गुरुवार, 23 मई 2024

कुर्बानी क्यों और कैसे ?

 

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        🔅 *क़ुरबानी क्यों और कैसे* 🔅

              ♻️ *पोस्ट :- 01* ♻️

🔘  *कुरबानी का मफहूम*

👉🏻 *ऐ मुसलमान सुन यह नुकतह दरसे कुरआनी में है अजमते इस्लाम व मुस्लिम सिर्फ कुरबानी में है।* 

यह शेअर इस्लाम की हकीकी तस्वीर पेश कर रहा है। इसमें क्यूकि मुसलमानों और इस्लाम दोनों की अजमत को कुरबानी से तअबीर किया गया है इसलिए यहां कुरबानी का मतलब सिर्फ जानवर की कुरबानी से नहीं बल्कि यहां कुरबानी का मफहूम यह है किह मुसलमानों को अपनी जिन्दगी के तमाम मरहूलों में अपने नफ़्स को कुरबान करते हुए अच्छे आमाल व अखलाक को अपनी जिन्दगी का जुज बना लेना चाहिए। जो देखे, जिससे वास्तह पड़े वह पुकार उठे "यह मुसलमान है।"

 नफ्स की कुरबानी ही अल्लाह व रसूल की खुशनूदी और कुरबत हासिल होने का जरिअह बनती है। जिसे अल्लाह व रसूल की खुशनूदी व कुरबत हासिल हो उसी को अजमत व बुलंदी हासिल होती है और मुसलमानों की अजमत इस्लाम की अजमत की अलमबरदार बन जाती है पहचान बन जाती है। आज मुसलमान नफ्स की कुरबानी के बजाए उसकी पैरवी और अपनी बदआमालियों के सबब जमाने की नज़रों में बेवुकुअत बे-विकार हो चुका है इसीलिए इस्लाम की अजमत व विकार भी अक्वामे आलम के दिलों में बाकी नहीं रही।

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📝 *इंशाअल्लाह पोस्ट जारी रहेगी.....* 

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        🔅 *क़ुरबानी क्यों और कैसे* 🔅

              ♻️ *पोस्ट :- 02* ♻️


🔘  *कुरबानी का मफहूम*


👉🏻 *मुसलमान की जिन्दगी इबादत और अख़लाके हस्न्ह का मजमूअह है* 


इबादतों का जाइजह लें तो नमाज, रोजह, जकात व हज तमाम अरकान में कुरबानी का उनसुर (अस्ल हिस्सह) नुमायां नजर आता है। नमाजों में वक्त, नींद व आराम की कुरबानी के साथ रोजी और दुनयावी ख़ास जरूरियात की कुरबानी है। रोजे पर गौर करें तो इन कुरबानियों के साथ भूख व प्यास और दीगर हलाल चीजों की कुरबानी है। जकात में माल और हज में माल के साथ वक्त, आराम, रोजी और दीगर दुनयावी जरूरियात की कुरबानी नुमायां है।


जिन्दगी के दूसरे रुख पर नज़र डालें तो अखलाके हसनह में उखुव्वत (भाई चारा) को सब से बुलंद मकाम हासिल है जिसको इस्लामी मुआशरे की जान कहा जाता है जिस के मुतअल्लिक सरकारे दो जहां सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:-


 *"अपने मुसलमान भाई के लिए वही बात पसंद करो जो अपने लिए पसंद करते हो और वह बात नापसंद करो जो अपने लिए नापसंद करते हो"* 


गौर करें तो देखेंगे किह उखुव्वत कुरबानियों का मजमूअह है इसमें - अपने भाई की ख़्वाहिशों और जरूरतों पर अपनी ख्वाहिशें और ज़रूरतें कुरबान करना पड़ती हैं। मुआमलह चाहे भूख व प्यास का हो या लिबास का, माल व दौलत का हो या इज्जत व विकार का, यहां तक किह अपनी जिन्दगी को भी अपने मुसलमान भाई की जिन्दगी पर कुरबान कर देना पड़ता है। 

इस जिमन में हज़रत जुनैद बगदादी और जंगे बद्र में जख्मी जां ब-लब सुहाबह-ए-किराम के ईसार की मिसालें हमारे सामने हैः


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        🔅 *क़ुरबानी क्यों और कैसे* 🔅

              ♻️ *पोस्ट :- 03* ♻️


🔘  *कुरबानी का मफहूम*


👉🏻 हज़रत जुनैद बगदादी अपने जमाने के सबसे बड़े और शाही पहलवान थे। एक निहायत दुबले पतले शख्स ने हज़रत जुनैद बगदादी को पहलवानी में चेलेंज कर दिया। लोग हैरत जुदह थे किह दोनों में कोई मुक़‌बिलह ही नहीं था लेकिन चेलेंज चेलेंज होता है। एक जमानह यह अजीब व गरीब कुशती देखने आया था। खुद बादशाहसलामत भी मौजूद थे। वक्ते मुर्कुरह पर वह शख्स आए, अखाड़े में उतरे तो उन्होंने हजरत जुनैद बगदादी से कहा

""मैं कोई पहलवान नहीं हूं, एक निहायत गरीब मिसकीन शख्स हूं और सय्यद हूं मैं इस कुशती में अगर जीत गया तो इनअमात से मेरी गरीबी दूर हो जाएगी और तुम्हारी कुरबानी के एवज महशर में नाना जान (नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से तुम्हारी शफाअत का वअदह करता हूँ।

हज़रत जुनैद बगदादी ने दिखावे के लिए कुछ जोर आजमाई की कुछ दाव पेंच चले और फिर उस कमजोर से शख्स ने उनहें पछाड़ दिया।

देखने वाले हैरत में थे किह यह क्या हुआ। अवाम के गुस्सेह की इन्तिहा नही रही और वह हज़रत जुनैद पर टूट पड़े। किसी ने लातें-घूंसे मारे, किसी ने उनपर थूका। जुनैद बगदादी यह सब बरदाश्त करते रहे उनको अपने इस अंजाम का एहसास था जिसपर कुरबानी का जज़्बह हावी आया और उन्होंने अपने एक मुसलमान भाई और वह भी आले रसूल की जरूरत पर अपनी इज़्ज़त अपना विकार अपनी शोहरत सब कुछ कुरबान कर दिया।

जिसके एवज दरबारे रिसालत से विलायत की नेअमत अता फरमाई गई

आप मशहूर व मअरूफ वली अल्लाह हुए। यह है मोमिन के ईसार की मिसाल, जो बेमिसाल है। हजरत जुनेद की इस कुरबानी में दो बातें नुमायां है। एक मुसलमान भाई के लिए कुरबानी और दूसरी बात आले रसूल की मुहब्बत व फरमाबरदारी जो ख़ातिमह बिल ईमान की ज़मानत है।


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🔘  *कुरबानी का मफहूम*


👉🏻 मुसलमान भाई पर अपनी जिन्दगी कुरबान करने की मिसाल जंगे बद्र में मिलती है। आप ने यह सबक आमोज वाकेअ जुरूर सुना होगा। मैदाने जंग में निहायत जखमी हालत में जां ब-लब कुछ सहाबा प्यास की शिद्दत में पानी के इन्तिजार में हैं। एक सहाबी पानी लाते हैं। जब वह एक प्यासे सहाबी के मुंह को पानी का प्याला लगाते हैं तो दूसरे प्यासे सहाबी की पानी मांगने की आवाज आती है। यह सहाबी अपने मुंह से पानी का प्याला हटा देते हैं और फरमाते हैं :-

 *"पहले उन भाई को पानी पिलाओ वह मुझ से ज़्यादा प्यासे हैं।"* 


पानी का प्याला जब दूसरे सहाबी अपने मुंह से लगाते हैं तीसरे की आवाज आती है। यह भी अपना प्याला तीसरे सहाबी को भेज देते हैं यहां तक की प्यासे सहाबियों में से कोई भी पानी नहीं पीने पाता और उन सब की रूहे परवाज़ कर जाती है। 

यह उसी ईसार के नमूने हैं जिसका दर्स नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मजकूरह हदीसे पाक में दिया है :-

 *"अपने मुसलमान भाई के लिए वही बात पसंद करो जो अपने लिए पसंद करते हो और वह बात नापसंद करो जो अपने लिए नापसंद करते हो।"* 


अपने भाई के लिए इंसार की ऐसी मिसाल दूसरी नहीं मिल सकती।

आज का मुसलमान ईसार के जज्बे से महरूम हुआ तो बात-बात पर आपस में लड़ाई झगड़ा, मुकदमे बाजी, कत्ल व गारतगरी आम हो गई

मुआशरह इन्तिशार का शिकार हो गया दुश्मन कमजोर समझ कर उस पर टूट पड़े नतीजा हमारे सामने है तमास कोम दुश्मनों के शिकते में टुक-टुक दीदम, दम नह कशीदर्ग की तरह फड़फड़ा रही है।


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🔘  *कुरबानी का मफहूम*


👉🏻 मअलूम हुआ किह मुसलमान की जिन्दगी हर लमहा हर पल कुरबानी चाहती है यही कुरबानिया उसकी अज़मत की जामिन बन जाती है

और उसको अजमत इस्लाम की अज़मत की अलमबरदार बन जाती है। अकवामे आलम सरनिगू होने (सर झुकाने) पर मजबूर हो जाती हैं।

ऐ बिरादने इस्लाम ! अगर दोनों जहान में सुरखुरूई, अजमत और विकार के ख़्वाहां हो तो अपने भाईयों की जरूरतों पर अपनी क्रूरतों को कुरबान करने की आदत डालो।

हम इस पोस्ट में ईदे-अजहा और जानवरों की कुरबानी का जिक्र करेंगे जो बेशुमार नेअमतों का ख़ज़ानह और सब से बढ़कर अल्लाह और रसूल की खुशनुदी और कुरबत की ज़रिअह है।

इस्लामी साल कुरबानी से शुरू होता है और कुरबानी पर ख़त्म होता है यअनी मुहर्रमुलहराम में हज़रत इमाम हुसैन रदीयल्लाहु अन्हु और ऐहले बैते किराम ने मैदाने करबला में कुरबानीयां पेश की और ज़िलहिज्जह में इजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने फरजंद हज़रत इस्माईलअलैहिस्सलाम की कुरबानी पेश की। दोनों महीनों के फ़ज़ाइल बेशुमार है।

 *गरीब, सादह व रंगीं है दास्ताने हरम निहायत इसकी हुसैन इबतिदा हैं ईस्माईल* 


ऐ मुसलमानों! इस्लामी साल मुहर्रम के महीने से शुरू होता है। ईसाई वगैरह जनवरी में नया साल मनाते हैं। तुम मुसलमान हो जनवरी में नया साल ना मनाया करो। पहली मुहर्रम को नए साल की मुबारकबाद अपने भाइयों को दिया करो। अल्लाह तआला फरमाता है :-


जिसने जिस कौम की तरह अपनी जिन्दगी गुजारी वह उन्ही में से है यअनी उसी कौम के साथ हश्र होगा।


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        🔅 *क़ुरबानी क्यों और कैसे* 🔅

              ♻️ *पोस्ट :- 06* ♻️

🔘  *कुरबानी क्या है*

👉🏻 कुरबानी इस्लाम के पांच सुतूनों में से एक सुतून 'हुज" के अरकान का एक अहम जुज है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है

तर्जुमा - नमाज पढ़ो अपने रब के लिए और कुरबानी अदा करो। 

इस फरमान के मुताबिक कुरबानी का हुक्म दुनिया के तमाम मुसलमानों के लिए है इसलिए आज़मीने हज के अलावह तमाम साहिबे निसाब मुसलमानों को अपने-अपने मकाम पर जिलहिज्जह की 10-11-12 तारीखों में कुरबानी करना वाजिब है।

कुरबानी माली इबादत है जो मालदारों पर वाजिब है। खास जानवर को खास दिन अल्लाह तआला के लिए सवाब की निय्यत से जिबह करने का नाम कुरबानी है।


कुरबानी हुक्मे रब्बानी है यअनी वह हुक्म जो अल्लाह तआला ने अपने खलील हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को दिया था जिसके तहत आपने अपने साहबजादे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला के हुजूर कुरबानी के लिए पेश कर दिया उसके बअद वही हुक्म कुरआने पाक में इरशाद फमाया गयाः-

यअनी नमाज पढ़ो अपने रब के लिए और कुरबानी अदा करो। 

अल्लाह तआला को कुरबानी बहुत पसंद है इस लिए हर उम्मत के लिए मुकर्रर फरमाई गई।


👉🏻 *हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का ख़्वाब* 


कुरबानी रज़ाए इलाही पर अपनी अजीजतरीन चीज़ कुरबान करने के जजबहे और इताअत व बन्दगी का मज़हर है। हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने मुतवतिर तीन रात यही ख़्वाब देखा कि रब्बुलआलमीन कुरबानी तलब फरमा रहा है। आप ने दो दिनों तक सौ-सौ ऊंट की कुरबानियां पेश की, मगर जब तीसरी रात अपनी अजीज तरीन चीज कुरबान करने का हुक्म हुआ तो आप समझ गए कि फ़रज़न्दे अरजुमन्द हजरत इस्माईल की कुरबानी की जानिब इशारा है। 

चुनान्चे आपने हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को पूरा वाकेअ सुनाया तो हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने अर्ज कियाः-

"अब्बाजान ! आपको जो हुक्म मिला है उसे आप बिना खौफ व खतर पूरा फरमाएं। इन्शाअल्लाह आप मुझे साबिर व शाकिर पाएंगे।"


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              ♻️ *पोस्ट :- 07* ♻️

🔘  *कुरबानी क्या है*

👉🏻 (दौरे हाजिर के मुसलमान बच्चों का यह आलम है कि वह अपने वालिदैन का मअमूली हुक्म भी मानने पर तय्यार नहीं) वालिदैन जागें अलगरज जब बाप व बेटे दोनों रजाए इलाही पर राजी हो गए तो बाप ने बेटे को जमीन पर पेशानी के बल लिटा कर गले पर छुरी रख दी। सब्र व इसतकलाल, इताअत व बन्दगी का ऐसा मनजर चश्मे फलक ने इससे  पहले कभी न देखा होगा।

हुकमे इलाही की जब दोनों हज़रात ने तअमील कर ली तो अल्लाह तआला ने पुकार कर फरमाया -

यअनी ऐ इब्राहीम ! तूने बेटे को जिबह करने के ख्वाब को सच कर दिखाया अब तुम बेटे को जिबह करने के बजाए मेंढा जिबह करो और हजरत जिबरईल अलैहिस्सलाम ने जन्नत से एक मेंढा लाकर जिसका नाम वजीर था छुरी के नीचे रख दिया और हज़रत इस्माईल को उठा लिया।


कुरबानी हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत व यादगार और हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है। इस्लाम में अकसर आमाल कुरबानी की तरह किसी ना किसी वाकिअह की याद ताज़ह करते हैं। जिस तरह हज़रत हाजरह रदीयल्लाहु अन्हा अपने लखते जिगर सय्यदना हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के लिए पानी की तलाश में सफा और मरवह पहाड़ियों के बीच दौड़ी थीं खुदावंदे कुद्दूस को आप की यह अदा इतनी अच्छी लगी किह कयामत तक के लिए वही तरीका हाजियो के लिए सफा, मरवह की "सअई" की शक्ल में लाजिम करार दे दिया। इसी तरह सय्यदना हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल अलैहुमाअस्सलाम का जजबए इताअत व बन्दगी और कुरबानी इतना पसन्द आया कि कयामत तक के लिए उस को हमेशगी बख़्श दी।

 नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने खुद दो मेंढ़ों को जिबह फरमाकर इस अजीम यादगार व सुन्नत को अपनी उम्मत के लिए लाज़मी करार दे दिया। इसलिए अब इस अमल कुरबानी में सुन्नते खलीलुल्लाह और सुन्नते हबीब उल्लाह दोनों की अदायगी है।


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              ♻️ *पोस्ट :- 08* ♻️

🔘  *कुरबानी उम्मते मुहम्मदया का फख्र व इमतियाज है*

👉🏻 पिछले दौर की उम्मतों में कुरबानी के जिबह्शुदह जानवरों को एक कुदरती आग जाहिर होकर जला डालती थी। इस तरह कुरबानियों के मकबूल और गैर मकबूल होने की यही पहचान थी। बाइबिल में भी यही तजकिरह मिलता है। अल्लाह तआला ने निजामे मुस्तफा में उम्मते मुहम्मदया को जो निजामे कुरबानी अता फरमाया उसमें दो अहम हिकमते हैं। एक तरफ मुसलमान जानों का नजरानह बारगाहे रब्बुलआलमीन में पेश करते हैं, दूसरी जानिब गोश्त का तोहफह अपने मुसलमान भाईयों में तकसीम करते हैं।


👉🏻 *कुरबानी अल्लाह और रसूल की खुशनूदी व कुरबत का जरिया है* 

मुसलमान इस माली इबादत के जरिये इताअत व बन्दगी का इजहार करते हैं जिस से अल्लाह और उसके रसूल की खुशनूदी और कुरबत हासिल होती है और बेशुमार नेअमतों बरकतों से नवाजे जाते हैं।

कुरबानी रिश्तए उखुव्वत (भाईचारा) और जजबए ईसार (दूसरे की जरूरतो पर अपनी जरूरतें कुरबान कर देना) की मजबूती और गुरबा व मसाकीन की ख़बर गीरी का नाम है।

रिश्तए उखुव्वत की मजबूती और गुरबा नवाजी निजामे मुस्तफा के अहम अजजा (हिस्से) है। आप सुल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है "तमाम मुसलमान आपस में भाई हैं।"

इस रिश्तए उखुव्वत को जोड़ने और उसके मजबूत करने के लिए आपने फरमाया "अपने भाई के लिए वही बात पसंद करो जो अपने लिए पसंद करते हो और वह बात ना पसंद करो जो अपने लिए नापसंद करते हो।" अपने मुसलमान भाई को सलाम करने का हुक्म, रिश्तेदारों पड़ोसियों और दीगर मुतअल्लेकीन को तोहफे देने का हुक्म, एक पलेट में एक साथ खाने का हुक्म वगैरह आपस में मुहब्बत पैदा करने और रिश्तए उखुब्बत मजबूत करने के लिए सादिर फरमाए। इस के बर खिलाफ कतअ रहमी यअनी रिश्ता कमजोर करने या तोड़ने वालों के मुतअल्लिक अल्लाह तआला ने फरमाया जो तुझे (रिश्ता) मिलाएगा मैं उसे मिलाऊंगा जो तुझे (रिशता) काटेगा मैं उसे काटूंगा (बुखारी)।

सिलह रहमी वाजिब और कतअ रहमी हराम है।

नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने रिश्ते तोड़ने या कमज़ोर करने वालों को सख्त तंबीह करते हुए फरमाया "जिसको अपने भाई का गम नहीं वह मेरी उम्मत से नहीं" निजामे मुस्तफा में उखुव्वत के इन मक़ासिद को हासिल करने के लिए कुरबानी को भी जरिअह बना दिया गया। हुक्म हुआ कि कुरबानी के गोश्त के तीन हिस्से करो। एक गरीब, मिसकीन और फकीरों के लिए दूसरा अजीज व अकारिब के लिए और बाकी एक अपने ऐहल व अयाल के लिए रखो जिससे रिश्तए उखुव्वत मजबूत हो और हाजतमन्दों की हाजत पूरी हो।

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              ♻️ *पोस्ट :- 09* ♻️

🔘  *कुरबानी जजबए रूहानी की जिला (रौशन करने) का रियह है।*

👉🏻 इंसान का सीना हविस और ईसार से भरा हुआ है। हविस एक हैवानी जज्बा है जिससे खुदगरजी पैदा होती है। जिस तरह एक हैवान सिर्फ अपना पेट भरने के लिए दूसरे का खून कर देता है और उसे कोई अफ़‌सोस नहीं होता। इसी तरह इंसान भी अपनी ख्वाहिशात पूरी करने के लिए दूसरों की तमन्नाओं का खून कर देता है और उसे अफ़‌सोस नहीं होता। इसके बर खिलाफ ईसार (कुरबानी) एक मलकूती (फरिश्तों जैसा) जजबह है जिसके तहत वह अपनी जुरुरियात पर अपने भाइयों की जुरीरियात को तरजीह देता है।

अगर एक क्यारी में दो पौदे गिजा हासिल करते हों तो एक पौदे को काट देने से दूसरा ज़्यादह गिजा हासिल कर सकता है। इसी तरह इंसान के दो जजबों में से अगर जजबए हविस को ख़त्म कर दिया जाए तो जजबए ईसार बढ़ जाएगा जिसकी बदौलत इनसान में मलकूतियत (फरिशतों जैसी सीरत) और रूहानियत रौशन हो जाएगी।

कुरबानी करने से मुसलमानों को यह मौकअ मिलता है उनका जजबए ईसार उनके जज्बए खुदगरजी पर छुरी फेर देता है। इस तरह उनकी रूहानियत को जिला मिलती है।


👉🏻 *कुरबानी जिहाद की तरबियत (TRAINING) का जरिया है* 


इस्लाम का हर फर्द फितरतन सिपाही होता है और वह उसे मुखतलिफ तरीकों से हर साल जिहाद की तरबियत देता है। इस्लाम ने साल में एक बार एक जानवर की कुरबानी का हुक्म दिया ताकिह जाहिरी तौर पर उसका गला काटने से मुसलमान के अन्दर जुर्रत, वलवला और ख़ाक व खून का मनज़र देखने की हिम्मत पैदा हो। काफिरों मुशरिकों का मुहासबह व मुकाबलह वही शख्स कर सकता है जो अपनी ज़िन्दगी में कभी खाक व खून से खेल चुका हो। जो शख्स एक जानवर को जिबह करने से भी डरता हो उससे जिहाद करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। जानवरों की कुरबानी के जरिए इस्लाम अपने फ़रज़नदों को समझाता है कि जिस तरह अल्लाह की रजा के लिए तुम आज इस जानवर का खून बहा रहे हो, कल इसी तरह खुदा के नाम की सरबुलन्दी के लिए तुम को खुद अपना लहू पेश करना है।



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🔘  *कुरबानी के फजाइल व फवाइद*

👉🏻 कुरबानी दीने इस्लाम की एक अजीम निशानी है जिसे जबरदस्त अहमियत व फजीलत हासिल है इससे मुसलमानों को अहम फायदे हासिल होते हैं:-

कुरबानी के फ़ज़ाइल व ‌वाइद के सिलसिले में हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के फरमान यह हैं :-

 *1.अल्लाह तआला का पसंदीदह अमल है* 

कुरबानी के दिनों में अल्लाह तआला को कुरबानी का खून बहाने से ज़्यादह मुसलमान का कोई अमल (नफिल अमल) पसंद नहीं।


 *2.ख़र्च किया गया रूपयह सब से प्यारा है* 

जो रूपयह ईद की कुरबानी में खर्च किया जाता है अल्लाह तआला को उससे ज़्यादह कोई रूपयह प्यारा नहीं। (यह रूपयह हलाल होना लाजमी है)


 *3.दर्जए मक‌बुलियत* 

कुरबानी का खून जमीन पर गिरने से पहले ही बारगाहे इलाही में मक़बूल हो जाता है इसलिए इसे खुशदिली से करना चाहिये।


 *4.कुरबानी दोजख की आग से ढाल है।*

जिसने खुश दिली से सवाब की नियत से कुरबानी की वह दोजख की आग से ढाल बन जाएगी।


 *5.गुनाहों का मुआफ किया जाना* 

हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत फातिमह रदीयल्लाहु अन्हा से फरमाया "कुरबानी के जानवर के पास खड़ी रहो, इसलिए किह कुरबानी के जानवर की गरदन से जब खून का पहला कतरा गिरेगा तो उसके एवज तुम्हारे सारे गुनाह (गुनाहे सगीरह) मुआफ कर दिए जाएंगे।" गुनाहे कबीरह बगैर तौबह मुआफ नहीं होते।


 *6.गरीबों के लिऐ इनआम* 

जो साहिबे निसाब नहीं और उसे कुरबानी की तौफीक नहीं, वह भी सवाब से महरूम न रहे, उस पर अल्लाह तआला ने उसे इस तरह नवाज़ह किह वह अपने बाल, नाखुन और मूंछे कतरवा ले और नाफ के नीचे बाल मूंड ले। यह सब करने से उसे कुरबानी का सवाब अता किया जाएगा।


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🔘  *कुरबानी के फजाइल व फवाइद*

👉🏻 *7. गरीबों के लिऐ हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रहमत* 

हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दो मेंढे मंगवाए। एक मेंढे की कुरबानी अपनी जानिब से की और दूसरे मेंढ़े की कुरबानी करके फरमायाः-

इलाही! यह मेरी उम्मत में उनकी तरफ से है जिसने कुरबानी नहीं की यअनी उन गरीब उम्मतियों की तरफ से है जो साहिबे निसाब न होने के सबब कुरबानी नहीं कर सकते। यह इनआम कयामत तक के गरीब मुसलमानों के लिए है। 

ऐ मुसलमानों! अपने प्यारे नबी की मुहब्बत का हक अदा करो इस तरह कि एहले बैते किराम और आले पाक से दिली मुहब्बत करो शुकरियह अदा करने का यही वाहिद तरीक़ह है।

फरमाने मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम है-

तर्जुमा - मैं तुमसे इसका अज्र नहीं मागता मगर कराबत दारों की मुहब्बत। (यअनी ईमान और दीगर नेअमतें अता फरमाने का बदलह कुछ और नहीं सिर्फ ऐहले बैत और आले रसूल से मुहब्बत करना)

इससे पता चलता है कि जानवर की कुरबानी किस दर्जह जरूरी है कोई अमल इसका बदल नहीं हो सकता क्यूंकिह कुरबानी का हुक्म अल्लाह तआला ने फरमाया है। अल्लाह तआला का फरमान हैः-

नमाज पढ़ो अल्लाह के लिऐ और कुरबानी करो। इसीलिए हुजूर ने अपने गरीबों पर रहमत फरमाई और उनकी जानिब से कुरबानी पेश कर दी।


👉🏻 *8.अफजल कुरबानी कौन सी है?* 

कुरबानी वह अफ‌ज़ल है किह जिस का जानवर कीमत से एतबार से आला और खूब फबेह (मोटा ताजह) हो।


👉🏻 *9.अताए मगफिरत* 

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया "जो शख्स कुरबानी के दिन अपनी कुरबानी के जानवर के नज़दीक उसके जिबह करने के इरादे से पहुंचता है तो अल्लाह तआला उसको जन्नत से नजदीक कर देता है और जब वह उस को जिबह कर देता है तो उसके खून का पहला कतरा जमीन पर गिरते ही अल्लाह तआला उसको बख्श देता है।"


 *10. नेकियों का इनआम* 

हज़त दाऊद अलैहिस्सलाम ने बारगाहे इलाही में अर्ज किया "इलाही उम्मते मुहम्मदया में से कुरबानी करने वालों को क्या सवाब मिलेगा ?"

अल्लाह तआला ने फरमाया "इसका सवाब कुरबानी के जानवर के हर बाल के एवज दस नेकियां मिलेंगी, गुनाह मिटा दिए जाएंगे और उसके दस दरजे बुलन्द किए जाएंगे।"

हजरत दाऊद अलैहिस्सलाम ने फिर अर्ज किया "जब वह कुरबानी के पेट को चाक करेगा तो उसका क्या सवाब होगा ?

अल्लाह तआला ने फरमाया "जब उस बन्दे की कब्र फटेगी तो उसको भूक, प्यास और कयामत के हौल से महफूज़ करके निकाला जाएगा। कुरबानी के गोश्त व खून को सत्तर (70) दरजह बढ़ा कर मीजान में वजन किया जायेगा।


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🔘  *कुरबानी के फजाइल व फवाइद*

👉🏻 *11.बलांए दूर होती हैं* - कुरबानियां बलाओं को दूर करती है।


 *12.कुरबानियों के जानवर पुलसिरात की सवारियां हैं* - रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया - अच्छे जानवरों की कुरबानी करो, कयामत के दिन यह तुम्हारी सवारियां होगी जो पुलसिरात से गुजारेंगी।


 *गौर से पढ़िए* 

आप अपने जानवर की कुरबानी, तजदीदे ईमान और इखलासे नियत यअनी अल्लाह व रसूल की रजा व कुर्ब और सवाब हासिल करने की नियत के साथ, अपने हाथ से करें अगर कोई मजबूरी हो तो वहां खड़े जुरूर रहें।

तजदीदे ईमान का तरीक़ह आगे देखें।

रिया यअनी नाम व नमूद और हराम माल हर अमल की तरह कुरबानी को भी मलबुलियत से महरूम कर देता है और इस कद्र कीमती माली इबादत बरबाद हो जाती है। तफसील आगे पढ़ें।


 *शराइते मकबूलियत* 

किसी भी अमल की मकबूलियत का इनहिसार 3 बातों पर है:-

1.ईमान, 2.इखलासे अमल, 3.हलाल माल

 *1.ईमान* 

दौरे हाजिर में, मुसलमानों की इल्मे दीन से महरूमी और माहौल में कुफरियात का गुलबह, इन सब बातों ने उनके ईमान की सलामती को खतरे में डाल दिया है। एक तफ इस्लाम के अन्दर नए-नए फिरकों के पैदा होने और इस्लाम के नाम पर मुसलमानों को गुमराह करने के सबब ब ईमान के लिए खतरे पैदा कर दिये हैं, दूसरी जानिब दुशमनाने इस्लाम गुमराहकुन तअलीमात के जरिए मुसलमानों के जहनों को तबदील (BRAIN WASH) करने की हिकमते अमली पर तेजी से अमल कर रहे हैं जिसके तहत स्कूली किताबों, तरीके तअलीम, टी वी, सिनेमा और रेडियो वगैरह के जरिए हिन्दू मजहब के प्रचार से माहौल में इस कद्र कुफरियात का तूफान बरपा किया जा रहा है किह मुसलमानों का ईमान पर काइम रहना दुशवार हो गया है।

मुसलमानाने आलम दीनी जिहालत के सबब माहौल में फैलती कुफरियात की पहचान करने और उनसे अपने ईमान की हिफाजत करने से मजबूर नज़र आते हैं और हर लमहा यह अनदेशा लगा रहता है कि उनका ईमान सलामत भी है या नहीं? ऐसे अनदेशों की तस्दीक इन अहादीसे करीमह से होती है। नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:-

1.कुरबे क़यामत में लोग सुबह को मुसलमान होंगे शाम को काफिर हो जाएंगे, शाम को मुसलमान होंगे सुबह को काफिर हो जाएंगे।

2.कुरबे कयामत में मसाजिद नमाजियों से भरी होंगी लेकिन उनमें ईमान वाले बहुत कम होंगे।

इन अहादीसे करीमह की रोशनी में यह कहना गलत न होगा किह इस फितनों से भरे दौर में मुसलमानों के रोजी रोटी, इज़्ज़त व आबरू, जान व माल की हिफाजत जैसे बड़े मसअले पीछे रह गये हैं और ईमान की हिफाजत का मसअलह सबसे बड़ा मसअलह बन चुका है लेकिन वह इससे बेन्याज बेखबर है।


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        🔅 *क़ुरबानी क्यों और कैसे* 🔅

              ♻️ *पोस्ट :- 13* ♻️

🔘  *शराइते मकबूलियत*

👉🏻 मुसलमान अगर ईमान की शरतें जान लें, स्कूली किताबों और स्कूलों के तरीके तअलीम पर नज़र रखें, टी. वी. पर हराम प्रोग्राम न खुद देखें न बीवी बच्चों को देखने दें और दीनी मुआमलात में अपनी जुबान का बेवजह इस्तेअमाल न करें तो बड़ी हद तक ईमान की सलामती का मसअलह हल हो सकता है।


हज के सिलसिले में भी नबीए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान है:- 'जिसने ईमान और एहतिसाब के साथ हज के अरकान अदा किए वह गुनाहों (गुनाहे सगीरह (छोटे)) से पाक साफ हो गया" यहां भी ईमान को मुकद्दम रखा गया है। मअलूम हुआ किह बगैर ईमान कोई अमल मकबूल नहीं। इसी तरह कुरबानी के सिलसिले में ऊपर बयान करदा फ़‌ज़ाइल व ‌वाइद उसी सूरत में हासिल हो सकते हैं जब ईमान की सलामती यकीनी हो। कुफरियात के इस दौर में जब ईमान की सलामती यकीनी नहीं तो तजदीदे ईमान करते रहना लाजमी हो गया है कि न जाने किस वक्त मौत का परवाना आ जाए। इसलिए कम से कम सुबह को और रात को, हर नमाज से पहले और हर अच्छे अमल से पहले तजदीदे ईमान कर लेने की आदत बना लेना चाहिए। जिससे वह अमल मोमिन का अमल लिखा जाए और उसके मक़बूल होने की उम्मीद हो सके इसी में खैरियत नजर आती है। 


 *तजदीदे ईमान इस तरह करें*

अव्वल आखिर तीन बार दुरूद शरीफ के साथ तीन तीन बार इस्तिगफार और कलमए तौहीद पढ़ लिया करें।

सच्ची तौबह करने के बअद यह भी जरूरी है किह गुनाह दोबारह नह करने का पक्का इरादह भी करें। कुरबानी से पहले भी तजदीदे ईमान का यह अमल जुरूर कर लें। ईमान व कुफ़ की तफसील के लिए फलाहेमिल्लत पढ़ें।


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        🔅 *क़ुरबानी क्यों और कैसे* 🔅

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🔘  *अहकाम व मसाइल*

 *A. शराइते कुरबानी* 

👉🏻कुरबानी वाजिब होने की चार शराइत् हैं। 1.मुसलमान होना - मुसलमान मर्द व औरत दोनों पर वाजिब है।

2.मुकीम होना - मुकीम पर वाजिब है, मुसाफिर पर वाजिब नहीं, अगर नफिल के तौर पर कर सकता है तो सुवाब पाएगा।

3.गनी होना - गनी यअनी मालिक निसाब पर वाजिब है, मोहताज, फकीर मुफलिस पर वाजिब नहीं।


 *मालिक निसाब कौन है ?* 

मालिके निसाब से मुराद इतना माल होना है जितना माल होने से सदकए फित्र वाजिब होता है, वह मुराद नहीं जिससे जकात वाजिब होती है। यअनी हाजते असुलियह के अलावह साढ़े सात तोले (7.5) सोना या साढ़े बावन तोले (52.5) चांदी या उसकी कीमत के बराबर रूपये का मालिक हो। आजकल 52.5 तोले चांदी की कीमत तक़रीबन सत्तावन हज़ार दो सौ पचपन रूपये होती है (बाजार भाव से 52.5 तोले चांदी की कीमत मअलूम कर लें) हाजते अम्लियह के अलावह जिसके पास इतना रूपयह या इतनी कीमत का सामान हो, उस पर कुरबानी वाजिब है। इसमें जकात की तरह आकिल बालिग और माले नामी होने की शर्त नहीं, यअनी माल पर साल गुज़रना शर्त नहीं, यहां तक कि अगर कुरबानी के दिनों में साहिबे निसाब हो गया तो उस पर कुरबानी वाजिब है।


 *औरतों के लिए एहकाम* 

अगर औरतें निसाब के बराबर सोना या चांदी की मालिक है तो उन पर जकात भी वाजिब है और कुरबानी भी। जकात व कुरबानी का खर्च अगर शौहर न बरदाश्त करे तो औरतों को अपने माल से ज़कात व कुरबानी करनी वाजिब है। अगर औरत के पास रूपए न हो तो सोना या चांदी बेच कर अदा करे। उन पर जकात व कुरबानी उस वक्त तक वाजिब रहेगी जब तक सोना या चांदी कम होकर निसाब की हद से कम न हो जाए।


 *हाजते अस्लियह क्या है ?*

 हाजते असस्लियह में रहने का मकान, सामाने खानादारी, पहनने के कपड़ों में घर में पहनने के कपड़े और काम काज के वक्त पहनने के कपड़े और जुमअह, ईद और दूसरे मौअको पर पहनकर जाने के कपड़े, खादिम सवारी, हथयार, पेशे के असबाब व औजार और अहले इल्म के लिए हाजत की किताबें शामिल है।


इसके अलावह

टी. वी. रेडियो, टू इन वन, वी सी आर वी. सी. पी, कैमरा वगेरह, मकानों की आराइश का सामान, वह सामान जो घर में मौजूद तो है मगर इस्तेमाल में नहीं और न उसकी जुरूस्त है, जुरूरत से जाइद कपड़े, मकान, दुकान, जमीन अगर यह काश्त की हो, जहेज के लिए खरोदह गया सामान वगैरह हाजाते असुलियह में शामिल नहीं इनकी कीमत निसाब में शामिल की जाएगी, यहां तक कि लोहालंगड़, कबाड़खाना अगर तिजारत के लिए न हो, अगर निसाब भर हो जाए तो उसपर कुरबानी व फ़ितरह वाजिब है। मजीद तफ्सील बहारे शरीअत और उल्माए किराम से दरयाफ्त कर सकते हैं।


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🔘  *अहकाम व मसाइल*

 *कर्जदारों के लिए हुक्म*


जिस शख़्स पर कर्ज है उसके माल से अगर कर्ज की रकम घटा दी जाए तो वह साहिबे निसाब नहीं रहता ऐसी सूरत में कुरबानी वाजिब नहीं होगी। दूसरी सूरत में अगर कर्ज की रकम घटाने पर वह साहिबे निसाब रहता है तो उस पर कुरबानी वाजिब होगी।


 *तंबीह* - कुछ लोग कर्जदार होने का बहाना बनाकर कुरबानी नहीं करते वह इस हुक्मे खुदावंदी से सबक लें और कुरबानी किया करें वरनह वाजिब अदा न करने का गुनाह हर साल होता रहेगा।


 *4.आजाद होना* - आज़ाद पर वाजिब है गुलाम पर वाजिब नहीं। इस दौर में गुलाम का दस्तूर नहीं है सब आजाद है। गुलाम से मुराद खादिम व मुलाजिम नहीं।


 *कुरबानी जिस पर वाजिब हो उसी के नाम से की जानी चाहिए* आम तौर पर यह देखा जाता है किह लोग जजबह-ए-मुहब्बत के तहत कुरबानी अपने उन बीवी बच्चों, वाल्दैन, दादा-दादी, नाना-नानी वगैरह के नाम से कर देते हैं जिन पर वाजिब नहीं होती या इन्तिकाल कर चुके होते हैं। ऐसी सूरत में यह कुरबानी नफिल कुरबानी हो जाती है और वाजिब बरकार रहता है कुरबानी फौत हो जाने से वह गुनाहगार होता है।

कुरबानी मय्यत की जानिब से भी की जा सकती है मगर अपना वाजिब अदा करने के बाद।


👉🏻 *बालिग बच्चे या बीवी के वाजिब अदा करने का हुक्म* 

बालिग बच्चे या बीवी, जिन पर कुरबानी वाजिब है, कोई उनकी जानिब से कुरबानी करना चाहे तो उनकी इजाजत के बगैर वाजिब अदा न होगा। उनकी इजाजत लेना जरूरी है। 


👉🏻 *कुरबानी का वक्त* - कुरबानी का वक्त दसवीं जिलहिज्जह की सुबह सादिक से बारहवी के गुरूब आफ‌ताब तक है, उसके बअद फौत हो जाती है। दसवी तारीख सब से अफज़ल है। शहर में नमाजे ईद व खुत्बे के बाद और देहात में चूंकि नमाजे ईद वाजिब नहीं कुरबानी सुबह सादिक से की जा सकती है।

किसी जुरूरत के तहत अगर कोई शहरी आदमी सुबह नमाजे ईद से पहले कुरबानी करना चाहे तो जानवर देहात भेज दे। दसवी तारीख को अगर ईद की नमाज नहीं हुई तो जब जवाल का वक़्त आ जाए कुरबानी की जा सकती है।


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🔘  *अहकाम व मसाइल*

*कुरबानी के जानवर* 

ऊंट, गाय, बकरा, दुंबा, भैंस, भेड़ जो तमाम एब से पाक हो उनकी कुरबानी की जा सकती है। जानवर काने, लंगड़े, टूटे सींग वाले, कान कटे, बीमार, दुबले-पतले न हो। वहशी हलाल जानवर मसलन नील गाय, हिरन की कुरबानी नहीं की जा सकती। मुर्ग की कुरबानी नाजाइज है। ऊंट, गाय, भैंस में सात लोग शरीक हो सकते हैं। जिसके दांत न हों (1साल से छोटा हो) या जिसके थन कटे हों या खुश्क हो उसकी कुरबानी नाजाइज़ है बकरी में एक थन खुश्क हो, गाए भैंस में वो खुश्क हो तो नाजाइज है। जिसकी नाक कटी हो या इलाज के जरिए दूध खुश्क कर दिया हो और जिसमें नर मादा दोनों की अलामतें हो और जो सिर्फ गलीज (गंदगी) खाता हो इन सब की कुरबानी नाजाइज है। कुरबानी करते वक्त जानवर उछला कूदा जिसकी वजह से ऐब पैदा हो गया उसकी कुरबानी जाइज है। कुरबानी के जानवर से कोई फाइदा नहीं उठाया जा सकता जैसे बाल काट लेना, दूध दूह लेना, उस पर सवार होना या कोई चीज लादना या उसे उजरत पर देना यह सब मना है। अगर ऐसा कर लिया तो बाल, दूध और तमाम मुनाफे का रूपयह सदकह कर दें। जानवर जिबह होने के बअद उसके बाल दूध वगैरह इस्तेअमाल कर सकते हैं।


👉🏻 *जानवर की उम्र* 

ऊंट की उम्र कम से कम पांच साल, गाय, भैंस की दो साल और बकरे की एक साल होना जरूरी है। यह जुरूरी है कि कुरबानी का जानवर तर व ताजह, मोटा और खूबसूरत हो।


👉🏻 *जानवर की उम्र की पहचान* 


दो साल की गाए, भैंस और एक साल का बकरा, बकरी इन सबकी एक ही पहचान है यअनी बीच के दो दांत बड़े हो। ऐसे जानवर को दन्तू या दंता हुआ कहते हैं। जिस जानवर के बीच के दो दांत बड़े नह हो उसे ऊना या ऊनी कहते हैं। ऐसे जानवरों की उम्र दो या एक साल से कम होती है और उनकी कुरबानी नहीं की जा सकती।


1.जानवर खरीदते वक्त ऊपर बताई गई पहचान जरूर देख लें और दन्तू या दंता हुआ ही जानवर खरीदें वरनह कुरबानी नहीं होगी।

जानवर बेचने वालों को अक्सर यह कहते सुना गया है किह जानवर एक या दो साल का हो चुका है लेकिन अभी दांता नहीं है। झूठ व फरेब के इस दौर में किसी का यकीन नहीं किया जा सकता। खुद पहचान कर जानवर ख़रीदें। एक जमानह था कि लोग गुनाह के डर से ऊने जानवर बेचने के लिऐ बाजार में लाते ही नहीं थे आजकल बेशुमार ऊने जानवर कुरबानी के दिनों बेचने ले आते है और यह बताते भी नहीं किह उनका जानवर ऊना है। क्यूं! इसलिए किह खौफे खुदा जाता रहा।

3.यह जो मशहूर है किह एक साल से कम उम्र का जानवर अगर देखने में इतना बड़ा लगे किह दूर से देखने में साल भर का मअलूम हो तो उसकी कुरबानी जाइज है। यह रिआयत सिर्फ दुबे और भेड़ के बच्चे के लिए है, बकरा, बकरी के लिए नहीं। नोट-शरीअत में जानवरों की सिर्फ उम्र बताई है कोई पहचान नहीं बताई गई है। जानवर पालने वालों से पूछा गया, उनके नजदीकएक साल (बकरा, बकरी) या दो साल (गाए, भैंस) उम्र होने की अलामत उनका दंत्ता हुआ होना ही है यअनी बीच के दो दांत खूब बड़े हों जैसा किह ऊपर बयान किया गया है।


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🔘  *अहकाम व मसाइल*

👉🏻 *निहायत कीमती जानवर की कुरबानी करना* 

जो लोग निहायत कीमती जानवर की कुरबानी नाम व नुमूद (दिखावे) के लिए करते हैं वह रिया है और कुबूल नहीं। कभी-कभी जानवरों की कीमत पचास हजार या एक लाख रू० तक पहुंच जाती है या उनको सोने चांदी के जेवरात पहनाकर अपनी शान दिखाई जाती है। ऐसे अमल इखलास को बरबाद कर देते हैं। इतनी कीमत में कई लोगों के वाजिब अदा किए जा सकते हैं। एक कीमती छोटे जानवर की जगह एक बड़े जानवर में हिस्से लेकर ज़्यादह लोग अपने वाजिब अदा कर सकते हैं।

👉🏻 *जानवर अपने हाथ से जिबह करना चाहिए* 

इसकी फजीलत और बदमजहब के जबीहे से महफूज़ रहने की बात आप पढ़ चुके हैं।

👉🏻 *कुरबानी का गोश्त* 

कुरबानी चाहे अपनी तरफ से हो चाहे किसी मय्यत की तरफ से उसका गोश्त खुद भी खा सकते हैं और अजीजों दोस्तों मालदारों व मुहताजो को भी खिला सकते हैं लेकिन कुरबानी अगर मन्नत या वसीयत की है तो इसमें से न खुद खाएं न मालदारों को दें बल्किह सब गोश्त सदकह कर दें। 

👉🏻 *गोश्त की तकसीम* - कुरबानी का गोश्त तौलकर सात हिस्सों में तकसीम किया जाए अंदाज़ से तक‌सीम करना मुनासिब नहीं। इस तरह हिस्से कम ज़्यादह हो सकते हैं और ऐसा करना जाइज नहीं जैसा पहले पढ़ चुके हैं। अपने हिस्से के गोश्त या बकरे के गोश्त को तौलकर तीन हिस्से करना जरूरी है जिससे गरीबों का हिस्सा एक तिहाई (1/3) से कम नह हो जाए। उसके बअद अगर कोई चाहे तो अपने हिस्से का सब गोश्त या कुछ हिस्सह सदकह कर सकता है और अजीजों को भी दे सकता है। एक हिस्सह मिसकीनों गरीबो के लिऐ, दूसरा अजीजों व अहबाबों के लिए और तीसरा हिस्सह अपने लिये रखे। गोश्त के खास खास हिस्से जैसे कलेजी, गुर्दे चाप वगैरह अलग कर लेना दुरूस्त नहीं।

हमारे आका हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम गरीबों, बेवाओ, मिसकीनों, फकीरों यतीमों से निहायत मुहब्बत फरमाते थे। जब आप अपने प्यारे आका की सुन्नत कुरबानी में अदा कर रहे हैं तो इसमें आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्यारों को नह भूलें उन्हे नज़र अंदाज नह करें। अपनी कुरबानी के गोश्त का एक तिहाई हिस्सह मुस्तहिक लोगों को तलाश करके उन तक पहुंचाएं पेशावर फकीरों को नह दें उनको सदकह खैरात देना मनअ है। गरीबों का हक मार कर तमाम गोश्त अपने अमीर दोस्तों रिश्तेदारों में तकसीम करके या तमाम गोश्त अपने फ्रिज में भरकर हफ्तों खाने का इन्तिज़ाम करके कुरबानी की रूह को मजरूह नह करें।

अगर किसी शख्स के बाल बच्चे बहुत हैं और उसको साहिबे निसाब होकर भी गुंजाइश नहीं तो बेहतर यह है किह सब गोश्त अपने बाल बच्चों के लिए रख ले।

कुरबानी करने वाला बकरईद के दिन सबसे पहले कुरबानी का गोश्त खाए।


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🔘  *अहकाम व मसाइल*

👉🏻 *कुरबानी का गोश्त काफिरों को देना, खिलाना मन है*

कुरबानी एक अहम दीनी फरीजा एक अहम सुन्नत है इसका गोश्त काफिरों को देना, खिलाना हरगिज़ जाइज नहीं। गैर मुस्लिम साथियों, गैर मुस्लिम नौकरों, मेहतरों, धोबियों, बच्चों की स्कूली आयाओं उनकी टीचरों वगैरह किसी भी गैर मुस्लिम को कुरबानी का गोश्त हरगिज़ न दें।

अगर मजबूरी हो तो बाजार से खरीदकर उन्हे खिला दें। जहां कुरबानी में हजारों रूपया खर्च कर रहे हों वहां सौ या दो सौ रूपये बाजार के गोश्त पर भी खर्च कर के अहकाम शरीअत की पाबंदी कर सकते हैं।

👉🏻 *किसी का हदयह वापस नह करें* 

अपने भाई के किसी भी किस्म के हदये को वापस करना उस का दिल दुखाना या उसको हकीर समझना है और यह बहुत बड़ा गुनाह है। अक्सर लोग यह कहकर कुरबानी का गोश्त वापस कर देते हैं कि हमारे यहां बहुत गोश्त है, फ्रिज भरा हुआ है, ऐसा कहना कभी भी दुरुस्त नहीं। ऐसी सूरत में आप अपने भाई का हदयह तो जुरूर कुबूल करले चाहे बअद में आप अपने किसी दूसरे भाई को हदयह कर दें। हदयह में बदला नहीं।

कुरबानी के गोश्त का हदयह हो या कोई दूसरा तबर्बुक, अक्सर लोग कहते हैं कि फलां ने हमारे यहां नहीं भेजा हम उन को क्यूं भेजें। हदयह देने में या अपने भाई के साथ किए गए किसी एहसान का बदला चाहने में मोमिन की शान नहीं और यह इस्लाम की रूह के खिलाफ है।

👉🏻 *कुरबानी की खाल* 

बेहतर यह है कि कुरबानी की खाल, झोल रस्सी, हार वगैरह सब सदकह कर दें। चमड़े को अपने इस्तेअमाल में लाया जा सकता है। मसलन - जानमाज, बिछौना, पानी का डोल वगैरह बनाया जा सकता है लेकिन खाल बेचकर कीमत अपने इस्तेअमाल में लाना जाइज़ नहीं, अगर खाल बेच दी तो उसकी कीमत दीनी कामों में लगा सकते हैं और दीनी मदरसों को, मसाजिद के इमाम व मुअज़्ज़िन को बतौर मदद (मगर तनख्वाह में न दी जाए), ऐहले सादात को, उलमा-ए-किराम को, मसजिद व कब्रिस्तान को, मुर्वे की तजहीज वा तदफीन (मय्यत के खर्च) वगैरह के लिऐ दी जा सकती है। जिन को फितह व जकात नहीं दी जा सकती मसलन दादा, दादी, नाना, नानी, पर दादा, पर दादी, पर नाना, पर नानी, पोता, पोती, पर पोता, पर पोती, नवासह, नवासी, पर नवासह, पर नवासी, शौहर, बीवी लेकिन कुरबानी की खाल की कीमत उनको भी दी जा सकती है।


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👉🏻 *कुरबानी का जानवर खुद पालकर अपने हाथ से जिबह करने की हिकमत*

आपने पढ़ा कि अल्लाह तआला ने अपने खलील हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अपनी महबूब तरीन पसंदीदह चीज कुरबान करने का हुक्म फरमाया था। जब हम किसी जानवर की परवरिश करते हैं तो उससे मुहब्बत हो जाना फितरी जजबह है और महबूब चीज़ को कुरबान करके अल्लाह तआला का हुक्म बजा लाना उसकी रजा और कुरबत हासिल होने का जरिअह है। इसी लिए खुद पाला हुआ जानवर कुरबानी के लिए पेश करना अफज़ल है।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जब बेटे को जिबह करना चाहा तो अर्ज किया कि परवरदिगार अगर यह जिबह किसी दूसरे के हाथ से हो जाता तो बेहतर था। अल्लाह तआला ने फरमाया किह यह काम तुम्हारे हाथों ही होना है। उस वक्त फरिश्तों ने अर्ज किया :- इलाहुलआलमीन ! इस इरशाद का मूजिब और सबब क्या है।

हकतआला ने फरमाया - ताकिह मेरे सिवा किसी और की मुहब्बत खलील के दिल में न रहे क्यूंकि मैं मुहब्बत में किसी का शरीक होना पसंद नहीं करता।

हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बेटे से मुहब्बत की तो इम्तिहान में मुबतिला हुए, हज़रत यअकूब अलैहिस्सलाम ने हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम से मुहब्बत की तो हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम चालीस (40) बरस उनसे गाइब रहे और हज़रत यअकूब अलैहिस्सलाम को उन की जुदाई की तकलीफ बरदाश्त करनी पड़ी। हमारे पैगमबर हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दिल में अपने नवासों, हज़रत इमाम हसन और हजरत इमाम हुसैन रदीयल्लाहु अन्हुम अजमईन की मुहब्बत जागुजीं (पैदा) हुई तो हज़रत जिब्राइल अलैहिस्सलाम ने आकर अर्ज किया कि उन में से एक को जहर दिया जाएगा और दूसरे को शहीद किया जाएगा।

मतलब यह था कि महबूब के साथ कोई दूसरा मुहब्बत में शरीक न हो। हबीबे किबरिया सुल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत का मेअयार भी मोमिनों के लिए इसी तरह काइम किया गया कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुहब्बत हर चीज की मुहब्बत पर गालिब रहे।


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🔘  *अहकाम व मसाइल*

👉🏻 कुरबानी अल्लाह के हुक्म की बजाआवरी, हज़रत इब्राहीम खलीलुल्लाह अलैहिस्सलाम और महबूबे खुदा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत है। मजकूरह तरीके से कुरबानी करने से सुन्नत की अदाइगी हकीकत बन जाती है कि एक तरफ अल्लाह तआला के हुक्म पर अपने उस जानवर को जिसे पालने की बदौलत दिल में मुहब्बत पैदा हो गई थी, अपने हाथ से कुरबान करने से यह जजबह दिल में पैदा होता है कि अल्लाह के हुक्म पर दौलत तो दौलत हर महबूब चीज़ कुरबान कर देने में कोई हिचकिचाहट नहीं। इस तरह अल्लाह तआला की मुहब्बत हर चीज की मुहब्बत पर गालिब आ जाती है। अल्लाह तआला, जैसा कि आपने पढ़ा यही बात पसंद फरमाता है।

👉🏻 *बदमजहबों के हाथ का जबीहा हराम मुरदार है* 

अकसर मकामात पर कस्साब (गोश्त का काम करने वाले लोग) बदमजहब पाए जाते हैं। मुशरिक व बदमजहबों के हाथ का जबीहह हराम व मुरदार है इस लिए कुरबानी के कुबूल होने का रास्तह कट जाता है। अपने हाथ से कुरबानी करने में एक हिकमत यह भी है कि कुरबानी बदमजहब के हाथ से न हो। गैबदां नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कोई हुक्म हिकमत से खाली नहीं। जानवर में किसी मुशरिक व बदमजहब को शरीक करने से भी कुरबानी नहीं होगी। जैसा कि पहले पढ़ चुके हैं।


👉🏻 *खबरदार! रोजमर्रह के गोश्त में भी हलाल हराम देखना लाजिमी है* 

रोज़मर्रह के गोश्त ख़रीदने में यह देख लेना काफी नहीं है कि गोश्त बेचने वाला सहीहउलअकीदह है बदमजहब नहीं है, देखना यह लाजमी है कि जानवर जिबह किसने किया है वह कोई बदमजहब तो नहीं। यह मअलूम करने के लिए क्या तरीक़ह इख़्तियार किया जाए यह इस बात पर मोनहसिर है कि आप अपने और अपने मुतअल्लिकीन के पेट हराम से बचाने में किस दरजह फिकरमंद रहते हैं। जहां चाह होती है वहां राह निकल ही आती है। आप को मअलूम होगा कि हराम का एक दाना चालीस दिनों की इबादत का नूर ख़त्म कर देता है और हराम खाने वाले की दुआ कुबूल नहीं होती।


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रमजानुल मुबारक के अहम मसाइल

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