गुरुवार, 29 जुलाई 2021

मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़ ?

 

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          🤔 मुहर्रम में क्या जाइज़ है ✅

                     क्या नाजाइज़❎ 

🔆👉🏻 पोस्ट:- 1

🍁प्यारे इस्लामी भाईयों! मज़हबे इस्लाम में एक अल्लाह की इबादत ज़रूरी है 

साथ ही साथ उसके नेक बंदों से मुहब्बत व अक़ीदत भी जरूरी है

अल्लाह के नेक अच्छे और मुक़द्दस बंदों से असली, सच्ची और हक़ीक़ी मुहब्बत तो ये है कि उनके ज़रिए अल्लाह ने जो रास्ता दिखाया है उस पर चला जाए

 उनका कहना माना जाए, अपनी ज़िंदगी को उनकी ज़िंदगी की तरह बनाने की कोशिश की जाए

 इसके साथ साथ इस्लाम के दायरे में रहकर उनकी याद मनाना, उनका ज़िक़्र और चर्चा करना, उनकी यादगारें क़ाइम करना भी मुहब्बत व अक़ीदत है।

 और अल्लाह के जितने भी नेक और बरगुज़ीदा बंदे है 

उन सब के सरदार उसके आखिरी रसूल हज़रत मुहम्मद सलल्ललाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं

उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वो अल्लाह के रसूल होने के साथ साथ उसके महबूब भी है

 और जिस को दीन व दुनियां में जो कुछ भी अल्लाह ने दिया, देता है, और देगा, सब उन्हीं का ज़रीया, वसीला और सदक़ा है

 उनका जब विसाल हुआ, और जब दुनियां से तशरीफ़ ले गए तो उन्होंने अपने क़रीबी दो तरह के लोग छोड़े थे

एक तो उनके साथी जिन्हें सहाबी कहते हैं

उनकी तादाद हुज़ूर सलल्ललाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाल के वक़्त एक लाख से भी ज़्यादा थी

 दूसरे हुज़ूर की आल व औलाद और आप की पाक बीवियाँ उन्हें अहले बैत कहते हैं, हुज़ूर के इन सब क़रीबी लोगों से मुहब्बत रखना मुसलमान के लिए निहायत ज़रुरी है

 हुज़ूर के अहले बैत हों या आप के सहाबी उन में से किसी को भी बुरा भला कहना या उनकी शान में गुस्ताख़ी और बे अदबी करना मुसलमान का काम नहीं है, ऐसा करने वाला गुमराह व बद दीन है उसका ठिकाना जहन्नम है।


📚 मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़ ?, सफा न. 3-4 


📝 इंशाअल्लाह पोस्ट जारी रहेगी .......

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          🤔 मुहर्रम में क्या जाइज़ है ✅

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पोस्ट-2

🔆 हुज़ूर के अहले बैत में एक बड़ी हस्ती इमाम आली मक़ाम सय्येदिना "इमाम हुसैन" भी हैं उनका मर्तबा इतना बड़ा है कि वो हुज़ूर के सहाबी भी हैं, और अहले बैत में से भी हैं, यानी आपकी प्यारी बेटी के प्यारे बेटे आप के प्यारे और चहीते नवासे हैं। रात रात भर जाग कर अल्लाह की इबादत करने वाले और क़ुरआने अज़ीम की तिलावत करने वाले मुत्तक़ी, इबादत गुज़ार, परहेज़गार, बुज़ुर्ग अल्लाह के बहुत बड़े वली हैं, साथ ही साथ मज़हबे इस्लाम के लिए राहे ख़ुदा में गला कटाने वाले शहीद भी हैं। मुहर्रम के महीने की 10 तारीख़ को जुमा के दिन 61 हिजरी में यानी हुज़ूर के विसाल के तक़रीबन 50 साल के बाद आपको और आपके साथियों और बहुत से घर वालों को ज़ालिमों ने ज़ुल्म करके करबला नाम के एक मैदान में 3 दिन प्यासा रख कर शहीद कर दिया। इस्लामी तारीख़ का ये एक बड़ा सानिहा और दिल हिला देने वाला हादसा है, और 10 मुहर्रम जो कि पहले ही से एक तारीख़ी और यादगार दिन था इस हादसे ने इसको और भी जिंदा व जावेद कर दिया, और उस दिन को हज़रत इमाम हुसैन के नाम से जाना जाने लगा, और गोया कि ये हुसैनी दिन हो गया, और बेशक ऐसा ही होना चाहिए। लेकिन मजहबे इस्लाम एक सीधा सच्चा संज़ीदगी और शराफ़त वाला मज़हब है, और उसकी हदे मुकर्रर हैं, लिहाज़ा इसमें जो भी हो सब मज़हब और शरीयत के दायरे में रहकर हो तभी वो इस्लामी बुज़ुर्गों की यादगार कहलाएगी, और जब हमारा कोई भी तरीक़ा मजहब की लगाई चहार दीवारी से बाहर निकल गया, तो वो ग़ैर इस्लामी और हमारी बुज़ुर्ग शख़्सियतों के लिए बाइसे बदनामी हो गया। हम जैसा करेंगे हमे देख कर दूसरे मज़हबों के लोग यही समझेंगें कि इनके बुज़ुर्ग भी ऐसा कर


📚  मुहर्रम में क्या जाइज? क्या नाजायज़?  सफा नं० 4,5

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                     *क्या नाजाइज़❎* 

📜 *पोस्ट - 3* 

🔆 हुशैनीं दिन यानि दस मुहर्रम के सांथ भी कुछ लोगों ने यही सब किया

और ईमाम हुशैन के क़िरदार को भूल गए

और *इस दिन को खेल तमाशों, गैर शरई रसूम, नांच गानों, मेलों, ठेलों और तफरीहों का दिन बनां डाला* 

और ऐसा लगनें लगा कि जैसे इस्लाम भी मआज़ अल्लाह  दूसरे मज़हबों की तरह खेल, तमाशों तफरीहों और रंग रलियों वाला मज़हब है।

*📚 _मुहर्रम में क्या जाइज़ ? क्या नाजाइज़ ?_*

*सफा नं. 5-6*

📝 *इंशाअल्लाह पोस्ट जारी रहेगी......*

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                     *क्या नाजाइज़❎* 

📜 *पोस्ट - 4* 

🔆ख़ुद को मुसलमान कहने वालों में एक नाम निहाद इस्लामी फ़िरक़ा ऐसा भी है कि उनके यहाँ नमाज़ रोज़े वगैरह अहकामे शरअ और दीनदारी की बातों को तो कोई ख़ास अहमियत नहीं दी जाती बस मुहर्रम आने पर रोना, पीटना, चीखना, चिल्लाना, कपड़े फाड़ना, मातम व सीना कोबी करना ही उन का मज़हब है गोया कि उनके नज़दीक अल्लाह तआला ने अपने रसूल को इन्हीं कामों को करने और सिखाने को भेजा था, और इन्हीं सब बेकार बातों का नाम इस्लाम है।

मज़हबे अहले सुन्नत वलजमाअत में से भी बहुत से अवाम कुछ राफ़ज़ियों के असरात और कुछ हिंदुस्तान के पुराने ग़ैर मुस्लिमों जिन के यहाँ धर्म के नाम पर जुए खेले जाते हैं, शराबें पी जाती हैं, जगह जगह मेले लगा कर खेल तमाशों ढोल, बाजे, वगैरह ग़ैर इस्लामी काम कराये जाते हैं, उनकी सोहबतों में रहकर उनके पास बैठने उठने, रहने सहने के नतीज़े में खेल तमाशे और वाहियात भरे मेले को ही इस्लाम समझने लगे, और बांस, कागज़ और पन्नी के मुजस्सिमे बना कर उनपर चढ़ावे चढ़ाने लगे।

दरअसल होता ये है कि ऐसे कामों कि जिन में लोगों को ख़ूब मज़ा और दिल चस्पी आये, तफरीह और चटखारे मिले उनका रिवाज़ अगर कोई डाले तो वो बहुत जल्दी पढ़ जाती है, और क़ौम बहुत जल्दी उन्हें अपना लेती है, और जब धर्म के ठेकेदार उनमे सवाब बता देते हैं तो अवाम उन्हें और भी मज़ा लेकर करने लगते हैं कि ये ख़ूब रही, रंगरलियां भी हो गई और सवाब भी मिला, तफरीह और दिल लगी भी हो गई खेल तमाशे भी हो गए और जन्नत का काम, क़ब्र का आराम भी हो गया। मौलवी साहब या मियाँ हुज़ूर ने कह दिया है कि सब जाइज़ व सवाब का काम है ख़ूब करो, और हमने भी ऐसे मौलवी साहब को खूब नज़राना देकर ख़ुश कर दिया है, और उन्होंने हम को तअज़िये बनाने घुमाने, ढोल बजाने और मेले ठेले लगाने और उनमें जाने की इजाज़त दे दी है अल्लाह नाराज़ हो या उस का रसूल ऐसे मौलवियों और पीरों से हम ख़ुश और वो हमसे ख़ुश।

*📚 मुहर्रम में क्या जाइज?, क्या नाजाइज़?  सफा नं. 6 - 7*

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📜 *पोस्ट - 5*
🔆इस सब के वाबजूद अवाम में ऐसे लोग भी काफ़ी हैं जो गलती करते हैं और इसको गलती समझते भी हैं और इस हराम को हलाल बताने वाले मौलवियों की भी उनकी नज़र में कुछ औक़ात नहीं रहती। एक गॉव का वाकिया है कोई ताज़िये बनाने वाला कारीगर नहीं मिल रहा था या बहुत सी रक़म का मुतालबा कर रहा था वहाँ की मस्जिद के इमाम ने कहा कि किसी को बुलाने की ज़रूरत नहीं है ताज़िया मैं बना दूंगा और इस इमाम ने गांव वालों को ख़ुश करने के लिए बहुत उम्दा बढ़िया और खूबसूरत ताज़िया बना कर दिया और फिर उन्हीं ताजियेदारों ने इस इमाम को मस्जिद से निकाल दिया और ये कहकर इस का हिसाब कर दिया कि ये कैसा मौलवी है कि ताज़िया बना रहा है मौलवी तो ताज़ियेदारी से मना करते हैं, और मौलवी साहब का बक़ौल शाइर ये हाल हुआ कि:
*"न ख़ुदा ही मिला न विसाले सनम"*
*"न यहाँ के रहे न वहाँ के रहे"*
दरअसल बात ये है कि सच्चाई में बहुत ताक़त है हक़ हक़ ही होता है। और सर चढ़ कर बोलता है और हक़ की अहमियत उनके नज़दीक भी होती है जो ना हक़ पर हैं।
बहरे हाल इस में कोई शक नहीं कि एक बड़ी तादाद में हमारे सुन्नी मुसलमान अवाम भाई हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु की मुहब्बत में गलत फहमियों के शिकार हो गए और मज़हब के नाम पर नाजाइज़ तफरीह और दिल लगी के काम करने लगे उनकी गलत फहमियों को दूर करने के लिए हमने ये मज़मून मुरत्तब किया है इस मुख्तसर मज़मून में इस्लाम व सुन्नियत के नाम पर जो कुछ होता है इस मे इस्लामी नुक़्ता ए नज़र से सुन्नी उलमा के फतवों के मुताबिक़ जाइज़ क्या है और नाजाइज़ क्या है, किस में गुनाह है और किस में सवाब। इस में बहस व मुबाहिसे और तफसील की तरह न जाकर सिर्फ जाइज़ और नाजाइज़ कामों का एक जायज़ा पेश करेंगे, और पढ़ने और सुनने वालों से गुजारिश है कि ज़िद और हठ धर्मी से काम न लें, मौत क़ब्र और आख़िरत को पेशे नज़र रखें।
मेरे अज़ीज़ इस्लामी भाइयों! हम सब को यक़ीनन मरना है, और खुदा ए तआला को मुंह दिखाना है वहां ज़िद और हठ धर्मी से काम नहीं चलेगा। भाइयों! आंखें खोलो और मरने से पहले होश में आ जाओ और पढ़ो समझो और मानों।

*📚 (मुहर्रम में क्या जाइज?, क्या नाजायज़?  सफा नं०  7, 8, 9)*
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📜 *पोस्ट - 6*
*मुहर्रम में क्या जाइज़*
🔆 हम पहले ही लिख चुके हैं कि हज़रत इमाम हुसैन हों या दूसरी अज़ीम इस्लामी शख्सियतें उनसे असली सच्ची हक़ीक़ी मुहब्बत व अक़ीदत तो ये है कि उनके रास्ते पर चला जाए, और उनका रास्ता "इस्लाम" है। पांचों वक़्त की नमाज़ की पाबंदी की जाए, रमज़ान के रोज़े रखे जाएं, माल की ज़कात निकाली जाए, बस की बात हो तो ज़िन्दगी में एक मर्तबा हज भी किया जाए, जुए, शराब, ज़िना, सूद, झूंठ, ग़ीबत फ़िल्मी गानों, तामाशों और पिक्चरों वगैरह नाजाइज़ हराम कामो से बचा जाए, और उसके साथ साथ उनकी मुहब्बत व अक़ीदत में *मुन्दरज़ा ज़ैल, काम* किये जाएं तो कुछ हर्ज़ नहीं बल्कि बाइसे खैर व बरक़त है।

*📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़ सफा न०- 9)*

*नोट* :- *मुन्दर्ज़ा जैल , काम* मानें निम्नलिखित(नीचे लिखे) काम जो अगली पोस्ट में लिखे जाऐंगें....

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📝 *पोस्ट- 7*
*न्याज़ व फ़ातिहा.......1*
🔆 हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु और जो लोग उनके साथ शहीद किये गए उनको सवाब पहुंचाने के लिए सदक़ा व ख़ैरात किया जाए, ग़रीबों, मिस्कीनों को या दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों वगैरह को शर्बत या खिचडे या मलीदे वगैरह कोई भी खाने पीने की चीज़ खिलाई या पिलाई जाए, और उसके साथ आयाते कुरआनिया की तिलावत कर दी जाए तो और भी बेहतर है इस सब को उर्फ़ में नियाज़ फ़ातिहा कहते हैं, ये सब बिला शक जाइज़ और सवाब का काम है, और बुजुर्गों से इज़हारे अक़ीदत व मुहब्बत और उन्हें याद रखने का अच्छा तरीक़ा है लेकिन इस बारे में चंद बातों पर ध्यान रखना ज़रूरी है।
➡️ न्याज़ व फ़ातिहा किसी भी हलाल और जाइज़ खाने पीने की चीज़ पर हो सकती है उसके लिए शर्बत, खिचड़े और मलीदे को ज़रूरी ख़्याल करना जिहालत है अलबत्ता इन चीजों पर फ़ातिहा दिलाने में कोई हर्ज़ नहीं है अगर कोई इन मज़कूरा चीज़ों पर फ़ातिहा दिलाता है तो वो कुछ बुरा नहीं करता, हां जो उन्हें ज़रूरी ख्याल करता है उनके एलावा किसी और खाने पीने की चीज़ पर मुहर्रम में फ़ातिहा सही नहीं मानता वो ज़रूर जाहिल है।
➡️ नियाज़ फ़ातिहा में शेख़ी ख़ोरी नहीं होना चाहिए और न खाने पीने की चीज़ों मे एक दूसरे से मुक़ाबला। बल्कि जो कुछ भी हो और जितना भी हो सब सिर्फ़ अल्लाह वालों के ज़रिए अल्लाह तआला की नज़दीकी और उसका कुर्ब और रज़ा हासिल करने के लिए हो, और अल्लाह के नेक बंदों से मुहब्बत इस लिए की जाती है कि उनसे  मुहब्बत करने और उनके नाम पर खाने खिलाने और उनकी रूहों को अच्छे कामों का सवाब पहुँचाने से अल्लाह राज़ी हो, और अल्लाह को राजी करना ही हर मुसलमान की जिंदगी का असली मक़सद है।
➡ ️नियाज़ फ़ातिहा बुज़ुर्गों की हो या बडे बूढो की उस के तौर तऱीके जो मुसलमानो में राइज़ हैं जाइज़ और अच्छे काम हैं फ़र्ज़ और वाज़िब यानी शरअन लाज़िम व ज़रूरी नहीं अगर कोई करता है तो अच्छा करता है और नहीं करता है तब भी गुनेहगार नहीं, हां कभी भी बिल्कुल न करना महरूमी है। नियाज़ व फ़ातिहा को न करने वाला गुनेहगार नहीं है, हां इससे रोकने और मना करने वाला जरूर गुमराह व बद मज़हब है और बुजुर्गों के नाम से जलने वाला है।
➡️ नियाज़ व फ़ातिहा के लिए बाल बच्चों को तंग करने की या किसी को परेशान करने की या ख़ुद परेशान होने की या उन कामों के लिए कर्ज़ा लेने की या ग़रीबों, मज़दूरों से चंदा करने की कोई ज़रूरत नहीं, जैसा और जितना मौक़ा हो उतना करें और कुछ भी न हो तो ख़ाली क़ुरआन या कलमा ए तय्यब या दुरुद शऱीफ वगैरह का ज़िक्र करके या नाफ़िल नमाज़ या रोज़े रखकर सवाब पहुंचा दिया जाए तो ये भी काफी है, और मुकम्मल नियाज़ और पूरी फ़ातिहा है, जिस में कोई कमी यानी शरअन ख़ामी नहीं है। ख़ुदा ए तआला ने इस्लाम के ज़रिए बंदों पर उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला। ज़कात हो या सदक़ा ए फित्र और क़ुर्बानी सिर्फ उन्हीं पर फ़र्ज़ व वाज़िब हैं जो साहिबे निसाब यानी शरअन मालदार हों। हज भी उसी पर फ़र्ज़ किया गया जिस के बस की बात हो, अक़ीक़ा व वलीमा उन्हीं के लिए सुन्नत है जिनका मौक़ा हो जब कि ये काम फ़र्ज़ व वाज़िब या सुन्नत हैं, और नियाज़ व फ़ातिहा उर्स वगैरह तो सिर्फ बिदआते हसना यानी सिर्फ अच्छे और मुस्तहब काम हैं, फ़र्ज़ व वाज़िब नहीं हैं यानी शरअन लाज़िम व जरूरी नहीं हैं। फिर नियाज़ व फ़ातिहा के लिए क़र्ज़ लेने, परेशान होने और बाल बच्चों को तंग करने की क्या जरूरत है बल्कि हलाल कमाई से अपने बच्चों की परवरिश करना बजाते ख़ुद एक बड़ा कारे ख़ैर सवाब का काम है।

*📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 9, 10, 11, 12)*

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 📝 *पोस्ट- 8*

*न्याज़ व फ़ातिहा.......2*

🔆 खुलासा ये है कि उर्स, नियाज़ व फ़ातिहा वगैरह बुज़ुर्गों की यादगारें मनाने की जो लोग मुख़ालिफत करते हैं वो गलती पर हैं और जो लोग सिर्फ उन कामों को ही इस्लाम समझे हुए हैं और शरअन उन्हें लाज़िम व जरूरी ख्याल समझते हैं वो भी बड़ी भूल में हैं।

➡️ नियाज़ व फ़ातिहा की हो या कोई और खाने पीने की चीज़ उसको लुटाना, भीड़ में फेंकना कि उनकी बे अदबी हो पैरों के नीचे आये या नाली वगैरह गंदी जगहों पर गिरें एक गलत तरीक़ा है, जिससे बचना जरूरी है जैसा कि मुहर्रम के दिनों में कुछ लोग पूड़ी, गुलगुले, बिस्किट वगैरह छतों से फेंकते और लुटाते हैं ये ना मुनासिब हरकतें हैं।

➡️ नियाज़ व फ़ातिहा यानी बुजर्गों को उनके विसाल के बाद या आम मुरदों की रूहों को उनके मरने के बाद सवाब पहुचांने का मतलब सिर्फ यही नहीं कि खाना पीना सामने रखकर और क़ुरआन करीम पढ़कर ईसाले सवाब कर दिया जाए, बल्कि दूसरे दीनी इस्लामी या रिफाहे आम यानी अवाम मुसलिमीन को नफा पहुंचाने बाले काम कर के उनका सवाब भी पहुँचाया जा सकता है।

किसी ग़रीब बीमार का ईलाज करा देना। किसी बाल बच्चेदार बेघर मुसलमान का घर बनबा देना।किसी बे क़सूर क़ैदी की मदद करके जेल से रिहाई दिलाना। जहां मस्जिद की ज़रूरत हो वहाँ मस्जिद बनवा देना। अपनी तरफ से इमाम व मुअज़्ज़िन की तनख्वाह जारी कर देना। मस्जिद में नमाज़ियों की ज़रूरत में ख़र्च करना। इल्मे दींन हासिल करने वालों या इल्म फैलाने वालों की मदद करना। दीनी किताबें छपवा कर या ख़रीदकर तकसीम कराना। दीनी मदरसे चलना। रास्ते और सड़के बनवाना या उन्हें सही कराना। रास्तों में राहगीरों की जरूरतो के काम कराना वगैरह वगैरह।

ये सब ऐसे काम हैं कि उन्हें करके या उनपर ख़र्चा करके, बुज़ुर्गों या बड़े बूढ़ों के लिए ईसाले सवाब की नियत कर ली जाए तो ये भी एक किस्म की बेहतरीन नियाज़ व फ़ातिहा है, ज़िन्दों और मुरदों सभी का उसमे नफा और फायदा है।

हदीस पाक में है कि हुज़ूर पाक के एक सहाबी हज़रते साअद इब्ने उबादा रदिअल्लाहु तआला अन्हु की माँ का विसाल हुआ तो वो बारगाहे रिसालत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया :- या रसूलल्लाह! मेरी माँ का इंतेक़ाल हो गया है तो कौनसा सदक़ा बेहतर रहेगा। सरकार ने फरमाया: पानी बेहतर रहेगा। उन्होंने एक कुआँ खुदवा दिया और उसके करीब खड़े होकर कहा :- ये कुआँ मेरी माँ के लिए है, *(मिश्कात बाबो फ़ज़लुस्सदक़ा स. 169)* यानी जो इस से पानी पिये उसका सवाब मेरी माँ को पहुँचता रहे।

शारेहीने हदीस फरमाते हैं:- हुज़ूर ने पानी इसलिए फरमाया कि मदीना तय्यबा में पानी की किल्लत थी पीने का पानी खरीदना पड़ता था, गरीबों के लिए दिक्कत का सामना था इसलिए हुज़ूर ने सअद से कुआँ खोदने के लिए फरमाया।

इस हदीस से ये बात साफ हो जाती है कि मुरदों को कारेखैर का सवाब पहुँचता है और ये कि जिस चीज़ का सवाब पहुंचाना हो उस खाने पीने की चीज़ को सामने रखकर ये कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि उसका सवाब फलां को पहुंचे, क्योकि हज़रत सअद ने कुआँ खुदवा कर कुआँ की तरफ इशारा करके ये ये अल्फ़ाज़ कहे थे, लेकिन इससे ज़रूरी भी नहीं समझना चाहिए कि खाना पानी सामने रखकर ही ईसाले सवाब जाइज़ है, दूर से भी कह सकते हैं, दिल में कोई नेक काम करके या कुछ पढ़कर या खिलाकर किसी को सवाब पहुंचाने की नियत करलें तब भी काफ़ी है। अल्लाह तआला सवाब देने वाला है वो दिलों के अहवाल से ख़ूब वाकिफ़ है। ये सब तऱीके दुरुस्त हैं उन में से जो किसी तऱीके को गलत कहे वही ख़ुद गलत है।


*📚 मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 12, 13, 14*

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          🤔 *मुहर्रम में क्या जाइज़ है ✅*
                     *क्या नाजाइज़❎*

📝 *पोस्ट- 9*
*ज़िक्रे शहादत*
🔆 हज़रत सय्यद इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु और दूसरे हज़रात अहले बैअत किराम का ज़िक्र नज़्म में या नस्र में करना और सुनना यक़ीनन जाइज़ है, और बाइसे ख़ैर व बरकत व नुज़ूले रहमत है लेकिन इस सिलसिले में नीचे लिखी हुई बातों को ध्यान में रखना ज़रूरी है।
ज़िक्रे शहादत में सही रिवायात और सच्चे वाकियात बयान किये जाए, आज कल कुछ पेशेवर मुक़र्रीरों और शायरों ने अवाम को ख़ुश करने और तक़रीरों को जमाने के लिए अज़ीब अज़ीब किस्से और अनोखी निराली हिकायात और  गढ़ी हुई कहानियां और करामात बयान करना शुरू कर दिया है, क्योकि अवाम को ऐसी बातें सुनने में मज़ा आता है, और आज कल के अक्सर मुक़र्रीरों को अल्लाह व रसूल से ज़्यादा अवाम को खुश करने की फ़िक्र रहती है, और बज़ाहिर सच से झूंठ में मज़ा ज्यादा है और जलसे ज़्यादातर अब मज़ेदारियों के लिए ही हो रहे हैं।
आला हज़रत मौलाना शाह अहमद रज़ा रहमतुल्लाहि तआला अलैहि फरमाते हैं:-
शहादत नामे नज़्म या नस्र जो आज कल अवाम में राइज़ है अक्सर रिवायाते बातिला व बे सरोपा से ममलू और अकाज़ीब मोज़ूआ पर मुश्तमिल है, ऐसे बयान का पढ़ना और सुन्ना, वो शहादत नामा हो, ख्वाह कुछ और मजलिसे मीलाद मुबारक में हों ख्वाह कहीं और मुतलकन हराम व नाजाइज़ है। *(फतावा रजविया जि. 24, स.514, मतबूआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर)* और उसी किताब के सफ़हा 522 पर इतना और है:-
यूँही मरसिये। ऐसी चीज़ों का पढ़ना सुन्ना सब गुनाह व हराम है।
हदीस पाक में है, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मरसियों से मना फरमाया।
(ज़िक्रे शहादत का मक़सद सिर्फ वाकियात को सुन कर इबरत व नसीहत हासिल करना हो और साथ ही साथ स्वालिहीन के ज़िक़्र की बरकत हासिल करना ही हो, रोने और रुलाने के लिए वाकियाते कर्बला बयान करना नाजाइज़ व गुनाह है।इस्लाम में 3 दिन से ज्यादा मौत का सोग जाइज़ नहीं)
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी फरमाते हैं:-
शरीयत में औरतों को शौहर की मौत पर चार महीने दस दिन सोग मनाने का हुक्म दिया है, औरों की मौत के तीसरे दिन तक इजाज़त दी है, बाक़ी हराम है, और हर साल सोग की तजदीद तो असलन किसी के लिए हलाल नहीं। *(फतावा रजविया जि.24, स.495)*
और रोना रुलाना सब राफ़ज़ीयों के तौर तरीके हैं क्योकि उनकी किस्मत में ही ये लिखा हुआ है। राफ़ज़ी ग़म मनाते हैं और ख़ारजी ख़ुशी मनाते हैं और सुन्नी, वाकियाते कर्बला से नसीहत व इबरत व इबरत हासिल करते है और दीन की खातिर कुर्बानियां देने और मुसीबतों पर सब्र करने का सबक लेते हैं और उनके ज़िक़्र से बरकत और फ़ैज़ पाते हैं।
हाँ अगर उनकी मुसीबतों को याद करके ग़म हो जाए या आँसू निकल आये तो ये मुहब्बत की पहचान है। मतलब ये है कि एक होता है ग़म मनाना और ग़म करना, और एक होता है ग़म हो जाना। ग़म मनाना और करना नाजाइज़ है और ध्यान आने पर ख़ुद बख़ुद हो जाए तो जाइज़ है।

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 15, 16, 17)*
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                     *क्या नाजाइज़❎*

📝 *पोस्ट- 10*
*मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......1*
(ताज़ियेदारी)

🔆 आज कल जो ताज़िये बनाये जाते हैं, पहली बात ये हज़रत इमाम आली मक़ाम के रोज़ा का सही नक़्शा नहीं है, अज़ीब अज़ीब तरह के ताज़िये बनाये जाते हैं, फिर उन्हें घुमाया और गश्त कराया जाता है, एक दूसरे से मक़ाबिला किया जाता है, और उस मुक़ाबिले में कभी कभी लड़ाई झगड़े और लाठी डंडे चाकू और छुरी चलाने की नौबत आ जाती है, और ये सब हज़रत इमाम हुसैन की मुहब्बत के नाम पर किया जाता है। अफ़सोस इस मुसलमान को क्या हो गया है और ये कहाँ से चला था और कहां पहुँच गया, कोई समझाये तो मानने को तय्यार नहीं, बल्कि उल्टा समझाने वाले को बुरा भला कहने लगता है।
खुलासा ये है कि आज की ताज़िये और इसके साथ होने वाली तमाम बिदआत व खुराफ़ात व वाहियात सब नाजाइज़ व गुनाह है, मसलन मातम करना, ताज़िये पर चढ़ावे चढ़ाना उनके सामने खाना रखकर वहाँ फ़ातिहा पढ़ना, उनसे मन्नत मांगना, उनके नीचे से बरकत हासिल करने के लिए बच्चों को निकालना, ताज़िये देखन कोे जाना, उन्हें झुककर सलाम करना, सवारियाँ निकलना, सब जाहिलाना बातें और नाजाइज़ हरकतें हैं, उनका मजहबे इस्लाम से कोई वास्ता नहीं, और जो जानता है उसका दिल ख़ुद कहेगा कि इस्लाम जैसा सीधा और शराफत व संजीदगी वाला मज़हब उन तमाशों और वहम परस्ती की बातों को कैसे गवारा कर सकता है?
कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िये और उसके साथ साथ ढोल बाजे और मातम करते हुए घूमने से इस्लाम और मुसलमानों की शान ज़ाहिर होती है। ये एक फ़ुज़ूल बात है, पांचों वक़्त की अज़ान और मुहल्ले बस्ती और शहर के सब मुसलमानों का मस्जिदों और ईदगाहों में जुमा और ईद की नमाज़ बा जमाअत अदा करने से ज़्यादा मुसलमानों की शान ज़ाहिर करने वाली कोई और चीज़ नहीं। ताज़िये और उसके तमाशों, ढोल बाजों और कूदने फांदने, मातम करने और बुज़ुर्गों के नाम पर ग़ैर शरई उर्सों, मेलों और आज की क़व्वालियों की महफिलों को देखकर तो गैर मुस्लिम ये समझते हैं कि इस्लाम भी हमारे मज़हब कु तरह तमाशाई मज़हब है, बजाये सुधरने और इस्लाम की तरफ आने के और चिढ़ते हैं, और कभी कभी उस ताज़िये की वजह से लड़ाई झगड़े और ख़ूनरेज़ी की नौबत आती है, और बे वजह मुसलमानों का नुकसान होता है, और नमाज़, रोज़ा, ईमानदारी और सच्चाई, अहकामे शरअ की पाबंदी और दीनदारी को देखकर ग़ैर मुस्लिम भी कहते हैं कि वाक़ई मज़हब है तो बस इस्लाम है ये और बात है कि वो किसी वजह से मुसलमान न बने, लेकिन इस में भी कोई शक़ नहीं कि बहुत से ग़ैर मुस्लिमों क़ा दिल मुसलमान होने को चाहता है और कुछ हो भी जाते है, और होते रहे हैं। देखते नहीं हो कि दुनियां में कितने मुसलमान हैं और सिर्फ 1400 साल में उनकी तादाद कहाँ से कहाँ पहुँच गई, ये सब नमाज़, रोज़े और इस्लाम की भोली, सीधी, सच्ची बातों को देख कर हुए हैं, ताज़िये और उसके साथ मेलों ठेलों और तमाशों को देखकर न कोई मुसलमान हुआ, और न अब होता है। और ताज़िये से इस्लाम की शान ज़ाहिर नहीं होती बल्कि मजहबे इस्लाम की बदनामी होती है।
कुछ लोग मुहर्रम के दिनों में बजने वाले बाजों को ग़म का बाजा बताते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि गम के मौके पर बाजे नहीं बजाए जाते और ग़म मनाना भी तो इस्लाम में जाइज़ नहीं है। ये इमाम हुसैन की दर्दनाक शहादत के नाम पर बाजे बजाने वालों से मैं पूछता हूँ कि जब उनके यहाँ कोई हादसा हो जाए या कोई मरजाये तो क्यों बाजे नहीं बजाते और बेंड मास्टर को क्यों नहीं बुलाते, नाच कूद और तमाशे क्यों नहीं करते, और जो मौलवी साहब मुहर्रम में बाजे बजाने को जाइज़ कहते हैं जब ये मरें या उनके घर में कोई मरे तो उनकी मौत पर और फिर तीजे, दसवें, चालीसवें और बरसी पर महंगा वाला बैंड लाया जाए जो मौलवी साहब के शायाने शान हो। और चूंकि उनके यहाँ ये सब सवाब का काम है लिहाज़ा उनकी रूह को इसका सवाब भी जरूर पहुँचाया जाए।

*📚 (मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०- 17,18,19,20)*
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📝 *पोस्ट- 11*
*मुहर्रम में क्या नाजाइज़❓........2*
*( ताज़ियेदारी )*
🔆 बाज़ लोग कहते हैं कि हमारे ख़ानदान में ताज़िऐ पहले से होती चली आ रही है, एक साल हमने ताजियेदारी नहीं बनाया तो हमारा फलां नुकसान हो गया या बीमार हो गए या घर में कोई मर गया, ये भी जाहिलाना बातें हैं पहले तो ऐसा होता नही और हो भी जाए तो ये एक शैतानी चाल है वो चाहता है कि तुम हराम कारियों में लगे रहो, और ख़ुदा और रसूल से दूर रहो, हो सकता है कि शैतान आप को डिगाने के लिए कुछ कुछ कर देता हो, क्योकि कुछ ताक़त अल्लाह ने उसको भी दी है, और अल्लाह की ज़ात तो ग़नी है सब से बे परवाह है अगर सब सुधर जाएं नेक और परहेज़गार हो जाए तो उसे कुछ नफा और फ़ायदा नहीं पहुंचता और सब बिगड़ जाए तो उसका कुछ घाटा नहीं होता, इंसान अच्छा करता है तो अपने अच्छे के लिए और बुरा करता है तो अपने बुरे के लिए और मुसलमान का अक़ीदा व ईमान इतना मजबूत होना चाहिए कि दुनियां का नफ़अ हो या नुकसान हम तो वही करेंगे जिस से अल्लाह व रसूल राज़ी हो, और घाटे नफ़अ को भी अल्लाह ही जानता है हम कुछ नहीं जानते, कभी किसी चीज़ में हम फ़ायदा समझते हैं और घाटा हो जाता है और कभी घाटा और नुकसान ख़्याल करते है मगर नफ़अ और फ़ायदा निकलता है। एक शख़्स को मुद्दत से एक गाड़ी खरीदने की तमन्ना थी और जब ख़रीदी तो पूरी फैमली के साथ इस गाड़ी में एक्सीडेंट के ज़रिए मारा गया। खुलासा ये है कि अपने सब काम अल्लाह की मर्ज़ी पर छोड़ दीजिये, और उसके बताये हुए रास्ते पर चलना ज़िन्दगी का मक़सद बना लीजिए फिर जो होगा देखा जाएगा। और वही होगा जो अल्लाह चाहेगा।
कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िया और तख़्त बनाना सजाना ऐसा ही है जैसे जलसे, जुलूस, और मीलाद की महफिलों के लिए शामयाने पिंडालों, सड़कों, गलियों और घरों को सजाया जाता है। तो ये भी एक गलतफ़हमी है, जलसा, जुलूस, और महफिलों में सजाबट और डेकोरेशन असल मक़सद नहीं होता, ज़िक्रे ख़ैर वअज़ व तब्लीग और तक़रीर मक़सूद होता है उसके लिए ये सजाबटें होती हैं, और ताज़िया बनाने का मक़सद सिवाए, सवारने और घुमाने के और क्या है? और जलसे, जुलूस, और महफिलों के लिए भी हद से ज्यादा बे ज़रूरत इतना डेकोरेशन और सजाबट करना कि आने वालों का ध्यान उसी में लग कर रह जाए और वही मक़सद बनकर रह जाए और ज़िक़्र ख़ैर वअज़ व तब्लीग की तरफ से तवज्जो हट जाए ये सब करना भी अच्छा नहीं है, और उन सब सजावटों में भी आपस में मुक़ाबिले और फ़ख्र व मुबाहत ख़िलाफ़े शरअ बातें हैं। ख़ासकर गरीबों मज़दूरों से जबर्दस्ती चंदे लेकर ये सब काम ज़्यादती है, बजाए सवाब के गुनाह भी हो सकता है, क्योकि गरीबों को सताना इस्लाम में ज़्यादा बुरा काम है।

महफ़िलें, मजलिसे कभी कभी बग़ैर सजबट और डेकोरेशन के भी होती हैं और ताज़िया तो सजावट ही का नाम है ये ना हो तो फिर ताज़िया ही कहाँ रहा?
कुछ लोग कहते हैं कि ताजियेदारी खत्म हो गई तो इमाम हुसैन का नाम मिट जाएगा तो ये भी उन लोगो की गलतफ़हमी हैं, हज़रत इमाम हुसैन का नाम तो दुनियां की लाखों मस्जिदों में हर जुमा की नमाज़ से पहले ख़ुत्बे में पढ़ा जाता है। पीरी मुरीदी के अक्सर सिलसिले उनसे होकर रसूले ख़ुदा तक पहुंचते हैं, और जब शजरे पढ़े जाते हैं तो इमाम हुसैन का नाम आता है, क़ुरआन करीम के 22वें पारे के पहले रूकूअ में जो आयते ततहीर है उसमें भी अहले बैत का ज़िक्र मौजूद है और तो और ख़ुद नमाज़ जो अल्लाह की इबादत है उसमें भी आले मुहम्मद पर दुरूद पढ़ा जाता है सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम। उसके अलावा कितने जलसों, जुलूसों महफिलों, मजलिसों, नारों, नज़्मों, में उनका नाम आता है, ये सब दुनिया जानती है मेरे बताने की ज़रूरत नहीं और सही बात ये है कि इमाम हुसैन का नाम तो हर मुसलमान के दिल में अल्लाह तआला ने लिख दिया है, और जिस के दिल में इमाम हुसैन का नाम नहीं वो मुसलमान कहलाने का हक़दार नहीं। तो भाइयों! जिस का ज़िक्र नमाज़ों में, ख़ुत्बों में, क़ुरआन की आयतों में, और हज़ारों महफिलों मजलिसों और खानकाही शजरों में हो उसका नाम कैसे मिट जाएगा। ताजियादारी और उसके साथ जो तमाशे होते हैं उससे तो हज़रत इमाम पाक का नाम बदनाम किया जाता है।
जो लोग कहते हैं कि ताजियेदारी खत्म हो गई तो इमाम हुसैन का नाम मिट जाएगा मैं उनसे पूछता हूं कि हज़रत इमाम पाक से पहले और बाद में जो हज़ारों लाखों हज़रात अम्बिया व औलिया व शोहदा हुए हैं उनमें से किस किस के नाम ताजियेदारी या मेले तमाशे होते हैं? क्या उन सबके नाम मिट गए? हक़ ये है कि ताजियेदारी ख़त्म होने से इमाम हुसैन का नाम नहीं मिटेगा बल्कि ताजियेदारों का नाम मिट जाएगा और आजकल ताजियेदारी अपने नाम के लिए ही हो रही है इमाम हुसैन के नाम के लिए नहीं। देखा नहीं ये ताजियेदार अपनी नामवरी कि मेरा ताज़िया सब से ऊंचा, सबसे अच्छा रहे और आगे चले उसके लिए कैसे कैसे झगड़े करते हैं, खुद भी लड़ते मरते हैं और औरों को भी मरवाते हैं

*📚(मुहर्रम में क्या जाइज़, क्या नाजाइज़, सफहा न०-20,21,22,23)*
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📝 *पोस्ट- 12*
*ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद.......1*
🔆 लड़ाई झगड़े करना तो अक्सर जगह ताज़िये दारों की आदत बन गई है,रास्तों के लिए खड़ी फसलों को रोन्दना,अपनी वाह वाही और शान शैली के लिए एक दूसरे से मुकाबिले करना,खुब ऊँचे ऊँचे ताअज़िये बनाकर उन्हें निकालने के लिए बिज़ली के तार या खड़े दरख्तों को काटना तरह तरह से ख़ुदा की मखलूक को सताना उनका मिज़ाज हो गया है। इन सब बातों में कभी कभी गैर मुस्लिमों से भी टकराव की नौबत आ जाती है,और यह सब बे मक़सद झगड़े होते हैं। मुसलमानों की तारीख में कभी भी इन गैर ज़रूरी फालतू बातों के लिए लड़ाइयाँ नहीं लड़ी गयीं और मुसलमान फितरतन झगड़ालू नहीं होता।
तअज़िये दारों को तो मैंने देखा कि यह लोग तअज़िये उठा कर मातम करते हुये ढोल बाजों के साथ चलते हैं तो होश खो बैठते हैं बे काबू और आपे से बाहर हो जाते हैं जोश ही जोश दिखाई देता है। ख़ुदा न करे मैं हर मुसलमाने मर्द व औरत की जान माल,इज्ज़त व आबरू की सलामती की अल्लाह तआला से दुआ करता हूँ लेकिन इस बढ़ती हुई तअज़िये दारी और तअज़िये उठाते वक़्त ताज़ियेदारों के बे काबू जोशीले रंग से मुझ को तो हिन्दुस्तान में ख़तरा महसूस हो रहा है,कभी उसकी वजह से मुसलमानों का बड़ा नुक़्सान हो सकता है,और यह बे नतीजा नुक्सान होगा,और यह अन्ज़ाम से बे ख़बर लोग कभी भी कौम को दंगों और बलवों की आग में झोंक सकते हैं। कुछ जगह ऐसा हुआ भी है और कही  होते होते बच गया है।
अभी चन्द साल पहले अख़बार में आया था कि तअज़िये दारों ने एक हिन्दू का आठ बीघा खेत रोन्द डाला बड़ी मुश्किल से पुलिस ने दंगे पर कन्ट्रोल किया, दर असल यह सब मुसलमानों को तबाह व बरबाद कराने वाले काम हैं।
आम रास्तों को बन्द करने, सड़कों पर जाम लगाने में भी तअज़िये दारों को बहुत मज़ा आता है और वह ऐसा कर के बहुत खुश होते हैं और उसको बड़ा कमाल समझते हैं,हांलाकि इस्लामी नुक्ता-ए-नज़र से यह रिफाहे आम में मुदाख़लत है,अवाम की हक़ तल्फ़ी नाजाइज़ व गुनाह है।
  *हदीस पाक में है हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया!*
    जो जिहाद के लिये जाने वाला किसी गुज़रने वाले के लिये रास्ता तंग करे उसको जिहाद का सवाब नहीं!
*📚मिश्कात बाब आदादुस्सफर सफ़हा 340*
उलमा-ए-किराम ने भी इस हरकत के नाजाइज़ होने का फतवा दिया है। इस की तहकीक़ हमारी किताब बारहवही शरीफ़ जलसे और जुलूस में देखे  मज़हब और धरम के नाम पर आज कल ऐसा बहुत किया जा रहा है।

*📚मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफा नं.  23,24,25*
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📝 *पोस्ट- 13*
*ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद.......2*
🔆 मज़हब मख़लूक़ की मुश्किलात को दूर करने का नाम है उन्हें परेशान करना और मुश्किलात में डालना मज़हब नहीं हैं, जब सड़के जाम होती हैं तो किस किस को कैसी मुसीबत और परेशानी का सामना करना पड़ता है ये सबको ख़ूब पता है..
लेकिन धर्म के ठेकेदारों का धर्म आज कल उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं होता जब तक कि वो पब्लिक का खून न पी लें
दूसरे लोग अपने धर्मों के नाम पर क्या करते हैं उसके ज़िम्मेदार तो वो हैं लेकिन हमें उनकी शरीकी नहीं करना चाहिए,
और अपने मज़हब की असली शक़्ल दुनियां के सामने लाना चाहिए, हमारे मज़हब में किसी को सताने की कोई गुंजाइश नहीं, रहगुजर तंग करना या बन्द करना या राहगीरों, मुसाफिरों को परेशान करना बड़ा ज़ुल्म व ज़्यादती है
इमाम हुसैन के मानने वालों को तो ऐसा कभी भी नहीं करना चाहिए, क्योकि उन्होंने दूसरों को यज़ीदी मज़ालिम से बचाने के लिए ही अपना गला कटाया था और आप उनका नाम लेकर ही दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं
और उनके लिए मुसीबत बन जाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि ताज़ियादारी अगर हराम है तो मौलवी पहले भी तो थे उन्होंने मना क्यों नहीं किया?
तो मेरे भाइयों! बात ये है कि ताजियेदारी शुरू होने के बाद धीरे धीरे नाजाइज़ कामों पर मुश्तामिल होती चली गई और जब से ये ख़िलाफ़े शरअ हरकात व खुराफ़ात का मजमुआ बनी है, उलमा ए दीन बराबर उसको हराम कहते और लिखते रहे
जैसा कि आने वाले बयान से आपको मालूम होगा। और हर ज़माने में मानने वाले भी रहे हैं और न मानने वाले भी, और मौलवी भी सब अल्लाह से डरने वाले नहीं होते मख़लूक़ से डरने वाले और लोगो की हां में हां मिलाने वाले कुछ मौलवी पहले भी रहे हैं, और अब भी हैं और आज के मस्जिदों के *इमामों का किसी ख़िलाफ़े शरअ बात को देखकर कुछ न कहना कोई मअना नहीं रखता क्योकि इमामत तो अब नौकरी व गुलामी सी हो कर रह गई है, अगर एक आदमी भी नाराज़ हो जाए तो इमामत ख़तरे में पड़ जाती है।*
लेकिन फिर भी मेरी गुजारिश है कि हिम्मत से काम लेना चाहिए और सही बात लोगो को बताना चाहिए छुपाना नहीं चाहिए, अल्लाह तआला उनकी मदद फरमाता है जो उसके दीन की मदद करते हैं।
मौलवियों में आज कुछ ऐसे भी हैं जिन के पेट अल्लाह ने भर दिए हैं लेकिन ये बहुत ज़्यादा माल व दौलत शान व शौकत हासिल करने के लिए दींन को नुकसान पहुंचाते हैं गलत बयानी करते हैं हक़ को छुपाते हैं और ये नहीं जानते हैं कि इज़्ज़त व दौलत अल्लाह के दस्ते कुदरत में है, जिसे जब चाहे अता फरमाए ये मौत को भूल गए हैं लेकिन मौत इन्हें नहीं भूलेगी ।

*📚मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 25,26,27*

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📝 *पोस्ट- 14*
*ताज़ियेदारी और क़ुरआन व हदीस*
🔆 क़ुरआन करीम में है:- और उन लोगो से दूर रहो जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और उन्हें दुनियां की ज़िंदगी ने धोका दे दिया है। *(पारा-7, रुकू-14)*
और एक जगह फरमाता है:- जिन लोगो ने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया और दुनियां की ज़िंदगी ने उन्हें धोके में डाल दिया, आज उन्हें हम छोड़ देंगे जैसा उन्होंने उस दिन के मिलने का ख़्याल छोड़ रखा था, और जैसा वो हमारी आयतों से इन्कार करते थे। *(पारा-8, रुकू-13)*
इन आयतों को आप ध्यान से पढ़ें तो आज की ताजियेदारी और उर्सों के नाम पर जो मेले ठेले नाच तमाशे और क़व्वालीयां हो रही हैं ये सब चीजें याद आ जाएंगी, और नज़रे इंसाफ कहेगी की वाक़ई ये वो लोग हैं जिन्होंने इस्लाम को तमाशा बना कर रख दिया और मज़हब को हंसी खेल की शक़्ल दे दी। ख़ुदा ए तआला तौफ़ीक़ दे इंसाफ को चाहिए कि मरने से पहले आँखे खोल ले और होश में आ जाए।
क़ुरआन करीम में जगह जगह अल्लाह तआला ने रंज व मुसीबत हादसात वगैरह पर सब्र करने का हुक्म दिया है न कि रोने पीटने चीखने पुकारने सीने कूटने और मातम करने का क़ुरआन मे मुसीबत और परेशानी पर सब्र करने से मुतअल्लिक़ आयतों को जमा किया जाए तो अच्छी खासी एक किताब तैयार हो जाएगी।
हदीस शरीफ़ में है रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- जो (मय्यत के ग़म में) गाल पीटे, गरेबान फाड़े, और ज़माना ए जाहिलियत की सी चीख़ व पुकार मचाये वो हम में से नहीं। *(सहीह बुखारी जि.1,स.173)*
हुज़ूर की एक सहाबिया हज़रत उम्मे अत्तिया कहती हैं:- रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हम को नोहा करने से मना फरमाया। *(सहीह बुख़ारी, जि.2, स.726)*
एक हदीस में है रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- अल्लाह अज़्ज़ व जल ने मुझ को ढोल बाजे और बांसुरियों को मिटाने का हुक्म दिया। *(मिशक़त स.318, किताबुलइमारत फ़सल सालिस)*
उसके अलावा एक और हदीस में है हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते है:- "मेरी उम्मत में ऐसे लोग होंगे जो ज़िनाकारी, रेशम, शराब और ढोल बाजो को हलाल कर लेंगे"
इस हदीस से हुज़ूर ने ढोल बाजों को ज़िनाकारी शराब वगैरह के साथ शुमार फरमाया है। *(सही बुख़ारी, जि.2, किताबुलअशरिबा स.837)*
मशहूर सहाबी हज़रत जाफ़र तैयार रदियल्लाहु तआला अन्हु जंगे मूता में शहीद हुए, उनकी शहादत की ख़बर जब मदीना शरीफ़ में आई तो उनके घर वाले ग़म मनाने लगे 3 दिन तक के लिए हुज़ूर ने इजाज़त दी उस के बाद हुज़ूर उनके घर ख़ुद तशरीफ़ लाये और फरमाया:- आज के बाद मेरे मेरे भाई जाफ़र के लिए कोई न रोये। *(मिशकात बाबूत्तरज्जल स.382)*
एक हदीस पाक में हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फरमाया:- लोगो मे दो बातें काफिरों वाली हैं, किसी के नसब में तअन करना और मय्यत पर नोहा करना। *(सही मुस्लिम, जि.1, स.58)*
रहा हज़रत सय्येदिना अमीर हमज़ा की जंगे उहद में शहादत के बाद हुज़ूर के हुक़्म पर बनू अब्दुलअशहल की औरतों का ग़म मनाना या रोना तो उस वाकिए के उलमा ने कई जवाबात दिए हैं उन सबकी तफसील का यहाँ मौक़ा नहीं, मैं ताजियेदारों मातम व सीना पीटने वालों से पूछता हूँ कि क्या जंगे उहद की तारीख़ पर मदीने शरीफ में हर साल ये हुआ करता था? जंगे उहद के तकरीबन 7 साल तक हुज़ूर दुनियां में तशरीफ़ फरमा रहे किसी एक साल का वाकिया भी किसी हदीस में हो तो ज़रा बताये। इस हदीस से मौत व शहादत के बाद चंद दिन तक ग़म मनाना साबित हो सकता है लेकिन बार बार या हर साल तजदीदे हुजन का सुबूत नहीं। और मौत व शहादत के बाद चंद यानी 3 दिन ग़म मनाने की इजाज़त का ज़िक्र हम पहले ही कर चुके हैं, जंगे उहद से बापसी में मदीने शरीफ़ में जिन घरों के मर्द शहीद हुए थे वहाँ ग़म मनाये गए थे लेकिन उसके बाद किसी साल किसी ने ऐसा किया हो तो बताएं जब उहद की लड़ाई में शरीक रहने वाले सहाबा और उनके घर वाले तो 50 साल से भी ज़्यादा दुनियां में रहे होंगे। उनकी औलाद और मानने वाले तो आज भी हैं। क्या  कहीं जंगे उहद के शहीदों, ख़ासकर हज़रत अमीर हमज़ा की शहादत का ग़म मनाया जाता है?

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 27,28,29,30)*

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          🤔 *मुहर्रम में क्या जाइज़ है ✅*
                     *क्या नाजाइज़❎*
📝 *पोस्ट- 15*
*ताज़ियेदारी और उलमा-ए-अहले सुन्नत*
🔆 कुछ लोग समझते हैं कि ताजियेदारी सुन्नियों का काम है और उसके रोकना, मना करना वहाबियों का। हालांकि जब से ये ग़ैर शरई ताजियेदारी राइज़ हुई है किसी भी ज़िम्मेदार सुन्नी आलिम ने उसे अच्छा नहीं कहा है।
हिन्दुस्तान में दौरे वहाबियत से पहले के आलिम व बुज़ुर्ग हज़रत *शाह अब्दुलअज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि तआला अलैहि लिखते है:-*
यानी अशरा मुहर्रम में जो ताज़ियेदारी होती है गुम्बदनुमा ताज़िये और तस्वीरें बनाई जाती है ये सब नाजाइज़ है। (फतावा अज़ीज़िया, जि.1, स.75)
*आला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खां बरेलवी रहमतुल्लाही तआला अलैहि* जो इमाम अहले सुन्नत हैं जिनका फतावा अरब व अज़म में माना जाता है वो फरमाते हैं:-
"अब कि ताज़ियादारी उस तरीक़ा-ए-ना मरज़िया का नाम है क़तअन बिदअत व नाजाइज़ व हराम है"
📚 (फतावा रज़विया, जि.24, स.513, मतबूआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर)
कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िया बनाना जाइज़ है घुमाना नाजाइज़ है आला हज़रत ने उसका भी रद फरमाया और बनाने से भी मना फरमाया, वो लिखते हैं:-
"मगर उस नक़्ल में भी अहले बिदअत से एक मुशाबिहत और ताज़ियेदारी की तोहमत का खदशा और आइन्दा अपनी औलाद व अहले एअतिक़ाद के लिए इब्तिलाये बिदअत का अन्देशा है। लिहाज़ा रोज़ा-ए-अक़दस हुज़ूर सय्यदुश्शोहद की ऐसी तस्वीर भी न बनाएं"
📚(फतावा रज़विया, जि.24, स.513)
जो लोग कहते हैं कि ताज़िया बनाकर अहले सुन्नत का काम है वो आला हज़रत की किताबों का मुताअला करें पचासों जगह उनकी किताबों में ताजियेदारी को नाजाइज़ व हराम और गुनाह लिखा है बल्कि पूरा एक रिसाला उसी बारे में तस्नीफ फरमाया हैं, जिसका नाम है ( रिसाला ए ताज़ीयादारी)
*सय्यदी मुफ्तिये आज़म मौलाना शाह मुस्तफा रज़ा खां अलैहिर्रहमा फरमाते हैं:-* "ताजियेदारी शरअन नाजाइज़ है"
📚 (फतावा मुस्तफ़विया, स.534, मतबुआ रज़ा एकेडमी मुम्बई)

*सदरुश्शरीआ हज़रत मौलाना अमजद अली साहब आज़मी अलैहिर्रहमा* ताजियेदारी और उसके साथ जगह जगह जो ख़िलाफ़े शरअ हरकात व बिदआत राइज़ हैं उनका ज़िक़्र करके लिखते हैं:-
"ये सब महज़ खुराफ़ात है उन सबसे हज़रत सैय्यदिना इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु ख़ुश नहीं हैं"
चंद लाइनों के आगे लिखते हैं:- "ये वाकिया तुम्हारे लिए नसीहत था और तुमने उसको खेल तमाशा बनालिया"
📚(बहारे शरीअत, हिस्सा16,स.248)
हज़रत मौलाना शाह मुफ़्ती अजमल साहब सम्भली फरमाते हैं:-  अब चूंकि ताजियेदारी बहुत ममनूआत शरइया और उमूरे नाजाइज़ पर मुश्तामिल है, लिहाज़ा ऐसी सही नक़्ल भी नहीं बनानी चाहिए।
📚(फतावा अजमलिया, जि.4, स.15)
*हज़रत मौलाना हशमत अली खां बरेलवी फरमाते हैं:-*
ताज़िये बनाना उन्हें बाजे ताशे के साथ धूम धाम से उठाना उनकी ज़ियारत करना उनका अदब और ताज़ीम करना, उन्हें चूमना, उनके आगे झुकना और आँखों से लगाना, बच्चों को हरे कपडे पहनना घर घर भीक मंगवाना, कर्बला जाना वगैरह वगैरह शरअन नाजाइज़ व गुनाह है।
📚(शमए हिदायत, हिस्सा-सोम, स.30)
*फ़क़ीहे मिल्लत मुफ़्ती जलालुद्दीन साहब अमजदी फरमाते हैं:-*  हिन्दुस्तान में जिस तरह के आमतौर पर ताज़ियादारी राइज़ है वो बेशक हराम व नाजाइज़ व बिदअत सय्यअह है।
📚 (फतावा फैज़ुर्रसूल, जि.2, स.563)
*हज़रत मौलाना गुलाम रसूल सईदी लिखते हैं:-*  "अपने सीने और चेहरे पर तमाचे लगाना, बाल नोचना, कपड़े फाड़ना, हाय हाय करना और चीख़ना चिल्लाना और वो तमाम काम करना जो शियों के यहाँ मातमे हुसैन के नाम पर किये जाते हैं ये सब काम हराम हैं।"
📚 (शरह सही मुस्लिम, जि.1, स.495)
*बहरुलउलूम हज़रत मुफ़्ती अब्दुलमन्नान साहब फरमाते हैं:-* "आजकल आमतौर से जो ताज़िये बनाते हैं, उसका बनाना और रखना इस सिलसिले में जो मरासिम अदा किए जाते हैं सब नाजाइज़ व हराम हैं।"
📚(फतावा बहरुलउलूम, जि.5, स.448)
यहाँ ये भी बात क़ाबिले ज़िक़्र है कि 1388 हिजरी में अब से तक़रीबन 50 साल पहले ताज़ियादारी के हराम व नाजाइज़ होने से मुतअल्लिक़ एक फ़तवा मरकज़े अहले सुन्नत बरेली शरीफ़ से शाइअ हुआ था जिस पर उस ज़माने के हिन्दुस्तान व पाकिस्तान के मुख़्तलिफ़ शहरों के 75 बड़े बड़े सुन्नी उलमा-ए-किराम ने दस्तख़त किये थे, सभी ने ताज़ियादारी के हराम और नाजाइज़ होने की तसदीक़ की थी, और वो फ़तवा उस ज़माने में पोस्टर की शक़्ल में शाइअ किया गया था, इस की तफसील उलमा ए किराम के नाम के साथ हज़रत मौलाना मुफ़्ती जलालुद्दीन साहब अलैहिर्रहमा की तस्नीफ़
📚 "खुतबाते मुहर्रम" स.469 पर देखी जा सकती है, गोया की ताजियेदारी हराम होने पर सुन्नी उलमा का इत्तिफाक है। इस सब के होते हुए ये कहना कि ताज़ियादारी से रोकना वहाबियों का काम है, जिहालत, नादानी और नावाकिफी है।
कुछ लोग बअज बुज़ुर्गाने दीन और औलियाए किराम के नाम गिना कर ये प्रोपगंडे करते हैं कि फलां बुज़ुर्ग ने ताज़िया बनबाया फलां ने कंधा दिया फलां ने ताज़िये का इस्तक़बाल किया देख कर खड़े हो गए, ये सब गढ़ी हुई कहानियां है, अवाम को बरगलाने और बहकाने के लिए गढ़ रखी हैं, किसी भी मुस्तनद मोअतबर ज़िम्मेदार आलिम की लिखी हुई किताब में ऐसा कोई वाकिया नहीं है, दर असल ताज़ियादारी को जाइज़ कहने वालों को क़ुरआन व हदीस या आइम्मा किराम की किताबों से कोई सुबूत नहीं मिलता तो गढ़ गढ़कर हिक़ायते बयान करते हैं

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 30,31,32,33,34)*
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📝 *पोस्ट- 16*
*बरेली शरीफ़ की ताज़ियेदारी......1*
🔆 कुछ लोग ये भी कहते सुने गए हैं कि ताज़ियादारी अगर नाजाइज़ व हराम है तो बरेली शरीफ़ जहाँ आला हज़रत अहमद रज़ा खां बरेलवी पैदा हुए और रहे वहाँ ताज़ियादारी क्यों होती है, तो उनकी ये दलील सही नहीं। दुनियां में सब जगह सब तरह के लोग रहते हैं उलमा ए किराम की बातें मानने वाले भी हैं और न मानने वाले भी, फरमाबरदार भी हैं और नाफ़रमान भी, बरेली शरीफ़ में एक ताज़ियादारी ही नहीं बहुत से गलत काम होते हैं, शराब नोशी, जुएबाजी, सूदख़ोरी, नाच तमाशे, बदकारी बेहयाई, बेपर्दगी, सिनेमा और पिक्चर बाजी, तो क्या उन सब की ज़िम्मेदारी आला हज़रत के सर डाली जाएगी? उलमा ए किराम की ज़िम्मेदारी समझाना है दिल में डालना अल्लाह का काम है और ताक़त से रोकना अहले सल्तनत व हुक़ूमत का काम है, आला हज़रत तो आलिमे दीन और नाइबे रसूल हैं। नबियों और रसूलों के ज़माने में भी उनकी बस्तियों में बडी तादाद नाफ़रमान और सरकशों की रही है हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की बीवी और उनके बेटे और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की बीवी की सरकशी और नाफ़रमानी का ज़िक्र तो ख़ुद क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला ने फरमाया है, ख़ुद इमाम आली मक़ाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु के ज़माने में उनके साथ क्या किया गया कलमा पढ़ने वालों ने ही उन्हें कैसा धोका दिया, और जंग करके शहीद कर डाला और सारा कूफ़ा मुख़ालिफ़ बन गया, तो अगर बरेली शरीफ़ के कुछ लोग आला हज़रत के ख़िलाफ़ चलते हैं तो उसमें कौनसी नई बात है और कौनसा तअज़्जु्ब का मक़ाम है।
हाँ ये बताइये कि आला हज़रत ने कभी ताज़ियादारी को जाइज़ कहा हो या उसकी इजाज़त दी हो तो ये आप कभी साबित नहीं कर सकते, क्योंकि उन्होंने हमेशा उसकी मुख़ालिफत की, जो काम भी उनकी किताबों से ज़ाहिर है, और उनकी औलाद के किरदार, तरीक़ा-ए-कार से। खानवादे के हज़रात आज भी ताज़ियादारी के मुख़ालिफ़ हैं, इसमे न कभी शरीक़ होते हैं न उसे चंदा देते हैं, बल्कि उनसे जहाँ तक मुमकिन है रोकने की कोशिश करते हैं, और बरेली शरीफ़ में जो अहले सुन्नत के दारुलइफ्ता हैं उनमें से किसी भी दारुलइफ्ता से ताज़ियादारी के नाजाइज़ व हराम होने का फ़तवा आज भी आसानी से लिया जा सकता है, ताज़ियेदार फ़तवा तो कभी लेते ही नहीं और झूंठे प्रोपगंडे करते फिरते हैं।

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 34,35,36)*

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📝 *पोस्ट- 17*
*ताजियेदारी बन सकती है कभी बूत परस्ती*
🔆 तअजियेदार अगर्चे हमारे सुन्नी मुसलमान भाई ही हैं खुदाये पाक उन्हें समझ अता फरमाये। तअजियेदारी और उस के साथ जो खिलाफे शरअ काम वह करते हैं उस से महफूज फरमाये लेकिन चूंकि तअजिया एक मुजस्समा है। लोग इस में तरह तरह के फ़ोटों और तस्वीरें भी लगाने लगे हैं उसको चूमते बल्कि सज्दे तक करने लगे हैं, चढ़ावे भी चढ़ाये जाने लगे हैं यानी मुशरिक लोग अपने बुतों के साथ जो कुछ करते हैं एअतिकादन न सहीह अमलन वह सब कुछ होने लगा है, ख़तरा महसूस हो रहा है कि तअजियेदारी कहीं आने वाले वक्त में बुत परस्ती न बन जाये क्योंकि सब लोग पढ़े लिखे और समझ दार नहीं होते, अन पढ़ों जाहिलों की भी दुनिया में कमी नहीं है। लिहाजा मैं अपने सुन्नी अवाम व ख़्वास भाइयों से नवाब ने हाफिज रहमत खाँ साहिब के मुकाबिले पर अंगरेजों का साथ दिया हाफिज रहमत खाँ साहिब बड़ी बहादुरी से लड़े आख़िर कार शहीद हुये और अंगरेजों की मेहरबानी से बरेली का इलाका कुछ सालों के लिए लखनऊ के राफ जी नवाब के जे रे हुकूमत आ गया, राफजियत का दौर दौरा शुरू हुआ इमाम बाड़े बने नवाब आसिफुहोला के नाम पर बड़े बाजार में लबे सड़क शीऔं की आस्फिया मस्जिद बनाई गई जो अब भी है, कुदरती तौर पर उसका एक मीनार ऊपर से आधा टूट गया है। राफजियत के असरात से इसी दौर में तअजियेदारी शुरू हुई और यहाँ तक ज़ोर बढ़ा कि किलो वाली जामे मस्जिद की सेह दरी तक में तअज़िये रख दिए गये और मस्जिद के इस हिस्से को इमाम बाड़ा कहा जाने लगा यह राफ़जी हुकूमत के असर से हुआ। यह आला हज़रत के दादा बुजुर्गवार इमामुललमा मौलाना रजा अली खाँ अलैहिर्रहमा का जमाना था उन्हों ने इस सब के खिलाफ बहुत सख्त फतवा दिया यहाँ तक कि हुकूमत की परवाह किए बगैर अपने असर व रूसूख का इस्तिअमाल कर के खुद जामअ मस्जिद जा कर वहाँ से तअजिये हटवाये थे। हवाले सुबूत और तफसील के लिए देखे (हयाते मुफ़ती आज़म मुसन्नफा जनाब मिर्जा : अब्दुलवहीद बेग मरहूम स : 22.मतबूआ इदारा तहकीकात मुफती आजम बाजार सन्दल ख़ाँ बरेली शरीफ)
🔆 खुलासा यह कि तअजियेदारी और उस की बात है। खुदाये तआला पैसा दे तो फालतू बातों में खर्च नहीं करना चाहिए, अपनी ज़रूरियात और राहे खुदा में ख़र्च करे, हुकूक अदा करे और उसके बाद अगर पैसे को बचा कर भी रखे तो उसमें कोई गुनाह नहीं, क्योंकि पैसा वक्त पर आदमी के काम आता है इंसान की जान व माल इज्जत व अबरू की हिफाजत करता है और दूसरों के सामने हाथ फैलाने और जलील होने से बचाता है। मैं कहता हूँ कि गरीबों मजदूरों को इस्लाम में देना और उन की मदद करना आया है न कि उन्हें नोचना खसोटना और उनसे चन्दे लेना। जुलसे, जूलूसों के नाम पर भी गरीबों मजदूरों से चन्दा नहीं करना चाहिए।

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📝 *पोस्ट- 18*
*जबरदस्ती के चन्दे*

📜तअजियेदारी के नाम पर तअजियेदारों के लिए जबरदस्ती गरीबों के घरों में घुस घुस कर चन्दे लेना और मना करने वालों को या कम देने वालों को धमकियां देना उन के बरतन भाड़े उठा कर ले जाना तरह तरह से उन्हें तंग करना एक आम बात हो गई है। यह मुसलमानों की ईजारसानी है, और सख़्त हराम है। मस्जिदें और मदरसे जो इस्लाम की असल हैं ज़बरदस्ती चन्दे तो उनके लिए भी नहीं करना चाहिए
*चे जाये कि तअजियेदारी ! वह तो एक हराम काम है उसकी वजह से गरीबों का खून चूस्ना दोहरा हराम है।*
और अल्लाह और उसके रसूल को नाराज़ करना है चन्दे करने में यह लोग इस कद्र जालिम बन गये हैं कि अगर कोई भला शरीफ आदमी तअजियेदारी को नाजाइज़ समझते हुये उन्हें चन्दे न दे तो उस पर जुल्म करते हैं उसका बाइकाट करने की कोशिश करते हैं गोया कि तअजियेदारों की कौम सरकशी में हद से आगे बढ़ चुकी है, सही लोगों को चाहिए कि उनका जुल्म बरदाशत कर ले लेकिन उन्हें चन्दे हर गिज़ न दे। आज कल हिन्दुस्तान का मुसलमान बे रोजगारी और गरीबी का शिकार है और ऊपर से यह जबरदस्ती के चन्दे वह भी फालतूबातों के लिए अफसोस की बात है। खुदाये तआला पैसा दे तो फालतू बातों में खर्च नहीं करना चाहिए, अपनी ज़रूरियात और राहे खुदा में खर्च करे, हुकूक अदा करे और उसके बाद अगर पैसे को बचा कर भी रखे तो उसमें कोई गुनाह नहीं, क्योंकि पैसा वक्त पर आदमी के काम आता है इंसान की जान व माल इज़्जत व अबरू की हिफाज़त करता है और दूसरों के सामने हाथ फैलाने और जलील होने से बचाता है कहता हूँ कि गरीबों मजदूरों को इस्लाम में देना और उन की मदद करना आया है न कि उन्हें नोचना खसोटना और उनसे चन्दे लेना। जुलसे, जूलूसों के नाम पर भी गरीबों मजदूरों से चन्दा नहीं करना चाहिए।

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 39,40)*

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📝 *पोस्ट- 19*
*मसनोई और फर्जी कर्बलाये*

📜कर्बला इराक में उस जगह का नाम है जहाँ हज़रत इमाम आली मकाम अपने साथियों के साथ यजीदी फौजों के हाथों शहीद किए गये। अब जहाँ तअजिये जमा और फिर दफन किए जाते हैं उन जगहों को लोग करबला कहने लगे, मजहबे इस्लाम में इन फर्जी कर्बलाओं की कोई हैसियत नहीं उन्हें मुकद्दस मकाम ख्याल कर के उनका एहतिराम करना सब राफिजियत और जिहालत की पैदावार हैं।
🔆 आला हज़रत इमाम अहमद रजा खाँ बरेलवी फरमाते हैं *अलम, तअजिये मेहेन्दी, उनकी मन्नत, गश्त चढ़ावा, ढोल ताशे, मुजीरे मरसिये, मातम, मसनोई कर्बला जाना यह सब बातें हराम व नाजाइज व गुनाह हैं।*
📚 (फतावा रज़विया जिल्द 24 सफा 496)

🔆कुछ जगहों पर औरतें रात को चिराग ले कर कर्बला जाती हैं और ख्याल करती हैं कि जिस का चिराग जलता हुआ पहुँच गया उसकी मुरादपूरी हो गई यह सब जाहिलाना बातें हैं ऐसी वहम परस्ती की इस्लाम में कोई गुन्जाइश नहीं है। जहाँ तअजिये को रखते हैं इस इमारत को इमाम बाड़ा कहते हैं, यह इमाम बाड़े बनाना और उनकी तअजीम करना यह सब राफजी फिर्क की देन है, इमाम बाड़े की कोई शरई हैसियत नहीं, उनकी जमीन किसी बाल बच्चे दार बे घर गरीब मुसलमान को दे दी जायें और उसका सवाब हजरत इमाम आली मकाम की रूह पाक को ईसाल कर दिया जाये तो यह एक इस्लामी काम होगा, या वहाँ ज़रूरत हो तो मस्जिद बनादी जाये या मुसलमानों के लिए कब्रिस्तान या मुसाफिर खाना वगैरा जिस से कौम को नफअ पहुँचे तो निहायत उमदा बात
🔆 आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ फाज़िले बरेलवी फरमाते हैं "इमाम बाड़ा वक्फ नहीं हो सकता वह जिस ने बनाया वह उसी की मिल्क है जो चाहे करे वह न रहा तो उसके वारिसों की मिल्क है उन्हें इख़्तियार है।

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 39,40)*

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📝 *पोस्ट- 20*
*बच्चों को फकीर बनाना*

🔆 कही कही हज़रत इमाम हुसैन के नाम पर बच्चों को फकीर बनाया जाता है और उनके गले में झोली डाल कर घर घर उन से भीक मंगवाते हैं यह भी नाजाइज़ व गुनाह है।
🔆आला हज़रत फरमाते हैं यूँ ही फकीर बनकर बिला ज़रूरत व मजबूरी भीक मांगना हराम है बहुत सी हदीसें उस मअना पर नातिक हैं और ऐसों को देना भी हराम है।
📚 ( फतावा रज़विया जि.24.स : 494 )

📜 *इमाम कासिम की मेहन्दी*
👉🏻 हज़रत इमाम कासिम, इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु के भतीजे और हज़रत इमाम हसन के फरजिन्दे अरजमन्द हैं। करबला में अपने चचा बुजुर्गवार के साथ बहुत से जालिमों को मार कर फिन्नार किया। फिर खुद शहीद किए गये। बात सिर्फ इतनी है कि हज़रत इमाम हुसैन की एक साहब जादी से उनकी निस्बत तै हो चुकी थी निकाह से पहले ही करबला का सांनेहा दर पेश हो गया। इतनी सी बात को लोगों ने अफसाना बना दिया और कहा कि करबला में ही उनकी शादी हुई और वह दुल्हा बने उनके मेहन्दी लगी और मेहन्दी कहीं 7 तारीख और कहीं 8 तारीख और कहीं 13 के मेले तमाशे और ढोल ढमाके बन गई। बांस की खपुचियों और पन्नी व कागज से छोटे छोटे खिलोने बनाये जाते हैं और उन का नाम जाहिलौं ने मेहेन्दी रख दिया। और मुसलमानों में से वह लोग जिन का मिजाज तमाशाई था उन्हों ने अपने जौक की चाशनी खेल खेलने और तमाशे व मेले करने के लिए हज़रत इमाम कासिम रदियल्लाहु तआला अन्हु की मुबारक शख्सियत को आड़ बना लिया।
🔆भाइयों ! यह तमाशे कब तक करोगे कुछ, मरने के बाद की और आख़िरत की भी फिक्र है। तकरीरों के जरीआ लम्बे लम्बे नज़राने ऐंठनेवाले अफसाना निगार खतीबों को भी रंग भरने का खूब मौका मिला और नई दुलहन के सामने दूलहा की शहादत रोने और रुलाने और दहाड़े मारने का बहाना बन गई , और शाइरों की मरसिया निगारी ने इस झूटी बात को कहाँ से कहाँ तक पहुँचा दिया। खुलासा यह कि मेहन्दी की रस्म और उस से मुतअल्लिक वाकिआ सब मन गढ़न्त और फजूलियात से है और उसके नाम पर जो कुछ खुराफातें और जाहिलाना हरकतें होती हैं यह सब नाजाइज व गुनाह व हराम हैं। आला हज़रत इमाम अहले सुन्नत मौलाना अहमद रजा खाँ फाजिल बरेलवी फरमाते हैं तअजिया, मेहेन्दी, शब आशूरा को रौशनी करना बिदअत व नाजाइज है।
हज़रत सय्यदिना इमाम कासिम के साथ करबला में हजरत सय्यदिना इमाम हुसैन की साहबजादी की शादी का वाकिआ साबित नहीं है किसी गढ़ा है।
📚( फतावा रजविया जि .24 स : 500,501 )

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 39,40)*

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📝 *पोस्ट- 21*
*चेहल्लुम का बयान*

🔆 सफर के महीने की 20 तारीख को हज़रत सय्यदिना इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु के चहल्लुम के नाम पर भी खूब मेले ठेले और तमाशे लगाये जाते हैं। तअजिये बना कर बाजों ताशों के साथ घुमाये जाते हैं। इस सिलसिले में पहली बात तो यह है कि चहल्लुम या चालीसवाँ उस नियाज़ व फातिहा व ईसाले सवाब को कहते हैं जो इन्तिकाल के चालीसवें दिन या कुछ आगे पीछे किया जाये। लेकिन जिस की शहादत को साड़े तेरह सौ साल हो चुके हों उसका चहल्लुम अब होना समझ में नहीं आता, उर्स व बरसी तो हर साल होते हैं, लेकिन चालीसवाँ या चहल्लुम हरसाल होना तअज्जुब की बात है, फिर भी चूंकि नियाज व फातिहा वगैरह जाइज काम हर दिन जाइज व हलाल हैं 20 सफर को भी किए जायें तो गुनाह नहीं बल्कि सवाब है, लेकिन चहल्लुम के नाम पर भी जो खुराफातें और तमाशे होते हैं उन से इस्लाम मजहब का दूर का भी वास्ता नहीं है। बात दर असल यह है कि जब एक मेले और तमाशे से पेट नहीं भरा तो मौज व मस्ती और चन्दे करने के लिए एक दिन और बढ़ालिया, क्यों कि खेल तमाशे ऐसी चीजें हैं कि तमाशा पसन्द लोग चाहते हैं कि यह तो रोजाना हों तो और भी अच्छा है और नमाज रोजे वगैरा कुरआन की तिलावत में उन्ही का ध्यान लगता है जो खुदा से डरते हैं और आख़िरत व मौत की फिक्र रखते हैं। खुलासा यह कि मैं तो इस चहल्लुम का मतलब यही समझा कि हजरत इमाम हुसैन की या गार मनाने का बहाना बनाकर खेल तमाशों ढोल बाजों के लिए एक दिन और बढ़ा लिया गया है। कुछ लोग इस महीने को चहल्लुम का महीना कहकर महर्रम के अलावा इस महीना में भी निकाह और शादी को बुरा जानते हैं हालांकि ब्याह शादी हर महीने में जाइज है। मुहर्रम और सफ़र में भी

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 44-45)*

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📝 *पोस्ट- 22*
*काले और हरे कपड़े पहनना या हरी टोपी ओढ़ना*

🔆 मुहर्रम में यह हरे काले कपड़े गम और सोग मनाने के लिए पहने जाते हैं और सोग इस्लाम में हराम है। उसके एलावा सोग की और बातें भी कुछ राइज हैं, जैसे मुहर्रम में शुरू के दस दिन कपड़े न बदलना, दिन में रोटी न पकाना, झाडू न लगाना, माहे महर्रम में ब्याह शादी को बुरा समझना सब फुजूल बातें और जिहालत व राफ़ज़ियत की पैदावार खुराफातें हैं।
आला हज़रत फरमाते हैं : यूँ ही अशरा - ए - मुहर्रम के सब्ज ( हरे ) रंगे हुये कपड़े भी नाजाइज़ हैं यह भी सोग की गर्ज़ से हैं।
अशरा महर्रम में तीन रंगों से बचें स्याह (काला) सब्ज (हरा) सुर्ख
📚(फतावा रजविया 24, स 496)

बाज जगह अशरा महर्रम में सवारियाँ निकाली जाती हैं और उनके साथ तरह तरह के तमाशे और ड्रामे होते हैं वह भी नाजाइज व गुनाह हैं। खुदाये तआला मुसलमानों को सही मअना में इस्लाम को समझने और उस पर चलने की तौफीक अता फरमाये।
भाइयों ! यह दिल है उसको जिस में लगाओगे यह लग जायेगा, गानों, बाजों, मेलों, तमाशों, खुराफातों में लगाओगे तो उसमें लग जायेगा। और उसी दिल को नमाज़ रोजे और कुरआन की तिलावत में लगाओगे तो उस में लग जायेगा। अफ़सोस कि तुम ने अपने दिल को मेलो, ठेलों और तमाशों में लगालिया। और मौत करीब आ रही है। मरने से पहले इस दिल को नमाज रोजे कुरआन की तिलावत और दीनी किताबों के मुताले वगैरा अच्छी बातों में लगा लो। कई जगह ऐसा भी हुआ है कि कुछ तअजियेदारों की समझ में यह आ गया कि वाके ई तअजियेदारी नाजाइज काम है तो वह मौलवियों और इमामों से कहते हैं कि ठीक है हम तअज़िये नहीं बनायेंगे लेकिन जलसा और कांफ्रेन्स कराओ फलाँ फलाँ मुकर्रिरों और शाइरों को बुलवा दो, तो यह बात भी सही नहीं है, किसी गलत काम से तौबा करने और नेक बनने के लिए कोई शर्त नहीं लगाना चाहिए, पहले आप तअजियेदारी से तौबा कीजिए बाज़ रहिए उसके बाद कहिए अब क्या करना है। आज कल के बहुत से जलसे भी मेरी नजर में कोई दीन दारी के काम नहीं रह गये हैं, दोनों तरफ से ख़ालिस दुनियादारी बल्कि दुकानदारी बन गये हैं और जलसे हैं कहाँ जलसों के नाम पर ज्यादा तर मुशाइरे हो रहे हैं और तकरीरें भी अक्सर वह हैं जिनकी हैसियत शेअर व शाइरी से ज़्यादा नहीं।

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 44-45)*

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📝 *पोस्ट- 23*
*काले और हरे कपड़े पहनना या हरी टोपी ओढ़ना*

🔆 मेरा मशवरा तो यह है कि दीन का जिम्मेदार ठेकेदार बनने की कोशिश करने के बजाये दीन दार बनने की कोशिश करो, जलसों और तकरीरों के जरीए दूसरों की इस्लाह करने की ज़्यादा फिक्र न करो, खुद को संभाल और सुधार लो तो एक आम आदमी के लिए यह भी बहुत काफ़ी है, नमाज.रोजे के पाबन्द हो जाओ बुरे कामों से बचो और अपने काम धन्धे करो। दर असल मुसलमानों में काफी लोग वह हैं कि जिन की तबीअतें तमाशा पसन्द हो गई हैं उन्हें हर वक्त दुन्दखपाड़ और कोहराम चाहिए ऐसे न सही तो ऐसे और इस में न सही तो उस में कुछ लोग जो सच्चे पक्के दीन दार मुसलमान होते हैं उनके लिए नमाज रोजा कुरआन की तिलावत जिक्र व शुक्र हुजूर पर दुरूद पढ़ना काफी है इन्हीं सब बातों से उनका दिल बहल जाता है असली मौमिनों की शान तो कुरआन में यह बयान की गई है बेशक मुराद को पहुँचे ईमान वाले जो नमाज़ में गिड़गिड़ाते हैं और जो बेहुदा बातों की तरफ तवज्जोह नहीं करते और वह जो ज़कात देने का काम करते हैं, और वह जो अपनी शर्मगाहों की हिफाज़त करते हैं। और यहीं थोड़ा आगे फरमाया जाता है और वह जो अपनी अमानतों और अहद का लिहाज़ रखते हैं और जो अपनी नमाजों की हिफाज़त करते हैं यही लोग वारिस हैं जो जन्नतुलफ़िरदौस की मीरास पायेंगे, और वह उस में हमेशा रहेंगे। (पारा 18, रुकूम ) खुदाये तआला से दुआ है कि वह नमाज व तिलावत जिक्र व शुक्र और अपने महबूब पर दुरूद व सलाम को हमारे दिल व जान और रूहों की गिजा बना दे और बेहूदा बातों खेल तमाशों से हमारे दिल हटा दे।

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 46-48)*

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📝 *पोस्ट- आखरी*
*झगड़े और फसाद से बचें*

🔆अहले इल्म व फज्ल मसाजिद के इमाम और समझ दार लोगों से मैं गुजारिश करूँगा कि वह तअजियेदारों से लड़ाई झगड़े न करें अख़ालाक व मुहब्बत के साथ समझाने की कोशिश करे, मान जायें तो ठीक वरना खुद को गलत कामों से बचालेना और उनमें शिरकत न करना मी काफी है, क्योंकि तअजियेदार अक्सर बड़े झगड़ालू होते हैं कुछ लोगों का यह तअजियेदारी खाने कमाने का धन्दा भी बन गई है तो वह किसी सूरत मानने को तैयार होंगे ही नहीं। आप खुद को बचाले खुदाये तआला आप की पकड़ नहीं फरमायेगा, हाँ बा असरलोगों को अपने असर व रसूख का इस्तिअमाल करना चाहिए।

*📚(मुहर्रम मे क्या जाइज़ क्या नाजाइज़ सफ़हा 48-49)*

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