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🔘 *बात बड़ों तक पहुँची*
👉🏻ज़रूरी है कि इस तरह के फैसलों में अपने बड़ों को शरीक किया जाये लिहाजा बात बड़ों तक पहुँची तो मुलाक़ात की तरकीब बन गयी, पहले लड़की वालों की तरफ़ से हमे पेशकश की गयी कि उनके घर मेहमान बनें लेकिन मैने इससे मना किया क्योंकि जब हमें असल शय जो मकसूद है वो मिल चुकी थी यानी दीनदारी तो फिर महज़ रस्म अदा करने के लिये जाना, खर्च बढ़ाना और बात सिर्फ़ इतनी नहीं बल्कि 4 तरह के लोगों को ले जा कर 40 तरह की बातें निकालने का मौका देना सहीह मालूम नहीं हुआ।
आज कल देखने दिखाने के तरीके ने भी निकाह को मुश्किल बना दिया है, कई-कई लोग देखने जाते हैं फिर नाश्ते खाने में कमी हो जाये तो तरह-तरह की बातें निकालते हैं, हर शख्स के सोचने समझने का अंदाज़ अलग होता है तो ज़ाहिर सी बात है कि जितने लोग होंगे उतनी बातें होंगी और फिर काम मुश्किल होता चला जायेगा।
ऐसी ही कई बातों को मद्देनजर रखते हुये मैने दरमियान में से ये महला निकाला कि हम असल शय पसंद होने के बाद फिर कुछ लोगों को ले कर देखने जायें ताकि वो बातें देखी जायें कि जिन्हें देखना यहाँ ज़रूरी नहीं।
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👥 एक निकाह ऐसा भी 👥
♻️ पोस्ट :- 02 ♻️
🔘 मुलाक़ात होती है
👉🏻शुरू में मेरा इरादा भी यही था कि पहले इधर से लोग जायें लेकिन दूरी की वजह से घर वालों ने कहा कि पहले लड़की वालों का आना मुनासिब रहेगा क्योंकि अस्ल उनका राज़ी होना है लिहाज़ा वो आयें और देख समझ लें फिर आगे बात होगी और साथ ये भी कहा कि जब तुम्हें ये रिश्ता पसंद है तो हमें कोई ऐतराज़ नहीं लिहाज़ा मैने अपनी तरफ से जाने वाले मरहले को ही निकाल दिया ताकि निकाह और आसानी से हो जाये।
चुनाँचे उधर से चंद लोग आये और फिर बात आगे बढ़ी, आने वालों में लड़की के वालिद, वालिदा, भाई और बहन थे।
यहाँ आने के बाद उन्होंने कई चीजें देखी पर तरजीह जिस चीज़ को दी वो थी दीनदारी, दिन भर रुकने के बाद वापसी हुई और नतीजा अब तक ये निकला था कि वो राय मश्वरे के बाद जवाब देंगे। चंद दिनों के बाद ही उधर से मुस्बत (Postive) जवाब आ गया और क़रीब 2 महीने बाद निकाह की तारीख़ रखी गयी।
🔘 शादी की तैयारियाँ शुरू
👉🏻आज कल शादी की तैयारियों का मतलब है कि हफ़्तों बल्कि महीनों पहले से कमर कस लेना जैसे कोई बड़ी जंग हो और इतना ज़्यादा काम फैला दिया जाता है कि कुछ ना कुछ फिर भी अधूरा रह जाता है लेकिन यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था, बस ज़रूरत की कुछ चीजें लेनी थी जो कि बड़ी आसानी से ले ली गई जिन की तफ्सील अब हम बयान करेंगे और साथ ही मुक़ाबिल में उन बातों को भी लायेंगे कि जिन से निकाह मुश्किल से मुश्किल हो गया है।
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♻️ पोस्ट :- 03 ♻️
🔘 दावत देना
👉🏻 दावत देना अच्छी बात है, हम इससे मना नहीं करते लेकिन इसका भी कोई तरीक़ा है, कोई हद्द है और कोई सलीक़ा है। आज कल तो हाल ये है कि गरीब से गरीब जिस के पास 100 लोगों को सही से खिलाने के लिये पैसे नहीं वो भी क़र्ज़ ले कर हज़ार से ज्यादा लोगों को दावत खिला रहा है।
महीने भर पहले से ही कार्ड्स, न्यौता वगैरह ले कर रिश्तेदारों के घरों के चक्कर काटना शुरू कर दिया जाता है और हमने देखा कि इसके बावजूद भी कई लोग बाक़ी रह जाते हैं जिन्हें मुँह फुला कर बैठने का मौक़ा मिल जाता है।
200 (गावों, शहरो) में दावत दे कर आने के बाद फिर उनके लिये इंतिज़ाम करने में जो हाल होता है वो बताने बैठे तो एक अलग दर्द भरी कहानी बन जायेगी लिहाज़ा बस ये अर्ज करना चाहेंगे कि इस तरह दावत का रिवाज सही नहीं है। इस में अमीर से गरीब सब परेशान होते हैं, जान लीजिये कि कम से कम लोगों को दावत दे कर ही निकाह आसानी से किया जा सकता है वरना नहीं।
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♻️ पोस्ट :- 04 ♻️
🔘 कितने लोगों को दावत दी गयी ?
👉🏻दावत के लिये मुन्तज़िर तो बिला मुबालगा 500 से ज़्यादा घर थे जिन्हें बिल्कुल यक़ीन सा था कि उन्हें दावत दी जायेगी, ऊपर से खुद के घर वाले भी एक अर्से तक इसी गुमान में थे कि बड़े बेटे की शादी में खुल के दावत करेंगे और सब को बुला कर धूम धाम से निकाह किया जायेगा फ़िर भले ही इस के लिये क़र्ज़ के दरिया में डूबना क्यों ना पड़े और ये एक मजबूरी भी थी जो इस तरह सुनने को मिलती है कि "सब का खाया है तो सब को खिलाना पड़ेगा" जैसे मानो सब ने दावत नहीं बल्कि क़र्ज़ के तौर पे खिलाया हो।
मैंने यहाँ पाबंदी लगायी और किसी को भी दावत नहीं दी गयी!
बारात और वलीमा में शरीक होने के लिये 10-12 लोगों को बुलाया गया जिन में रिश्तेदारो के साथ चंद दोस्त शामिल थे और वलीमा भी कैसे हुआ, इसकी तफ़सील आगे बयान की जायेगी। हमें लगता है कि ये बात काफ़ी अजीब लगने वाली है कि दावत क्यों नहीं दी गयी ?
क्या दावत देना गलत है ?
फिर और भी कई तरह की बातें और सवालात ज़हन में आ सकते हैं कि
क्या पैसे नहीं थे ?
क्या पैसे बचाये जा रहे थे ?
या कोइ और वजह थी ?
तो आइये इस पर भी थोड़ी गुफ़्तगू कर ली जाये कि निकाह में दावत देने की हैसियत क्या है और इसे लोगों ने क्या बना रखा है।
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♻️ पोस्ट :- 05 ♻️
🔘 सहाबा ने नबी को दावत नही दी !
👉🏻 इस में रिवायत है कि हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह रदिअल्लाहु तआला अन्हुमा बयान करते हैं कि मैने रसूलुल्लाह ﷺ के अहद में एक औरत से निकाह किया, जब मेरी मुलाक़ात रसूलुल्लाह से हुई तो आप ने फ़रमाया : ए जाबिर! क्या तुम ने शादी कर ली है? मैने कहा : बेवा से।
आप ने फ़रमाया : कुँवारी से शादी क्यों ना की, वो तुम से खेलती, तुम उस से खेलते!
मैने कहा या रसूलुल्लाह ﷺ मेरी कुछ बहनें हैं, मुझे ये खदसा हुआ कि कहीं वो मेरी बहनों की परवरिश और मेरे दरमियान हाइल ना जाये।
आप ने फ़रमाया : अगर ये बात है तो ठीक है, औरत से उसकी दीनदारी, उसके माल और जमाल की बिना पर निकाह किया जाता है, तुम्हारे हाथ खाक आलूद हों, तुम दीनदारी को मुक़द्दम रखा करो।
यहाँ ये बात क़ाबिले ग़ौर है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रते जाबिर से निकाह के बारे में पूछा जिस से साफ ज़ाहिर होता है कि हज़रते जाबिर ने हुजूर को निकाह की दावत नहीं दी और ऐसा रिवाज था ही नहीं कि निकाह के बारे में हर एक को इत्तिला दी जाये वरना हज़रते जाबिर सबसे पहले अल्लाह के नबी को दावत देते और फिर ये भी देखें कि हुजूर ने हज़रते जाबिर से ये नहीं कहा कि तुमने निकाह में मुझे क्यों नहीं बुलाया ?
ऐसी सिर्फ़ एक मिसाल नहीं और भी हैं जिनसे ज़ाहिर होता है कि ये मुरव्वजा दावत देने का तरीक़ा एक नया तरीक़ा है जिस से मुश्किलें ही मुश्किलें पैदा हुई हैं।
आप ने ये रिवायत पढ़ ली, अब ज़रा सोचें कि अगर आप अपने क़रीबी असातिज़ा, अपने दोस्तों, अपने भाईयों को बताये बिना निकाह कर लें तो क्या होगा! ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ और मेरा बयान अभी जारी है।
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♻️ पोस्ट :- 06 ♻️
🔘 हज़रते अब्दुर्रहमान औफ़ की शादी में दावत
👉🏻एक और मिसाल यहाँ हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ की पेश की जाती है जो कि अशरा-ए- मुबश्शरा में से हैं और आपका शुमार सबसे मालदार सहाबा में होता है। आप की शादी के चंद दिनों बाद जब आप बारगाहे रिसालत में आये तो आपके कपड़ों पे ज़र्द निशानात लगे थे जिन्हें देख कर हुजूर ने पूछा कि : ये कैसा रंग है?
आप ने बताया कि या रसूलल्लाह, मैने एक औरत से निकाह कर लिया है!
हुजूर ने पूछा कि तुम ने महर कितना दिया?
कहा कि या रसूलल्लाह! गुठली के बराबर सोना।
फिर हुजूर ने फरमाया कि तुम वलीमा करो, ख्वाह एक बकरी से।
इस रिवायत से भी समझ में आता है कि निकाह की तकरीब में सब को दावत देने का कोई तसव्वुर ना था वरना हज़रते अब्दुर्रहमान बिन औफ़ सबसे पहले हुजूर को दावत देते।
अब रहा ये कि हुजूर ने वलीमा का हुक्म दिया तो पहले जान लीजिये कि वलीमा किसे कहते हैं और इस का तरीक़ा क्या है, ये दुरुस्त नहीं कि अपनी ईजाद की हुई मुश्किलों को वलीमे के नाम पर चलायें और खुद की बनाई हुई जहमत को सुन्नत का नाम दें।
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♻️ पोस्ट :- 07 ♻️
🔘 वलीमा किसे कहते हैं ❓
👉🏻वलीमा यानी शादी के बाद अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को दावत देना लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि सब को बुलाया जाये और ये मतलब भी नहीं कि खाना ही खिलाया जाये बल्कि नाश्ता करवा देना भी सुन्नत की अदायगी के लिये काफ़ी है, अब आइये इसकी थोड़ी तफसील बयान कर दी जाये।
अल्लामा अइनी हनफ़ी रहीमहुल्लाहु त'आला लिखते हैं - शादी के मौक़े पर शबे जुफाफ गुज़ारने के बाद रिश्तेदारों और दोस्तों को जो दावत की जाती है, उसको वलीमा कहते हैं।
चूँकि रसूलुल्लाह ने वलीमा करने का हुक्म दिया है इसीलिये बाज़ फ़ुक़हा ने इस ज़ाहिर हदीस के एतबार से वलीमा को वाजिब कहा है और अक्सर उलमा के नज़दीक वलीमा करना मुस्तहब है।
तलवीह में मजकूर है कि इमाम शाफ़ई के नज़दीक वलीमा करना मुस्तहब है और एक क़ौल ये है कि वलीमा करना वाजिब है।
अल्लामा खिताबी ने कहा है कि जो शख्स साहिबे हैसियत हो वो एक बकरी की मिक्दार दावत करे और जिस शख्स के पास इतनी कुदरत ना हो तो कोई हरज नहीं है क्योंकि नबी ने अपनी बाज़ अज़वाज का वलीमा सत्तू और खजूरों के साथ भी किया है।
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🔘 वलीमा, दिखावा या मजबूरी❓
👉🏻 हज़रत अल्लामा मुफ्ती अमजद अली आज़मी रहीमहुल्लाहु त'आला वलीमा के मुतल्लिक़ लिखते हैं कि दावते सुन्नत के लिये किसी ज़्यादा एहतिमाम की ज़रूरत नहीं अगर दो चार लोगों को कुछ मामूली चीज़ अगर्चे पेट भर कर ना हो अगर्चे दाल रोटी चटनी रोटी हो या इससे भी कम खिला दें तो सुन्नत अदा हो जायेगी और अगर इसकी भी इस्तिताअत ना हो तो कुछ इल्ज़ाम नहीं (यानी ना खिलाये तो कोई हर्ज नही)
(فتاوی امجدیہ ، ج 4، ص 225)
मगर हमें सुन्नत तो अदा करनी नहीं है बल्कि क़र्ज़ ले कर जिस जिस का खाया है उस का क़र्ज़ अदा करना है और दुनिया को दिखाना और राज़ी करना है तो ऐसा वलीमा असल में वलीमा नहीं। कई ऐसे लोग हैं कि उनके पास वलीमा के लिए टेंट (Tent) लगाने के भी पैसे नहीं हैं पर क़र्ज़ ले कर हज़ार की तादाद में लोगों का पेट भरना पड़ता है फिर भी लोगों से यही सुनने को मिलता है कि मुझे पापड़ नही मिला, मुझे मछली का पीस नही मिला, मुझे ज़र्दा नहीं मिला और मुझे कोल्ड ड्रिंक (Cold Drink) नसीब नहीं हुई।
🤲🏻 अल्लाह त'आला हमें सुन्नत पर अमल करने और सादगी की तौफ़ीक़ अता फरमाये।
आमीन
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🔘 दावत देना कितना ज़रूरी ? (एतिदाली बहस)❓
👉🏻 हम मिसालें पेश कर चुके कि सबसे बेहतरीन ज़माने यानी के ज़माने में निकाह की तक़रीब में इस तरह दावत देने हुजूर का रिवाज ना था जैसा कि आज कल हमारे दरमियान राइज है और हम ये भी नहीं कहते कि दावत देना कोई गुमराही है लेकिन इसकी असल हैसियत को समझना ज़रूरी है।
अल्लामा गुलाम रसूल सईदी रहीमहुल्लाहु तआला लिखते हैं कि ये बिलकुल सहीह है कि (रसूलुल्लाह, और सहाबा के दौर में मजलिसे निकाह क़ाइम करने का रिवाज ना था) निकाह करना सुन्नत है और इस सुन्नत के लिये मजलिस और महफिल मुनअकिद करने का रिवाज खैरूल कुरुन (यानी नबी और सहाबा के ज़माने में) ना था (मजीद लिखते हैं जिसका मफहूम ये है कि) ये अमल बुरी बिद्द'अत (गुमराही) नहीं बल्कि मुस्तहब है।
हम कहते हैं कि निकाह में उलमा, मुतल्लिक़ीन, अहबाब, रिश्तेदारों और दोस्तों को दावत देना कोई गुमराही नहीं है और ये तरीके से किया जाये तो अच्छा भी है लेकिन जिस तरह आज कल रिवाज है ये निकाह को मुश्किल बनाने वाली शय है। होना ये चाहिये कि बंदा अपनी हैसियत के मुताबिक़ दावत दे और अगर इस्तिताअत नहीं तो दावत ना दे लेकिन आज कल ये मजबूरी बन चुकी है कि दावत देना है तो देना है, अब चाहे इसके लिये खुद को तकलीफ में क्यों ना डालना पड़े।
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🔘 तकल्लुफ़ भरी दावत का नुक़सान
👉🏻 200 मुल्कों में (यानी दूर दूर के रिश्तेदारों, तमाम दोस्तों, भाईयों, भाईयों के दोस्तों और दोस्तों के भाईयों को) दावत देना फिर उनके लिये 56 भोग (यानी तरह तरह के ख़ानों) का इंतिज़ाम करना किसी जहमत से कम नहीं है।
ऐसी तकल्लुफ़ भरी दावतों से बहुत नुक़सान हुआ है, पहला नुक़सान तो ये कि इसका ऐसा रिवाज चल पड़ा कि छोटे क्या और बड़े क्या, अमीर क्या और गरीब क्या सब इसे लाज़िम समझने लगे।
कुछ तो मजबूर हैं और बाक़ी दिखावे से बाज़ नहीं आते, अगर्चे कुदरत नहीं रखते फिर भी कहते हैं ना कि जब घोड़े ने नाल लगवायी मेढ़की ने भी टांग उठायी, ऐसा ही कुछ हाल हमारे मुसलमानों का है कि दिखावे के चक्कर में मुसीबत को गले लगा लेते हैं। एक नुकसान ये हुआ कि लोगों ने मिलना कम कर दिया और वो इस तरह के शादी बियाह ही नहीं बल्कि इसके इलावा भी मुलाक़ात के साथ तकल्लुफ़ भरी दावतों को जोड़ दिया गया तो अब मुलाक़ात करना भी आसान ना रहा कि मिलेंगे तो फिर इन चीजों के साथ मिलना होगा। हमारे अकाबिरीन ने हमें इससे खबरदार किया था लेकिन हमने जाना नहीं, माना नहीं और फिर जो हुआ वो हमारे सामने है।
हमारे अस्लाफ का तर्जे अमल ये था कि वो खाने में तकल्लुफ़ को पसन्द नहीं करते थे।
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