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😥गौर कीजिए तो यह बात खुल कर सामने आती है कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों की तहज़ीब व तमदुन में गैर शऊरी तौर पर अकसर *हिन्दुओं की रस्मों ने जगह ले ली है शायद उन्हीं रस्मों में से एक मरने के बाद दावत भी है* जो अहले मय्यत बड़े धूम-धाम से करते हैं और बाज़ लोग इसे भी एक काम कहते हैं और बड़े फख्र से कहते हैं कि फलाँ का काम फलाँ ने बड़ी शान से किया।
यह अलफाज़ हिन्दुओं के ही मालूम होते हैं वर्ना इस्लाम में इसकी कोई जगह नहीं।
इसी सिलसिले में एक सवाल के जवाब में आलाहज़रत फ़ाज़िले बरेलवी ने लिखा है कि यह बहुत सी वजहों से नाजाइज़ है।
1. यह दावत खुद नाजाइज़ बिदअते शनीआ व कबीहा है, इसलिए कि ऐसी दावत ख़ुशी के मौके पर होती है नाकि ग़मी में इस किताब में हदीस और बहुत सी किताबों से यह साबित किया है कि शरअ को यह दावत हरगिज़ पसन्द नहीं।
2. इसलिए कि अगर वुरसा में कोई यतीम भी है तो यह और आफत सख़्ततर। इसलिए कि यतीम का नाहक माल खाना पेट में अंगारे भरना है और अगर नाबालिग हो तो उसका माल जाए करना है और यह नाजाइज़ है यह इसलिए कि उसके माल का इख़्तियार किसी को नहीं और अगर वालिद मौजूद नहीं तो गैर के माल को बग़ैर उसकी इजाज़त खर्च करना हुआ और यह भी नाजाइज़ है हाँ अगर फुकरा व मसाकीन के लिए खाना पकवाएं तो हर्ज नहीं बल्कि बेहतर है बशर्ते कि कोई आकिल बालिग अपने माले ख़ास से करे या तर्का से करे तो सब वारिस मौजूद व बालिग़ राज़ी हों।
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💠3. औरतें इकट्ठा होती हैं और नाजाइज़ काम करती हैं मसलन चिल्ला कर रोना पीटना बनावट से मुँह ढाकना वग़ैरा वग़ैरा यह सब काम नौहा है और नौहा हराम है ऐसे मजमे के लिए मय्यत के अजीजों का खाना भेजना भी जाइज़ नहीं।
💠4. अकसर लोगों को इस बुरी रस्म की अदाएगी में मजबूरन तानों से बचने के लिए और जाहिलों की लानत व मलामत के ख़ौफ़ से वुसअत से ज्यादा दावत करनी पड़ती है बल्कि ज्यादातर कर्ज़ की ज़रूरत पड़ती है और देखा यह भी गया है कि बाज़ वक्त सूद पर कर्ज लेते हैं जो ख़ालिस हराम है। यहाँ तक कि मय्यत वाले बेचारे अपने ग़म को भूल कर इस आफते नागाहनी में फंस कर रह जाते हैं, ऐसा तकल्लुफ तो शरीअत ने किसी मुबाह काम के लिए भी पसन्द नहीं किया जबकि यह बुरी रस्म है गर्ज़ अच्छाई का कोई पहलू नहीं मौला तआला मुसलमानों को अक़्ले सलीम अता फरमाए और इस बुरी रस्म से बचें जिसमें दीन व दुनिया दोनों का नुकसान है और तानों का ख़्याल न करें अल्लाह हिदायात दे।
सिर्फ पहले ही रोज़ हमसायों और अज़ीज़ों का इतना खाना पका कर भेजना जिसे अहले मय्यत दो वक़्त खा सकें और इसरार करके खिलाना मसनून हैं अगर उस मेले के लिए भेजने का हरगिज़ हुक्म नहीं, तफसील के लिए अगली पोस्ट पढ़िए.....
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💠 *मसअला :-* क्या फ़रमाते हैं उलमाए दीन इस मसअले में कि अक्सर हिन्दुस्तान में रस्म है कि मय्यत के रोज़े वफ़ात से उसके अइज़्ज़ा व अकारिब व अहबाब की औरतें उसके यहाँ जमा होती हैं इस एहतमाम के साथ जो शादियों में किया जाता है फिर कुछ दूसरे दिन अक्सर तीसरे दिन वापस आती हैं। बाज़ चालीसवाँ तक बैठती हैं। इस मुद्दते इकामत में औरत के खाने पीने पान छालिया का एहतमाम मय्यत के घर वाले करते है जिसकी वजह से अच्छा ख़ासा ख़र्च होता है जो उन पर बार होता है और अगर इस वक़्त उनका हाथ खाली हो तो ज़रूरत से कर्ज लेते हैं। यूँ न मिले तो सूदी निकलवाते हैं अगर न करें तो लोग ताने देते हैं और बदनाम करते हैं। यह जाइज़ है या क्या ? बय्यनू तुजरु यानि बयान करो और उसका अज्र पाओ।
🔅 *अलजवाब :-* सुबहानल्लाह ! ऐ मुसलमान यह पूछता है जाइज़ है या क्या? यूँ पूछ कि यह नापाक रस्म कितने बीह और शदीद गुनाहों सख़्त व शनीअ (बुरी) खराबियों पर मुश्तमिल है यानि इसमें कितनी बुराईयाँ शामिल है
*अव्वलन*
*यह दावत ख़ुद नाजाइज़ बिदअते शनीआ क़बीहा (ख़राब व बुरी ) है।*
इमाम अहमद अपनी मसनद और इब्ने माजा सुनन में हज़रत जरीर इब्ने अब्दुल्लाह बजली रदियल्लाहु तआला अन्हु से रावी :-
"हम गिरोहे सहाबा अहले मय्यत के यहाँ जमा हों और उनके खाना तैयार कराने को मुर्दे की नौहा व मातम करने से शुमार करते थे जिस की हुरमत पर मुतवातर हदीसें हैं । "
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💠 *हदीस :-* _इमाम मुहक्किक अललइतलाक फ़तहुल क़दीर शरहे हिदाया में फ़रमाते हैं_
*“अहले मय्यत की तरफ से खाने की दावत तैयार करनी मना है कि शरा ने दावत खुशी में रखी है न कि ग़मी में और और यह बिदअते शनीआ ( बुरी बिदअत)"*
💠 *हदीस :-* _इसी तरह अल्लामा हसन शुरुम्बुलाली ने मराकिलफलाह में फ़रमाया_
*"अहले मय्यत के खाने की ज़ियाफ़त (मेहमानी) करना मकरूह है इसलिए कि दावत ख़ुशी में दी जाती है न कि ग़मी में और यह बुरी बिदअत है।"*
💠 *हदीस :-* _फतावा खुलासा व फतावा सिराजिया व फ़तावा ज़हीरिया व फुतावा तातारखनिया और फतावा ज़हीरिया से ख़ज़ानतुल मुफ्तीईन किताबुल कराहियह और तातारखनिया से फ़तावा हिन्दिया में करीब करीब इन्हीं अल्फाज़ में है_
*"ग़मी में यह तीसरे दिन की दावत जायज़ नहीं।"*
खुलासा में इतना और है कि दावत खुशी में होती है।
💠 *हदीस :-* _फुतावा इमाम काज़ी ख़ाँ किताब अल हज़ वल इबाहत में है_
*"ग़मी में जियाफत ममनूअ है कि यह अफ़सोस के दिन हैं तो जो ख़ुशी में होता है उनके लायक नहीं"*
💠 *हदीस :-* _तबीनुल हक़ाइक इमाम ज़ैलई में है_
*"मय्यत के लिए तीन दिन बैठने में कुछ मज़ायका (हर्ज) नहीं जबकि किसी मना किए गए काम को न किया जाये जैसे तकल्लुफ़ के तौर पर फर्श बिछाना और मय्यत की तरफ से खानें।"*
💠 *हदीस :-* _इमाम बज़्ज़ाज़ी वजीज़ में फ़रमाते हैं_
*"मय्यत के पहले या तीसरे दिन या हफ़्ता के बाद जो खाने तैयार कराये जाते हैं सब मकरूह व ममनू हैं।"*
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💠 *हदीस :-* _अल्लामा शामी ( रदुल मुहतार) में फ़रमाते हैं मेअराजुद्दराया शरहे हिदाया ने इस मसअले मे बहुत कलाम तवील किया और फ़रमाया_
*सब नामवरी और दिखावे के काम हैं इनसे परहेज़ किया जाए।*
💠 *हदीस :-* _जामेउर्रुमूज़ आखिरुल कराहियह में है_
*“तीन दिन या कम ताज़ियत लेने के लिए मस्जिद में बैठना मना है और इन दिनों में जियाफत भी ममनूअ और उसका खाना भी मना जैसा कि ख़ैरतुल फतावा में तसरीह की।"*
💠 *हदीस :-* _और फतावा अनकारवी और वाक़ि आतुल मुफ़्तीईन में है_
*"तीन दिन दावत और इसका खाना मकरूह है कि दावत तो खुशी में मशरूअ (जाइज़) हुई है।"*
💠 *हदीस :-* _कशफुलगता में है_
*"अहले मय्यत का ताज़ियत करने वालों के लिए दावत करना और उनके लिए खाना पकाना मकरूह है। तमाम रिवायात इस पर मुत्तफिक हैं इसलिए कि उन लोगों को मुसीबतज़दा होने की वजह से खाना तैयार करना दुशवार है।”*
💠 “तो जो रिवाज बिगड़ गया है कि अहले मुसीबत सोम के दिन खाना पकाते हैं और ताज़ियत करने वालों और दोस्तों में तकसीम करते हैं ये नाजाइज़ ग़ैर शरई है और ख़ज़ानतुल मुफ़्तीईन में इसकी सराहत है क्योंकि ये इस सबब से ममनूअ है कि दावत खुशी के वक्त जायज़ है न कि ग़मी के वक़्त और यही वजह जमहूर के नज़दीक मशहूर है।"
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💠 ग़ालिबन वुरसा में कोई बच्चा यतीम या और बच्चा नाबालिग होता है या और वुरसा मौजूद नहीं होते न उनसे इसका इज़्न (इजाजत) लिया जाता है जब तो यह अम्र सख़्त हराम शदीद पर मुज़तमिन होता है यानि शामिल होता है।
_अल्लाह अज़्ज़ावजल्ला फ़रमाता है_ *"बेशक जो लोग यतीमों के माल नाहक खाते हैं बिला शुबा वह अपने पेट में अंगारे भरते हैं और करीब है कि जहन्नम के गहराओ में जाएंगे।"*
माले गैर में बिना इजाज़त तसरूफ यानि खर्च करना खुद नाजाइज़ है।
_अल्लाह तआला का फ़रमान है_
"और आपस में एक दूसरे का माल नाहक़ न खाओ। (कन्जुल ईमान )" खुसूसन नाबालिग का माल जाय करना जिसका इख़्तेयार न ख़ुद उसे है न उसके बाप न उसके वसी (वह शख़्स जिसको वसीयत की गई हो) को और अगर इनमें कोई यतीम हो तो आफ़त सख़्त्तर है। वल अयाजुबिल्लाहि रब्बिल आलमीन।
हाँ अगर मोहताजों को देने को खाना पकवाएं तो हर्ज नहीं बल्कि ख़ूब है। बशर्ते कि कोई आकिल बालिग़ अपने माले ख़ास से करे या तर्का से करें तो सब वारिस मौजूद व बालिग़ राज़ी हों।
💠 *हदीस :-* _ख़ानिया व बज़्ज़ाज़िया व तातारख़ानिया व हिन्दिया में है_
"अगर फुकरा के लिए खाना तैयार किया तो खूब है जबकि तमाम वुरसा बालिग़ हों और अगर वुरसा में कोई बच्चा हो तो तर्फे से खाना तैयार न कराए
नीज़ फतावा काज़ी खाँ में है :- “अगर मय्यत का वली फुकरा के लिए खाना तैयार करे तो बेहतर ये कि वुरसा में कोई नाबालिग हो तो तर्के के माल से ऐसा न करे।"
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💠 *"ये औरतें कि जमा होती हैं मकरूह अफआल करती हैं मसलन चिल्ला कर रोना पीटना बनावट से मुँह ढांकना और यह सब नेहायत (नौहा करना यानि बयान करके रोना) है और नेहायत हराम है ऐसे मजमे के लिए मय्यत के अज़ीज़ों और दोस्तों को भी जाइज़ नहीं कि खाना भेजें कि गुनाह की इमदाद (मदद ) होगी।"*
_अल्लाह तआला फ़रमाता है_
*“और गुनाह और ज्यादती पर बाहम मदद न दो।"*
📚 (कन्जुल ईमान)
*नाकि लोगों का अहले मय्यत का खाने और दावत का इन्तेज़ाम करना कि सिरे से नाजाइज़ है तो इस नाजाइज़ मजमे के लिए नाजाइज़तर होगा।*
_कशफुलग़ता में है_
*"दूसरे और तीसरे दिन अहले मय्यत के लिए खाना बनाना जबकि नौहा करने वालों का मजमा हो तो मकरूह है इसलिए कि उनकी गुनाह पर मदद करना है।”*
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💠 अक्सर लोगों को इस बुरी रस्म की वजह से अपनी ताकत से ज़्यादा दावत करनी पड़ती है यहाँ तक कि मय्यत वाले बेचारे अपने ग़म को भूलकर इस आफत में मुब्तिला होते हैं कि इस मेले के लिए खाना, पान छालिया कहाँ से लायें और बारहा ज़रूरत कर्ज़ लेने की पड़ती।
एैसा तकल्लुफ़ शरा को किसी अम्रे मुबाह के लिए भी जिन्हारा पसन्द नहीं यानि किसी जाइज़ काम के लिए भी इतना तकल्लुफ़ पसन्द नहीं नाकि एक रस्मे ममनूआ के लिए।
फिर इसकी वजह से जो दिक्कतें पड़ती हैं खुद ज़ाहिर हैं फिर अगर कर्ज सूदी मिला तो हरामे ख़ास हो गया और मआज़ अल्लाह लानते इलाही से पूरा हिस्सा मिला कि बे-ज़रूरत शरिआ सूद देना भी सूद लेने के मिस्ल बाइसे लानत है जैसा कि सही हदीस में फ़रमाया।
ग़र्ज़ इस रस्म की शनाअत पे मुमानअत में शक नहीं। अल्लाह *अज़्ज़ावजल्ला मुसलमानों को तौफ़ीक़ बख़्शे कि कतअन एैसी बुरी रस्मों जिनसे इन के दीन-ओ- दुनिया का नुकसान है तर्क कर दें (छोड़ दे) और बेहूदा तानों का लिहाज़ न करें।*
(वल्लाहुल हादी यानि अल्लाह तआला हिदायत देने वाला है)
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💠 *तम्बीह :-* अगर्चे सिर्फ एक दिन यानि पहले ही रोज़ अज़ीज़ों हमसायों को मसनून है कि अहले मय्यत के लिए इतना खाना पकवाकर भेजें जिसे वह दो वक्त खा सकें और यह खाना इसरार करके उन्हें खिलायें मगर यह खाना सिर्फ अहले मय्यत ही के काबिल होना सुन्नत है। इस मेले के लिए भेजने का हरगिज़ हुक्म नहीं है और इनके लिए भी फ़क्त पहले ही दिन का हुक्म है आगे नहीं।
कशफुलगता में है :- "मुस्तहब है कि मय्यत के करीबी और पड़ोसी लोग खाना खिलायें जो उनका पेट भर दे, एक दिन रात और कोशिश करके उनको खिलायें और अहले मय्यत के अलावा दूसरे को ये खाना मकरूह है।"
आलमगीरी में है :-
अहले मुसीबत की तरफ़ खाना ले जाना और उनके साथ मिलकर खाना पहले दिन जाइज़ है। उनके तजहीज़ व तकफीन में मशगूल होने के सबब और उसके बाद मकरूह है। इसी तरह ताताराख़निया में है।
📚 (फ़तावा रजविया जिल्द चहारुम सफा 138-140)
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💠 *मसअला :-* मय्यत के घर का खाना जो अहले मय्यत सोम (तीजा) तक बतौर मेहमानी के पकाते हैं और सोम के चने बताशों का लेना कैसा है
🔅👉🏻 *अलजवाब :-* मय्यत के घर का वह खाना तो अलबत्ता बिला शुबह नाजाइज़ है जैसा कि फ़क़ीर ने अपने फतवे में मसअला बयान किया और सोम के चने, बताशे, कि बग़र्ज़े मेहमानी नहीं मंगाये जाते बल्कि सवाब पहुँचाने के इरादे से होते हैं यह इस हुक्म में दाखिल नहीं न मेरे उस फतवे में इन की निसबत कुछ ज़िक्र है। ये अगर मालिक ने सिर्फ मौहताजों के देने के लिए मंगाये और यही उसकी नीयत है तो गनी को उन का भी लेना नाजाइज़ और अगर उसने आम हाज़रीन पर तकसीम के लिए मंगाये हैं तो अगर ग़नी भी ले लेगा तो गुनाहगार न होगा। और यहाँ बहुक्मे उर्फ व रिवाज आम हुक्म यही है कि वह ख़ास मसाकीन के लिए नहीं होते तो ग़नी को भी लेना नाजाइज़ नहीं। अगरचे ऐहतराज़ यानि बचना ज़्यादा पसन्दीदा और इसी पर हमेशा से इस फ़क़ीर का अमल है।
वल्लाह तआला आलम।
📚 _(फ़्तावा रजविया सफा 138)_
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💠 *मसअला :-* हज़रत की ख़िदमत में अर्ज़ है कि बुजुगों के मज़ार पर जायें तो फ़ातिहा किस तरह पढ़ा करें और फ़ातिहा में कौन-कौन चीजें पढ़ा करें।
🔅👉🏻 *अलजवाब :-* हाफ़िज़ साहब करम फ़रमा अस्सलामु अलैकुम, मज़ारात शरीफ़ पर हाज़िर होने में पांयती की तरफ से जायें और कम - अज़ - कम चार हाथ के फासले पर मवाजेह (मुकाबिल यानि सामने) में खड़ा हो, और मुतवस्सत (दरमियानी) आवाज़ बाअदब सलाम अर्ज करे।
अस्सलामु अलैकुम या सय्यदी वरहमतुल्लाह बराकातुह फ़िर दुरूदे गौसिया तीन बार, अलहम्द शरीफ़ एक बार, आयतल कुर्सी एक बार, सूरा - ए - इख़लास सात बार, फिर दुरू गौसिया सात बार और वक़्त फुरसत दे तो सूरा - ए - यासीन और सूरा-ए-मुल्क भी पढ़ कर अल्लाह अज़्ज़ावजल्ला से दुआ करे कि इलाही इस किरात पर इतना सवाब दे जो तेरे करम के काबिल है न इतना जो मेरे अमल के काबिल है और इसे मेरी तरफ़ से इस बन्दा मक़बूल को नज़ पहुँचा फिर अपना जो मतलब जाइज़ शरई हो उसके लिए दुआ करे और साहिबे मज़ार की रूह को अल्लाह अज़्ज़ावजल्ला की बारगाह में अपना वसीला करार दे फिर इसी तरह सलाम करके वापस आये।
मज़ार को न हाथ लगाये, न बोसा दे, और तवाफ़ बिलइत्तेफ़ाक़ नाजाइज़ है, और सजदा हराम है, वल्लाह तआला आलम।
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🔳 *दावत ए मय्यत* 🔳
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💠 *इसाले सवाब के चन्द तरीके और मय्यत के सवाब के फायदे के चन्द काम*
🔅इस्लाम की सही मालूमात और शरई मसाइल से नावाकफ़ियत की बिना पर अवाम ने अपने मुर्दों के इसाले सवाब के लिए धूम-धाम से अइज़्ज़ा व अहबाब ( रिश्तेदार वग़ैरा) और अग़निया (अमीर लोग) की आम दावत की जिस बुरी रस्म को रिवाज दे डाला है।
*इस किताब ने दलाएल से साबित कर दिया कि यकीनन यह नाजाइज़ और मुर्दों के लिए गैर मुफीद है।*
इसका पहला एडीशन जब छप कर सामने आया तो लोग हैरतज़दा होकर फटी नज़रों से देखते रह गये कि अब तक हम किस ग़लतफहमी का शिकार और कैसे अन्धेरे में थे, रुपये बरबाद हुए मशक्कतें बर्दाशत कीं और मकसद भी हाथ न आया। ऐसे बहुत से लोग जो अब तक इस ग़लत रस्म के पाबन्द थे, जब उन्हें मालूम हुआ कि यह रस्म नाजाइज़ है तो सवाल करने लगे कि आखिर *अपने मुर्दों के लिए इस के अलावा क्या क्या कर सकते हैं?*
लिहाज़ा अवाम की आसानी के लिए यहाँ चन्द एैसे तरीके बयान किये जा रहे हैं जो इस दुनिया से जाने वाले मुसलमानों के लिए सिर्फ तोहफए आख़िरत ही नहीं दीन की तबलीग़ और इस्लामी अहकाम की इशाअत का भी बेहतरीन ज़रिया और सदकए जारिया है।
(1) किसी दीनी मदरसा में अपने मुर्दों की तरफ से कोई तामीरी काम कर डालें या तफ़सीर व हदीस और फिक्ह वगैरह की ज़रूरी किताबें खरीद कर वक्फ कर दें।
(2) दीनी मदारिस के गरीब व नादार तलबा की किसी भी तरह इमदाद करें खुसूसन उनके खाने, कपड़े और दर्सी किताबों का इन्तेजाम करें या मदरसों के मतबक में गल्ला वगैरह दें।
( 3 ) दीनी किताबें ख़रीद कर अपनी क़रीबी लाइब्रेरी में वक्फ कर दें ताकि अवाम की पैनी मालूमात में इजाफा हो।
(4) अपने ख़र्च से कोई दीनी व इसलामी किताब छपवाकर मुफ़्त तकसीम करें जिस से मुआशरे और अवाम की इसलाह हो।
(5) खुद यही किताब, दावते मय्यत छपवाकर ज़्यादा से ज़्यादा मुफ़्त तक्सीम करें ताकि रस्मे बद से मुसलमान बचें और दीगर कारे ख़ैर में हिस्सा लें।
_📮 *पोस्ट ज़ारी रहेगी इन्शा अल्लाह*_
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