करे : 

٠اَللّٰہُمَّ اِنّ‌ِیْ اُعِیْذُ ھَابِکَ وَذُرّ‌ِ یَّتَهَا مِنَ الشَّیْطٰنِ الرَّجِیْمِ٠

अल्लाहुम्मा इन्नी अउईजु हाबिक व जुर्रियतहा मिनश्शेतानिर्रजीम "


📚तर्जमा : - ऐ अल्लाह ! में इस लड़की को और इसकी होने वाली औलाद को तेरी पनाह में देता हूँ शैतान मरदूद से। फिर उस पानी को दुल्हन के सर और सीने और पीठ पर छींटे मारे , इसके बाद दूल्हा को भी बुलाए और प्याले में दूसरा पानी लेकर यह दुआ पढ़कर दम करे :

٠اَللّٰہُمَّ اِنّ‌ِیْ اُعِیْذُہٗ بِکَ وَذُرّ‌ِ یَّتَهٗ مِنَ الشَّیْطٰنِ الرَّجِیْمِ٠ 

अल्लाहुम्मा इन्नी उईजुहू बि क व जुर्रियतहू  मिनश्शेतानिर्रजीम" फिर दुल्हा के सर और सीने और पीठ पर छींटे मारे और इसके बाद रूखसत करे।

📕( हिस्ने हसीन पेज 249 )


💫दुल्हन जब सुसराल पहुंचे तो सुसराल वालों को चाहिए कि नई दुल्हन का पांव धोकर पानी को मकान के चारों तरफ छिड़के कि यह मुस्तहब और बाइसे बरकत है।

📕 ( फतावा रज़विया जिल्ट 1 , पेज 455 )


              ✨शबे ज़िफाफ के आदाब ✨


💫जब दूल्हा दुल्हन के पास जाये तो सबसे पहले दूल्हा - दुल्हन दोनों वुजू करें , फिर दो रकअत नमाजे शुकरान पढ़ें। अगर दुल्हन हैज़ की। हालत में हो तो नमाज़ न पढ़े लेकिन दूल्हा ज़रूर पढ़े। हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रदियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि एक शख्स ने उनसे बयान किया कि मैंने एक जवान लड़की से निकाह कर लिया है और मुझे अन्देशा है कि वह मुझे पसन्द नहीं करेगी। हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रदियल्लाहु अन्हु ने फ़रमायाः "मुहब्बतो उल्फ़त खुदा की तरफ़ से होती है और नफ़रत शैतान की तरफ से । जब तुम अपनी बीवी के पास जाओ तो सबसे पहले उससे कहो कि वह तुम्हारे पीछे दो रकअत नमाज़ पढ़े । इन्शा अल्लाह तुम उसे मुहब्बत करने वाली और वफ़ा करने वाली पाओगे ।

📕( गुनिय्या पेज 115 )


         🤲🏻शबे ज़िफाफ की खास दुआ 🤲🏻


✨नमाज़ अदा करने के बाद दूल्हा अपनी दुल्हन की पैशानी के ऊपर के थोड़े से बालों को अपने सीधे हाथ से नरमी के साथ महब्बत भरे अन्दाज़ में पकड़े और यह दुआ पढ़ेः

٠اَللّٰہُمَّ اِنّ‌ِیْ اَسْئَلُکَ مِنْ خَیْرِ ھَاوَ خَیْرِ مَا جَبَلْتَهَا عَلَیْهِ وَاَعُوْذُبِکَ مِنْ شَرّ‌ِ ھَاوَشَرّ‌ِ مَا جَبَلْتَهَا عَلَیْهِ ٠

अल्लाहुम्मा इन्नी असअलु क मिन खैरिहा व खैरि मा जबलतहा अलैहि व अऊजु बि क मिन शर्रि हा व शर्रि मा जबलतहा अलैहि " ।


📝तर्जुमा :- ऐ अल्लाह ! मैं तुझ से इसकी भलाई और इसके । अखलाक की भलाई का सवाल करता हूँ और इसके अब आदात के शर से तेरी पनाह चाहता हूँ ।

📕( अबू दाऊद शरीफ़ पेज 293 )


🕋अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त दो रकअत नमाज़ और इस दुआ को  पढ़ने की बरकत से मियां - बीवी के दरमियान इत्तिहादो इत्तेफाक और मुहब्बत कायम रखेगा और अगर औरत में कोई कमी व बुराई होगी तो उसे दूर फ़रमा कर उसके ज़रिये नेकी फैलायेगा और औरत हमेशा शौहर की ख़िदमत गुज़ार और फ़रमां बरदार रहेगी ।

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  26/27/28


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             💗शौहर के हुकूक 💗


📓कुर्आन में :- अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है : "मर्द अफ़ज़ल हैं औरतों पर।

(सूरह अलनिसा) 


📚हदीस :- हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने औफा रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलल्लाह सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम ने फरमाया : "अगर मैं किसी को हुक्म करता कि गैर खुदा के लिए सजदा करे तो हुक्म देता कि औरत अपने शौहर को सजदा करे। कसम है उसकी जिसके कब्ज - ए - कुदरत में मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की जान है, औरत अपने परवरदिगार का हक़ अदा न करेगी, जबतक शौहर के कुल हक अदा न करे। 

📕( इब्ने माजा पेज 133 )


📚हदीस :- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः "औरत पर सब आदमियों से ज़्यादा हक़ उसके शौहर का है और मर्द पर उसकी माँ का। 


📚हदीस :- हज़रत मआज़ बिन जबल रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः "औरत मज़ा न पायेगी जब तक कि शोहर का हक अदा न करे।

📕( बहारे शरीअत हिस्सा 7 , पेज 89 , 90 )


🕋अल्लाह तआला ने शौहरों को बीवियों पर हाकिम बनाया है और उसे बहुत बड़ी फ़ज़ीलतो बुर्जुगी दी है । इसलिए हर औरत पर फ़र्ज़ है कि वह अपने शौहर का हर हुक्म माने और खुशी बख़ुशी अपने शौहर के हर हुक्म की ताबेदारी करे । याद रखो ! शौहर को राजी व खुश रखना बहुत बड़ी इबादत है और शौहर को नाखुश और नाराज़ रखना बहुत बड़ा गुनाह है । हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने यह भी फ़रमाया है कि " जिस औरत को मौत ऐसी हालत में आये कि मरते वक़्त उसका शौहर उससे खुश हो तो वह औरत जन्नत में जायेगी और यह भी फ़रमाया है कि जब कोई मर्द अपनी बीवी को अपनी हाजत पूरी करने के लिए बुलाये तो उसे फ़ौरन जाना चाहिए ख्वाह वह तनूर ही पर क्यों न हो । दूसरी हदीस में है अगर तुम में से कोई अपनी बीवी को बिस्तर पर बुलाये और वह न आये और उसका शोहर तमाम रात गम और गुस्से में बसर करे तो फ़रिश्ते सुबह तक उस औरत पर लानत भेजते रहते हैं ।


📕( तिरमिजी जिल्द 1 , पेज 138 )


📚हदीस शरीफ़ का मतलब यह है कि औरत को चाहिए कितने भी ज़रूरी काम में मशगूल हो शौहर के बुलाने पर सब कामों को छोड़ कर शौहर की ख़िदत में हाज़िर हो जाय ।


📚हदीस : - हज़रत अबु हुरैरह रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " जो औरत अपने शौहर को उसके काम यानी जिमाअ से रोक देती है , उस पर दो कीरात गुनाह होता है और जो मर्द अपनी औरत की हाजत पूरी नहीं करता उस पर एक कीरात  गुनाह होता है । 

📕( गुनिय्या पेज 116 )

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  28/29/30


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                   💗शौहर के हुकूक 💗


📚हदीसः - हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहु अन्हुमा से मरवी के रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "शौहर का हक़ औरत पर यह है कि अपने नफ़्स को उससे रोके और सिवाय फ़र्ज़ के किसी दिन उसकी इजाज़त के बगैर रोज़ा न रखे। अगर ऐसा किया यानी बगैर इजाज़त रोज़ा रख लिया तो गुनाहगार होगी और उसकी इजाज़त के बगैर औरत का कोई अमल मक़बूल नहीं। अगर औरत ने कर लिया तो शौहर को सवाब है और औरत पर गुनाह। जो औरत अपने घर से बाहर जाय और उसके शौहर को नागवार हो, जब तक पलट कर आये आसमान में हर फ़रिश्ता उस पर लानत करे और इन्सानो जिन के सिवा जिस - जिस चीज़ पर गुज़रे सब उस पर लानत करें।

📕( फ़तावा रज़विया जिल्द 9 , पेज 197 बहारे शरीअत हिस्सा 7 , पेज 91 ) 


📚हदीस :- एक शख्स ने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि " बेहतरीन औरत की क्या पहचान है ? ' 'आपने इरशाद फ़रमायाः " जो औरत अपने शौहर को खुश कर दे जब उसकी तरफ़ देखे और उसकी इताअत व फ़रमां बरदारी करे जब कोई हुक्म दे ।


📕( निसाई जिल्द 2 ; पेज 60 )


✨इन हदीसों से सबक़ मिलता है कि शौहर का बहुत बड़ा हक़ है और हर औरत पर अपने शौहर का हक़ अदा करना ज़रूरी है । जिनके अदा न करने पर मर्द औरत का खर्चा बन्द कर सकता है । शौहर के हुकूक बहुत ज़्यादा हैं , कुछ नीचे लिखे जाते हैं :


💫( 1 ) औरत पर शौहर का हक़ यह है कि उसके बिछौने को न छोड़े और ऐसे शख्स को मकान में न आने दे जिसका आना शौहर को पसन्द न हो ।

💫( 2 ) शौहर की इजाज़त के बगैर घर से बाहर न जाय ।

💫( 3 ) अपने शौहर की इताअत गुज़ार और वफ़ादार हो ।

💫( 4 ) सलीका शिआर हो कि शौहर के मालो दौलत की हिफ़ाज़त करे ।

💫( 5 ) इफ़्फत मआब हो कि अपनी और अपने शौहर की इज़्ज़तो नामूस पर आंच न आने दे ।

💫( 6 ) औरत हरगिज़ - हरगिज़ कोई ऐसा काम न करे जो शौहर को नापसन्द हो ।

💫( 7 ) औरत को लाज़िम है कि मकान , सामान और अपने बदन और कपड़ों की सफ़ाई सुथराई का ख़ास तौर से ख्याल रखे । फूहड़ , मैली , कुचैली न रहे बल्कि बनाव सिंगार से रहा करे ताकि शौहर उसको देख कर खुश हो जाय ।

💫( 8 ) शौहर को कभी जली कटी बातें न सुनाये , न कभी उसके सामने गुस्से में चिल्ला - चिल्ला कर बोले , न उसकी बातों का कड़वा तीखा जवाब दे , न कभी उसको तअना दें , न उसकी लाई हुई चीज़ों में ऐब निकाले , न शौहर के मकानो सामान वगैरह को हक़ीर बताये ।

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  30/31


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                🌹बेहतरीन बीवी वह है 🌹


🥀(1) जो अपने शौहर की फरमा बरदारी और ख़िदमत गुज़ारी को अपना फर्जे मनसबी समझे।


🥀(2) जो अपने शौहर के तमाम हुकूक अदा करने में कोताही न करे ।


🥀(3) जो अपने शौहर की खूबियों पर नज़र रखे और उसके ड्यूब और खामियों को नज़र अन्दाज़ करती रहे ।


🥀(4) जो अपने शोहर के सिवा किसी अजनबी मर्द पर निगाह न डालें न किसी की निगाह अपने ऊपर पड़ने दे ।


🥀(5) जो अपने शौहर की ज्यादती और जुल्म पर हमेशा सब्र करती रहे ।

 

🥀(6) जो मज़हब की पाबंदी और दीनदार हो और अल्लाह व बन्दें के हुकूक़ को अदा करती हो ।


🥀(7) जो पर्दे में रहे और अपने शौहर की इज्जत नामूस की हिफ़ाज़त करें ।

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  31/32


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                    🌹बीवी के हुकूक 🌹


✨इस्लाम से पहले औरतों का बहुत बुरा हाल था, दुनिया में औरतों की कोई इज़्ज़तो वक़अ़त ही नहीं थी। मर्दों की नज़रों में उनकी कोई हैसियत न थी । वे मर्दों की नफ़्स की ख्वाहिश पूरी करने का एक खिलौना थीं, दिन-रात मर्दों की किस्म-किस्म की खिदमतें करती थी । मगर जालिम मर्द फिर भी उन औरतों की कोई कदर नहीं करता था बल्कि जानवरों की तरह उनके साथ सुलूक किया करता था। उनका कोई मकाम न था। शौहर फ़क़्त अपनी खिदमत के लिए उन्हें खाना कपड़ा देकर उनसे गुलामों जैसा बर्ताव करता था बल्कि उन्हें जायदाद की तरह इस्तेमाल करता था लेकिन इस्लाम ने औरत को नीचे से ऊपर उठाया और उनके लिए हुकूक मुकर्रर किये गये। माँ-बाप, भाई-बहन के मालों में वारिस करार दिया गया! औरतों को मालिकाना हुकूक हासिल हो गये, गरज़ कि वे औरतें जो मर्दों की जूतियों से ज़्यादा जलीलो ख़्वार और इन्तिहाई मजबूरो लाचार थीं वे मर्दों के घरों की महिला बन गईं। अब न कोई मर्द बिला वजह औरतों को मार पीट सकता है, ना ही उनको घरों से निकाल सकता है बल्कि हर मर्द मज़हबी तौर पर औरतों के हुकूक अदा करने पर मजबूर है।


🕋कुर्आन- अल्लाह तआला इरशाद फ्रमाता है:


📝तर्जमा :- "और उनसे अच्छा बर्ताव करो"

📓(सूरह अन्निसा)


📝तर्जमा :- "और औरतों का भी हक ऐसा ही है जैसे उन पर है शरीअत के मुआफिक़ ।"

📓(सूरह बकरह) 


📚हदीस:- हज़रत आयशा रदियल्लाहु अन्हु फरमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः"ईमान में सबसे ज़्यादा कामिल वह शख्स है जिसके आदातो अखलाक सबसे अच्छे हों और अपनी बीवी के साथ सबसे ज्यादा नर्मी और अच्छा बर्ताव करता हो।"

📕(मिशकात शरीफ पेज 282)


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  32/33


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                🌹बीवी के हुकूक 🌹


📚हदीस - हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया "ईमान में कामिल तरीन वह शख्स है जो सब से ज़्यादा बा अखलाक हो और तुम में सब से ज़्यादा बेहतर वह है जो अपनी औरतों के लिए बेहतर हो।"

📕(तिरमिज़ी शरीफ जिल्द 1, पेज 138)


📚हदीस - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः"औरत टेढ़ी पसली से पैदा की गयी है। अगर कोई शख्स टेढ़ी पसली को सीधी करने की कोशिश करेगा तो पसली की हड्डी टूट जायेगी मगर वह कभी सीधी न होगी और अगर छोड़ देगा तो टेढ़ी बाकी रहेगी। ठीक इसी तरह अगर कोई शख्स अपनी बीवी को बिल्कुल ही सीधी करने की कोशिश करेगा तो टूट जायेगी यानी तलाक की नौबत आ जायेगी। लिहाज़ा अगर औरत से फ़ायदा उठाना है तो उसके टेढ़े पन ही से फ़ायदा उठा लो।"

📕(बुखारी शरीफ जिल्द 2, पेज 779)


📚हदीस- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "तुम में बेहतर वह है जो अपने घर वालों के लिए अच्छा है। और मैं तुम सब में अपने अहल के लिए बेहतर हूँ।"

📕(तिर्मिज़ी शरीफ जिल्द1, पेज 228)


📚हदीस - एक सहाबी ने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से दरयाफ्त किया "या रसूलल्लाह! बीवी का उसके शोहर पर क्या हक़ है ?" आपने फ़रमाया :


"जब तू खाये, उसको भी खिलाये, जब तू कपड़ा पहने उसको भी पहनाये, उसके मुँह पर मत मार, उसको गालियाँ न दे और उसको न छोड़ मगर घर में।"

📕(अबु दाऊद पेज 291)


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  33/34


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                  🌹बीवी के हुकूक 🌹


✨औरतों के शरई हुकूक मर्द पर चार किस्म के हैं✨


(1) खाना जैसा खुद खाये उसे भी खिलाये।

(2) लिबास देना यानी जिस मैयार के कपड़े खुद पहने उसे भी पहनाये।

(3) मकान कि हस्बे हैसियत उसके रहने के लिए दे।

(4) हमबिस्तरी करना यानी निकाह के बाद एक बार जिमाअ् करना औरत का हक़ है ।


अगर एक बार भी न कर सके तो औरत के दावे पर काज़ी मर्द को साल भर की मोहलत देगा । अगर इसमें भी हमबिस्तरी न हो तो काज़ी तफरीक कर देगा। इसके बाद गाह बगाह वती (सम्भोग) करना दयानतन वाजिब है कि उसे परेशान नज़री न पैदा हो और उसकी रज़ा के बगैर चार माह तक तर्के जिमाअ् बिला उज्र सहीह शरीअ़ी नाजाईज़ ।


"अगर मर्द जिमा पर कादिर है, फिर भी जिमा नहीं करता ख्वाह इब्तिदाअन ख्वाह तर्के मुतलक का इरादा कर लिया है और औरत को उस से ज़रर है तो काज़ी मजबूर करेगा कि जिमअ् करे या तलाक दे। अगर न माने तो कैद करेगा। फिर भी न मानेगा तो मारेगा, यहां तक कि दो बातों में से एक करे।"

📓(फतावा रज़विया जिल्द 5, पेज 907)


औरत को बिला किसी बड़े कुसूर के हरगिज़-हरगिज़ न गरे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः "कोई शख्स औरत को इस तरह न मारे जिस तरह अपने गुलाम को मारा करता है। फिर दूसरे वक़्त उस से सोह़बत भी करे।"


📕(मिशकात जिल्द 2, पेज 280)


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  34/35


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 💫शौहर अपनी औरत को इन उमूर पर मारपीट सकता है


🔖(1) बनाव सिंगार पर कुदरत रखने के बावजूद बनाव सिंगार न करे घर में मैली कुचैली, परा गन्दा हाल रहे।

🔖(2) नमाज़ न पढ़े।

🔖(3) गुस्ले जनाबत न करे।

🔖(4) बगैर इजाज़त घर से चली जाय।

🔖(5) शौहर अपने पास बुलाये और वह न आये जबकि हैज़ो निफ़ास से पाक थी और फर्ज़ रोज़ा भी रखे हुए न थी।

🔖(6) गैर महरम के सामने चेहरा खोल कर चले फिरे।

🔖(7) अजनबी मर्द से कलाम करें।

🔖(8) शौहर से झगड़ा करे।


📕(बहारे शरीअत हिस्सा 9, पेज 119)


✨शौहर को चाहिये कि औरत के खर्चों के बारे में बहुत ज़्यादा बख़ील और कन्जूसी न करे और हद से ज़्यादा फुजूल खर्ची भी न करे। हदीस शरीफ में है कि बीवी को नफ़क़ा देना खैरात देने से बेहतर है। बुजुर्गों ने फ़रमाया है कि अहलो अ़याल के लिए कस्बे हलाल करना अबदालों का काम है। औरत का उसके शौहर पर यह भी हक़ है कि शौहर औरत की नफासत और बनाव सिंगार का सामान यानी साबुन, तेल, कंघी, मेंहदी वगैरह मुहय्या करता रहे ताकि औरत अपने आपको साफ सुथरी रख सके।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  35/36


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           🌹बेहतरीन शोहर कौन है?🌹


🌟(1) जो अपनी बीवी के साथ नर्मी, खुश सिल्की और हुस्ने सुलूक के साथ पैश आये।


🌟(2) जो अपनी बीवी के हुकूक अदा करने में किसी किस्म की ग़फ़लत और कोताही न करे।


🌟(3) जो अपनी बीवी की खूबियों पर नज़र रखे और मामूली ग़लतियों को नज़र अंदाज़ करे।


🌟(4) जो अपनी बीवी को पर्दे में रख कर इज़्ज़त व आबरू की हिफाज़त करे।


🌟(5) जो अपनी बीवी को दीनदारी की ताकीद करता रहे और शरीअत की राह पर चलाये।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  36


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             🌹जिमाअ़् का बयान🌹

                       {पार्ट 1️⃣ }


✨जिमाअ़् (हमबिस्तरी) की ख्वाहिश एक फ़ितरी (Natural) जज़्बा है जो हर ज़ीरूह में खिलक़तन पाया जाता है। इसे बताने की ज़रूरत नहीं होती। हर एक अपनी नौअ़ की मादा की तरफ तबई एतबार से माइल होता है और यह जज़्बा ही इज़्दिवाजी ज़िन्दगी और जिन्सी तअल्लुकात की जान है। जब इश्क व मोहब्बत का जज़्बा हैवानात में पाया जाता है और वे भी अपनी मिलने की ख्वाहिश पुरी करते हैं । नर को मादा की तलाश रहती है और मादा को नर की तो फिर इन्सान जो जज़्बात का मअदिन है उसका दिल जिमाअ़् और ख्वाहिशे विशाल से क्योंकर खाली रह सकता है? और वह औरत जैसी सिनफे नाजूक से क्यों न लुत्फ़ अन्दोज़ हो?


💫इमाम ग़ज़ाली फरमाते हैं:


✨जिमाअ़् की ख्वाहिश को इन्सान पर मुसल्लत कर दिया गया है ताकि नस्ले इन्सानी की बक़ा के लिए वह तुम रेज़ी करे । जिमा जन्नत की लज़्ज़तों में से एक लज्जत है ।


📕(कीमिया ए सआदत पेज 496)📕*


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  36/37


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              ✨जिमाअ़् के फायदे✨

                         {पार्ट 2️⃣ }


जिमाअ़् के मुतअल्लिक याद रखना चाहिये कि जब तक शहवत ग़ालिब न हो और मनी मुस्तअिद न हो, जिमाअ़् करना मुनासिब नहीं लेकिन जब वह हालत पाई जाए तो फ़ौरन मनी खारिज करनी चाहिये। जिस तरह रद्दी फुला पेशाब पाखाना से खारिज किया जाता है क्योंकि उस वक़्त मनी के रोकने मे बड़े नुक्सान का अन्देशा है।

📕(मुजर्राबात सुयूती पेज 40)


✨उम्दा जिमाअ वह कहलाता है जिसका नतीजा दिल की ताज़गी और तबीअत को फ़रहतो सुरूर हो। बुरा जिमाअ़् वह है जिसका नतीजा लर्ज़ा व तंगीए नफ़्सो दिल की कमजोरी और तबीअत का मत्लाना और महबूबा को पसंद न आना हो। (मुजरा बाते सुयूती पेज 41) जिमाअ़् सिर्फ मज़ा लेने या शहवत की आग बुझाने की नियत से न हो बल्कि यह नियत हो कि ज़िना से बचूंगा और औलाद स्वालेह व नेक सीरत पैदा होगी। अगर इस नियत से जिमाअ़् करेगा तो सवाब भी पायगा ।


📕(कीमिया ए सआदत पेज 255)

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  40


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                   🌹जिमाअ़् के आदाब🌹


✨जिमाअ करना इन्सान की वह तबई और अहम ज़रूरत है जिसक बगैर इन्सान का सही तौर से ज़िन्दगी गुज़ारना मुश्किल बल्कि तकरीबन ना मुम्किन सा है। अल्लाह तआला ने जिमाअ़् की ख़्वाहिर इन्सानों ही में नहीं बल्कि तमाम हैवानात में वदीअ़त रखी है लेकिन शरीअत ने इन्सान की इस फ़ितरी ख्वाहिश की तक्मील के लिये कुछ आदाब और तरीके मुकर्रर कर दिये ताकि इन्सान और हैवान में फर्क हो जाए। अगर जिमाअ़् का मकसद सिर्फ शहवत की तकमील होता ख्वाह जिस तरह भी हो तो इन्सान और हैवान में फर्क ही न होता। इसलिये इसके आदाब की रिआयत शीरअी हक होने के साथ-साथ इन्सानी हक़ भी है। कुरान- अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:


"तो अब उनसे सोहबत करो और तलब करो जो अल्लाह तुम्हारे नसीब में लिखा हो।


📓(सुरह बकरा)


📚हदीस - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया तुम में से जो कोई अपनी बीवी के पास जाए तो पर्दा करे और गधों की तरह बरहना(नंगा) न हो जाए।


📕(इब्ने माजा पेज 138)

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  40/41


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🌹अब हम जिमाअ के कुछ आदाब बयान करते हैं:


💫(1) जिमाअ़् से पहले औरत से मुलाकात और छेड़-छाड़ करे ताकि औरत का दिल खुश हो जाय और उसकी मुराद आसानी से हासिल हो। खूब बोसो किनार जारी रखें यहाँ तक कि औरत जल्दी-जल्दी साँस लेने लगे और उसकी घबराहट बढ़ जाय और मर्द को अपनी तरफ ज़ोर से खींचे।


💫(2) मर्द को चाहिये कि अपनी औरत पर जानवरों की तरह न गिरे। सोहबत से पहले कासिद होता है। लोगों ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह! वह कासिद क्या है? आपने फरमाया "बोसो किनार।


💫(3) जिमाअ़्.करते वक़्त कलाम करना मकरूह है बल्कि बच्चे के गूंगे या तोतले होने का खतरा है। यूं ही उस वक़्त औरत की शर्मगाह पर नज़र न करे कि बच्चे के अन्धे होने का अन्देशा है और मर्द औरत कपड़ा ओढ़ लें, जानवरों की तरह बरहना न हों कि बच्चे के बेहया या बेशर्म होने का अन्देशा है।


✨हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम खुद को और अपनी बीवी को सर से पैर तक चादर या किसी कपड़े से ढांप लिया करते थे और आवाज़ पस्त करते थे और बीवी से फरमाते थे कि वक़ार के साथ रहो।


💫(4) हमबिस्तरी से पहले बिस्मिल्लाह पढ़ना सुन्नत है मगर यह याद रहे कि सत्र खुलने से पहले पढ़ी जाय।


💫(5) जिमाअ़् के वक़्त किब्ला रू न हो, पोशीदा जगह में हो, किसी की नज़र के सामने न हो। हदीस शरीफ में है कि सरकार सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया "जब तुम में से कोई अपनी बीवी से कुरबत करे तो पर्दा करे, बेपर्दा होगा तो फ़रिश्ते हया की वजह से बाहर निकल जायेंगे और उनकी जगह शैतान आ जाएगा। अब अगर कोई बच्चा हुआ तो शैतान की उसमें शिरकत होगी। जिमाअ़् के वक़्त यानी जिमाअ़् शुरू करने से पहले बिस्मिल्लाह ज़रूर पढ़ना चाहिये। अगर बिस्मिल्लाह न पढ़े तो इस सूरत में मर्द की शर्मगाह से शैतान लिपट जाता है और उस मर्द की तरह वह भी जिमाअ़् करता है।


💫(6) जिमा से पहले औरत को जिमाअ़् की तरफ रागिब करना मुस्तहसन है। अगर ऐसा न किया जाए तो औरत को नुक्सान पहुंचने का अंदेशा है, जो अक्सर अदावतो जुदाई तक पहुँचा देता है।


💫(7) हमबिस्तरी से पहले गुस्ल करना बेहतर है, वर्ना इस्तिन्जा और वुजू कर ले।


💫(8) जिमाअ के वक़्त बीवी के अलावा किसी गैर औरत का तसव्वुर हरगिज़ न करे। ऐसा करना सख्त गुनाह है और यह भी एक किस्म का ज़िना है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  41/42/43


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              ✨तरीका-ए-जिमाअ✨

                     {पार्ट 1️⃣ }


कुर्आन में - अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है;


"तुम्हारी औरतें तुम्हारे लिये खैतियां हैं तो आओ अपनी खेतों में जिस तरह चाहो।"


✨जिमाअ़् के तरीके बहुत से हैं बल्कि हवस परस्तों ने कुछ बेहूदा और तकलीफ़ दह तरीके भी ईजाद कर लिये हैं। उन तरीकों से बचना चाहिये बल्कि ऐसा तरीका अपनाना चाहिये जिससे दोनों खुशो खुर्रम और हश्शाश बश्शास हो जाऐं। बेहतर तरीका यह है कि औरत चित लेट जाए और मर्द उसके ऊपर आए। फिर उसके साथ छेड़-छाड़ और बोसो किनार करे, यहाँ तक कि शहवत भड़क उठे, फिर जल्दी से औरत की अन्दामे निहानी में ज़कर को दाखिल कर दे और हरकत करे। फिर जब मनी गिर जाये तो कुछ देर तक औरत की गर्दन से चिम्टा रहे और ज़कर बाहर न निकाले। जब जिस्म में सुकूनो करार आजाए तो दायें जानिब होकर ज़कर को बाहर निकाले। इसमें एक खूबी यह भी है कि अगर इस किस्म के जिमाअ़् से  नुत्फा ठहर जाए तो लड़का पैदा होगा।


💫जिमाअ़् के लिए कोई वक़्त मुकर्रर नहीं, जब चाहो दिन में या रात में इसी तरह जैसे चाहो खड़े होकर, बैठ कर, लेट कर, चित से, पट से, हर तरह तुम्हारे लिये मुबाह है लेकिन फ़ित्री तरीका तो यह ही है कि औरत नीचे और मर्द ऊपर रहे। जैसा कि सारे हैवानात इसी फ़ित्री तरीके पर अमल करते हैं। कुर्आने पाक की इस आयत में भी इसी तरीके की तरफ लतीफ इशारा किया गया है।


"जब मर्द ने औरत को ढाँप लिया तो उसको हल्का सा हम्ल रह गया ।"


✨इस तरीके में ज़्यादा राहतो आसानी भी है। औरत को मशक़्क नहीं उठानी पड़ती, नीज़ औरत पर थोड़ा वज़न आयगा जिसकी वजह से उसकी लज़्ज़त में इजाफा होगा।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  43/44


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               ✨तरीका-ए-जिमाअ✨

                         {पार्ट 2️⃣ }


✨इमामे अहले सुन्नत, सरकारे आला हज़रत इमाम अहमद रजा फाजिले बरेलवी अलैहिर्रह़मा फरमाते हैं:


"जिमाअ़् के वक़्त यह नियत हो

💫(1) तलबे वलदे स्वालेह।

💫(2) बीवी का अदाए हक़।

💫(3) यादे इलाही और आमाले स्वालेहा के लिये अपने दिल को फारिग करना। न बिल्कुल बरहना हो न खुद, न औरत,  बकिब्ला रू न पुश्त किब्ला, औरत चित हो और यह उकडूं बैठे। बोसो किनार, छेड़-छाड़ से शुरू करे। जब औरत को भी मुतवज्जह पाए। ये पढे कर:

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیْمِ جَنِّبْنَا الشَّیْطٰنَ وَ جَنِّبِ الشَّیْطَانَ مَارَزَقْتَنَا 

" बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम जन्निबनश्शैताना व जन्निबिश्शैताना मा रज़क़तना"


आगाज़ करे, उस वक़्त कलाम न करे और न औरत की शर्मगाह पर नज़र करे, फिर जब इन्ज़ाल की नौबत पहुँचे तो दिल ही दिल में यह दुआ पढ़े :

 اَللّٰہُمَّ لَا تَجْعَلْ لِلشَّیْطَانِ فِیْمَا رَزَقْتَنِیْ نَصِیْبًا

'अल्लाहुम्मा ला तजअ़ल लिश्शैतानि फीमा रज़कतनी नसीबन"


अगर कोई इस दुआ को पढ़ लेता है और उसके मुक़द्दर में बच्चे की विलादत है तो शैतान उस बच्चे को कभी ज़रर (नुकसान) न दे सकेगा।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  44/45


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              ✨तरीका-ए-जिमाअ✨

                         {पार्ट 3️⃣ }


✨औरत के बैठी हुई हालत में मुक़ारबत ( संगत ) न करे , इसी तरह पहलू की तरफ़ से भी न करे कि इससे दर्दे कमर पैदा होता है। औरत को अपने ऊपर भी न चढ़ाये कि इससे औरत बाँझ हो जाती है बल्कि औरत को चित लिटाए और उसकी टाँगो को ऊपर उठाए।


💫शैख़ बू अली सीना के नज़दीक जिमाअ की तमाम शक्लों में बुरी शक्ल यह है कि औरत मर्द के ऊपर हो और मर्द नीचे चित लेटा हो क्योंकि इस सूरत में मनी मर्द के उज़्व में बाकी रह कर मुतअफ़्फ़न हो जाती है जो तकलीफ़ का बाइस होती है। इन्ज़ाल के बाद फ़ौरन जुदा न हो बल्कि इन्तिज़ार करे कि औरत की भी हाजत पूरी हो जाए।


✨इमाम गज़ाली फ़रमाते हैं कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया "मर्द में यह कमज़ोरी की निशानी है कि जब मुबाशरत ( संगत ) का इरादा करे तो बोसो किनार से पहले जिमाअ़् करने लगे और जब इन्जाल हो जाय तो सब्र न कर सके और फौरन अलग हो जाय कि औरत की हाजत अभी पूरी नहीं हो पाई है। "


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  45


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              ✨तरीका-ए-जिमाअ✨

                         {पार्ट 4️⃣ }


💫फ़रागत के बाद मर्दो औरत दोनों अलग-अलग कपड़े से अपनी अपनी शर्मगाह को साफ़ कर लें। दोनों का एक ही कपड़े से साफ करना नफ़रतो जुदाई का सबब है। अगर किसी शख्स को एहतिलाम हुआ हो तो बगैर वुजू किये (यानी हाथ, मुंह, शर्मगाह धोए) जिमाअ़् न करे वर्ना होने वाले बच्चे पर बीमारी का अंदेशा है। हो सकता है कि बच्चा दीवाना और बेकार पैदा हो।


✨ज़्यादा बूढ़ी औरत से जिमाअ़् नहीं करना चाहिए कि इससे बदन कमज़ोर और आदमी जल्द बूढ़ा हो जाता है। खड़े होकर भी जिमाअ़् नहीं करना चाहिये कि इससे बदन कमज़ोर और ज़अ़ीफ़ हो जाता है और भरे पेट भी मुजामअत (संगत) नहीं करना चाहिये कि इससे औलाद कुन्द ज़ेहन पैदा होगी।


🍂बअ़्ज़ लोगों ने यह भी लिखा है कि फ़राग़त के बाद मर्दो औरत और दोनों को पेशाब कर लेना चाहिये, नहीं तो किसी ला-इलाज मर्ज़ में मुब्तिला होगा


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  45/46


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           ✨जिमाअ के बाद का अमल✨


╭┈► जिमाअ (संगत) से फारिग होकर मर्द औरत दोनों अलग-अलग हो जाए, फिर किसी साफ़ कपड़े से दोनों अपने-अपने मकामे मख्नसूस को साफ़ कर लें। दोनों का कपड़ा अलहदा-अलहदा होना चाहिये। एक ही कपड़े से साफ़ न करें कि यह नफ़रतो जुदाई का सबब है। फिर औरत को सीधी करवट पर लेटे रहने का हुक्म दें, ताकि अगर नुत्फ़ा करार पा जाए तो लड़का पैदा हो, अगर उल्टी कर्वट पर लेटेगा तो लड़की पैदा हो सकती है और फरागत के बाद दिल ही दिल में इस आयत की तिलावत करे:


اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِیْ خَلَقَ مِنَ الْمَاءِ بَشَرًا 

فَجَعَلَهٗ نَسَبًاوَّ صِهْرً اوَّکَانَ رَبُّکَ قَدِیْرًا٠

'अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी ख़लक मिलन माइ बशरन फ़जअ़लहू नसबन व सिहरन व काना रब्बुका क़दीरन


╭┈►जिमाअ के फ़ौरन बाद पानी नहीं पीना चाहिये। ऐसा करने से दम्मा का मर्ज़ लाहिक हो सकता है। हाँ, अगर कुन्कुना दूध पी लिया जाए ता कुछ हरज नहीं। जिमाअ के बाद फोरन ठन्डे पानी से गुस्ल करना नुकसान दह है। इससे बुखार आने का अन्देशा होता है। अगर गुस्ल ही करना है तो इतनी देर रूका रहे कि बदन की हरारत एतिदाल पर आ जाए। हाँ फोरन उज़्व को धो लेना चाहिये कि इससे बदन तन्दरूस्तो कवी हो जाता है।


╭┈► फराग़त के बाद मर्द औरत दोनों को पेशाब कर लेना चाहिए , नहीं तो किसी ला-इलाज मर्ज़ में मुब्तिला हो सकता है।

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  46/47


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            ⌚मुबाशिरत के औक़ात⌚


╭┈► शरीअत ने जिमाअ़् के लिये कोई ख़ास वक़्त मुकर्रर नहीं किया है । हाँ, बअज़ शरई अवारिज़ की मौजूदगी में जिमाअ करना मना है। जैसे रोज़ा, नमाज़, एहराम, एतिकाफ़, हैजो निफ़ास के वक़्त, इनके अलावा दिनो रात के हर हिस्से में सोहबत करना जाइज़ है लेकिन बुजुरगाने दीन या हकीमों ने कुछ ऐसे औकात बताए हैं जिनमें सोहबत करना सेहत के लिये फायदेमन्द होने के साथ सवाब का काम भी है।


╭┈►जुमा या शबे जुमा को मुबाशरत मुस्तहब है। शब में ज़्यादा फज़ीलत है। हदीस शरीफ़ में है कि जुमे की शब में जिमाअ करने वाले को दो सवाब मिलते हैं। एक अपने गुस्ल और दूसरे अपनी औरत के गुस्ल का।


╭┈► जिमाअ के लिये सबसे बेहतर वक़्त रात का आख़िरी हिस्सा है, क्योंकि रात के पहले हिस्से में मेअदा गिज़ा से पुर होता है और भरे पेट में मुबाशरत करना सेहत के लिये नुकसानदह है। जबकि रात के आख़िरी हिस्से में सोहबत करना सेहत के लिये फ़ायदेमन्द है। वजह यह है कि रात के आखिरी हिस्से तक खाना अच्छी तरह हज़्म हो जाता है और दिन भर की थकावट नींद से दूर भी हो जाती है। दोपहर को कैलूला के बाद या शब को इशा की नमाज के बाद कुछ देर सोकर हमबिस्तरी करना बेहतर है।


👉🏻 उन वक़्तों का बयान जिनमें मुबाशिरत करना मना है


╭┈►अगर किसी शख्स को एहतिलाम हुआ हो तो बगैर हाथ मुंह और शर्मगाह धोए जिमाअ़् न करे, वरना होने वाले बच्चे पर बीमारी का अन्देशा है। हो सकता है कि बच्चा दीवाना और बेकार पैदा हो।

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  47/48


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 ✨तबीबों ( हकीमों ) की तहकीक के मुताबिक


👉🏻 ( 1 ) पेट भरा होने की हालत में मुबाशरत नहीं करना चाहिये कि इससे औलाद कुन्द ज़ेहन पैदा होगी। 


👉🏻 ( 2 ) ज़्यादा बूढ़ी औरत से भी जिमाअ़् नहीं करना चाहिये कि इससे बदन कमज़ोर और आदमी जल्द बूढ़ा हो जाता है। 


👉🏻 ( 3 ) खड़े होकर जिमाअ़् करने से बदन कमज़ोरो ज़ईफ़ हो जाता है। 


👉🏻 ( 4 ) थोड़ी - थोड़ी देर बाद जिमाअ़् करना सेहत के लिये नुकसान दह है। बल्कि दो मर्तबा की हमबिस्तरी में इतना वक्फा ( ठहरना ) होना चाहिये कि जिससे बदन हल्का मालूम हो और तबीअत में अच्छी तरह ख्वाहिश पैदा हो। 


👉🏻 ( 5 ) पेट भरा होने की हालत में अगर मुबाशरत की जाय तो सुरअ़ते इन्जाल का मर्ज़ लाहिक हो जाता है, मेअदा कमज़ोर और हाज़्मे की कुव्वत भी कमजोर हो जाती है। 


👉🏻 ( 6 ) सफ़र में जाने के इरादे के वक़्त हमबिस्तरी नहीं करनी चाहिये कि इससे इरादा कमजोर हो जाता है।


👉🏻 ( 7 ) बुखार, नज़्ला, जुकाम, खांसी और दूसरी तकलीफ़ों की मौजूदगी में जिमाअ़् नहीं करना चाहिये।


👉🏻 ( 8 ) सफ़र से आने के फौरन बाद जिमाअ़् नहीं करना चाहिये, जब तक कि सफ़र की थकावट , रंजो फ़िक्र दूर न हो जाय।


👉🏻 ( 9 ) नशे की हालत में जिमअ़् नहीं करना चाहिये, वरना इससे बीवी को नफ़रत हो जायगी और औलाद भी लंगड़ी, लूली पैदा होगी। 


👉🏻 ( 10 ) एक बार सोहबत करने के बाद अगर उसी रात में दोबारा सोहबत करने का इरादा हो तो दोनों को चाहिये कि वुजू कर लें, अगर वुजू न कर सकें तो अपनी -अपनी शर्मगाह को धोलें। ऐन नमाज़ के वक़्त सोहबत नहीं करनी चाहिये। बुजुर्गाने दीन फ़रमाते हैं ' अगर इन वक़्तों में हमबिस्तरी करने से हम्ल ( गर्भ ) ठहर जाय तो औलाद नाफरमान पैदा होगी।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  48/49


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 🌕उन रातों का बयान जिनमे मुबाशिरत ( संगत ) करना मना है


✨हर महीने की पहली रात और चाँद की पन्द्रहवीं रात और महीने की आखिरी रात में जिमाअ़् न किया जाए कि इन रातों में शैतान जिमाअ़् के वक़्त हाज़िर होते हैं और कुछ यह कहते हैं कि इन रातों में शैतान जिमाअ़् करते हैं।


 ⏳हफ़्ता और इतवार, मंगल और बुध की दरमियानी शब में हमबिस्तरी करने से बचना चाहिये कि इन रातों में हमबिस्तरी करने से अगर हम्ल ठहर जाए तो बच्चा बेहया, बदनसीब और मुफ़्लिसो हरीस पैदा होने के इमकानात हैं।


💫इमाम ग़ज़ालो फरमाते हैं : रात के पहले हिस्से में सोहबत करना मकरूह है कि सोहबत के बाद पूरी रात नापाकी की हालत में सोना पड़ेगा।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  49


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      💔कसरतें जिमअ् के नुक़सानात💔

                         {पार्ट 1️⃣ }


📖मसअलाः- ज़िन्दगी में एक मर्तबा जिमाअ़् करना क़ज़ाअन वाजिब है हद मुकर्रर नहीं, इतना तो हो कि औरत की नज़र औरों की तरफ न उठे और इतनी कसरत भी जायज़ नहीं कि औरत को ज़रर ( नुकसान ) पहुंचे।


💞मुबाशरत से जो चीज़ निकलती है वह दरअस्ल रोगने हयात है कि चिरागे उम्र उसी से रौशन और कायम रहता है। उसके अन्दर यह सलाहिय्यत होती है कि जुज़्वे बदन बन जाय, उसके निकलने से जिस कद्र कमज़ोरी महसूस होती है, किसी गलीज़ जिस्मानी चीज़ के निकलने से नहीं होती। जो लोग औरत को सिर्फ अपनी नफ़्सानी ख्वाहिशात की तक्मील का ज़रिया समझते और महज़ शहवत परस्ती की वजह से कसरते जिमाअ़् के आदी बन जाते हैं, वे अपनी सेहतो ज़िन्दगी के सख्त दुश्मन हैं। उन्हें ख़तरनाक से ख़तरनाक बीमारी से दो चार होना पड़ता है।


 जैसेः👉🏻 बदन में हरारत का बिल्कुल कम हो जाना, जिस्म का दुबला हो जाना, काहिली और सुस्ती का छा जाना, समाअतो बसारत ( सुन्ने, देखने ) में कमी आ जाना, दिमाग में कमज़ोरी व इख़्तिलाल का आ जाना, पिन्डलियों में दर्द पैदा हो जाना, दायमी कब्ज की शिकायत होना, मेदे की कमज़ोरी, बद - हज़्मी, गन्दा जेहनी का पैदा हो जाना, जुअफे बाह , जिरयान, सुझते इन्जाल और नामर्दी की शिकायत हो जाना, रअशा ( कपकपाहट ), मिर्गी, फालिज की बीमारी का लाहिक़ होना। अलग़रज़ कसरते जिमाअ़् से इस किस्म के हज़ारों मर्ज़ पैदा हो जाते हैं जो इन्सान की ज़िन्दगी को इस कदर तल्ख कर देते हैं कि वह ज़िन्दगी पर मौत को तरजीह देने लगता है।

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  50


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      💔कसरतें जिमअ् के नुक़सानात💔

                         {पार्ट 2️⃣ }


🏥हकीमों ने लिखा है कि हफ्ते में ज़्यादा से ज़्यादा दो मर्तबा मुबाशरत की जाय। किसी ने हकीम लुकमान से पूछा कि ज़िन्दगी में औरत के पास कितनी बार जाना चाहिये? उन्होंने कहा एक मर्तबा। नौजवान ने कहा कि इतना सब्र मुश्किल है, आपने जवाब दिया फिर साल में एक बार, पूछने वाले ने कहा यह वक़्त भी ज़्यादा है, आपने फरमाया फिर छः माह में एक बार, नौजवान ने जब इसे भी ज़्यादा बताया तो हकीम लुकमान ने नौजवान को मुखातब करते हुए कहा, 'यह मौत का कुआं है, जो चाहो छलांग लगा लो।


💫बुकरात से किसी ने पूछा हफ्ते में कितनी बार मुबाशरत करनी चाहिये? उसने जवाब दिया सिर्फ एक बार। पूछने वाले ने फिर पूछा एक मर्तबा क्यों, इससे ज़्यादा क्यों नहीं? बुकरात ने झुंजलाकर जवाब दिया "तुम्हारी ज़िन्दगी है तुम जानो, मुझ से क्या पूछते हो?


🦁शेर के मुतअल्लिक मशहूर है कि वह जंगल का बादशाह होता है, जंगल का कोई जानवर चरिन्द, परिन्द, दरिन्दा वगैरह उसके सामने दम नहीं मार सकता, उसकी बेपनाह ताकत का राज़ सिर्फ यही है कि वह साल में सिर्फ एक बार अपनी मादा से जिमाअ़् करता है। इसके बाद शेर को इतनी कमज़ोरी लाहिक हो जाती है कि वह अड़तालीस (48) घंटों के लिये तंगो तारीक जंगल में चला जाता है और वहाँ आराम करता है, फिर जब निकलता है तो लड़खड़ाता है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  51


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      💔कसरतें जिमअ् के नुक़सानात💔

                         {पार्ट 2️⃣ }


💫अल्लामा जलालुद्दीन सुयूती ने लिखा है:


💞"जिमाअ में कसरत बड़े नुकसान का बाइस है, कुव्वते जिस्मानी के कमजोर होने के साथ दिमाग और बीनाई भी कमज़ोर हो जाती है। बुढ़ापे के आसार वक़्त से पहले नमूदार हो जाते हैं। मनी ग़िज़ा का खुलासा है, जब इन्सान कसरते जिमाअ़् का आदी हो जाता है, पहले तो मनी ख़ारिज होती है, फिर गिज़ा और रतूबाते अस्लिया का खून मनी की शक्ल में आ जाता है और रतूबाते अस्लिया फ़ना होने से हलाक़त मोजिब बनता है"। 


💫साहिबे बुस्तान ने हज़रते अली का कौल नक्ल किया है: 


✨"जो शख्स इस बात का ख्वाहिश मन्द हो कि उसकी सेहता तन्दरूस्ती ज़्यादा दिनों तक कायम रहे तो उसको चाहिये सुबह को जल्दी खाया करे, कर्ज़ से दूर रहे और औरत से मुबाशरत कम किया करे।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  51/52


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      💔कसरतें जिमअ् के नुक़सानात💔

                         {पार्ट 4️⃣ }


💫इमाम गज़ाली रहमतुल्लाहि अलैह फरमाते हैं:


👉🏻 "मर्द के लिये चार दिनों में एक मर्तबा वती (संभोग) करना मुनासिब है, नीज़ औरत की ज़रूरत पूरी करने और उसकी परहेज़गारी के एतिबार से इस हद से कमो बेश (कम-ज़्यादा) भी कर सकता है क्योंकि औरत को पाक दामन रखना मर्द पर वाजिब है।"


✨कअ़्ब बिन सवार ने एक आबिदो ज़ाहिद को हुक्म दिया:


💫"तीन दिन तू शब बेदारी और इबादत में गुज़ार और चौथे दिन अपनी बीवी से तअल्लुक रख।"


👉🏻 कुछ लोग शादी के बाद शुरू-शरू में औरत पर अपनी मर्दानगी व कुव्वत का रोअब डालने के लिये दवाओं या तिला वगैरह का इस्तेमाल करते हैं जिससे मियाँ-बीवी खूब लुत्फ़ अन्दोज़ होते हैं लेकिन बाद में उन दवाओं का असर उल्टा पड़ता है। इसलिये कि अक्सर इस किस्म की दवाओं में भंग, अफीम, संखिया वगैरह ज़हरीली चीजें शामिल होती हैं, जो मर्द की कुव्वते बाह के लिये सख्त नुकसानदह है। लिहाज़ा अगर कुव्वते मर्दानगी को बरकरार रखना है तो मस्तू। (बनावटी) दवाओं के बजाय मुक़व्वी ग़िज़ाओं का इस्तिमाल कर ग़िज़ा के ज़रिये हासिल होने वाली ताक़त आरिज़ी नहीं होती बाल्की पायदार होती है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  52


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        हालते हैज़ में मुबाशरत हराम है।


💫कुर्आन ए करीम में - अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है: "तो औरतों से अलग रहो हैज़ के दिनों और उनसे नज़्दीकी न करो जब तक पाक न हो लें, फिर जब पाक हो जायें तो उनके पास जाओ जहाँ से तुम्हे अल्लाह ने हुक्म दिया।"


📖मसअलाः- हालते हैज़ में हमबिस्तरी को जाइज़ जानना कुफ्र है और हराम समझ कर किया तो सख्त गुनाहगार हुआ, उस पर तौबा फ़र्ज़ है। बअज़ फुकहा(उलमा) ने इस हुक्म की ख़िलाफ़ वर्जी पर हदीस के मुताबिक कफ़्फ़ारा भी रखा है। अगरचे हमारे इमामे आज़म के नज़्दीक कफ्फारा अदा करना वाजिब नहीं, तौबा व इस्तिग़फ़ार वाजिब है। जिस आदमी से ग़ल्ब ए शहवत की बिना पर हालते हैज़ में हमबिस्तरी का गुनाह सर्ज़द हो जाए तो उसे एक दीनार या निस्फ़ दीनार बतौरे कफ्फारा सदका करना चाहिये। अगर आमद के ज़माने में किया तो एक दीनार और कुर्बे ख़त्म के किया तो निस्फ़ दीनार सदक़ा करना मुस्तहब है।


📖मसअलाः- औरत हैज़ की हालत में है और मर्द को शहवत का ज़ोर है और डर यह है कि कहीं ज़िना में न फंस जाए तो ऐसी हालत में औरत के पेट पर ज़कर को मस करके इन्जाल करे तो जाइज़ है, रान पर नाजाइज़ है। हालते हैजो निफ़ास में नाफ़ के नीचे से ज़ानू तक औरत के बदन से बिला किसी हायल के फ़ायदा हासिल करना जाइज़ नहीं।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  53


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        हालते हैज़ में मुबाशरत हराम है।


बहुत से मर्द शादी की पहली रात में बेसब्री का मुज़ाहिरा करते हैं और इसके बावुजूद कि औरत हायज़ा है, सोहवत कर बैठते हैं। यह सख्त नाजाइज़ है बल्कि औरत पर वाजिब है कि अगर वह हायज़ा हो तो अपनी हालत से शौहर को वाकिफ करादे ताकि शौहर मुबाशरत न करे, वरना औरत सख्त गुनाहगार होगी। हुजूर सल्लल्लाह और वसल्लम ने ऐसे आदमी से सख्त बेज़ारी का इज़्हार फ़रमाया हायज़ा औरत से वती (संगत) करता है।


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जिस शख्स ने हायज़ा औरत से वती की या अपनी औरत से उस के पीछे के मक़ाम में वती की या काहिन के पास गया. उसने उसका इन्कार किया जो मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुआ।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  53/54


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      हालते हैज़ में मुबाशरत के नुक़सानात


कुर्आन ए करीम में - अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: "और तुम से पूछते हैं हैज़ का हुक्म, तुम फ़रमाओ वह नापाकी है।"

 

हालते हैज़ में जो खून निकला करता है वह एक गंदा और जरासीम से आलूदा खून हुआ करता है। उसके अन्दर ज़हरीला माद्दा भी होता है। यह खून औरत के जिस्म में ज़ाइद और बेकार हुआ करता है। अगर यह खून औरत के जिस्म में रह जाय तो औरत मुख्तलिफ़ बीमारियों में मुब्तिला हो जाती है। इस हालत में हमबिस्तरी करना मर्दो औरत दोनों के लिये नुकसानदह है। खास तौर से औरत की सेहत के लिये ज़्यादा मुज़िर है। क्योंकि औरत की फ़र्ज (शर्मगाह) से लगातार गंदा खून जारी होता रहता है, जिसकी वजह से वह मकाम इन्तिहाई नरमो नाजुक हो जाता है। अब अगर ऐसी हालत में जिमाअ़् किया जाए तो उस मकाम में रगड़ की वजह से ज़ख़्म, सोज़िशे रहम वगैरह अमराज़ लाहिक होने का अन्देशा रहता है। मर्द में सुज़ाक, आतिशक, एड्स वगैरह होने का इमकान ज़्यादा हो जाता है।


🏥अतिब्बा ने लिखा है कि हालते माहवारी में हमबिस्तरी करने से आतिशक वगैरह पैदा हो जाने का अन्देशा है और अगर इस सोहबत से हम्ल ठहर जाय तो मुमकिन है कि बच्चा कोढ़ी पैदा हो। हदीस में है कि हैज़ की औलाद को जुज़ाम हो जाता है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  54/55


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        हालते हैज़ में औरत अछूत नहीं


✨कुछ मज़हबों में औरत को हालते हैज़ में ऐसा नापाक और अछूत समझा जाता है कि उनके साथ खाना, पीना या उनके हाथ से खाना पीना, बोसो-किनार करना वगैरह सब काबिले नफ़रत समझते हैं। यहाँ तक कि उनके साथ उठना-बैठना भी छोड़ देते हैं। ये सब लग्व, बेहूदा और जिहालत की बातें हैं। इस्लाम एतिदाल का हुक्म देता है। औरत हालते हैज़ में ऐसी नापाक नहीं हो जाती कि उसके साथ खाना-पीना, उठना-बैठना भी हराम हो जाय। बल्कि औरत हालते हैज़ में फ़ातिहा वगैरह का खाना भी बना सकती है। जो लोग औरतों को हालते हैज़ में अछूत समझते हैं, वे निरे जिहालत में हैं। मुशरिकों और यहूदियों की पैरवी करते हैं।


💫सरकार मुफ़्ती-ए-आज़म हिन्द अपने एक फ़तवे में लिखते हैं: "जो लोग ऐसा करते हैं, वे नाजाइजो गुनाह का काम करते हैं और मुश्रिकीन, यहूद और मजूस की पैरवी करते हैं। हालते हैज़ में सिर्फ सोहबत (नाफ़ से लेकर घुटने तक, इस दरमियान से फायदा हासिल करना) नाजायज़ है। बस इससे परहेज़ ज़रूरी है। मुश्रिकीनो यहूद और मजूस की तरह हैज़ वाली औरत को भंगन से भी बदतर समझना बहुत नापाक ख्याल, निरा जुल्म, अज़ीम वबाल है, यह उनकी मनघड़त है।"


📖मसअलाः- नाफ़ से ऊपर और घुटने से नीचे किसी तरह नफअ लेने के कोई हरज नहीं। यहाँ तक कि बोसो किनार भी जाइज़ है। इसी तरह अपने साथ खिलाना या एक जगह सोना जाइज़ है, बल्कि इस वजह से साथ न सोना मकरूह है।


📖मसअलाः- अगर साथ सोने में गल्ब-ए-शहवत और अपने को काबू में न रखने का एहतिमाल हो तो साथ न सोए और अगर गुमाने ग़ालिब हो तो साथ सोना गुनाह।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  55/56


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       हैज़ के बाद सोहबत कब जाइज़ है


✨अगर हैज़ का खून दस दिन से कम में रूक गया तो उसमें दो सूरतें हैं या तो औरत की आदत से भी कम में खत्म हुआ तो उससे सोहबत अभी जाइज़ नहीं, अगरचे नहा ले और अगर आदत से कम नहीं मस्लन पहले महीने सात दिन आया था, अब भी सात या आठ रोज़ आकर ख़त्म हुआ या पहला ही हैज़ है जो उस औरत को आया और दस दिन से कम में खत्म हुआ तो उस से सोहबत जाइज़ होने के लिये दो बातों में से एक बात ज़रूरी है। या तो औरत नहा ले और अगर मर्ज़ की वजह से या पानी न होने की वजह से नहा न सके तो तयम्मुम करके नमाज़ भी पढ़ ले, सिर्फ तयम्मुम काफ़ी नहीं या तहारत न करे तो इतना हो कि उस पर कोई नमाज़ फर्ज़ हो जाय, यानी नमाज़े पंजगाना से किसी नमाज़ का वक़्त गुज़र जाए, जिसमें कम से कम उसने इतना वक़्त पाया हो जिसमें नहा कर तक्बीरे तहरीमा कह सकती थी और अगर पूरे दस दिन पर हैज़ ख़त्म हुआ तो पाक होते ही हमबिस्तरी जाइज़ है, अगरचे अब तक गुस्ल न किया हो, मगर बेहतर यह है कि नहाने के बाद हमबिस्तरी करे।


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      ✨राज़ की बातों का बयान करना ✨


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "क़यामत के दिन सबसे ज़्यादा बदबख्त वह मर्द होगा जो अपनी बीवी की खास बातें लोगों में ज़ाहिर करे। इसी तरह वह औरत जो अपने शौहर की ख़ास बातें अपनी सहेलियों को सुनाए। यह अज़ीम गुनाह है।"


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जिस किसी ने सोहबत की बातें लोगों में बयान कीं, उसकी मिसाल ऐसी है जैसे शैतान औरत ने शैतान मर्द से आम चौराहे पर मुलाकात की और खुले आम लोगों के सामने ही सोहबत करने लगे।"


 मियाँ-बीवी में से हर एक शबे ज़िफ़ाफ़ की बातें (यानी मर्द अपने दोस्त अहबाब को सुनाया करता है और बीवी अपनी सहेलियों को सुनाया करती है) यह कत्अन नाजाइज़ और जाहिलाना तरीका है। -सरासर बेशर्मी और बेहयाई है। साहिबे गुनिय्या फ़रमाते हैं:


💫"अपनी बीवी से जिमाअ़् करने की हालतो कैफ़ियत का तज़्किरा करना न मर्द के लिये जाइज़ है, न ही औरत के लिये कि वह किसी दूसरी औरत से उसका तज़्किरा करे। यह रज़ालत और छिछोरापन है, अक़्लन और शर्अन दोनों एतिबार से कबीह और बुरा है।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  57


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 अपनी बीवी को देखने और छूने का बयान


_✨मर्द व औरत का एक दूसरे की शर्मगाह को छूना जाइज़ बल्कि बनियते सालिहा मोजिबे अजरो सवाब है।


अपनी औरत से बोसो किनार करना मुस्तहब व मस्नून है बाल्कि अच्छी नियत से हो तो बाइसे अजरो सवाब है। इसी तरह मर्द का औरत के पिस्तान का मुंह में लेकर चूसना जाइज़ है, अगर दूध वाली हो और अगर दूध वाली औरत है तो न चूसना बेहतर है कि इसमें के हलक तक पहुंचने का अन्देशा है।


औरत के मकामे मनसूस की तरफ़ नज़र न करे कि इससे निस्यान (भूल का मर्ज़) पैदा होता है और निगाह भी कमज़ोर होती है।


शौहर का बीवी से और बीवी का शौहर से कोई पर्दा नहीं, मर्द अपनी बीवी का सर से लेकर पैर तक सारा बदन देख और छू सकता है। इसी तरह औरत का मर्द के हर हिस्स-ए-बदन को देखना और छूना जाइज़ है, ख्वाह शहवत के साथ हो या बगैर शहवत।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  57/58


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         बीवी से जुदा रहने की मुद्दत


💫मर्द को चाहिये कि कम से कम चार माह में एक बार अपनी बीवी से सोहबत ज़रूर करे, बिला वजह औरत को छोड़ कर बहुत दिन सफ़र में न रहे। जो लोग शादी करके बीवी से अलग थलग रहते हैं । और औरत के साथ उसके बिस्तर का हक़ अदा नहीं करते, वे हक्कुल इबाद में गिरफ्तार और बहुत बड़े गुनाहगार हैं। अगर शौहर किसी मजबूरी से अपनी औरत के उस हक़ को अदा न कर सके तो शौहर पर लाजिम है कि औरत से उसके इस हक़ को माफ़ कराये। औरत के इस हक़ की कितनी अहमियत है, इस बारे में हज़रत अमीरूल मोमिनान उमर फारूक रदियल्लाहु तआला अन्हु का एक वाकिआ बहुत ज़्यादा इबरतनाक और नसीहत आमेज़ है।


✨एक मर्तबा रात के वक़्त हस्बे मअमूल हज़रत फारूके आज़म रदियल्लाहु अन्हु रिआया(Public) की खबरगीरी के लिये शहरे मदीना में गश्त फ़रमा रहे थे कि अचानक एक मकान से दर्दनाक अश्आर पढ़ने की आवाज़ सुनी। आप उसी जगह खड़े हो गए और गौर से सुन्ने लगे तो एक औरत दर्द भरे लहजे में कुछ अश्आर पढ़ रही थी जिनका मफ़्हूम यह है "खुदा की कसम! अगर खुदा के अज़ाब का खौफ़ न होता तो बिला शुबाह इस चारपाई के किनारे जुम्बिश में हो जाते"। अमीरूल मोमिनीन ने सुबह को जब तहकीकात की तो मालूम हुआ कि इस औरत का शौहर जिहाद के सिलसिले में कई माह से बाहर गया हुआ है और यह औरत उसको याद कर के फ़िराक के गम में ये अश्आर पढ़ रही है। अमीरूल मोमिनीन के दिल पर इसका इतना गहरा असर पड़ा कि सुबह ही को उसके शौहर की तलब के लिये कासिद रवाना कर दिया। इसके बाद आप अपनी साहिबज़ादी हज़रत हफ़्सा रदियल्लाहु अन्हा के पास तशरीफ़ ले गए और उनसे फ़रमाया मुझे एक मुश्किल मसअला दरपेश है, तुम उसको हल कर दो। मसअला यह है "औरत बगैर मर्द के कितने दिन सब्र कर सकती है?'' उन्होंने जवाब दिया “तीन माह या ज़्यादा से ज़्यादा चार माह" वहाँ से वापस आकर आपने तमाम सिपह सालारों को यह फ़रमान लिख भेजा "कोई शादी शुदा फ़ौजी चार माह से ज़्यादा अपनी बीवी से जुदा न रहे"।


औरत को छोड़ कर सफ़र में जाना या किसी मुलाज़िमत में जाना अगर ज़रूरत से हो तो जाइज़ है, इसकी कोई हद नहीं। अलबत्ता बेज़रूरत चार माह से ज़ाइद जुदा रहना मना है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  58/59


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     अज़्ल या कंडोम का इस्तेमाल


💞बीवी से हमबिस्तरी के वक़्त इन्जाल से पहले अलग हो कर मनी बाहर निकालने को अज़्ल कहते हैं। ऐसा इसलिये करते हैं ताकि हम्ल से रोका जा सके। इसी मक़्सद के लिये कंडोम वगैरह का भी इस्तिमाल करते हैं। इस सिलसिले में उलमाए किराम के अक़वाल मुख्तलिफ़ हैं। सही कौल यह है कि अगर उज़रे शरई हो तो ऐसी सूरत में अज़्ल या कंडोम या दीगर चीज़ों का इस्तिमाल करना बिला कराहत जाइज़ है। मसलन बच्चा छोटा है जो माँ का दूध पी रहा है और शौहर को अन्देशा है कि जिमाअ़् करने पर हम्ल ठहर जायगा और हम्ल ठहर जाने से माँ का दूध खराब या बन्द हो जायगा और बच्चे के वालिद में किसी दाई को उजरत पर रख कर दूध पिलाने की ताक़त नहीं और बच्चे की हलाकत का ख़ौफ़ है या हम्ल ठहर जाने से बच्चे की विलादत में दुश्वारी होगी तो इन सूरतों में ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं।


💫शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी दूसरी जगह फरमाते हैं: "दवाओं का इस्तिमाल जिमाअ़् से पहले या जिमाअ़् के बाद कि हम्ल न रहने पाए अज़्ल के मानिन्द जाइज़ व दुरूस्त है।"


📍नोट:- यहाँ भी शाह साहिब की मुराद बतौरे ज़रूरत है। (अज़ मुअल्लिफ़) अल्लामा शामी फरमाते हैं:


✨मानेअ हम्ल(गर्भ निरोधक) या मुस्क़िते हम्ल अद्वियात (दवाओं) का इस्तिमाल इस सूरत में जाइज़ है जबकि इस्तिकरारे हम्ल न हुआ हो या इस्तिक़रारे हम्ल के बाद शिकमे मादर (माँ के पेट) में बच्चे की खिल्क़त ताम न हुई हो और न ही उसमें रूह डाली गई हो। इस सूरत में इस किस्म की अद्वियात का इस्तिमाल जाइज़ है लेकिन बच्चे की खिल्क़त ताम हो जाने और उसमें रूह फूंकने के बाद इस किस्म की दवाओं का इस्तिमाल नाजाइज़ व हराम है। 


💫इमामे अहले सुन्नत आलाहज़रत फाज़िले वरेलवी फरमाते हैं: .. "जान पड़ जाने के बाद इस्काते हम्ल(हम्ल का गिराना) हराम है और ऐसा करने वाला गोया कातिल है और जान पड़ने से पहले अगर कोई ज़रूरत है तो हर्ज नहीं।"


💫सय्यिदुना सरकारे आलाहज़रत दूसरी जगह फरमाते हैं: " ऐसी दवा का इस्तिमाल जिससे हम्ल न होने पाए, अगर किसी ज़रूरते शदीदा काबिले कबूल शरअ़ के सबब है तो हर्ज नहीं, वरना सख्त बुरा व मअयूब है और शर्अन ऐसा कस्द नाजाइज़ व हराम है।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  60/61


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               ✨अय्यामे हम्ल ✨


💫साहिबे गुनिय्या लिखते हैं: "जो हामिला औरत हम्ल की तक्लीफ़ बरदाश्त करती है तो, उसके लिये कायमुल्लैल और साइमुन्नहार (यानी पूरी रात इबादत करने और पूरे दिन रोज़ा रखने) का सवाब मिलता है। और अल्लाह की राह में जिहाद करने का अज्र मिलता है और जब उसे दर्दज़ह लाहिक होता है तो हर दर्द के बदले उसको एक गुलाम आज़ाद करने का सवाब मिलता है"।


✨औरत को अय्यामे हम्ल में काफी तक्लीफ़ होती है। औरत को चाहिये कि इस तक्लीफ़ को हंसी खुशी बरदाश्त करे, ज़बान पर कोई शिकवा शिकायत न लाए। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसी औरत के लिये पैशगोई फ़रमाई है कि औरत ज़मानए हम्ल से लेकर दूध छुड़ाने तक उस ग़ाज़ी की तरह है जो सरहदों की निगरानी करता है और अगर औरत दर्दज़ह की तकलीफ़ में इन्तिकाल कर जाए तो उसको शहादत का सवाब मिलता है।


हामिला औरत को चाहिये कि हम्ल के ज़माने में खुशो खुर्रम रहे, रंजो ग़म करीब में भी भटकने न दे। अक्सर गुस्ल करे, साफ़ सुथरे कपड़े पहने, गिज़ा हल्की मुअतदिल और मुकव्वी खाये, ज़्यादा सर्द या ज़्यादा गर्म चीज़ों से परहेज़ करे, खूबसूरत तस्वीरें देखे और अपने खूबसूरत रिश्तेदारों के पास बैठे, बे वक़्त सोने और जागने से परहेज़ करे, सक़ील और गर्म ग़िज़ा न खाये, सख्त बिस्तर पर न सोये, फल खुसूसन सन्तरे का इस्तिमाल ज़्यादा करे। सन्तरे का खाना औलाद के खूबसूरत होने की दलील है। दिलो दिमाग को गंदे और बुरे ख्यालात से पाको साफ़ रखे, इसलिये कि इसका असर कुद्रती तौर से बच्चे पर पड़ता है।


📖मसअलाः- औरत से अय्यामे हम्ल में भी हमबिस्तरी करना जाइज़ है मगर अतिब्बा(हकीमों) के नज़दीक जिमाअ़् न करना बेहतर है।


✨साहिबे गुनिय्या फरमाते हैं:

"हम्ल ज़ाहिर होने पर मर्द को लाज़िम है कि औरत की ग़िज़ा हराम बल्कि हराम के शुबह से भी पाक रखे ताकि बच्चे की नश्वो नुमा इस पर हो कि शैतान की वहाँ तक रसाई न हो सके। ज़्यादा बेहतर यह है कि हलाल गिजा की पाबन्दी पहले दिन ही से की जाय।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  61/62


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           ✨बच्चे की पैदाइश ✨


कुर्आन ए करीम में - अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है "और बेशक हमने आदमी को चुनी हुई मिट्टी से बानाया, फिर उसे पानी की बूंद किया एक मजबूत ठहराव में, फिर हमने उस पानी की बूंद को खून की फुटक किया, फिर खून की फुटक को गोश्त की बोटी, फिर गोश्त की बोटी को हड्डियां, फिर उन हड्डियों पर गोश्त पहनाया, फिर उसे और सूरत में उठान दी, तो बड़ी बरकत वाला है अल्लाह, सबसे बेहतर बनाने वाला।"


🕋खालिके कायनात ने पैदा करने का तरीका यह रखा है कि पहले नुत्फ़े की शक्ल में माँ के रहम में रखा, फिर उस नुत्फे को बस्ता खून - किया, फिर उस बस्ता खून को गोश्त का लोथड़ा किया, फिर उस - लोथड़े में हड्डियाँ बनाई, फिर उन हड्डियों पर गोश्त चढ़ाया, फिर उसे एक अच्छी सूरत में पैदा किया।


✨इसको इस तरह समझिये कि इस्तिक़रारे मनी के बाद नुतफ़ा एक सिफ़त से दूसरी सिफ़त की जानिब रफ़्ता रफ़्ता मुनतकिल होता है। यानी नुतफ़ा ठहरने के बाद खून के अज्ज़ा नुतफ़े से मखलूत होने लगते हैं। यहाँ तक कि अरबईने ऊला के बिल्कुल आखिरी दिनों में नुतफा बस्ता खून हो जाता है, फिर रफ़्ता-रफ़्ता बस्ता खून से गोश्त के अज्जा मखलूत होने लगते हैं। यहाँ तक कि अरबईने सानिया के बिल्कुल अख़ीर में वह गोश्त का लोथड़ा हो जाता है, फिर तीसरे चालीस में तस्वीरे इंसानी की तकमील अमल में आती है। इसके बाद रूह डाली जाती है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  63


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           ✨बच्चे की पैदाइश ✨


💫बच्चा कभी बाप के मुशाबह, कभी माँ के मुशाबह होता है। इसकी वजह यह है कि औरत के रहम में दो खाने होते हैं दायां खाना लड़के के लिए और बायां खाना लड़की के वास्ते और अगर मर्द का नुत्फा ग़ालिब आये तो लड़का बनता है और औरत का ग़ालिब पड़ा। लड़की बनती है। फिर अगर मर्द का नुत्फ़ा गालिब आया और रहम के सीधे खाने में पड़ा तो लड़का पैदा होगा ज़ाहिरो बातिन मर्द और अगर औरत का नुत्फ़ा ग़ालिब आया और रहम के बायें ख़ाने में पड़ा तो लड़की होगी ज़ाहिरो बातिन औरत और अगर मर्द का नुत्फ़ा ग़ालिब आया और रहम के बायें खाने में गिरा तो सूरतन तो लड़का होगा मगर दिल के ऐतिबार से ज़नाना होगा। उसे दाढ़ी मुंडाने, जेवर पहनने, हाथ पांव में मेंहदी लगाने, औरतों जैसे बाल रखने, जूड़ा बांधने वगैरह जनानी वज़ा का शोक होगा और अगर इस हालत में मर्द का नुत्फा खफ़ीफ़ गालिब हो तो वह बच्चा ज़नाना, ज़नखा बन जायगा और अगर औरत का नुत्फ़ा ग़ालिब आया और रहम के दाहिने खाने में गिरा तो होगी तो सूरतन लड़की मगर दिल के ऐतिबार से मर्दानी। उसे घोड़े पर चढ़ने, तलवार चलाने, साईकिल और मोटर साईकिल चलाने, मर्दाना जूता पहनने वगैरह मर्दानी वज़ा का शौक होगा।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  64


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             🗡️औलाद के कातिल 🗡️


इस दौर में हर आदमी अपने आपको तरक्की याफ्ता और मार्डन कहलवाना ज़्यादा पसंद करता है और अपने इसी जुअ़मे फ़ासिद में ऐसी हरकतें कर बैठता है जो आज से तकरीबन साढे चौदह सो(१४५०) साल पहले अरब के दरिन्दा सिफ़त इंसान किया करते थे बल्कि ये तो कुछ मआमलों में इनसे भी गये गुज़रे नज़र आते हैं। अरब में अगर किसी के घर लड़की पैदा होती तो लड़कियों का पैदा होना बाइसे नंग व आर और कबीह तसव्वुर करते थे और अपनी गैरियत व हैमिय्यत की के ख़ातिर उसे ज़िन्दा दरगोर कर देते थे और अगर किसी घर लड़का पैदा होता तो लाडो प्यार से उसकी परवरिश करते थे।  बस वही काम इस दौर में कुछ पढ़े लिखे मार्डन कहलाने वाले जाहिल कर रहे हैं लेकिन तरीका थोड़ा बदला हुआ है।


💫होता यह है कि तिब्बी जाँच(डॉक्टरी चेकअप) के ज़रिये मालूम कर लेते हैं कि औरत के पेट में लड़का है या लड़की? अगर लड़की मालूम होती है तो उसे ख़त्म कर देते हैं यानी हम्ल गिरा देते हैं और अगर मालूम हुआ कि लड़का है तो उसकी निगाहदाश्त रखते हैं ताकि पैदाईश के बाद अच्छी तरह उसकी परवरिश कर सकें।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  64 /65


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          🗡️औलाद के कातिल 🗡️


किस क़दर ज़ालिम हैं वह मर्द व औरत जो एक नन्ही सी जान को दुनिया में आँखें खोलने से पहले ही मौत की नींद सुला देते हैं। क्या ये ज़मान-ए-जाहिलियत के जाहिलों की पैरवी नहीं? क्या ये साफ़ खुला हुआ क़त्ल नहीं? ऐसी औरतें यक़ीनन माँ के रिश्ते पर एक बदनुमा दाग़ हैं, समाज के लिए एक नासूर हैं जो अपने शिकम(पेट) में परवान चढ़ रही औलाद को सिर्फ इसलिए सज़ा देती हैं कि वह एक लड़की है। क्या ये औरतें यह सोचने के लिए तैयार नहीं कि वे भी तो पहले अपनी माओं के पेट में थीं। अगर इनकी माएं इन्हें न जनतीं और पेट में ही खत्म कर देतीं तो क्या आज वे दुनिया में मौजूद होती?


📓कुर्आन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:


📝"तहक़ीक कि तबाह हुए वे जो अपनी औलाद को क़त्ल करते हैं अहमक़ाना जिहालत से।"


(सूरह इनआम)


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  65


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           🗡️औलाद के कातिल 🗡️


इसी तरह आज के दौर में बर्थ कन्ट्रोल (Birth Control) का तरीका उरूज पर है। यानी एक दो बच्चे पैदा होने के बाद या तो मर्द नसबन्दी करा लेता है या फिर औरत का आपरेशन करा देता है ताकि तवालुद व तनासुल का सिलसिला हमेशा के लिए खत्म हो जाए ऐसा करना इस्लाम में सख्त नाजाइज़ व हराम और अशद दर्जा गुनाह है इसी तरह बगैर उज़रे शरई के ऐसी दवाओं का इस्तेमाल करना हराम है जिनसे बच्चों की पैदाईश हमेशा के लिए बन्द हो जाए आजकल आम तौर पर लोगों में यह ख्याल पाया जा रहा है कि ज़्यदा" बच्चे होंगे तो खाने-पीने की किल्लत होगी, खर्च बढ़ जाएगा रहने-सहने के लिए जगह और मकान की तंगी होगी, शादी ब्याह का में परेशानी आएगी वगैरह वगैरह। यह ख्याल सिर्फ गैर मुस्लिमों का नहीं बल्कि आज के मार्डन मुसलमानों का भी है।


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          🗡️औलाद के कातिल 🗡️


यक़ीनन इस किस्म के बुरे ख्यालात शरीअ़्ते इस्लामी के बिल्कल ख़िलाफ़ हैं। मुसलमानों को ऐसा अकीदा रखना नाजाइज़ व हराम है। इंसान की क्या ताक़त कि वह किसी को खिलाए और किसी की परवरिश करे बल्कि हक़ीक़त में खिलाने, पिलाने वाला अल्लाह तआला है, वही सबको रोज़ी देता है।


 ✨कुर्आन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:


*"और ज़मीन पर चलने वाला कोई ऐसा नहीं जिसका रिज़्क अल्लाह के ज़िम्म-ए-करम पर न हो।" *


📓(सूरह हूद)


✨कुर्आन में दूसरी जगह रब्बे कायनात इरशाद फ़रमाता है:


"और अपनी औलाद को कत्ल न करो मुफ़लिसी के डर से, हम उन्हें भी रोजी देंगे और तुम्हें भी, बेशक क़त्ल बड़ी खता है ।


📓(सूरह बनी इस्राईल)


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  66


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            🗡️औलाद के कातिल 🗡️


📚हदीसः- हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद से मरवी है, उन्होने कहा कि मैंने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा? या रसूलल्लाह! कौन सा गुनाह सबसे बड़ा है?" फ़रमाया तू अल्लाह का किसी को शरीक ठहराये हालांकि उसने तुझे पैदा किया है, फिर पूछा इसके बाद कौन सा? फ़रमाया "तू अपनी औलाद को इस डर से क़त्ल करे कि वह तेरे साथ खायेगी ।


✨देखा आपने औलाद को क़त्ल करना कितना बड़ा गुनाह है। काश मुसलमान इस हदीस से इबरत हासिल करें और अपने बच्चों को माओं के पेट ही में क़त्ल करने से बचें।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  66/67


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🧕लड़कियों का पैदा होना बाइसे रह़मत है


पुराने ज़माने में लड़कियों का पैदा होना बाइसे नंग व आर समझा जाता था, समाज व मुआशिरे में बुरा तसव्वुर किया जाता था। अरब के लोग अपनी जिहालत व दरिंदगी का मुज़ाहिरा करते हुए कभी इसे भेंट चढ़ाते और कभी ज़िन्दा क़ब्र मे दफ़न कर देते थे। सदियों से यही पुरानी रस्म चली आ रही थी लेकिन मोहसिने इंसानियत के दुनिया में तशरीफ़ लाते ही इन बुरी रस्मों का खात्मा हो गया और आपने उन दरिन्दा सिफ़त इंसानों को इस्लाम के सांचे में ढाल दिया। ज़िन्दगी का सलीका सिखाया और सही मानों में इस्लाम का शैदाई बना दिया और आपने बबांगे दुहल दुनिया वालों को पैगाम सुना दिया कि लड़कियों का पैदा होना बाइसे ज़हमत नहीं बल्कि बाइसे रह़मत है। उनकी पैदाईश वबाले जान नहीं बल्कि जहन्नम से बचाने के लिए एक वसीला है। इनकी परवरिश अल्लाह व रसूल की खुशनूदी और जन्नत में जाने का एक ज़रिया है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  67


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🧕लड़कियों का पैदा होना बाइसे रह़मत है


📚हदीस:- हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है, उन्होंने कहा कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः

✨"जिस शख्स के लड़की पैदा हुई और उसने न उसको ज़िन्दा दफ़न किया, न उसे बेवक्अ़त समझा, न अपने बेटे को उस तरजीह दी तो अल्लाह तआला जन्नत में दाखिल फ़रमाएगा।


 📚हदीसः- हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है, उन्होंने कहा फ़रमाया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम नेः "जिसकी परवरिश में दो लड़कियां बुलूग तक रहीं तो क़यामत के दिन इस तरह आयगा कि मैं और वह बिल्कुल पास-पास होंगे। यह कहते हुए हुजूर ने उंगलियां मिला कर फ़रमाया कि इस तरह।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  67/68


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🧕लड़कियों का पैदा होना बाइसे रह़मत है


📚हदीसः- हज़रत सुराका बिन मालिक रदीयल्लाहु अन्हु से रिवायत है। कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "क्या मैं तुमको यह न बता दूं कि अफ़ज़ल सदक़ा क्या है? तुम्हारी बेटी जो तुम्हारे पास लौट कर आयी है (मुतल्लका या बेवा होने के सबब) उसका तुम्हारे सिवा कोई कफ़ील न हो।"


📚हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाय: "जो शख्स बेटियों के ज़रिये आज़माइश में डाला जाए और फिर वह उनके साथ अच्छा सुलूक करे तो ये बेटियां उसके लिए जहन्नम की आग से परदा बन जायेगी।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  68


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🧕लड़कियों का पैदा होना बाइसे रह़मत है


📚हदीसः- हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि उन्होंने कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम न फरमायाः "जिसने तीन बेटियों या उनकी मिस्ल बहनों की परवरिश का इन्तिजाम किया, फिर उनको इल्म व अदब से आरास्ता किया और उन पर मेहरबानी करता रहा, यहाँ तक कि अल्लाह तआला उनको बेनियाज़ कर दे यानी शादी कर दे तो अल्लाह तआला उसके लिए जन्नत वाजिब कर देता है। एक शख्स ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह! दो हों तो? हुजूर ने फ़रमाया दो हों तब भी, यहां तक कि लोगों ने अर्ज़ की अगर एक ही हो, फरमाया "अगरचे एक ही हो।"


📚हदीस:- नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जिस घर में लड़कियां होती हैं उस पर रोज़ाना आसमान से बारह रहमतें नाज़िल होती हैं और उस घर की फ़रिश्ते ज़्यारत करते रहते हैं। नीज़ उनके वालिदैन के हक़ में हर एक शबो रोज़ के बदले साल भर की इबादत लिखी जाती है।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  68/69


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🧕लड़कियों का पैदा होना बाइसे रह़मत है


✨इन हदीसों से लड़कियों की फज़ीलत और उनके बारे में हुस्ने सुलूक की ताकीद मालूम होती है। नीज़ इन अहादीस से पता चलता है कि लड़कियों की परवरिश करना और उनके साथ हुस्ने सुलूक करना जन्नत में जाने का सबब है। ये लड़कियां गोया ख़ुदा की तरफ़ से आज़माइश का सबब हैं। लिहाज़ा लड़कियों को नापसंद करना या उनसे नफ़रत करना खुदा के गज़ब को दावत देना है। कुर्आने करीम में लड़कियों से नाखुश होने को अह़दे जाहिलियत की अलामत करार दिया गया है। इरशादे बारी तआला है:


"और जब उनमें किसी को बेटी होने की खुशखबरी दी जाती है तो दिन भर उसका मुंह काला रहता है और वह गुस्सा खाता है।"


📓(सूरह नहल)

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा  69


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🧕लड़कियों का पैदा होना बाइसे रह़मत है


💫इस आयत से पता चला कि लड़कियों के पैदा होने पर रंज वह ग़म  करना काफ़िरों का तरीका है। लेकिल आज यह देखा जा रहा है कि अगर किसी घर में लड़की पैदा हो गई तो उस घर में सफे मातमबिछ जाती है और घर का घर रंजो अलम में डूब जाता है और खुशी के बजाए ग़म का बादल छा जाता है। लड़कियों को अपने ऊपर बोछ और वबाले जान समझने लगता है कभी-कभी बेचारी माँ डर की वजह से मौत के घाट उतार दी जाती है। वरना ज़िन्दगी भर के लिए अपने ससुराल वालों के लअ़्नत व तअन से दो चार रहती है। अल्लाह तआला उम्मते मुसलिमा को राहे हक़ की तौफीक अता फरमाएं।


 आमीन!


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 70


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         🍼बच्चे को दूध पिलाना🍼


_कुरान में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

"और माऐं दूध पिलाएं अपने बच्चों को पूरे दो बरस, उसके लिए जो दूध की मुद्दत पूरी करनी चाहिए।


 📓(सूरह अलबक्र)


📖मसअलाः- लड़की हो या लड़का दोनों को दो साल तक दूध पिलाया। जाए माँ बाप चाहें तो दो साल से पहले भी दूध छुड़ा सकते हैं मगर दो साल के बाद पिलाना मना है।


📚हदीसः- हज़रत अबू उमामा रदीयल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "शबे मेराज मैंने कुछ औरतें ऐसी देखीं जिनके पिस्तान लटके हुए और सर झुके हुए थे। उनके पिस्तानों को सांप डस रहे थे। जिब्रीले अमीन ने बताया या रसूलल्लाह! यह वे औरतें हैं जो अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाती थीं।


💫आज की औरतें इस हदीस से इबरत हासिल करें जो अपने बच्चे को दूध नहीं पिलातीं बल्कि गाय, भेंस या डिब्बे का दूध पिलाती हैं। जनका ख्याल है कि बच्चे को दूध पिलाने से औरत का हुस्न और इसकी खूबसूरती ख़त्म हो जाती है जबकि यह ख्याल सरासर बातिल और लग़्व है। हकीक़त यह है कि बच्चे को दूध पिलाना सिर्फ बच्चे ही के लिए मुफीद नहीं बल्कि खुद माँ के लिए भी मुफीद है। दूध पिलाने से न औरत में किसी किस्म की कोई कमज़ोरी आती है और न ही उसके हुस्न व जमाल पर कोई फर्क पड़ता है। जो माऐं अपने बच्चों को दुध नहीं पिलातीं वे अकसर छाती के मर्जों और दीगर जिल्दी बीमारियों में मुब्तिला हो सकती हैं। औरत के लिए बच्चे को दूध पिलाना जिस्मानी और दीनी दोनों ऐतिबार से फ़ायदे मंन्द है बल्कि औरत दूध पिलाकर बहुत बड़े सवाबे अज़ीम की मुसतहिक बनती है।

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 70/71


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         🍼बच्चे को दूध पिलाना🍼


🏥अतिब्बा(हकीमों) की तहक़ीक़ के मुताबिक़ माँ का दूध बच्चे के लिए सबसे ज़्यादा मुफीद है। माँ का दूध पीने से बच्चे को बीमारी कम पैदा होती है। मुशाहिदा शाहिद है कि जो बच्चे अपनी माँ का दूध पिते हैं वे ज़्यादा सेहतमन्द और तंदरूस्त रहते हैं। इसके बरखिलाफ जो बच्चे अपनी माँ के दूध से महरूम रहते हैं वे कमज़ोर होते हैं और मुखतलिफ़ अमराज़ में मुब्तिला रहते हैं।


‌_💫हिकायतः- हज़रत शैख़ इब्ने मुहम्मद जुवैनी रदियल्लाहु अन्हु अपने घर में आये तो देखा कि उनके बेटे इमाम अबुल मुआली को कोई दूसरी औरत दूध पिला रही है। आपने उससे बच्चे को छीन लिया और बच्चे के मुँह में उंगली डालकर तमाम दूध उलटी करा दिया और फ़रमाया “अच्छे दूध से शराफ़त पैदा होती है और जांकनी में आसानी।" जब इमाम अबुल मुआली रदीयल्लाहु अन्हु जवान हुए तो बहुत बड़े आलिम बने लेकिन कभी-कभी आप मुनाज़िरे में तंग दिल हो जाते थे और फ़रमाते थे कि शायद उसी दूध का असर मेरे पेट में रह गया है जिसका यह नतीजा है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 71/72


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           ✨शादी की रस्में✨


💕दूल्हा-दुल्हन को उबटन या हल्दी वगैरह मलना जाइज़ है। दूल्हा की उम्र अगर नो दस साल की हो तो अजनबी औरत भी उसके बदन में उबटन हल्दी वगैरह लगा सकती है। हाँ, अगर दूल्हा बालिग हो तो ना महरम औरत का उसके बदन पर हाथ लगाना नाजाइज़ है। शादी ब्याह के मौके पर अकसर जवान औरतें बालिग दूल्हा के बदन पर उबटन वगैरह मलती हैं, यह नाजाइज़ और सख्त हराम है। मुसलमानों को इससे एहतिराज़(बचना) लाज़िम है।


💫रस्मों की पाबन्दी करना उसी हद तक जाइज़ है कि किसी हराम काम का इरतिकाब न करना पड़े। कुछ लोग रस्मों की पाबन्दी इस तरह करते हैं कि हरामो नाजाइज़ काम तक कर बैठते हैं। अकसर जाहिलों में यह रिवाज है कि मोहल्ले या रिश्ते की औरतें जमा होती हैं और गाती ही हैं यह हराम है। अव्वलन ढोल बजाना हराम, फिर औरतों का गाना मजीद बरआं, औरतों की आवाज़ नामहरमों तक पहुंचाना यह अलैहदा हराम है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 72/73


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                ✨शादी की रस्में✨


आजकल तो शादियों में वीडियो या केमरे के ज़रिये तस्वीर कशी करवाना शादी का एक अहम हिस्सा बन चुका है। इधर काज़ी साहब ने निकाह पढ़ाया, उधर यह शैतानी आला सामने आ गया और फ़ोटो ग्राफी का अम्ल शुरू हो गया। जवान-जवान लड़कियां ज़र्क बर्क लिबास में मलबूस होकर हंस-हंस कर सबके सामने फोटो खिंचवा रही हैं। कोई उनको बुरा नहीं समझता, फिर इसी पर बस नहीं बल्कि यह शैतानी आला ज़नाने कमरे में पहुंचा और वहाँ हमारी माँ बहने बेनकाब होकर खूब मज़े ले-ले कर फोटो खिंचवाती हैं और फिर टीवी के स्क्रीन पर अपनी नुमाइश कराती हैं। जिन लोगों ने हमारी बहनों को कभी नहीं देखा था, वे अब टीवी के स्क्रीन पर बेनकाब देख रहे हैं। अल्लाह अल्लाह! कहाँ गया मुसलमानों का एहसास और कहाँ गई इनकी गैरते ईमानी? अल्लाह तआला तमाम मुसलमानों को राहे हक पर चलने की तौफीक अता फ़रमाये। बअज़ जगह शादियों के मौके पर रात भर आतिशबाजी करते हैं, यह भी हराम है, इसमें माल बर्बाद करना है। लिहाज़ा जिन शादियों में ऐसी हरकतें हों मुसलमानों पर लाज़िम है कि उनमें हरगिज़ शरीक न हों।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 73/74


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            ✨तलाक़ का बयान ✨


💔निकाह से जो दो अजनबियों के दरमियान एक रिश्ता और तअल्लुके ख़ास पैदा हुआ था , उसी रिश्ते और तअल्लुक को तोड़ देने का नाम तलाक है । तलाक़ शरीअत में अगरचे एक मुबाह चीज़ है लेकिन उसका इस्तेमाल ख़ास दुश्वारियों और परेशानियों के वक़्त करना चाहिए । ऐसा नहीं कि मियाँ - बीवी में हल्की फुल्की कोई बात हुई या औरत में कुछ कमी देखी और फ़ोरन तलाक दे बैठे । बल्कि आपस में पहले मेल - मिलाप और सुलह का रास्ता इख्तियार करना चाहिए । कुर्आने मुक़द्दस में रब्बे कायनात इरशाद फ़रमाता है :


" फिर अगर वे तुम्हें पसंद न आयें तो करीब है कि कोई चीज़ तुम्हें नापसंद हो और अल्लाह उसी में बहुत भलाई रखे। " 


( सुरह अलनिसा )


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 74


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            ✨तलाक़ का बयान ✨


कुर्आन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:


"यह तलाक़ दो बार तक है, फिर भलाई के साथ रोक लेना है या निकोई के साथ छोड़ देना है।"


(सूरह अलबकरह)


 📚हदीसः- हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रदियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः

"तमाम हलाल चीज़ों में सबसे ज़्यादा नापसंद चीज़ अल्लाह के नज़दीक तलाक है।" 

यानी अगरचे अशद हाजत के वक़्त इसको इस्तेमाल करने की ज़रूरत है लेकिन फिर भी यह काम अल्लाह को पसंद नहीं। 


📚हदीस:- हज़रत सोबान रदीयल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः

"जो औरत बगैर किसी हरज के शौहर से तलाक का सवाल करे, उस पर जन्नत की खुश्बू हराम है।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 75


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            ✨तलाक़ का बयान ✨


📚हदीस:- हज़रत मआ़ज रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशादा फ़रमायाः

"ऐ मआज़! अल्लाह तआला ने कोई चीज़ गुलाम अज़ाद करने से ज़्यादा पसंदीदा रूए ज़मीन पर पैदा नहीं की और चीज़ ज़मीन पर तलाक़ से ज़्यादा नापसंदीदा पैदा न की।"


📚हदीसः- हज़रत जाबिर रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः

"इबलीस अपना तख्त पानी पर बिछाता है और अपने लश्कर को भेजता है और सबसे ज़्यादा मर्तबे वाला उसके नज़दीक वह है जिसका फ़ितना बड़ा होता है। उनमें एक आकर कहता है 'मैंने यह किया, यह किया।' इबलीस कहता है 'तूने कुछ नहीं किया।' दूसरा आता है और कहता है 'मैंने मर्द और औरत में जुदाई डाल दी यानी तलाक दिलवा दी। यह बात सुनकर इबलीस बहुत खुश हो जाता है और उसे अपने करीब कर लेता है और कहता है हाँ, तू है, हाँ, तू है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 75/76


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            ✨तलाक़ का बयान ✨


💫 तलाक़ हुक्म व नतीजे के एतिबार से तीन क़िस्म पर है:


1.रजई, 2.बाइन, 3.मुग़ल्लज़ा।


1. रजई :- वह तलाक़ है जिससे औरत फ़िलहाल निकाह से नहीं निकलती, हाँ, अगर इद्दत गुज़र जाए और रजअ़्त न करे तो अब निकाह से निकल जाएगी। इसमें शौहर को इद्दत के अन्दर लौटाने का हक़ रहता है। 


2. बाइन :- वह तलाक़ है जिससे औरत निकाह से फ़ौरन निकल जाए, इसमें शौहर बीवी की रजामन्दी से दोबारा निकाह कर सकता है, इद्दत के अन्दर हो या इद्दत के बाद।


3. मुगल्लज़ा :- वह तलाक़ है जिसमें औरत निकाह से फौरन इस तरह से निकल जाती है कि बगैर हलाला शौहर के लिए हलाल नहीं रहती। मुग़ल्लजा तीन तलाक़ों से होता है ख़्वाह एक साथ दी हों या बरसों के फॉस्ले से, अलफ़ाज़े सरीहा(साफ़ लफ़्ज़ों) से दी हों या किनाया (इशारे) से।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 76/77


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            ✨तलाक़ की किस्मे ✨


📖 मसअ्लाः- तलाक देना जाइज़ है मगर बेवजह शरई मकरूह व ममनू है और शरई वजह हो तो मुबाह बल्कि बअज़ सूरतों में मुस्तहब है। मसलन औरत अपने शौहर को या औरों को तकलीफ देती है या नमाज़ नहीं पढ़ती। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रदियल्लाहु अन्ह फ़रमाते कि बेनमाज़ी को तलाक दे दूं अगरचे उसका मेहर ज़िम्मे बाक़ी हो, इस हालत के साथ दरबारे खुदाबन्दी में मेरी पैशी हो तो यह इससे बेहतर है कि उसके साथ ज़िन्दगी बसर करूं। और बअज़ सूरतों में तलाक़ देना वाजिब है। मसलन शौहर नामर्द या हिजड़ा है या उस पर किसी ने जादू या अमल कर दिया है कि जिमाअ़् ( सोहबत ) करने पर कादिर नहीं और इसके इज़ाले की भी कोई सूरत नज़र नहीं आती तो इन सूरतों में तलाक़ न देना सख्त तकलीफ़ पहुंचाना है।


📖 मसअलाः- हालते हैज़ में तलाक देना हराम व गुनाह है। अगर किसी ने तलाक दे दी तो ' रजअ़्त ' वाजिब है।


📖 मसअलाः- माँ - बाप औरत को तलाक देने का हुक्म दें और न देने में इनकी ईज़ा व नाराज़गी हो तो तलाक़ देना वाजिब है, अगरचे औरत का‌‌ कुसूर न हो।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 77


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                     🍱खाने का बयान 🍱✨



कुरान में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

"हलाल व पाक खाना खाओ और अच्छे अमल करो।"


✨जो कोई इस इरादे से खाना खाए कि मुझे इल्म व अमल की क़ुव्वत और आख़िरत की राह चलने की क़ुदरत हासिल हो, उसका खान पीना भी इबादत है। इसलिए रसूले कायनात सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि मुसलमान को हर चीज़ पर सवाब मिलता है। यहाँ तक कि उस लुकमे पर भी जो अपने मुंह या अपने बाल बच्चों के मुंह में डाले। बसा औक़ात खाना खाना ज़रूरी व फर्ज़ हो जाता है। लिहाजा हमें चाहिए कि जब खाना खाएं तो सुन्नते नबवी के मुताबिक़ खाएं। इस तरह खाने में खाना भी खा लिया जाएगा और मुफ़्त में सवाब भी मिल जाएगा।


📚 हदीस:- हज़रत अबु हरैरह रदियल्लाहु अन्हु से मरवी कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः

"तुम में से कोई खाना खाए तो दाएं हाथ से और पिये तो दायें हाथ से और किसी से कुछ ले तो दाएं हाथ से और दे तो दाएं हाथ से क्योंकि शैतान बाएं हाथ से खाता, पीता और बाएं हाथ से ही लेता-देता है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 77/78


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             🍱खाने का बयान 🍱✨


📚हदीसः- हज़रत आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः

"जब कोई आदमी खाना खाए तो बिस्मिल्लाह पढ़े और अगर शुरू में बिस्मिल्लाह पढ़ना भूल जाए तो यूंकहे “बिस्मिल्लाहि अव्वलहू व आखिरहू"


📚 हदीस:- उमय्या बिन मख़शी से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तशरीफ़ फ़रमा थे और एक आदमी बगैर बिस्मिल्लाह पढ़े खाना खा रहा था, जब खाना खा चुका सिर्फ एक लुकमा बाकी रह गया तो जब यह लुकमा उठाया और पढ़ा "बिस्मिल्लाहि अव्वलहू व आखिरहू" तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु लैहि वसल्लम देख कर मुस्कुरा उठे और आपने फ़रमायाः "शैतान इसके साथ खा रहा था, जब इसने अल्लाह का नाम लिया तो जो कुछ उसके पेट में था उगल दिया।


📚हदीसः- "हज़रत सलमान रदियल्लाहु अन्हु ने कहा मैंने 'तौरात' में , पढ़ा था कि खाने की बरकत का सबब इससे पहले वजू करना (यानी हाथ, मुंह धोना है) मैंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से इसका जिक्र किया तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "खाने की बरकत खाने से पहले और खाने के बाद वजू करने यानी हाथ, मुंह धोने में है।"


📚हदीस:- हज़रत जाबिर रदियल्लाहु तआला अन्हु से मरवी कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः तहक़ीक़ कि शैतान तुम्हारे हर काम में हाज़िर हो जाता है, यहाँ तक कि खाना खाने के वक़्त भी हाज़िर हो जाता है। जिहाज़ा अगर कोई लुकमा गिर जाए और उसमें कुछ लग जाए तो साफ़ करके खा ले, उसे शैतान के लिए न छोड़े और जब खाने से फ़ारिग हो जाए तो उंगलियां चाट ले क्योंकि यह मालूम नहीं कि खाने के किस हिस्से में बरकत है।''


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 79


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               खाने का बयान 


📚हदीस:- हज़रत आयशा सिद्दीका रदियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दौलतकदे में तशरीफ़ लाए, रोटी का टुकड़ा पड़ा हुआ देखा, आपने उसे लेकर साफ़ किया, फिर तनावुल फ़रमाया लिया और कहाः "ऐ आयशा! अच्छी चीज़ का एहतिराम करो कि यह चीज़ यानी रोटी वगैरह जब किसी कोम से भागती है तो लोट कर नहीं आती।"


📚हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः “आदमी ने पेट से ज़्यादा बुरा कोई बर्तन नहीं भरा। इब्ने आदम को चन्द लुकमे काफ़ी हैं जो उसकी पीठ को सीधा रखें। अगर ज़्यादा खाना ज़रूरी हो तो तिहाई पेट खाने के लिए और तिहाई पानी के लिए और तिहाई सांस के लिए।"


📚हदीस:- हज़रत आयशा सिद्दीका रदियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दौलतकदे में तशरीफ़ लाए, रोटी का टुकड़ा पड़ा हुआ देखा, आपने उसे लेकर साफ़ किया, फिर तनावुल फ़रमाया लिया और कहाः "ऐ आयशा! अच्छी चीज़ का एहतिराम करो कि यह चीज़ यानी रोटी वगैरह जब किसी कोम से भागती है तो लोट कर नहीं आती।"


📚हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः “आदमी ने पेट से ज़्यादा बुरा कोई बर्तन नहीं भरा। इब्ने आदम को चन्द लुकमे काफ़ी हैं जो उसकी पीठ को सीधा रखें। अगर ज़्यादा खाना ज़रूरी हो तो तिहाई पेट खाने के लिए और तिहाई पानी के लिए और तिहाई सांस के लिए।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 79/80


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                 खाने का बयान 


📚हदीस:- हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जब कोई खाना खाए या पानी पिये तो यह कह लेः

بِسْمِ اللّٰهِ الَّذِیْ  لَایَضُرُّ مَعَ اسْمِهٖ شَیْیٌ فِی الْاَرْضِ وَلَا فِی السَّمَآءِیَا حَیُّ یَا قَیُّوْم०

📝तर्जमा : अल्लाह के नाम से और अल्लाह की मदद से जिसके नाम के साथ कोई चीज़ ज़रर ( नुकसान ) देने वाली नहीं न ज़मीन में न आसमान में ऐ हय्यु ( अमर ) ऐ कय्यूम ( काइम रखने वाला ) फिर उसे कोई बीमारी न होगी अगरचे उसमें जहर हो ।


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः " खाने को ठण्डा करके खाओ , गर्म खाने में बरकत नहीं और खाने को न सूंघो कि यह चोपायों का तरीका है ।


📚हदीसः- हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रदियल्लाहु अन्हु से मरवी कि उन्होंने हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को इरशाद फ़रमाते सुनाः " जब आदमी अपने घर में दाखिल हो और दाखिल होने से पहले और खाने से पहले बिस्मिल्लाह कह ले तो शैतान अपनी जुर्रियत से कहता है कि अब तुम इस घर में न रात को रह सकोगे , न यहाँ खाने में शरीक हो सकोगे , अब यहाँ से भागो । इसके बरख़िलाफ़ जब कोई आदमी घर में दाखिल होते वक़्त और खाना खाते वक़्त अल्लाह का नाम नहीं लेता तो शैतान अपनी जुर्रियत से कहता है कि तुमको आज रात का ठिकाना मिल गया और रात का खाना भी मिल गया ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 80/81


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                      खाने का बयान 


📜मसअ्लाः- भूक से कम खाना चाहिए और पूरी भूक खा लेना मुबाह है यानी न सवाब है, न गुनाह क्योंकि इसका भी सही मक़सद हो सकता है कि ताकत ज़्यादा होगी। शहवत पैदा करने के लिए भूक से ज़्यादा खा लेना हराम है यानी इतना खा लेना जिससे मैदा खराब होने का अन्देशा हो ।


📜मसअ्लाः- रोज़े की कुव्वत हासिल करने के लिए या मेहमान का साथ देने के लिए इतना ज़्यादा खाना मुसतहब है जितने में मैदा खराब होने का अन्देशा न हो।


📜मसअ्लाः- भूक का इतना गल्बा हो कि न खाने से मर जाएगा तो इतना खा लेना जिससे जान बच जाए फ़र्ज़ है। इस सूरत में अगर नहीं खाया यहाँ तक कि मर गया तो गुनाहगार हुआ, इतना खा लेना कि खड़े होकर नमाज़ पढ़ने की ताक़त आ जाए और रोज़ा रख सके तो इतनी मिकदार खा लेना ज़रूरी है और इसमें सवाब भी है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 81


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                      खाने का बयान 


📜मसअ्लाः- इज़तिरार की हालत में जबकि जान जाने का अन्देशा है अगर हलाल चीज़ खाने के लिए नहीं मिलती तो हराम चीज़ या मुरदार या दूसरे की चीज़ खाकर अपनी जान बचाए और इन चीज़ों के खा लेने पर मुवाख़िज़ा ( पकड़ ) नहीं बल्कि न खाकर मर जाने में मुवाखिज़ा है , अगरचे दूसरे की चीज़ खाने में तावान देना पड़े ।


📜मसअ्लाः- यूंही प्यास से हलाक होने का अन्देशा है तो कोई भी चीज़ पी कर अपने को हलाकत से बचाना फ़र्ज़ है । पानी नहीं है और शराब मौजूद है और मालूम है कि इसके पी लेने से जान बच जाएगी तो इतनी पी ले जिससे यह अन्देशा जाता रहे ।


📜मसअ्लाः- सेर होकर खाना ताकि नवाफ़िल कसरत से पढ़ सकेगा और पढ़ने-पढ़ाने में कमज़ोरी पैदा न होगी मुसतहब और सेरी से ज़्यादा खाना मगर इतना ज़्यादा नहीं कि शिकम खराब हो जाए मकरूह है। इबादत गुज़ार आदमी को इख्तियार है कि बक़दरे मुबाह तनावुल करे या बक़दरे मनदूब मगर उसे यह नियत करना चाहिए कि इसलिए खाता हूं कि इबादत की कुव्वत पैदा होगी, इस नियत से खाना एक किस्म की ताअ़त है और खाने से मक़सद तलज्जुज़ व तनउम न हो कि यह बुरी सिफ़त है। 


📜मसअ्लाः- रियाज़त व मुजाहिदा में इतना कम खाना कि इबादते मफ़रूज़ा की अदायगी में कमज़ोरी लाहिक हो जाएगी मसलन इतनी कमज़ोरी लाहिक हो जाएगी कि खड़े होकर नमाज़ नहीं पढ़ सकेगा, यह नाजाइज़ है और अगर इस हद की कमज़ोरी पैदा न हो तो हरज नहीं।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 82


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          ✨मेहमान नवाज़ी की फज़ीलत ✨


💫मेहमान नवाज़ी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बगैर मेहमान के खाना तनावुल न फरमाते थे आपके घर कोई मेहमान न होता तो आप मेहमान की तलाश में एक दो मील दूर निकल जाते थे , जबतक मेहमान न मिलता खाना तनावुल न फ़रमाते मेहमान का आना रह़मते खुदावन्दी के नुज़ूल का ज़रिया है मेहमान ज़ेहमत नहीं बल्कि खुदा की रहमत लेकर आता है जिस घर में मेहमान को खाना खिलाया जाता है , वहाँ खुदा की रह़मत उमड़ आती है ।मेहमान खुद अपनी किस्मत का खाता है इसलिए मेहमान के आने पर इज़हारे मसर्रत करना चाहिए मेहमान को हिकारत की नज़र से देखना और उसके आने पर नाखुश होना इफ़लास व तंगदस्ती का सबब है।


📚 हदीसः- हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः "उस आदमी में कोई भलाई नहीं जो मेहमान नवाज़ नहीं।"


📚 हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः "जब तुम्हारे घर मेहमान आये तो उसकी ताज़ीम करो।"


📚 हदीसः-- हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जिस घर में खाना खिलाया जाता है, भलाई उसकी तरफ़ कोहान की तरफ जाने वाली छुरी से ज़्यादा तेजी के साथ दोड़ती है।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 83


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        ✨मेहमान नवाज़ी की फज़ीलत ✨


📚 हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः"मेहमान अपना रिज़्क लेकर आता है और खिलाने वालों के गुनाह लेकर जाता है, उनके गुनाह मिटा देता है।"


✨ग़र्ज़ कि मेहमान नवाज़ी करने में बड़ी फ़ज़ीलत है। हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं: "जिस घर में मेहमान न आये, उसमें रहमत के फ़रिश्ते दाखिल नहीं होते। जब तुम्हारे घर कोई मेहमान आये तो उसके लिए तकल्लुफ़ न करो, जो कुछ हाज़िर हो उसके सामने पेश करो।"


📚 हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः"मेहमान के लिए तकल्लुफ़ न करो क्योंकि जब तकल्लफ़ करोगे तो उसके साथ दुश्मनी रखोगे और जो शख्स मेहमान से दुश्मनी रखेगा, वह खुदा के साथ दुश्मनी रखेगा और जो खुदा के साथ दुश्मनी रखेगा, उसका अंजाम बुरा होगा।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 83


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      ✨खाना खाने की फज़ीलत ✨


📚हदीसः- लोगों ने अर्ज़ की या रसूलल्लाह! हम खाते हैं और पेट नहीं भरता। इरशाद फ़रमाया "शायद तुम लोग अलग-अलग खाते हो। अर्ज़ की, हाँ, फ़रमाया "इकट्ठे होकर खाया करो और बिस्मिल्ला पढ़ो, खाने में बरकत होगी।"


📚हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "खाने में बेहतर वह है जिसमें खाने वाले ज़्यादा हों।"


📚हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः "जो शख्स किसी मुसलमान भाई को पेट भर खाना खिलाए या पानी पिलाए, हक़ तआला उसको दोज़ख की आग से सात खंदक दूर रखेगा और हर एक खंदक के दरमियान पांच सो बरस की मुसाफ़त है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 84


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      ✨खाना खाने की फज़ीलत ✨


💫दोस्त व अहबाब या दीनी भाई की ज़्याफ़त करना और उसके साथ खाना खाना भारी मिक़दार में सदक़ा करने से अफ़ज़ल है। नीज़ खाने में बरकत होती है, क़यामत के दिन उस खाने का हिसाब नहीं होगा और अल्लाह तआला खिलाने वालों के लिए फल का दरवाज़ा कुशादा फ़रमा देता है। लिहाज़ा हमें चाहिए कि मोमिन भाईयों को खिलाएं और उनके साथ खूद भी खाएं। 


📚हदीस शरीफ़ में है कि तीन चीज़ों का बन्दे से हिसाब नहीं लिया जायगा एक तो वह चीज़ जो सहरी में खायेगा दूसरी जिससे रोज़ा इफ्तार परेगा तीसरा जो कुछ दोस्तों के साथ खायेगा हज़रत ह़सन बसरी अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं बन्दा जो कुछ खाता पीता है और अपने माँ बाप को खिलाता है उसका हिसाब होगा और जो खाना दोस्तों के साथ खाता है उसका हिसाब न होगा। इसलिए बअज़ बुजुर्गाने दीन से मनकूल है कि वह मेहमान के सामने ज़्यादा से ज़्यादा खाना पेश करते थे ताकि जो खाना बच जाए उससे खुद खाएं और घर वालों को खिलाएं


✨बिलखुसूस भूकों को खिलाने में ज़्यादा फ़ज़ीलत व सवाब है। हदीस शरीफ़ में है कि हक़ तआला क़यामत के दिन फ़रमायगा "ऐ बनी आदम (आदम की औलाद) ! मैं भूका था और तूने मुझे खाना न दिया।" बन्दा अर्ज़ करेगा “ऐ रब ! तू क्योंकर भूका होता ? तू तो सारे आलम का मालिक है, तुझको खाने पीने की कुछ हाजत नहीं।" इरशाद होगा “तेरा भाई भूका था, अगर तू उसको खाना खिलाता तो गोया मुझको खिलाता। "


💫इससे मालूम हुआ कि भूकों को खाना खिलाना गोया रब को खिलाना है। दूसरी हदीस में है कि तुम में सब से बेहतर वह है जो खाना खिलाए।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 84/85


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          ✨खाने से पहले के आदाब ✨        


✨(1) दोनों हाथ, मुँह धोकर खाना। हदीस शरीफ़ में है कि जो कोई खाने से पहले हाथ धोया करे वह इफलास व तंगदस्ती से बेफ़िक्र रहेगा।


✨(2) खाना दस्तरख्वान पर रखना। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ऐसा ही किया करते थे, क्योंकि सफ़रह यानी (दस्तरख्वान) सफ़र याद दिलाता है और सफ़रे दुनिया सफ़रे आख़िरत याद दिलाता है और दस्तरख्वान पर खाना तवाज़ो व इनकिसारी से करीब है। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दस्तरख्वान पर ही खाना तनावुल फ़रमाते थे।


✨(3) नियत यह हो कि इबादत की कुव्वत के लिए खाता हूं ख्वाहिश के लिए नहीं। इसकी अलामत यह है कि थोड़ा खाने इरादा करे, ज़्यादा खाना इबादत से रोकता है। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया छोटे-छोटे चन्द लुकमे जो आदमी की पीठ सीधी रखें, काफ़ी हैं, अगर इस पर क़नाअत न हो सके तो एक तिहाई पेट खाने के लिए एक तिहाई पानी के लिए और एक तिहाई सांस के लिए यानी दो हिस्सा पेट में खाना पानी भरे और एक हिस्सा सांस लेने के लिए ख़ाली रखे।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 85/86


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          ✨खाने से पहले के आदाब ✨        


✨(4) जब तक भूक न हो खाने की तरफ़ हाथ न बढ़ाये, खाने से पहले जो चीजें सुन्नत हैं उनमें से बेहतरीन सुन्नत भूक है। इसलिए कि भूक से पहले खाना मकरूह भी है और मज़मूम(बुरा) भी जो शख्स खाना शुरू करते वक़्त भी भूका हो और खाने से हाथ खींचते वक़्त भी भूका रहता हो वह हरगिज़ तबीब(डॉक्टर) का मोहताज न होगा। 


✨(5) जो कुछ हाज़िर हो उस पर क़नाअत करे, उम्दा खाना न ढूंडे।


✨(6) जिसके साथ खाना खाता है जबतक वह न आये, खाना शुरू न करे कि तन्हा खाना अच्छा नहीं और खाने में जितने अफराद ज़्यादा होंगे, उतनी ही बरकत ज़्यादा होगी। हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अकेले हरगिज़ खाना तनावुल न फ़रमाते थे।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 86


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          ✨खाने से पहले के आदाब ✨        


'बिस्मिल्लाह' पढ़कर शुरू करना और खाने के बाद 'अलहम्दु लिल्लाह' पढ़ना। बेहतर यह है कि पहले निवाले में कहे 'बिस्मिल्लाह' दूसरे में 'बिस्मिल्लाहिर्रहमान' तीसरे " में मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम'। 'बिस्मिल्लाह' ज़ोर से कहे कि साथ वालों को अगर याद न हो तो उससे सुनकर उन्हें याद आजाए। दाहिने हाथ से खाए, नमक से इब्तिदा करे और नमक ही पर खत्म करे यानी पहले नमकीन खाना खाये और फिर बाद में भी नमकीन चीज़ खाये। इससे सत्तर (70) बीमारियां दफ़ा हो जाती हैं। तकिया लगाकर न खाए कि यह अदब के खिलाफ है।


हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया कि मैं तकिया लगाकर खाना नहीं खाता कि मैं बन्दा हूँ और बन्दों की तरह बैठता और बन्दों के तरीकों से खाता हूँ। नंगे सर न खाएं कि यह अहले हुनूद का तरीका है और ख़िलाफ़े सुन्नत। बायें हाथ को ज़मीन पर टेक देकर खाना मकरूह है। अगर शुरू में 'बिस्मिल्लाह' कहना भूल जाए तो जब याद आ जाए 'बिस्मिल्लाहि फ़ी अव्वलिही व आखिरिही कह ले। खाने के वक़्त अच्छी तरह बायां पांव बिछा दे और दाहिना पांव खड़ा कर दे या सुरीन पर बैठे और दोनों घुटने खड़े रखे। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से यही दो तरीके साबित हैं।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 86/87


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             ✨खाने खाने के आदाब ✨        


✨(1) गर्म खाना न खाए और न खाने पर फूंके, न खाने को सूंघे। 


✨(2) खाने के वक़्त अच्छी बातें करे, बिल्कुल चुप रहना मजूसियों का तरीका है। 


✨(3) खाने के वक़्त जो निवाला गिर जाए उसे उठा ले और साफ़ करके खा ले। 


✨(4) हदीस शरीफ में है कि अगर छोड़ देगा तो शैतान के लिए छोड़ेगा। 


✨(5) किसी खाने में ऐब न निकाले। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हरगिज़ खाने में ऐब नहीं निकालते। अगर अच्छा होता तो तनावुल फ़रमा लेते, वरना हाथ रोक लेते। 


✨(6) अपने सामने से खाये, दूसरों के निवाले की तरफ़ न देखे।


✨(7) दस्तरख्वान पर हरी चीज़ हो तो बेहतर है यानी पर सब्जी वगैरह। हदीस शरीफ में है कि दस्तरख्वान पर जब हरी चीज़ होती है तो फ़रिश्ते हाज़िर होते हैं।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 87/88


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         ✨खाने के बाद के आदाब ✨


_पेट भरने से पहले ही हाथ खींच ले, खाने के बाद उंगलियां चाट ले इनमें जूठा न लगा रहने दे और बर्तन को उंगलियों से पोंछ कर चाट ले। हदीस शरीफ़ में है जो शख्स खाने के बाद बर्तन चाटता है तो वह बर्तन उसके लिए दुआ करता है। कहता कि अल्लाह तुझे जह़न्नम की आग से आज़ाद करे जिस तरह तूने मुझे शैतान से आज़ाद किया। एक रिवायत में है कि बर्तन उसके लिए इस्तिग़फ़ार करता है। फिर हाथ रूमाल वगैरह से पोंछ ले। अगर दस्तरख्वान पर रोटी के टुकड़े वगैरह पड़े हों तो चुनकर खा ले। हदीस शरीफ़ में है कि जो दस्तरख्वान पर गिरी हुई चीज़ रोटी वगैरह के टुकड़े को उठा कर खा लेगा तो अल्लाह तआला उसके रिज़्क़ में कुशादगी अता फरमाएगा और उसकी औलाद बे ऐब और सेहत व सलामती के साथ रहेगी।


💫बअज़ रिवायत में है कि उठाकर खाने वाला मोहताजी, कोढ़ और बर्स की बीमारी से महफूज़ रहता है और उसकी औलाद हिमाकत से महफूज़ रहती है। खाने के बाद यह दुआ पढ़ेः

٠اَلْحَمْدُ لِلّٰهِ الَّذِیْ‌ اَطْعَمَنَا وَ سَقَانَا وَ جَعَلَنَا مِنَ الْمُسْلِمِیْمنَ٠


अलहम्दु लिल्लाहिल्लज़ी अतअमना व सकाना व जअलना मिनल मुस्लिमीन०" इसके बाद ‘कुल हुवल्लाह शरीफ़' और 'लेईलाफ़ शरीफ़' पढ़े।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 88


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         ✨किसी के घर बगैर दावत जाना ✨


💫 आजकल आमतौर पर देखा जा रहा है बल्कि रिवाज सा बन गया है कि लोग शादी ब्याह या वलीमे की दावत में बिन बुलाए चले जाते हैं। खुद भी जाते हैं और अपने दो चार बच्चों को भी साथ लेकर जाते हैं। अगर खुद न भी गए तो दो चार बच्चों को शादी वालों के घर मुफ़्त खाने के लिए भेज देते हैं। ताकि एक दो टाईम का खाना ही बच जाए और कभी ऐसा भी होता है कि शादी वाला घर के एक फर्द की दावत करता है तो उसके यहाँ एक के बजाए पूरा घर पहुंच जाता है। यह कितनी शर्म व गैरत की बात है ? न ही अपनी इज़्ज़त का ख्याल और न ही अल्लाह व रसूल का डर मुसलमानो ! अल्लाह और उसके रसूल का ख़ौफ़ खाओ, बगैर बुलाए किसी के घर दावत में हरगिज़ न जाओ बिला दावत किसी के घर खाने के लिए जाना सख्त नाजाइज़ है।


📚हदीस शरीफ़ में है कि जो बगैर बुलाए दावत में गया वह चोर बनकर गया और लुटेरा हो कर निकला ।


✨इस हदीस से मुसलमान भाईयों को इबरत पकड़नी चाहिए जो बिन बुलाए दावत में चले जाते हैं या अपने बच्चों को भेज देते हैं हाँ , अगर कोई वलीमे की दावत करे तो दावत कबूल करना सुन्नत है बलिक बअज़ उलमा के नज़दीक वाजिब है इस सिलसिले में दोनों ही कौल हैं बज़ाहिर यही मालूम होता है कि इजाबत सुन्नते मोअक्कदा है वलीमे के सिवा दूसरी दावतों में भी जाना अफ़ज़ल है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 89


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        ✨दावत को कबूल न करना ✨


📚हदीस:- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जिसको दावत दी गई और उसने कबूल न की तो उसने अल्लाह और उसके रसूल की नाफरमानी की।"


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जब तुम में से किसी को वलीमा के खाने के लिए बुलाया जाए तो ज़रूर जाए।"


✨इन हदीसों से मालूम हुआ कि दावत कबूल करना और दावत । जाना नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है। लिहाजी दावत मिलने पर दावत में जाना चाहिए। इसमें अपने मोमिन भाई को दिलजोई है और आपस में मेल मिलाप और महब्बत का ज़रिया है।


📜मसअलाः- दावते वलीमा कबूल करना उसी वक़्त सुन्नत है जबकि दावत में कोई मुनकिराते शरीअह ढोल, तमाशे, गाने, बजाने, लहव व लअब वगैरह न पाया जाता हो। बाक़ी आम दावतों का कबूल करना अफ़ज़ल है, जबकि न कोई मानेअ हो और न उससे ज़्यादा अहम काम हो।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 89/90


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        ✨दावत को कबूल न करना ✨


📜मसअलाः- जिस शादी की बारात में बाजे, खैल, तमाशे वगैरह हों तो आलिमे दीन को बारात के साथ जाना मुतलकन मना है। हरगिज़ शिरकत न करे, बाकी आम आदमी कि वह बाजे वगैरह की तरफ बिल्कुल तवज्जेह न करे बल्कि महज़ सुले रहमी या दोस्ती की रिआयत के सबब बारात में शरीक हो कर जाय तो जा सकता है।



📜मसअलाः- दावत में बारात के घर जाना अगर बाजे वगैरह दूसरे मकान में हों तो हरज नहीं। अगर आलिम मुक़तदा के लिए तीन सूरतें हैं। अगर आलिम जानता है कि मेरे जाने से मुनकिरात बन्द हो जायेंगे और मेरे सामने न करेंगे तो जाना ज़रूरी है और अगर जानता है कि मेरी खातिर उन लोगों को इतनी अज़ीज़ है कि मैं शिरकत से इन्कार करूंगा तो व मजबूरन ममनूआत से बाज़ रहेंगे और मेरा शरीक न होना गवारा न करेंगे तो इस पर वाजिब है कि बेतर्के मुनकिरात शिरकत से इनकार कर दे अगर वे लोग इसके इन्कार पर मुनकिरात से बाज़ हैं तो दावत में जाना जरूरी है और अगर इनके इन्कार पर बाज़ न रहेंगे तो हरगिज़ न जाए और अगर ढोल, बाजे वगैरह उसी बारात के मकान में हों तो हरगिज़ न जाएं और अगर जाने के बाद शुरू हो तो फ़ौरन उठ जाएं।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 90/91


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             ✨पानी पीने का बयान ✨


📚हदीसः- हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः"एक सांस में पानी न पियो जैसे ऊँट पीता है बल्कि दो और तीन मर्तबा में पियो और जब पियो तो 'बिस्मिल्लाह' कह लो और जब बर्तन को मुँह से हटाओ तो अल्लाह की हम्द करो।"


📚हदीस:- इब्ने अब्बास रदियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है: .. "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बर्तन में सांस लेने और फूंकने से मना फ़रमाया।"


📚हदीस:- हज़रत अनस रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है: "रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खड़े होकर

पानी पीने से मना फ़रमाया।


📚हदीस:- हज़रत अबू हरैरह रदियल्लाहु अन्हु से मरवी कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "खड़े होकर हरगिज़ कोई शख्स पानी न पिये और जो भूल कर ऐसा करे वह के(उल्टी) कर दे।"


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 91


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             ✨पानी पीने का बयान ✨


📜मसअला:- पानी 'बिस्मिल्लाह' कह कर दायें हाथ से पीना चाहिए और तीन सांस में पिये। हर मर्तबा बर्तन को मुंह से हटा कर सांस ले, पहली और दूसरी मर्तबा एक-एक घूंट पिये और तीसरी सांस में जितना चाहे पी डाले। इस तरह पीने से प्यास बुझ जाती है और पानी को चूस कर पिये, गट-गट, बड़े-बड़े घूंट न पिये। जब पी ले तो 'अलहम्दु लिल्लाह' कहे।


 💫फायदाः- खड़े होकर पानी पीना मना है, जैसा कि हदीस में गुज़रा लेकिन वजू के बचे हुए पानी को खड़े होकर पीना मुसतहब है। इसी तरह आबे ज़म ज़म को खड़े होकर पीना सुन्नत है। ये दोनों पानी इस हुक्म से मुसतस्ना(अलग) हैं और इसमें हिकमत यह है कि खड़े होकर जब पानी पिया जाता है तो वह फौरन तमाम आज़ा की तरफ़ सरायत कर जाता है और यह मुज़िर(नुकसानदह) है मगर ये दोनों पानी बरकत वाले हैं और इनसे मकसूद ही बरकत है। लिहाज़ा इनका तमाम आज़ा में पहुंच जाना फ़ायदामन्द है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 91/92


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✨खाने पीने के सिलसिले में हकीमों के अकवाल


💫( 1 ) अगर लोहे के बर्तन में खाना पका हो तो उस खाने को खाने से भूक में इज़ाफ़ा और शहवत ज़्यादा होती है ।


💫( 2 ) मिट्टी के बर्तन में खाना पकाने और मिट्टी ही के बर्तन में खाना खाने से केन्सर जैसा मूज़ी मर्ज़ नहीं होता ।


💫( 3 ) बहुत ज़्यादा तुर्श ( खट्टी ) गिज़ाएं इस्तेमाल करने से नामर्दी पैदा होती है । 


💫( 4 ) बहुत ज़्यादा मीठी चीजें इस्तेमाल करने से जिस्म में चर्बी ज़्यादा बनती है और शुगर का ख़तरा रहता है । 


💫( 5 ) ठण्डा पानी मैदे को कुव्वत देता है और गर्म पानी मैदे को कमज़ोर व सुस्त करता है ।


 💫( 6 ) दही , मूली , पनीर मिलाकर एक साथ इस्तेमाल करने से सेहत बिगड़ती है और पेट में शदीद दर्द होता है । 


💫( 7 ) शहद का इस्तेमाल गोश्त के साथ या गोश्त खाने के बाद पेट में दर्द पैदा करता है । 


💫( 8 ) मछली के साथ या फ़ौरन बाद दूध पीने से बर्स ( कोढ़ ) होने का खतरा है । 


💫( 9 ) शहद और घी मिलाकर खाने से फ़ालिज हो जाने का अन्देशा है । 


💫( 10 ) दूध पीने के फ़ौरन बाद तुर्श चीजें इस्तेमाल करने से पेट में दर्द होने का सबब बनती हैं ।


बाकि अगले पोस्ट में


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 92/93


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✨खाने पीने के सिलसिले में हकीमों के अकवाल


💫(11) चावल के साथ सिरका इस्तेमाल करने से सेहत में बिगाड़ पैदा होता है और पेट में दर्द भी लाहिक़ होता है। 


💫(12) मुर्ग या परिंदों के गोश्त के साथ मूली खाना सेहत के लिए नुकसानदह है। 


💫(13) टमाटर और दूध एक साथ इस्तेमाल करने से गुर्दो में तकलीफ़ होती है। 


💫(14) गर्म दूध या गर्म चाय पीने के बाद फ़ौरन टण्डा पानी पीना सेहत के लिए नुकसानदह है। 


💫(15) रात को खाना खाने के फ़ौरन बाद औरत से हमबिस्तरी करना सख्त से सख्त नुकसानदह है और सेहत के लिए मुज़िर भी। 


💫(16) ताक़त व कुव्वत बढ़ाने के लिए खाना खाने के फ़ौरन बाद पैशाब करना अच्छा है। 


💫(17) खाना खाने के फ़ौरन बाद गुस्ल करना सेहत के लिए नुकसानदह है।


💫(18) गर्म गिज़ाओं को खाकर दूध और शहद पीने से बर्स और जुज़ाम होने का खतरा पैदा होता है।


💫(19) ज्यादा मीठा खाने से बीनाई कमज़ोर और दांतों में दर्द, गुर्दा और मसाने में पथरी और पैशाब में शकर आने का मूजिब है। 


💫(20) खाने में दो गर्म चीज़ों जैसे अण्डा और गोश्त और दो सर्द चीज़ों जैसे चावल और दही और दो खुश्क चीज़ों जैसे कंगनी और मसूर इसी तरह दो काबिज़ और दो मुसहल और दो ग़लीज़ चीज़ों को जमा न करें।


बाकि अगले पोस्ट में


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 93/94


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✨खाने पीने के सिलसिले में हकीमों के अकवाल


💫( 21 ) दूध और नीबू , दूध और अण्डा , दूध और गोश्त को एक साथ जमा करने से अमराजे रद्दिया पैदा होने का खतरा है ।


💫( 22 ) रात में सोने के बाद पानी पीने से बीमारी होने का अन्देशा है । 


💫( 23 ) ताज़ा मछली खाकर फ़ौरन नहाने से फ़ालिज पड़ने का अन्देशा है । 


💫( 24 ) भरे पेट फ़ौरन सोने से दिल सख़्त हो जाता है , जबतक कि चहल कदमी या नमाज़ पढ़कर खाना हज़्म न कर ले , हरगिज़ न सोये । 


💫( 25 ) मछली के साथ गर्म रोटी खाने से पेट में कीड़े पैदा हो जाते हैं ।


💫( 26 ) गर्माये हुए बदन पर सर्द पानी डालना या पीना सख्त नुकसानदह है ।


💫( 27 ) भीगे कपड़े पहनना सेहत के लिए मुज़िर है । 


💫( 28 ) खाने से पहले ठण्डे पानी का पीना भूक को कम कर देता है और खाने के बाद बदन को तंदरूस्त करता है ।


💫( 29 ) सेब वगैरह फल खाने के बाद पानी पीने से मैदा फ़ासिद हो जाता है ।


💫( 30 ) गर्म चावल या मीठी चीज़ खाने के बाद ठण्डे पानी का पीना दांत के लिए नुकसानदह है । 


💫( 31 ) मछली और अण्डा एक साथ खाने से फ़ालिज होने का अन्देशा है । 


💫( 32 ) जूस और दूध पीने से बर्स होने का एहतिमाल ( खतरा ) है । 


💫( 33 ) खाने के दरमियान पानी पीना नुकसानदह है ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 94


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             ✨जीनत का बयान ✨


💫शोहर या मेहरम के सिवा औरों के सामने अपनी ज़ीनत व आराइश का इज़हार जाइज़ नहीं। आजकल जो औरतें जेब व जीनत करती हैं जिसके लिए मौजूदा ज़माने में  "मेकअप " लफ़्ज़ बोला जाता है, गैरों पर ज़ाहिर करना हरगिज़ जाईज़ नहीं। 


कुर्आन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है : "औरतें अपना सिंगार ज़ाहिर न करें मगर अपने शौहरों पर या अपने बाप पर वगैरह। 


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः नामहरम मर्दो के सामने सिंगार करके इतराने वाली औरत क़यामत के दिन की उस तारीकी की तरह है जिसमें कोई नूर नहीं होगा।


💫हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने शबे मेअराज अपनी उम्मत की बाज़ औरतों को देखा जो अपनी छातियों से लटकी हुई हैं और उनके नीचे आग जल रही है और उनके बदन पिघल रहे हैं । फ़रमाया गया ये वे औरतें हैं जो अपने शौहर के अलावा दूसरों के लिए बनाव सिंगार करती थीं । नीज़ आपने फ़रमाया जो औरत अपने शौहर के अलावा दूसरों के लिए सुर्मा वगैरह लगाएगी , अल्लाह तआला उसे ज़लीलो ख्वार करेगा और उसकी कब्र को दोज़ख का गढ़ा बना दिया जाएगा ।


📖 मसअला : - हाँ , शोहरदार औरत के लिए जेबो जीनत का हुक्म है और वह हर जाइज़ तरीके से अपने शौहर के लिए ज़ीनत इख्तियार कर सकती है बल्कि करने का हुक्म है ताकि शौहर देखकर खुश हो जाए और उसकी निगाह गैरों की तरफ़ न जाए ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 95


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             ✨जीनत का बयान ✨


💫सरकार आला हज़रत लिखते हैं:


 "औरत को अपने शौहर के लिए जेवर पहन्ना, बनाव सिंगार और उनके हक में नमाज़े नफ़्ल से अफ़ज़ल है।


कुंवारी लड़कियों को जेवरों आरास्ता रखना कि उनकी मंगनियाँ आएं यह भी सुन्नत है बल्कि औरत का कुदरत रखने के बावजूद बेजे़वर रहना मकरूह है कि यह मर्दो से तशब्बुह है। हज़रत उम्मुलमोमेनीन" आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहु तआला अन्हा औरत का बेज़ेवर नमाज़ पढ़ना मकरूह जानती और फरमाती कुछ न पाये तो एक डोरा (धागा) ही गले में बांध लें।


📖मसअलाः- औरत को चाहिए कि हाथ पाँव में मेंहदी लगा ले, हाथ पांव को दरिन्दों की तरह न रखे। हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसी औरतों से नागवारी का इज़हार फ़रमाया जो अपनी हथैलियों को न बदल दे यानी मेंहदी लगा कर उनका रंग न बदल दे बल्कि आपने फ़रमाया इस किस्म के हाथ गोया दरिन्दों के हाथ है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 96


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             ✨जीनत का बयान ✨


📚हदीस:- हज़रते आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि हिन्द बिन्ते उक़बा ने अर्ज़ की या नबी अल्लाह! मुझे बैअ़त कर लीजिए, फ़रमायाः "मैं तुझे बैअत नहीं करूँगा जबतक तू अपनी हथैलिया को न बदल दे (यानी मेंहदी लगाकर उनका रंग न बदल दे) तेरे हाथ गोया दरिन्दे के हाथ मालूम हो रहे हैं यानी औरतों को चाहिए कि हाथों को रंगीन कर लिया करें।


📚हदीस:- एक औरत के हाथ में किताब थी, उसने पर्दे के पीछे से हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ इशारा किया यानी हज़ूर को देना चाहा। हुजूर ने अपना हाथ खींच लिया आरय लिया और यह फ़रमायाः मालूम नहीं मर्द का हाथ है या औरत का।" उसने कहा "औरत का।" फ़रमाया "अगर औरत होती तो नाखुनो को मेंहदी से रंगे होती।


आज के दौर में सबसे ज़्यादा बुरी बात और कबीह दस्तूर यह चल पड़ा है कि औरतें मग़रिबी तहज़ीब ( यूरोपीय कलचर ) की दिल दादा होती जा रही हैं और मग़रिबी तौर व तरीके को अपना रही हैं और यहूदी , नसरानी औरतों की तरह बालों को कटवा रही हैं , अबरू ( भौंहों ) और पलकों को कटवाकर मुख्तलिफ़ किस्म की जेबाइशो आराइश करती हैं । मर्दाना लिबास पहनने पर फख्र करती हैं । कुछ ही घराने ऐसे होंगे जो इस बीमारी से महफूज़ होंगे । औरतों को सर के बाल कटवाना , इसी तरह मर्दानी वज़अ ( स्टाइल ) इख़्तियार करना सख़्त नाजाइज़ व गुनाह है ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 97


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📚हदीसः- हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है : ' रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन औरतों पर लानत की जो मर्दो से तशब्बुह करें और उन मर्दो पे जो औरतों से तशब्बुह करें । 


📚हदीसः- हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है : " रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उस मर्द पर लानत की जो औरतों का लिबास पहनता है और उस औरत पर लानत की जो मर्दाना लिबास पहनती है ।


📚हदीस : - किसी ने हज़रत आयशा सिद्दीका रदियल्लाहु अन्हा से कहा कि एक औरत मर्दो की तरह जूते पहनती है , उन्होंने कहाः रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मर्दानी औरत पर लानत की ।


📚हदीसः- तीन शख्सो पर अल्लाह तआला रोज़े क़यामत नज़र नहीं करेगा, माँ - बाप को सताने वाला, वह औरत जो मर्दो से तशब्बुह करे और दय्यूस।


📚हदीसः- तीन आदमी जन्नत में कभी दाख़िल न होंगे और दय्यूस और मर्दानी वज़अ ( स्टाइल ) की औरत और शराबी ।


इन हदीसों से मालूम हुआ कि औरतों को मर्दाना जूता पहनना मना है । बल्कि वे तमाम बातें जिनमे मर्दो और औरतों का इम्तियाज़ होता है । उनमें हर एक को दूसरे की वज़अ ( स्टाइल ) इख्तियार करने से मुमानिअत है । न मर्द औरत की वज़अ इख़्तियार करे , न औरत मर्द की । ऐसे मर्द व औरत सख्त वईद के मुस्तहिक़ हैं । इसी तरह औरतों के लिए बजने वाले जेवरात का इस्तेमाल करना मना है ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 98


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📚हदीस :- हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने जुबैर रदियल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है, कहते हैं कि हमारे यहाँ की एक लोंडी हज़रत जुबैर की लड़की को हज़रत उमर फारूक रदियल्लाहु अन्हु के पास लेकर आई , उसके पांव में घुंगरू थे। हज़रत उमर रदियल्लाहु अन्हु ने उसे काट दिया और फ़रमाया कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना है कि हर घुंगरू के साथ शैतान होता है। रिवायत है कि हज़रत आयशा रदियल्लाहु अन्हा के पास एक लड़की आई जिसके पांव में घुंगरू बज रहे थे। फ़रमाया कि इसे मेरे पास न लाना। जबतक इसके घुंगरू न काट लेना। मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना है कि जिस  घर में जरस यानी घण्टी या घुंगरू होते हैं , उसमें फ़रिश्ते नहीं आते।


📚हदीसः- अल्लाह तआला उस कौम की दुआ कबूल नहीं फ़रमाता जो अपनी औरतों को बजने वाला पाज़ेब पहनाते हैं।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 98


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             ✨जीनत का बयान ✨


📖मसअला : - इसी तरह जीनत के लिए इन्सान के बालों की चोटी बनाकर औरत अपने बालों में गूंधे , यह हराम है । ऐसा ही सोने , चांदी के अलावा दूसरी धात की अंगूठी मर्द व औरत दोनों के लिए हराम है ।


📚हदीस : - जिस साल हज़रत अमीर मआ़विया रदियल्लाहु अन्हु ने अपने खिलाफ़त के ज़माने में हज किया , मदीने में आये और मिम्बर पर चढ़कर बालों का गुच्छा हाथ में लेकर कहाः “ ऐ अहले मदीना ! तुम्हारे उलमा कहाँ हैं ? मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना है कि हुजूर इससे मना फ़रमाते थे यानी चोटी पर बाल जोड़ने से और हुजूर यह फ़रमाते थे कि बनी इस्राईल उसी वक़्त हलाक हुए जब उनकी औरतों ने ऐसा करना शुरू किया ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 99


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            🔥बद निगाही का बयान 🔥


✨ आज के मुआशरे ( समाज ) में जहाँ तरह - तरह की बुराईयां जन्म ले चुकी हैं वहीं यह बुराई उरूज पर पहुंच चुकी है । नौजवान मर्द व औरत का बन संवर कर बाजारों में घूमना फिरना और एक दूसरे को नज़ारे की दावत देना ताकि एक दूसरे के हुस्न व शबाब पर बुरी नज़र डालें और उससे तलज़्जुज़ हासिल करें । खुसूसन औरतों का बेनकाब होकर बाज़ारों में तफरीह करना और अपने हुस्न का दीदार कराना तो आम बात है । बल्कि आज के मार्डन नौजवान गैर औरतों को देखने , छूने और - छेड़ - छाड़ करने को गोया गुनाह ही नहीं समझते बल्कि उसे फेशन और मार्डन कल्चर का नाम देते और उसे मामूली बात समझते हैं ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 99


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            🔥बद निगाही का बयान 🔥


कुरान में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: मुसलमान मर्दो को हुक्म दो अपनी निगाहें कुछ नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करें यह उनकी लिए सुथरा है, बेशक अल्लाह को उनके कामों की ख़बर है और मुसलमान औरतों को हुक्म दो अपनी निगाहें नीची रखें और पारसाई की हिफाज़त करें और अपना बनाव न दिखाएं जितना खुद ही ज़ाहिर है और दुपट्टे अपने गिरेबानों पर डाले रहें।


✨इस आयते करीमा में अल्लाह तआला ने साफ़-साफ़ हुक्म दिया है कि मर्द अपनी निगाहें नीची रखें यानी बद-निगाही से बचें और अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करें यानी बुराई की तरफ़ न जाऐं । इसी तरह अल्लाह तआला औरतों को भी हुक्म दे रहा है कि वे भी अपनी निगाहें नीची रखें, अपना बनाव सिंगार गैरों पर ज़ाहिर न करें लेकिन आज का मामला ही उलटा नज़र आ रहा है । सरकारे दो जहाँ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने भी सख्त अंदाज़ में मुमानिअ़त फ़रमाई है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 99/100


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            🔥बद निगाही का बयान 🔥


📚हदीसः- हुजूर नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " अजनबिया खूबसूरत औरत को शहवत से देखने वाले की आँख कयामत के दिन पिघला शीशा डाला जाएगा ।


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमायाः " जो मर्द गैर औरत को देखे और जो औरत अपने को गैर मर्दो को दिखाए , दोनों पर अल्लाह की लानत ।


 📚हदीसः- हज़रत जरीर बिन अब्दुल्लाह का बयान है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अचानक नज़र पड़ जाने के मुतअल्लिक पूछा तो फ़रमायाः " अपनी नज़र फेर लिया करो


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 100


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            🔥बद निगाही का बयान 🔥


📚हदीसः- हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! बअज़ औक़ात गैर औरत पर अचानक नज़र पड़ जाती है। आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः 'ऐ अली ! पहली नज़र जो अचानक पड़ जाए, उस पर गिरफ़्त नहीं लेकिन दूसरी नज़र पर गिरफ़्त है।


 अजनबी औरत को देखने का जुर्म जब इतना शदीद है तो जो औरत अज़ खुद बेपर्दा होकर अजनबी मर्द के सामने आती है या दूसरों को देखने का मौका देती है वह भी इस जुर्म में बराबर की शरीक होगी, बल्कि उसका जुर्म और शदीद होगा। यह बेपर्दा न होती तो अजनबी मर्द को गुनाह का मौका न मिलता, उसने बेपर्दा होकर खुद भी गुनाह किया और दूसरों को भी गुनाह पर उकसाया।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 101


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            🔥बद निगाही का बयान 🔥


📚हदीस : - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं : आँख भी शर्मगाह की तरह ज़िना करती है और आँख का ज़िना नज़र है । वह शख्स जो नज़र को बचाने की कुदरत नहीं रखता , उस पर वाजिब है कि शहवत को रियाज़त से ख़त्म करे । इसकी तदबीर यह है कि रोज़ा रखे , वरना निकाह करे ।


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " निगाह इबलीस के तीरों में से एक तीर है जिसको ज़ेहर के पानी से बुझाया गया है । पस जो कोई खुदावन्द करीम के डर से अपनी निगाह को बचायगा उसको ऐसा ईमान नसीब होगा जिसकी हलावत वह अपने दिल में महसूस करेगा ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 101


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            🔥बद निगाही का बयान 🔥


    ✨ बुज़ुर्गाने दीन फरमाते हैं:


तमाम बुराईयों की इब्तिदा नज़र से होती है । पहले नज़र , नज़र से मिलती है , इसके बाद मुस्कुराहट होती है , फिर सलाम व कलाम , फिर वादा , फिर मुलाकात , फिर आपस में गुनाहों का दरवाज़ा खुल जाता है । हज़रत याहया अलैहिस्सलाम से लोगों ने पूछा कि ज़िना की इब्तिदा कहाँ से होती है ? उन्होंने फ़रमाया “ आँख से।


📚हदीसः- प्यारे आका सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इरशाद फ़रमाते हैं : " मर्द का गैर औरतों को और औरत का गैर मर्दो को देखना आँखों का ज़िना है । पैरों से उसकी तरफ़ चलना , पैरों का ज़िना है । कानों से उसकी बात सुनना , कानों का ज़िना है । ज़बान से उसके साथ बातें करना , ज़बान का ज़िना है । दिल में नाजाइज़ मिलाप की तमन्ना करना , दिल का ज़िना है । हाथों से उसे छूना , हाथों का जिना है ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 102


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           🔥बेपर्दगी का बयान 🔥


मुसलमान औरतों के लिए पर्दा बहुत ज़रूरी है और बेपर्दगी इन्तिहा दर्जे की बेहयाई व बेगैरती का सबब है।


कुर्आन में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: "और अपने घरों में ठहरी रहो और बेपर्दा न रहो जैसे अगली जाहिलियत की बेपर्दगी।"


अगली जाहिलियत से मुराद कब्ले इस्लाम का ज़माना है। उस ज़माने में औरतें इतराती निकलती थीं, अपनी ज़ैब व ज़ीनत का इज़हार करती थीं ताकि गैर मर्द देखें और लिबास इस तरह पहनती थी जिन जिनसे के आज़ा अच्छी तरह न छुपते थे।


आज वे औरतें जो ज़र्क बर्क(तड़क-भड़क) लिबास में मलबूस होकर खिरामा खिरामा मटकती हुई अजनबी मर्दो की महफ़िलों, नामहरमों की मजलिसों और गैरों के मजमों में आती जाती हैं और अपनी इस आवारगी और बेहयाई पर ज़रा भी नहीं शर्मातीं।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 102/103


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           🔥बेपर्दगी का बयान 🔥


📚हदीसः- सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशादे गिरामी है : "औरत छिपाने की चीज़ है, जब औरत निकलती है तो शैतान उसे झांक कर देखता है यानी उसे देखना शैतानी काम है। 


📚हदीसः- हज़रत अबू मूसा अशअरी रदियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः 'जब कोई औरत खुश्बू लगा कर लोगों में निकलती है ताकि उन्हें खुश्बू पहुंचे तो वह औरत ज़ानिया है।


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः "जो औरत खुश्बू लगा कर किसी मजलिस से गुज़रती है तो ऐसी औरत बदकार है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 103


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           🔥बेपर्दगी का बयान 🔥


✨इन हदीसों से वे औरतें सबक लें जो आज तरह - तरह की तेज़ खुशबूओं को लगाकर आम शाहराहों पर इतराती फिरती हैं और बन संवर कर आम महफिलों में जाती हैं , उनके लिए सख्त मना है । वाजेह हो कि जो औरतें पर्दे में रहकर भी तेज़ खुशबू लगाएं तो इसी वईद की मुस्तहिक़ होंगी क्योंकि पर्दा बदन और चेहरे का है न कि खुशबू का , खुशबू तो पर्दे से भी बाहर जाती है।


📖मसअलाः- औरतों के लिए ऐसे लिबास का इस्तेमाल करना हराम है कि जिससे जिस्म चमकता हो या इतना चुस्त हो कि जिस्म को साख़्त ( बनावट ) और उसके नशैब व फ़राज़ नुमायां नज़र आते हों। हदीस शरीफ़ में ऐसे लिबास को नंगा लिबास फ़रमाया गया।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 103


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✨पर्दा औरतों का बेहतरीन ज़ेवर है✨


📚हदीसः- अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः "औरत की नमाज़ अपने तहख़ाने ( Basement ) में बेहतर है, कोठरी में नमाज़ पढ़ने से और उसकी कोठरी में नमाज़ बेहतर है, दालान में नमाज़ पढ़ने से और उसकी नमाज़ दालान में बेहतर है, सेहन (आंगन) में नमाज़ पढ़ने से और उसकी अपने सेहन में नमाज़ बेहतर है मस्जिद में नमाज़ पढ़ने से। "


📚हदीसः- मौलाए कायनात हज़रत अली रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि एक रोज़ सय्यदे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपनी मजलिस में सहाबा किराम से दरयाफ़्त फ़रमाया औरत के लिए कौनसी चीज़ बेहतर है? किसी ने जवाब न दिया, सब के सब ख़ामोश रहे, यहाँ तक कि मैं भी कोई जवाब न दे सका। जब घर आया तो हज़रत फातिमा ज़ेहरा (रदियल्लाहु तआला अन्हा) से पूछा औरतों के लिए कौनसी चीज़ सबसे बेहतर है? हज़रत फ़ातिमा (रदियल्लाहु तआला अन्हा)ने फ़ौरन जवाब दिया कि औरतों के लिए सबसे बेहतर यह है कि उनको गैर मर्द न देखें। हज़रत अली इस जवाब से बहुत खुश हुए और जाकर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह जवाब सुनाया तो हुजूर भी खुश हुए और फ़रमाया 'फ़ातिमा मेरा एक हिस्सा है।


📜मसअलाः- नामहरम औरतों को अन्धे से पर्दा वैसा ही है जैसे आँख वाले से और उसका घर में जाना औरत के पास बैठना वैसा ही है जैसा आँख वाले का।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 104


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✨पर्दा औरतों का बेहतरीन ज़ेवर है✨


📜मसअलाः- पर्दा सिर्फ उन लोगों से नहीं जो नसब के सबब औरत पर हमेशा - हमेशा के लिए हराम हों और कभी किसी हालत में उनसे निकाह नामुमकिन हो । जैसेः  बाप , दादा , बेटा , पोता , चचा , मामू वगैरह । इनके सिवा जिनसे निकाह कभी दुरूस्त है , अगरचे फ़िलहाल नाजाइज़ हो जैसे बेहनोई जबतक बहन ज़िन्दा है या चचा मामू खाला , फूफी के बेटे या जेठ , देवर इनसे पर्दा वाजिब है।


📜मसअलाः- कुछ औरतें अपने मर्दो के सामने मनीहार के हाथों से चूड़ियां पहनती हैं , यह हराम , हराम , हराम है । हाथ दिखाना गैर मर्द को हराम है । उसके हाथ में हाथ देना हराम है , जो मर्द अपनी औरतों के साथ उसे जाइज़ रखते हैं , दय्यूस हैं ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 104/105


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🔥अजनबी औरतों के साथ तनहाई इख्तियार करना


📚हदीस : - हज़रत अबु सईद खुदरी से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " दुनिया मीठी और हरी भरी है और यकीनन अल्लाह तआला तुमको इसमें दूसरों के पीछे मालिक करेगा । फिर आज़माएगा कि क्या अमल करते हो ? लिहाज़ा दुनिया से दूर हो ! और औरतों से बचो क्योंकि बनी इस्राईल का पहला फ़ितना औरतों ही से हुआ ।


📚हदीसः- सरकारे दो जहाँ सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " मैंने अपने पीछे मर्दो के लिए ज़्यादा ज़रर देने वाला फ़ितना औरतों से बढ़कर कोई न छोड़ा । "


📚हदीसः- हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " कोई मर्द किसी औरत के साथ जब तन्हाई में इकट्ठा होता है तो तीसरा शैतान ज़रूर होता है ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 105


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🔥अजनबी औरतों के साथ तनहाई इख्तियार करना


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमायाः "जिन औरतों के शौहर मौजूद न हों उनके पास न जाओ क्योंकि शैतान तुम्हारी रगों में खून की तरह दौड़ता है।"


📚हदीस :- नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः “गैर औरत के पास जाने से दूर रहो, एक सहाबी ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह ! देवर के बारे में क्या इरशाद है ? फ़रमाया ' देवर तो मौत है।"


              इन हदीसों से मालूम हुआ कि औरत बाइसे फ़ितना है। तमाम बुराईयों की अस्ल है। औरतों का गैरमहरम मर्दो के सामने बेहिजाब आना, बातचीत करना, हंसी मज़ाक करना हराम और गुनाहे अज़ीम है। यूंही मर्दो का गैरमहरम औरत के पास तन्हाई में जाना, उनके साथ बातचीत करना, हराम, अशद गुनाह है। आप खुद ही अन्दाज़ा कीजिए जब देवर के सामने भाभी को आने से या देवर को भाभी के पास जाने से मना किया गया तो गैर औरतों के पास जाना किस क़द्र ख़तरनाक और बाइसे गुनाह होगा।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 106


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🔥अजनबी औरतों के साथ तनहाई इख्तियार करना


📜मसअलाः- जेठ, देवर, बहनोई, फूफा, खालू, ख़ालाज़ाद भाई, मामूज़ाद भाई, फूफाज़ाद भाई ये सब लोग औरत के लिए महज़ बल्कि इनका ज़रर निरे बेगाने शख्स के ज़रर से ज़ाइद है कि महज़ गैर आदमी घर में आते हुए डरेगा और ये आपस में मेलजोल के बाइस ख़ौफ़ नहीं रखते। औरत निरे अजनबी आदमी से फ़िलफ़ौर मेल नहीं खा सकती और इन लोगों से लिहाज़ टूटा हुआ है , बिलखुसूस देवर के लिए अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया " देवर तो मौत है "


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 106


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           ✨देखने और छूने का बयान✨


📚हदीस : - हज़रत अबु सईद रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूले कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " एक मर्द दूसरे मर्द के सतर की जगह न देखे और न औरत दूसरी औरत के सतर की जगह देखे और न मर्द दूसरे मर्द के साथ एक कपड़े में बरहना ( नंगा ) सोए ।


📚हदीस : - हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " ऐसा न हो कि एक औरत दूसरी औरत के साथ रहे , फिर अपने शौहर के सामने उसका हाल बयान करे , गोया यह उसे देख रहा है । "


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 107


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           ✨देखने और छूने का बयान✨


📚हदीस : - हज़रत अबु सईद रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूले कायनात सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " एक मर्द दूसरे मर्द के सतर की जगह न देखे और न औरत दूसरी औरत के सतर की जगह देखे और न मर्द दूसरे मर्द के साथ एक कपड़े में बरहना ( नंगा ) सोए ।


📚हदीस : - हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः " ऐसा न हो कि एक औरत दूसरी औरत के साथ रहे , फिर अपने शौहर के सामने उसका हाल बयान करे , गोया यह उसे देख रहा है । "


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 107


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        ✨देखने और छूने का बयान✨


📜मसअलाः- मर्द , मर्द के बदन के हर हिस्से की तरफ़ नज़र कर सकता है , अलावा उन आज़ा ( अंगों ) के जिनका छिपाना फर्ज़ है वे नाफ़ के नीचे से घुटने के नीचे तक है ।


📜मसअलाः- बहुत छोटे बच्चे के लिए सतरे औरत नहीं यानी उसके बदन के किसी हिस्से का छुपाना फ़र्ज़ नहीं । फिर जब कुछ बड़ा हो जाए तो उसके आगे पीछे का मक़ाम छुपाना फ़र्ज़ है ।


📜मसअला : औरत का औरत को देखना , इसका वही हुक्म है जो मर्द को मर्द की तरफ़ नज़र करने का है यानी नाफ़ के नीचे से घुटने तक नहीं देख सकती । बाकी आज़ा ( अंगों ) की तरफ़ नज़र कर सकती है , जबकि शहवत का अन्देशा न हो । सालिहा ( नेक ) औरत को चाहिए कि अपने को बदकार औरत के देखने से बचाए यानी उसके सामने दुपट्टा वगैरा न उतारे क्योंकि वह उसे देखकर मर्दों के सामने उसका हुलिया बयान करेगी ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 107/108


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        ✨देखने और छूने का बयान✨


📜मसअलाः- औरत का अजनबी मर्द की तरफ़ नज़र करते का वही हुक्म है जो मर्द का मर्द की तरफ़ नज़र करने का है और यह  वक़्त है कि औरत को यक़ीन के साथ मालूम हो कि उसकी तरफ नज़र करने से शहवत पैदा न होगी वरना इसका शुबह भी हो तो हरगिज़ नज़र न करे।


📜मसअलाः- औरत का अजनबी मर्द के जिस्म को छूना हरगिज जाइज़ नहीं जबकि दोनों में से कोई भी जवान हो और उनको शहवत हो सकती हो, अगरचे इस बात का दोनों को इतमिनान हो कि शहवत पैदा न होगी।


कुछ जवान औरतें अपने पीरों के हाथ-पाँव दबाती हैं और बअज़ पीर अपनी मुरीदा से हाथ-पाँव दबवाते हैं और उनमें अकसर दोनों या एक हदे शहवत में होता है। ऐसा करना नाजाइज़ है और दोनों गुनाहगार हैं।


📜मसअलाः- अजनबिया औरत की तरफ़ नज़र करने का हुक्म यह है कि ज़रूरतन उसके चेहरे और हथैली की तरफ़ नज़र करना जाइज़ है मगर छूना जाइज़ नहीं अगरचे शहवत का अन्देशा न हो।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 108


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        ✨देखने और छूने का बयान✨


📜मसअलाः- मर्द महरमा औरत के सर, सीना, पिण्डली, बाजू, कलाइ गर्दन, कदम की तरफ नजर कर सकता है जबकि दोनों में से किसा को शहवत का अन्देशा न हो। महरमों के पेट, पीठ और रान की तरफ नज़र करना नाजाइज़ है।


📜मसअलाः- जिस उज्व(अंग) की तरफ नज़र करना नाजाइज़ है, वह बदन से जुदा हो जाए तब भी उसकी तरफ़ नज़र करना नाजाइज़ ही रहेगा मसलन पैरों के बाल उनको जुदा करने के बाद भी दूसरा शख्स नहीं देख सकता। औरत के सर के बाल या उसके पाँव या कलाई की हड्डी कि उसके मरने के बाद भी अजनबी आदमी नहीं देख सकता। औरत के पाँव के नाखुन कि उनको भी अजनबी आदमी नहीं देख सकता और हाथ के नाखुन को देख सकता है।


अकसर देखा गया है कि गुस्लखाना या पाखाने में मूए ज़ेरे नाफ मुंड कर बअज़ लोग छोड़ देते हैं, ऐसा करना दुरूस्त नहीं बल्कि उनको ऐसी जगह डाल दें कि किसी की नज़र न पड़े या ज़मीन में दफ्न कर दें। औरतों को भी लाज़िम है कि कंघा करने या सर धोने में जो बाल निकलें उन्हें कहीं छिपा दें कि उन पर अजनबी की नज़र न पड़े।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 108/109


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               🔥ज़िना का बयान🔥


जिना इन्तिहाई बेहयाई और बेगैरती का नाम है । समाज के लिए एक नासूर और बदतरीन लानत है । नस्ले इन्सानी को तबाहो बर्बाद करने का ज़रिया है । आज समाज इस बुरे काम में मुब्तिला है । कोई मुल्को शहर ऐसा नहीं जिसमे यह बला आम न हो । जिधर देखो बेहयाई और बेगैरती का दौर दौरा है । पूरा मुआशरा ( समाज ) बिगड़ता जा रहा है । गैरतो हमियत इन्सानों से दूर होती जा रही है । पूरी नस्ले इन्सानियत तबाही के दुहाने पर पहुंच चुकी है ।


कुर्आन में रब्बे कायनात इरशाद फ़रमाता है : " और बदकारी के पास न जाओ , बेशक वह बेहयाई है और बहुत ही बुरी राह । " ( सूरह बनी इस्राईल ) 


यानी ज़िना रूहानी पाकीज़गी और अख़लाक़ी तहारत के मुनाफ़ी है । जिस्मानी और मुआशरती दोनों ऐतिबार से काबिले नफ़रत है । अलगरज़ ज़िना वह बदतरीन काम है कि उसकी शामत से हजारों बुराईयां समाज में जन्म लेती हैं ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 109/110


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               🔥ज़िना का बयान🔥


( 1 ) बलाओं का नुजूल होता है।

( 2 ) दुश्मन ग़ल्बा पाता है। 

( 3 ) रिज़्क़ में तंगी आती है। 

( 4 ) उम्र से बरकत उठ जाती है। 

( 5 ) मिल्को दौलत में बर्बादी आती है। 

( 6 ) दुआएं कबूलियत से मेहरूम रहती हैं। 

( 7 ) रूह की नूरानियत पर नफ़्स की जुल्मतो तारीकी गल्बा पाती है।

( 8 ) बिला तौबा मर जाए तो अज़ाबे आख़िरत का सिलसिला शुरू हो जाता है। 


बअज़ सहाबा - ए - किराम से मरवी है कि ज़िना से बचो इसमें 6 मुसीबतें हैं , जिनमें से तीन का तअल्लुक दुनिया से है और तीन का आखिरत से। दुनिया में :


 ( 1 ) रिज़्क़ कम हो जाना। 

( 2 ) ज़िन्दगी का मुख्तसर हो जाना। 

( 3 ) चेहरे का मस्ख़ हो जाना ( बिगड़ जाना )


 आखिरत में : 


( 1 ) ख़ुदा की नाराजगी

( 2 ) सख्त पुरशिश 

( 3 ) जहन्नुम में दाखिल होना।


जिस कोम में ज़िना की कसरत हो जाती है, अल्लाह तआला उसे खौफ और आम कहत में मुब्तिला कर देता है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 110


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               🔥ज़िना का बयान🔥


ऐ मेरे नौज़वानो ! ज़िना से बचो । आज पर्दो में छुप - छुप कर मुंह काला करते हो , कल क़यामत के दिन मालूम हो जाएगा कि अल्लाह का अज़ाब कितना सख्त है ? अल्लाह की सिफत जहाँ रहमान व सत्तार है वहीं उसकी सिफ़त कह्हार व जब्बार भी है । ज़ानी के लिए दुनिया में भी सज़ा है और आख़िरत में भी । और जो शख्स ज़िना करे , उसे ' आसा़म ' में डाला जाएगा ) ' आसा़म ' के मुतअल्लिक कहा गया है कि जहन्नुम की एक वादी है । बअज़ उलमा ने कहा है कि वह जहन्नम का एक गार है , जब उसका मुँह खोला जाएगा तो उसकी शदीद बदबू से जहन्नमी भी चीख उठेंगे ।


🔖रिवायतः- हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने रब्बे कायनात से ज़ानी की सज़ा के बारे में पूछा तो रब तआला ने फ़रमायाः " मैं उसे आग की ज़िरह पहनाउंगा और वह ऐसी वज़नी है कि अगर बहुत बड़े पहाड़ पर रख दी जाए तो वह भी रेज़ा - रेज़ा हो जाए।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 111


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               🔥ज़िना का बयान🔥


📚हदीसः- हज़रते जिबरील व मीकाईल अलैहिमुस्सलाम हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को ख़्वाब की हालत में अजाइबात की सैर कराने के लिए अपने हमराह ले गए । आपने ख्वाब में एक तंनूर मुलाहिजा फ़रमाया जो ऊपर से तंग और नीचे से फैला हुआ था । उसके निचले हिस्से में आग जलती थी । कुछ नंगे मर्द और नंगी औरतें उसमें शोलों के साथ ऊपर आते थे और फिर नीचे गिरते थे । जब आग बलन्द होती थी तो ऐसा मालूम होता था कि ये लोग उस तनूर से निकल जाना चाहते हैं । फिर वह आग नीचे होती है तो ये लोग फिर नीचे चले जाते हैं । फरिश्तों ने बयान किया कि ये ज़िना करने वाले मर्द और औरतें आग के तनूर में कैद हैं । आग इनको उछालती है और फिर अन्दर की तरफ़ खेंचती है ।


आज दुनिया ने ज़िना जैसी कबीह़ चीज़ को मामूली चीज़ समझकर नज़र अन्दाज़ करना शुरू कर दिया है । गोया कि यह उनकी निगाह में कोई बुरी बात नहीं । हालांकि अहादीसे करीमा से साफ पता चलता है कि ज़िना से बढ़कर कोई गुनाह नहीं और ज़िना ग़ज़बे इलाही को दावत देता है । ज़रूरी बात यह है कि जानी ज़िना के वक़्त मोमिन नहीं रहता ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 111/112


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               🔥ज़िना का बयान🔥


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः " जब कोई शख्स ज़िना करता है तो ईमान उससे निकलकर उसके सर पर साये की तरह ज़मीनो आसमान के दरमियान मुअल्लक हो जाता है ।


📚हदीसः- रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमायाः " अल्लाह के नज़दीक नुत्फ़े को हराम कारी में सर्फ करने से बड़ा कोई गुनाह नहीं ।


📚हदीसः- हज़रत अबु हुरैरह रदियल्लाहु अन्हु से मरवी है कि उन्होंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फ़रमाते सुनाः " जो औरत किसी कौम में उसको दाखिल करे जो उस कौम से न हो ( यानी ज़िना कराए और उससे औलाद हुई ) तो उसे अल्लाह की रहमत का हिस्सा नहीं और उसे जन्नत में दाखिल न फ़रमाएगा ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 112


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                ✨हिकमत की बातें✨


💫चार चीजें बदन को ताकतवर बनाती हैं: 


✨गोश्त खाना, खुश्बू सूंघना, गुस्ल करना और कतान का कपड़ा पहनना


💫चार चीजें आँख की रोशनी को तेज़ करती हैं:


✨किबले की तरफ मुँह करके बैठना, सोते वक़्त सुरमा लगाना, तरोताजा हरियाली की तरफ देखना, कपड़े साफ़ सुथरे पहनना।


💫चार चीजें बदन को कमज़ोर करती हैं:


✨कसरते जिमाअ़, कसरते ग़म, निहार मुँह कसरत से पानी पीना, कसरत से खटाई खाना।

 

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 112/113


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                  ✨हिकमत की बातें✨


💫चार चीजें निगाह को कमजोर करती हैं : 


✨गन्दगी की तरफ देखना , सूली पर लटकाए हुए आदमी की तरफ देखना , औरतों की शर्मगाह की तरफ देखना, किबले की तरफ पीठ करके बैठना। 


💫चार चीजें जिमाअ़ की कुव्वत को बढ़ाती हैं : 


✨चिड़िया का गोश्त खाना, इतरीफ़ल, पिस्ता, तीरह तेज़क खाना


📖साहिबे बुस्तान लिखते हैं :


💫पाँच चीजें बीनाई को तेज़ करती हैं : 


✨हरियाली की तरफ़ देखना, जारी पानी की तरफ देखना, हसीन चेहरे की तरफ़ नज़र करना, नमाज़ में मोज़ए सुजूद (सजदे की जगह) की तरफ देखना, माँ - बाप के चेहरे को देखना। 


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 113


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                  ✨हिकमत की बातें✨


✨उन चीज़ों का बयान जिनसे बीमारी लाहिक होने का अन्देशा है


💫ऐहतिकार करनाः ( यानी खाने पीने की चीज़ को इसलिए रोकना कि महगा होने पर फरोख्त करेगा ) कोढ़ की बीमारी पैदा होने का सबब है ।


💫दाँत से नाखुन काटनाः इससे बर्स ( सफेद दाग ) की बीमारी होने का अन्देशा है। 


💫नाक के बाल उखेड़नाः इससे मर्ज़ आकला पैदा होने का डर है। 


💫इमामा बैठकर बांधना और पायजामा खड़े होकर पहननाः इसका करने वाला ऐसी बीमारी में मुब्तिला होगा जिसकी कोई दवा नहीं। 


💫धूप से गर्मशुदा पानी का इस्तेमाल करनाः इससे बर्स होने का अन्देशा है ख्वाह वुजू करे या गुस्ल करे या पिये।


💫बुध के दिन नाखुन तराशनाः इसमें बर्स होने का अन्देशा है।


💫हमबिस्तरी के वक़्त औरत की शर्मगाह की तरफ नज़र करनाः इसमें नाबीना होने का सबब है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 113/114


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💫जिमाअ़ करते वक़्त कलाम करनाः बच्चे के गूंगे या तोतले होने का अन्देशा है।


💫औरत के मकामे मखसूस की तरफ नज़र करनाः इससे निस्यान (भूल) का मर्ज़ लाहिक होता है।


💫खाना खाने के बाद वे हाथ धोए सोए रहना (कि शैतान उसेचाटता है): इसमें बर्स के पैदा होने का इमकान है। 


💫गुस्लखाने में पैशाब करनाः इससे वसवसा पैदा होता है।


💫राख पर पैशाब करनाः किबले की तरफ मुँह करके पैशाब करनाः ज़िन्दगी हराम खोरी में गंवानाः इन तीनों से निस्यान(भूल) का मर्ज़ लाहिक होता है।


💫खट्टे सेब का खाना, ठहरे हुए पानी में पैशाब करना, जुओं मारे ज़मीन पर फेंकना, बिल्ली और चूहे का जूठा खाना, दो औरतों के बीचों बीच चलनाः 


✨साहिबे बुस्तान लिखते हैं। इन पाँच चीज़ो से भूल जाने का मर्ज़ लाहिक होता है। 


📍नोट:- मजकूरा बातों में तिब्बी ऐतिबार से भी इज्तिनाबो ऐहतिराज़ चाहिए, वरना उन्ही बीमारियों में मुब्तिला होगा जिनका बयान ऊपर गुज़र चुका।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 114/115


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✨माने हम्ल (हम्ल गिराने वाली दवायें)



💫1)सरसों या चम्बेली या तिल का तैल उज़्व पर लगाकर हमबिस्तरी करने से हम्ल नहीं ठहरता है। 


💫2) एक मिस्क़ाल तिल फांकने से हम्ल करार नहीं पाता है।


💫3) जो औरत माहवारी से पाक होकर अगर एक बूंघची सफ़ेद निगल ले तो एक साल तक, दो निगल ले तो दो साल तक - हामिला(गर्भवती) न हो। 


💫4) अगर औरत मुल्तानी मिट्टी पानी में घोल कर पी ले तो हामिला न हो। 


💫5) अगर मर्द प्याज़ का पानी ज़कर(लिंग) पर लगाकर मुजामअ़त (सम्भोग) करे तो हम्ल न ठहरे।


💫6) अगर कोई औरत मादा खच्चर के पसीने को रूई में जज़्ब करके शर्मगाह में रख ले तो वह कभी हामिला(गर्भवती) न हो।



💫7) अगर औरत खच्चर के कान का मेल अपनी शर्मगाह में रख ले या मर्द ज़कर पर लगाकर हमबिस्तरी करे तो वह औरत कभी हामिला न हो।


💫8) अगर औरत ख़रगोश की मेंगनी को कमर में बाँध कर लटका ले तो हामिला न हो।


💫9) जो औरत एक दिरहम काफूर खा जाए तो वह कभी बच्चा न जनेगी।


💫10) माहवारी के बाद कास्नी के फूलों को पानी में घोलकर पीना हम्ल के लिए माने(निरोधक) है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 121


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✨माने हम्ल (हम्ल गिराने वाली दवायें)


💫10) माहवारी के बाद कास्नी के फूलों को पानी में घोलकर पीना  हम्ल के लिए माने(निरोधक) है।


💫11) जो औरत किसी बच्चे के उस दाँत को जो कभी ज़मीन पर गिरा न हो, किसी कपड़े में बाँध कर अपने पास रखे तो हरग़िज़ हामिला न हो।


💫12) जो औरत आँख बन्द करके अरण्डी का एक दाना निगल जाए तो एक साल तक और दो निगल जाए तो दो साल तक तीन निगल जाए तो तीन साल तक हामिला न हो।


💫13) अगर औरत नअ़ना के पत्ते अपने पास रखे तो जब तक पत्ते इसके पास रहेंगे, हम्ल नहीं ठहरेगा।


💫14) मजीठ पकाकर इसका पानी निहार मुँह पीने से हमल नहीं ठहरता है।


💫15) जो औरत हालते हेज़ में हल्दी पीस कर खाए और फिर जब हैज़ से पाक हो तो तीन रोज़ तक और खाए हामिला न होगी।


💫16) अगर औरत मेंढक की हड्डी अपने पास रखे तो हामिला न हो।


💫17) सांप के दाँत को कमर में बाँध लेना माने हम्ल(गर्भ निरोधक) है।


💫18) जो औरत चम्बेली की एक कली निगल जाए तो एक साल तक, दो निगल जाए तो दो साल तक हामिला न हो।


💫19) बाबची मीठे तैल में पीस कर हेज़ के बाद रूई वगैरह में रख कर शर्मगाह में रखने से हम्ल ठहरने से रोक देता है।


💫20) नोशादर, फिटकरी पानी में पीसकर माहवारी के बाद मकामे मखसूस में रखना माने हम्ल है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 121/122


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✨माने हम्ल (हम्ल गिराने वाली दवायें)



💫(21) जामुन का फूल सिरके में पीस कर हैज़ के दिनों में सात दिन तक खाने से औरत हामिला नहीं होती। 


💫22) जो औरत गंधक डेढ़ दरहम पीस कर माहवारी के दिन मे तीन दिन तक खा ले तो बिलकुल बांझ हो जाए।


💫23) अगर औरत ऊँट का दिल पकाकर खाकर खा ले तो बांझ हो जाए।


💫24) जो औरत एक दिरहम काला दाना गुड़ में मिलाकर माहवारी से फारिग हो कर तीन रोज़ खा ले तो हामिला न हो।  


 💫25) अगर खच्चर के सुम (खुर) को बारीक पीस कर औरत को खिला दे तो औरत हामिला न होगी। 


💫26) जो औरत एक कोड़ी पीस कर खा ले तो बिल्कुल बांझ हो जाए। 


💫27) शहद, गाय का घी, तुख्मे प्लास मिलाकर पीस कर माहवारी के वक़्त शर्मगाह में रखने से हम्ल नहीं ठहरता।


💫28) तुख्मे प्लास पानी पीस कर पीले और थोड़ा तुख्मे प्लास रोगने गाओ के साथ पीस कर शर्मगाह में रख ले तो औरत हामिला न हो।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 122/123


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               ✨ हम्ल के लिए ✨


 💫 नुस्खाः - सोंठ, फिलफिल, जोजुत्तीब, सब हम वज़न फरफियून 1/8 हिस्सा सबको बारीक पीस कर गाय के गोश्त में मिलाकर भूने और औरत हैज़ से पाक होने के बाद इस्तेमाल करे फिर शौहर चन्द दिनो के बाद उससे हमबिस्तरी करे तो वह औरत हामिला हो जाएगी। 

 

💫नुस्खाः - जो औरत हैज़ के दिनों में हर रोज़ तीन मर्तबा मर्द के बालों की धूनी ले फिर हैज़ से पाक होने के बाद शौहर उससे मुज़ामत करे, हामिला हो जाएगी।


💫नुस्खाः - जो औरत कुत्ते के पैशाब में ऊन तर करके हैज़ के बाद शर्मगाह में रखे और फिर शौहर उससे हमबिस्तरी करे तो हामिला हो जाएगी। 


💫नुस्खाः - ज़र्रनीख अहमर का फल हर एक मुसावी लेकर कूटकर के सफेद मोम के साथ मिलाकर गुस्ल के बाद तीन रोज़ तक औरत उससे धूनी ले फिर शौहर उससे हमबिस्तरी करे हम्ल ठहर जाएगा।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 123


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               ✨ हम्ल के लिए ✨


 💫 नुस्खाः - जो औरत बांझ हो गई हो तो माहवारी से पाक होने के बाद तीन दिन तक ऊँट की पिण्डली का मम्ज़ निकाल कर रूई या ऊन के फाय में रख कर अपनी शर्मगाह में रख ले, फिर उसका शौहर हमबिस्तरहो इंशा अल्लाह हम्ल ठहर जाएगा।


💫 नुस्खाः - सियाह धतूरे का फूल पीस कर शहद और रोगने ज़र्द में मिलाकर खाने से हम्ल बरकरार रहेगा। 


💫नुस्खाः - एक अदद समुद्र फल अगर थोड़े दही के साथ मिला कर निगल ले तो हामिला हो जाए। 


💫नुस्खाः - हाथी के दाँत का बुरादा कूट छानकर बराबर मिसरी मिलाकर जिस दिन औरत हैज़ से पाक हो, नौ माशा सात दिन तक खाए. फिर सातवें दिन के बाद मर्द से कुरबत करे, इंशा अल्लाह तीन दिन में हामिला हो जाएगी। 


✨नुस्खाः - असगन्दे नागौरी कूट छान कर शुरू हैज़ से एक दिरहम से दो दिरहम तक खाए, फिर पाकी के बाद शौहर से हमबिस्तर हो, हामिला हो जाएगी।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 124


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               ✨ हम्ल के लिए ✨


 💫 नुस्खाः - मरमुकी, नौशादर बराबर पीस कर चार-चार तीलों के मिक़दार गोलियां बनाए, औरत अय्यामें हैज़ में एक गोली रोज़ खाए, फिर बादे हैज़ शौहर से कुरबत करे, हामिला हो जाएगी। 

 

 💫 नुस्खाः- जायफल, अनार का छिल्का एक-एक मिस्काल पीसकर और शहद में मिलाकर अगर औरत हमम्बिस्तरी के वक़्त कपड़े का बनाकर शर्मगाह में रख ले तो हामिला हो जाएगी। 

 

💫 नुस्खा:- चिड़े का पत्ता ज़कर पर लगाकर हमबिस्तरी करने से औरत हामिला हो जाती है। 


💫 नुस्खा:- जो औरत लहसन को तिलों के तेल में जलाए कि तिल में जलाए कि सब एक ज़ात हो जाए, फिर उसको शर्मगाह में रखकर मर्द से कुरबत करे तो हामिला हो जाएगी।  


💫 नुस्खा :- लोमड़ी की बीट तेल में घोल कर ज़कर पर लगाकर हमबिस्तरी करने से औरत हामिला हो जाती है। 


💫 नुस्खाः- अगर औरत बकरी के बच्चे की हड्डी का गूदा रूई में लगाकर माहवारी के बाद शर्मगाह में रखे, फिर मर्द से कुरबत करे तो हामिला हो जाएगी।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 124/25


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               ✨ हम्ल के लिए ✨


 💫 नुस्खाः- जौज़बुवा, कज़माज़िज, बिल्लौर, फिटकरी, अनार का छिलका एक - एक मिस्काल कूट छानकर पोटली बनाकर औरत शर्मगाह में रखे , अगर बांझ भी होगी तो हामिला हो जाएगी।

 

💫 नुस्खाः- नारंगी की जड़ और बीज पानी में पीस कर एक रंगी गाय के दूध में मिलाकर पीने से औरत हामिला हो जाती है।


💫 नुस्खाः- हुद हुद की चोंच तिल के तेल में जोश देकर मर्द अपने उज्व में तिला कर के मुबाशरत करे, इंशा अल्लाह हमल ठहर जाएगा।


💫 नुस्खाः- फिटकरी सफेद दो दिरहम, सिमाक, ज़ाफ़रान, ऊदे हिन्दी ये सब एक - एक दिरहम सबको बारीक करके भेड़ के ऊन में आलूदा करके औरत पोटली बनाकर अपनी शर्मगाह में रखे। एक हफ्ते के बाद शौहर से कुरबत करे, बफ़ज़्ले खुदा हामिला हो जाए। 


💫 नुस्खाः- मूस्ली सफेद, मूस्ली सियाह, तुख्मे ओटंगन, सेम्भल के जड़ का पोस्त, गोखरू एक - एक तोला लेकर, पीस करके छान ले, जब औरत माहवारी से पाक हो तो उसी दिन से छः माशा खाना शुरू करे और मर्द भी हर रोज़ छः माशा खाए, फिर पाँच रोज़ के बाद शौहर हमबिस्तर हो, इंशा अल्लाह औरत हामिला हो जाएगी।


 💫 नुस्खा :- सितावर का सफूफ माहवारी आने के बाद रात को तीन दिन तक दूध के साथ खाने से औरत हामिला हो जाती है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 125


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 ✨ विलादत की आसानी के लिए ✨


 💫 नुस्खा:- जंगली गाय का सींग औरत के गले में लटकाने से दर्द की तकलीफ़ दूर हो जाती है और बच्चा फिलफ़ौर पैदा हो जाता है।

 

💫 नुस्खा:- गिद्ध के परों को जलाकर धूनी देने से बच्चा फ़ोरन पैदा हो  जाता है।

 

💫 नुस्खाः- शबे यमानी यानी फिटकरी औरत की दांयी रान में बांधने से बच्चे की विलादत आसान हो जाती है और तकलीफें दूर हो जाती हैं।


💫 नुस्खाः- गिद्ध के परों को औरत के कदमों के नीचे रखने से विलादत में सहुलत हो जाती है।


💫 नुस्खाः- मिक़नातीस(चुम्बकीय) पत्थर औरत की रान में बांध देने से बच्चे की विलादत में आसानी हो जाती है और तकलीफ दूर हो जाती है।

 

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 126


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 ✨ विलादत की आसानी के लिए ✨


 💫 नुस्खाः - चिरचिरे की जड़ औरत के पेट पर बांधे और थोड़े पानी में पीस कर नाफ़ और पेट पर लेप करे तो बहुत जल्द बच्चे की पैदाईश हो जाएगी और औरत की तकलीफ़ भी दूर हो जाएगी। 

 

💫 नुस्खा:- गाजर के बीजों को जलाकर शर्मगाह में उसकी धूनी लेने से मरा हुआ बच्चा भी फ़ौरन निकल पड़ता है। 


💫 नुस्खाः - जाओ शीर, हींग और गुड़ को मिलाकर खा लेने से बच्चे की विलादत में आसानी हो जाती है, तकलीफ़ भी दूर हो जाती है। 


💫 नुस्खाः - गधे की सुम (खुर) को जलाकर उसकी धूनी शरमगाह से बच्चा फ़ोरन ही निकल आता है।


 💫 नुस्खाः- चार मिस्काल अम्लतास के छिलके पानी में जोश देकर शकर मिलाकर पिलाना विलादत की दुशवारी के लिए बेहद मुफीद है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 126


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    ✨ विलादत की आसानी के लिए ✨


  💫 नुस्खाः- गुले बाबूना नो माशा थोड़े पानी में जोश देकर ब-कदर ज़रूरत शह़द में मिलाकर पिलाना दर्दज़ह की तकलीफ़ को दूर कर देता है।

 

💫 नुस्खाः- विलादत के वक़्त संगे मिक़्नातीस हाथ में लेना दुश्वारिये विलादत के लिए बहुत मुजर्रव है।


💫 नुस्खाः- - बारह सिंगे का सींग गले में लटकाने से तकलीफ़ दूर हो जाती है। 


💫 नुस्खाः- आदमी के सर के बालों को जलाकर उसकी धूनी लेना दुश्वारिये विलादत के लिए फायदेमन्द है।


💫 नुस्खाः- समुन्दर का झाग औरत के गले में लटका देने से तकलीफ़ दूर हो जाती है और बच्चे की विलादत आसान हो जाती है। 


💫 नुस्खाः- अगर इंसान के बालों को जलाकर उसकी राख गुलाब के पानी में मिलाकर औरत अपने सर में और शर्मगाह में रख ले तो दर्दज़ह की तकलीफ़ दूर हो जाती है और विलादत में आसानी हो जाती है।



💫 नुस्खाः- मुर्ग के अण्डे की पोस्त दो अदद, मजेठ छ: माशा दोनों को पीस कर छः माशे पानी के साथ खाए, विलादत की दुश्वारी के लिए बेहद मुफीद है। 

 

📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 126/127


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               ✨ जिरयान एवं धात ✨


🥀इस बीमारी में माद्दए तोलीद(वीर्य) बिला इरादा ख़ारिज हुआ करता है। कभी पैशाब करने से पहले, कभी खुद ब खुद निकलता है। अकसर यह मर्ज़ कसरते हमविस्तरी(सम्भोग) या जलक़ की आदत के बाईस उजूए तनासुल के जकीयुलहिस होने की वजह से हुआ करता है लेकिन कभी कब्ज हो जाने या गुर्दा मसाना की खराश और पथरी के बाईस और कभी गर्म और मुक़व्वी चीज़ के इस्तेमाल से भी यह शिकायत हो जाती है। इस मर्ज़ में मरीज़ की कमर में दर्द और घुटनों में तकलीफ़ और आँखों के सामने अन्धेरा छा जाता है और कमजोरी दिन ब दिन बढ़ती जाती है। यहाँ तक कि भूख नहीं लगती और कुछ खा पी ले तो हज़्म नही होता। इस सिलसिले में कुछ मुजर्रब नुस्खे लिखे जाते हैं। अपने हालात देखकर इस्तेमाल कर सकते हैं।


💫नुस्खाः - गोखरू पाव भर, सअ़लिब मिसरी एक तोला, इसबग़ोल की भूसी छः माशा, तबाशीर एक तोला, मिसरी आधा किलो सब को मिला कर सफूफ़ बना ले और हर रोज़ सुबह को थोड़ी सी फाँक कर ऊपर से पाव भर दूध पी लिया करे। जिरयानो रिक़्क़त के लिए मुफीद है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 127/128


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                     💦 एहतिलाम 💦


🥀दिल में फ़ासिद(गन्दे) ख्यालात और आशिकाना तफ़क्कुरात के वजह से शहवत अंगेज़ ख्वाब देखने के बाद बगैर इरादा मनी(वीर्य) एहतिलाम है। कभी ज्यादा दिनों तक औरत से अलग रहने या चित लेटने या क़ब्ज़ , बद ह़ज़मी ज़्यादा रहने या ह़द से ज़्यादा खाने की वजह से भी हो जाता है। जब ये शिकायत बढ़ जाती है तो दिन में भी एहतिलाम होने लगता है‌‌। इस बिमारी में बदन के अंदर सुस्ती काहिली और कमज़ोरी बढ़ जाती है। मिजाज़ में चिड़-चिड़ा पन आ जाता है सर मे दर्द और चक्कर पैदा हो जाता है कुछ मुजर्र्ब नुस्खे लिखे जाते हैं अपने मिजाज़ और तबियत के ऐतिबर से इस्तेमाल करे


💫नुस्खाः- ताल मखाना 6 माशा, मुस्तगी 1 माशा, इसपगोल 6 माशा. दोनों दवाओं को कूटकर उसमें इसपगोल शामिल कर लें, फिर दूध के साथ फांक लें। यह एक दिन का नुस्खा है। 


💫नुस्खाः - ऊँट के बाल की रस्सी बनाकर रान पर बांधने से एहतिलाम की शिकायत दूर हो जाती है। 


💫नुस्खाः - फिटकरी कमर में बांधने से भी एहतिलाम की शिायत ख़त्म हो जाती है।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 132/133/134


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                     💦 एहतिलाम 💦


💫 नुस्खाः - दरख्त सेम्भल के नीचे की जड़ खुश्क करके कूटकर कपड़े में छान लें, फिर इसमें हमवज़न शहद मिलाकर माजून मिला लें। हर रोज़ सुबह दूध के साथ खाएं, एहतिलाम की शिकायत दूर हो जाएगी। 


💫नुस्खाः - अकर करहा 6 माशा, तुमे रेहान 4 तोला, खांड 4 तोला सबको कूट कर सुबह निहार मुंह 3 माशा गाय के दूध के साथ खाएं, एहतिलाम के लिए बेहद मुफीद है। 


💫नुस्खाः - दूधी खुर्द साये में खुश्क करके सफूफ़ बनाऐं, फिर इसमें बराबर वज़न खांड मिलाकर रखें, 6 माशा सुबह-शाम दूध के साथ खाऐं।



💫नुस्खाः- गुलनार फ़ारसी 1 तोला, तुख्मे भंग 1 तोला, दोनों को पीस कर पाँच हिस्से करें। एक हिस्सा सुबह को दूध से फांक लें। एहतिलाम का नामो निशान न रहेगा।


📍परहेज़ः- गोश्त, गर्म चीज़ों और मसालेदार गिज़ाओं से दूर रहें। अण्डा, चटनी, अचार, चाय, बीड़ी, सिगरेट वगैरह से भी परहेज़ करें।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 134


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        ✨ कुव्वते मर्दानगी की कमज़ोरी ✨


🥀आमतौर से यह बीमारी कसरते मुबाशरत या हाथ वगैरह से मनी निकालने या काफी दिनों तक जिरयाने मनी और कसरते एहतिलाम की शिकायत रहने की वजह से हो जाती है । बाज़ दफ़ा आज़ाए रईसा दिलो दिमाग , जिगर वगैरह के कमजोर हो जाने की वजह से यह हालत पैदा हो जाती है । कभी नशा आवर चीजें मसलन अफ़ीम , भांग , चरस , शराब वगैरह खाने पीने से भी यह शिकायत पैदा हो जाती है । खुदा न ख़ास्ता अगर यह शिकायत किसी आदमी को हो जाए तो उसे घबराना नहीं चाहिए बल्कि माहिर हकीम की तरफ़ रूजू करना चाहिए । हर बीमारी का इलाज मुमकिन है । हम इस सिलसिले में कुछ मुजर्रब नुस्खे तहरीर करते हैं । ज़ौके तबीयत के मुताबिक इस्तेमाल करके फ़ायदा उठायें । 


💫नुस्खाः- सअलिब मिसरी , शकाकिल , मूसली सियाह व सफेद , मूसली सेम्भल , तज कलमी , बीज बन्द , तुमे ताल मखाना , कमरकस , इसपगोल की भूसी , मज़े इमली , मगजे तुमे जामुन , हर एक - एक तोला , सब दवाओं को सफूफ बनाकर हर रोज़ सुबह एक तोला दूध के साथ खाएं । बेहद मुगलिज़ मनी है और कुव्वते बाह में बेपनाह इज़ाफ़ा करता है । 


💫नुस्खा : - फ़िलफ़िल दराज़ पावभर पुख्ता लेकर एक सेर गाय के दूध में इस क़द्र जोश दें कि सब दूध जज़्ब हो जाये , फिर उसको पीस कर हर दिन एक दिरहम में 6 दिरहम मिस्री मिलाकर खायें और ऊपर से आधा सेर दूध पी लें । इसी तरह चन्द रोज़ इस्तेमाल करके फ़ायदा देखें ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 135


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        ✨ कुव्वते मर्दानगी की कमज़ोरी ✨


💫नुस्खा : - सुर्ख गाजरें लेकर उनका नड़ा निकाल कर फेंक दें , बाकी के छोटे-छोटे टुकड़े करके किसी हांडी में डालकर ख़ालिस शहद । पोशीदा कर के आग पर किवाम करें, फिर उतार कर मुन्दरजा जेल दवाई शामिल कर देंः सोंठ, जौजे बुवा, लोंग, करफ़ा, खुसनजान, हर एक एक दिरहम, ज़ाफ़रान आधा दिरहम, सुम्बुल मुस्तगी हर एक आधा ग्राम, सबको कूट छानकर शहद में मिला दें और वक़्ते जिमाअ (सम्भोग के समय) से तीन घड़ी पहले पाँच दिरहम इस्तेमाल करें और खुदा की कुदरत का मुशाहिदा करें। 


💫नुस्खाः - लस्सन बक़द्रे ज़रूरत लेकर खूब बारीक पीसें कि हलवे की तरह हो जाये, फिर उसमें लस्सन का निस्फ़ वज़न अकरकरहा कूट छानकर मिला लें। फिर उसमें रोगने ज़र्द और शहदे खालिस दो गुना मिलाकर आग पर किवाम करें, फिर ठंडा करके छोड़ दें और उसमें से एक औकिया निहार मुँह इस्तेमाल करें, इसके इस्तेमाल से शहवत बरअंगेत्ता होती है और कुव्वते बाह बढ़ जाती है।


💫नुस्खाः - जो शख्स चाहे कि रातभर अपनी बीवी से मसरूफे जिमाअ रहे, उसको चाहिए कि जितने अण्डो की ज़र्दी हज़्म कर सके उसे कढ़ाही में डालकर उसके ऊपर ताज़ा घी और मक्खन बक़द्रे ज़रूरत डाल दें और जोश दें यहाँ तक कि घी की खुश्बु आने लगे, फिर उसमें बक़द्रे ज़रूरत शहद डाल दें और सबको रोटी के साथ पेट भर के खा लें, फिर तीन घण्टे के बाद औरत से मुकारबत करें, रात भर उसकी तासीर बाकी रहेगी।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 135/136


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        ‌             ✨ तिला (मालिश)✨


💫नुस्खा:- बेर बहुटी, हींग हर एक ६ माशा, जंगली मेढक एक अदद जोंक ४ अदद, सब को बारीक करके अण्डे की जर्दी २ तोला मिलाकर आतिशी शीशी में तेल निकाले और फिर एक रत्ती के करीब चन्द रोज़ मालिश करे, यह आसाब को क़वी और मुर्दा जिस्म को ज़िन्दा करता है।


💫नुस्खाः- यह तिला आला दर्जे का मुक़व्वी बिलखुसूस मजलूक के लिए बेहद मुफीद है। बेर बहुटी, लोंग, अकरकरहा, जावित्री, जायफल, तेलिया हर एक २ तोला लेकर खूब बारीक कर दें, फिर किसी आतिशि शीशी में डालकर उसमें मिट्टी लगा दें और फिर उसमें से तैल निकालें और उस तैल को चन्द दिन रात में हरफा सेवन छोड़कर ज़कर पर लगायें और ऊपर से पान बांधे। 


💫 नुस्खा:- अगर किसी का उज्व टेढ़ा या कहीं से पतला हो गया हो तो उसके लिए तिला बहुत फायदेमन्द है: अकरकरहा पीस कर बारीक कर लें और सफेद प्याज़ के अर्क से ख़मीर करके बारीक पटटी लगाकर ऊपर से कच्चा सूत लपेट लें। सुबह खोलकर १५ मिनट के वक़्फे से दूसरी पट्टी लगायें। इसी तरह लगाते रहें, तीन चार रोज़ में आराम हो जायेगा।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 140/141


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        ‌             ✨ तिला (मालिश)✨


💫नुस्खा : - जावित्रि , जमाल गोटा , सफ़ेद घोंघची हर एक तीन माशा कूट छानकर रोगने गाव में मिला लें और उसमें से थोड़ा सा लेकर उज्वे तनासुल पर मल लें और ऊपर से पान बांधे , बहुत फायदा करता है । जकर में तेज़ी और तुन्दी पैदा हो जाती है ।


💫 नुस्खाः- हड़ताल वरकी , गन्धक , आमला सार , हर एक तीन माशा , सुहागा एक माशा , समुलफ़ार एक माशा , ज़र्दी बेज़ए मुर्ग ८ अदद घोट कर गोली बना लें और वक्ते ज़रूरत तिल के तेल में हल करके लगा लें । चन्द दिनों में दाने पैदा हो कर रतूबते नाक़िसा ख़ारिज हो जाती है । फिर उज्वे तनासुल में सख्ती और तनाव हो जाता है । यह मजलूक के लिए बेहद मुफीद है । 


💫नुस्खा : - मुर्गी के अण्डे को गाय के घी और कड़वा तेल में मिलाकर ज़कर पर मलें , कुछ देर बाद कुव्वते बाह में खूब इज़ाफ़ा होता है और बेपनाह इन्तेशार भी । 


💫नुस्खा : - चूंगची की जड़ पानी में पीस कर ज़कर पर मलें , ऊपर से कपड़ा लपेट दें , एक घड़ी के बाद कुव्वते बाह में खूब तरक्की होगी ।


📕सलिक़ा -ए- ज़िन्दगी, सफा 142


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8 टिप्‍पणियां:

  1. Salike jindagi ki grou me post no 27 tak aachuki hai jabki yaha par sirf post no 16 tak hi dekh pa raha hoo kiya wajeh hai.
    وجاہت فرمائے

    जवाब देंहटाएं
  2. Aap ka Bahot bahot shukriya
    aap ke in koshisho ki wajah se mene bahot kuch sikha aour apni ishlah bhi kiya.

    Allah aap ko jzay_e_khair ata farmaye
    aap ko sehto shlmat rakkhe.
    Aap ke ilm me bepnah barkate ata ata farmaye.

    जवाब देंहटाएं
  3. Mashallah bhai bhot achcha kaam kar rahe hu Allah tumhe kamyab kare or tumhari har nek jaiz tammanna ko pura kare.

    जवाब देंहटाएं

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