बुधवार, 14 जून 2023

पर्दे के बारे में सवाल जवाब


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🤔 *सवाल 01*➖ औरत के लफ्ज़ी माना क्या हैं❓

👉🏻 *जवाब*➖ औरत के लुगवी माना हैं *"छुपाने की चीज़।"* 

अल्लाह के महबूब ﷺ का फ़रमाने आलीशान है कि औरत, "औरत" (यानी छुपाने की चीज़) है जब वोह निकलती है तो उसे शैतान झांक कर देखता है। (यानी उसे देखना शैतानी काम है।

🤔 *सवाल 02* ➖ क्या पर्दा इस दौर में भी ज़रूरी है❓

👉🏻 *जवाब* ➖ जी हां । चन्द बातें अगर पेशे नज़र रहें तो ! पर्दे के मसाइल समझने में आसानी रहेगी। पारह 22 सूरतुल अहजाब की आयत नम्बर 33 में पर्दे का हुक्म देते हुए फरमाया की

🔅तरजमए कन्जुल ईमान : और अपने घरों में ठहरी रहो और बे पर्दा न रहो जैसे अगली जाहिलिय्यत की बे पर्दगी।

🌀ख़लीफ़ए आला हज़रत सदरुल अफ़ाज़िल हज़रते अल्लामा मौलाना सय्यद मुहम्मद नईमुद्दीन मुरादआबादी इस के तहूत फ़रमाते हैं : "अगली जाहिलिय्यत से मुराद क़ब्ले इस्लाम का ज़माना है, उस ज़माने में औरतें इतराती निकलती थीं, अपनी जीनत व महासिन ( या'नी बनाव सिंघार और जिस्म की खूबियां म-सलन सीने के उभार वग़ैरा) का इजहार करती थीं कि गैर मर्द देखें। लिबास ऐसे पहनती थीं, जिन से जिस्म के आज़ा अच्छी तरह न ढकें।"

📚 _(खजाइनुल इरफान, स. 673)_ 

👉🏻अफसोस ! मौजूदा दौर में भी ज़मानए जाहिलिय्यत वाली बेपर्दगी पाई जा रही है। यकीनन जैसे उस ज़माने में पर्दा ज़रूरी था वैसा ही अब भी है।

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🤔 *सवाल 03*➖ बे पर्दगी का क्या वबाल है❓

👉🏻 *जवाब*➖ औरत की बे पर्दगी मूजिबे गु-ज़बे इलाही और सबब ए तबाही है। इस सवाल का जवाब पारह 18 सूरए नूर की आयत नम्बर 31 के इस हिस्से की तफ्सीर में मुला-हज़ा हो चुनाचे इर्शादे इलाही होता है :-

🔅तर-ज-मए कन्ज़ुल ईमान : और ज़मीन पर पाउं ज़ोर से न रखें कि जाना जाए उन का छुपा हुवा सिंगार।


👉🏻बयान कर्दा आयते मुबारका के तहूत मुफस्सिरे कुरआन, ख़लीफ़ए आ'ला हज़रत, सदरुल अफ़ाज़िल हज़रते अल्लामा मौलाना सय्यिद मुहम्मद नईमुद्दीन मुरादआबादी फ़रमाते हैं :- _यानी औरतें घर के अन्दर चलने फिरने में भी पाउं इस क़दर आहिस्ता रखें कि उन के ज़ेवर की झन्कार न सुनी जाए._ 


🔅मस्अला :- इसी लिये चाहिये कि औरतें बाजेदार झांझन न पहनें। 

हदीस शरीफ़ में है *“अल्लाह उस क़ौम की दुआ नहीं क़बूल फरमाता जिन की औरतें झांझन पहनती हों।"* 

इस से समझना चाहिये कि जब ज़ेवर की आवाज़ अ-दमे क़बूले दुआ (यानी दुआ कबूल न होने) का सबब है तो ख़ास औरत की (अपनी) आवाज़ (का बिला इजाज़ते शर-ई गैर मर्दों तक पहुंचना) और इस की बे पर्दगी कैसी मूजिबे गजबे इलाही होगी, पर्दे की तरफ़ से बे परवाई तबाही का सबब है। 

📚(खज़ाइनुल इरफान, स. 566)


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🤔 *सवाल 04*➖ हदीस में जिस बाजेदार झांझन पहनने की मुमा-न-अत की गई इस से कौन सा ज़ेवर मुराद है❓

👉🏻 *जवाब*➖ इस से घुंगुरू वाला ज़ेवर मुराद है। ऐसे ज़ेवर पहनने वालियों से मु-तअल्लिक एक हदीस में इर्शाद होता है : अल्लाह बाजेदार झांझन की आवाज़ को ऐसे ही ना पसन्द फ़रमाता है जिस तरह गिना की आवाज़ को ना पसन्द फ़रमाता है और उस का हश्र जो ऐसे जेवर पहनती हो वैसा ही करेगा जैसा कि मज़ामीर वालों का होगा, कोई औरत बाजेदार झांझन नहीं पहनती मगर येह कि उस पर लानत बरसती है।


 *हर घुंगुरू के साथ शैतान होता है।* 

हज़रते सख्यिदुना अब्दुल्लाह बिन जुबैर फरमाते हैं कि हमारे यहां की लौंडी हज़रते जुबैर की लड़की को हज़रते उमर के पास लाई और उस के पाउ में घुंगुरू थे। हजुरते सख्यिदुना उमरे फारूक ने उन्हें काट दिया और फ़रमाया कि मैं ने रसूलुल्लाह ﷺ से सुना है कि हर घुंगुरू के साथ शैतान होता है।


 *झांज वाले घर में फ़िरिश्ते नहीं आते* 

हज़रते सय्यदतुना बुनाना फरमाती हैं कि वोह उम्मुल मुअमिनीन हज़रते सय्यिदतुना आइशा सिद्दीका के पास थीं कि आप की ख़िदमत में एक बच्ची लाई गई जिस पर झांझन थे जो आवाज़ कर रहे थे आप बोलीं कि इसे मेरे पास हरगिज़ न लाओ मगर इस सूरत में कि इस के झांझन तोड़ दिये जाएं मैं ने रसूलुल्लाह ﷺ को फ़रमाते सुना कि उस घर में फिरिश्ते नहीं आते जिस में झांज हो।


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🤔 *सवाल 05*➖ क्या औरत के लिये आवाज़ वाला ज़ेवर पहनना बिल्कुल मन्अ है❓

👉🏻 *जवाब*➖ नहीं ऐसा हरगिज़ नहीं, इमाम अहमद रजा खान फ़तावा रजविय्या जिल्द 22 सफ़ा 127 और 128 पर फ़रमाते हैं बल्कि औरत का बा वस्फ़े कुदरत बिल्कुल वे जेवर रहना मक्रूह है कि मर्दों से तशब्बोह (मुशा-बहत) है। 

हदीस में है की रसूलुल्लाह ﷺ ने मोला अली से फरमाया

तरजमा : ऐ अली ! अपने घर की ख़वातीन को हुक्म दो कि ज़ेवर के बिगैर नमाज न पढ़ें।

उम्मुल मुअमिनीन हज़रते सिद्दीका औरत का बे ज़ेवर नमाज़ पढ़ना मकरूह (यानी ना पसन्दीदा) जानतीं और फ़रमात कुछ न पाए तो एक डोरा ही गले में बांध ले।

आला हज़रत बजने वाले जेवर के इस्तिमाल के मु-अल्लिक इर्शाद फ़रमाते हैं : बजने वाला ज़ेवर औरत के लिये इस हालत में जाइज़ है कि ना महूरमों मसलन, खाला मामूं चचा फूफी के बेटों, जेठ, देवर, बहनोई के सामने न आती हो न उस के ज़ेवर की झन्कार (यानी बजने की आवाज) ना महरम तक पहुंचे।

अल्लाह त'आला फ़रमाता है, तरजमए कन्जुल ईमान *और अपना सिंगार जाहिर न करें मगर अपने शोहरों : पर* और फ़रमाता है तर-ज-मए कन्जुल ईमान : *ज़मीन पर पाउं ज़ोर से न रखें कि जाना जाए उनका छुपा हुवा सिंगार* 

फ़ाएदा : येह आयते करीमा जिस तरह ना महरम को गहने (यानी ज़ेवर) की आवाज़ पहुंचना मन्अ फ़रमाती है यूंही जब आवाज़ न पहुंचे (तो) इस का पहनना औरतों के लिये जाइज़ बताती है धमक कर पाउं रखने को मन्अ फ़रमाया न कि पहनने को।


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🤔 *सवाल 05*➖ औरतों का अपने शोहर की रिज़ा मन्दी के लिये ज़ेवर पहनना कैसा❓

👉🏻 *जवाब*➖ कारे सवाब है। मेरे आका आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत, मौलाना शाह इमाम अहमद रजा खान फ़रमाते हैं : *औरत का अपने शोहर के लिये गहना (ज़ेवर) पहनना, बनाव सिंगार करना बाइसे अज्रे अज़ीम और उस के हक़ में नमाज़े नफ़्ल से अफ्ज़ल है।* बा'ज सालिहात (यानी नेक बीबियां) कि खुद और उन के शोहर दोनों औलियाए किराम से थे हर शब बा' दे नमाज़े इशा पूरा सिंगार कर के दुल्हन बन कर अपने शोहर के पास आतीं अगर उन्हें अपनी, तरफ हाजत पातीं हाज़िर रहतीं वरना ज़ेवर व लिबास उतार कर मुसल्ला बिछातीं और नमाज़ में मश्गूल हो जातीं। और दुल्हन को सजाना तो सुन्नते क़दीमा और बहुत अहादीस से, साबित है बल्कि कुंवारी लड़कियों को ज़ेवर व लिबास से आरास्ता रखना कि उन की मंग्नियां आएं, येह भी सुन्नत है। (फतावा रजविय्या, जि. 22, स. 126 )

🔅 *मगर याद रहे ! बनाव सिंघार घर की चार दीवारी में वोह भी सिर्फ़ महारिम के सामने हो, उन को बना संवार कर गैर मर्दों के सामने बे पर्दा लिये लिये फिरना हराम और जहन्नम में ले जाने वाला काम है।* 


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🤔 *सवाल 06*➖ सित्रे औरत किसे कहते हैं❓

👉🏻 *जवाब*➖सित्र के लुगवी माना हैं छुपाना, ढांपना। जिन आ'जा का छुपाना ज़रूरी है उन को औरत कहते हैं और मज्मूई तौर पर छुपाने के इस अमल को "सित्रे औरत" (यानी पोशीदा आ'ज़ा का छुपाना) कहते हैं। हमारे उर्फ़ में उन मख़्सूस आ'जा को भी सत्र कहते हैं जिन का छुपाया जाना जरूरी है। सदरुश्शरीअह, बदरुत्तरीकह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फ़रमाते हैं सित्रे औरत (यानी सित्र छुपाना) हर हाल में वाजिब है ख़्वाह नमाज़ में हो या नहीं, तन्हा हो या किसी के सामने बिला किसी गु-रजे सीह के तन्हाई में भी (सित्र) खोलना जाइज़ नहीं और लोगों के सामने या नमाज़ में तो सित्र (छुपाना) बिल इज्माअ फ़र्ज़ है।


सित्र के मु-तअल्लिक अहकाम की दो अक्साम हैं।

🔅1) नमाज़ में मर्द व औरत के लिये सित्र के अहकाम

🔅2) गैरे नमाज़ में सित्र के अहकाम कि कौन किस किस के जिस्म के कौन से हिस्से पर नज़र कर सकता है।


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🤔 *सवाल 07*➖ मर्द के जिस्म का कौन सा हिस्सा सित्र है और नमाज़ में इस के लिये सित्र के क्या अहकाम हैं❓

👉🏻 *जवाब*➖मर्द के लिये नाक के नीचे से घुटनों के नीचे तक (सित्र) औरत है यानी इस का छुपाना फर्ज है। नाफ़ इस में दाखिल नहीं और घुटने दाख़िल हैं। इस जमाने में बहुतेरे ऐसे हैं कि तहबन्द या पाजामा इस तरह पहनते हैं कि पेडू (या'नी नाफ के नीचे) का कुछ हिस्सा खुला रहता है और अगर कुरते वग़ैरा से इस तरह छुपा हो कि जिल्द (यानी खाल) की रंगत न चमके तो खैर वरना हराम है और नमाज़ में चौथाई की मिक्दार खुला रहा तो नमाज़ न होगी और बाज़ बेबाक ऐसे हैं कि लोगों के सामने घुटने बल्कि रान तक खोले रहते हैं येह भी हराम है और इसकी आदत है तो फ़ासिक हैं।


एहराम पहनने वाले बा'ज हाजी भी बे एहतियातियां करते हैं और उन के सित्र के बा'ज़ हिस्से जैसा कि नाफ़ के नीचे का कुछ हिस्सा और घुटने बल्कि रानों के बाज़ हिस्से सब के सामने ज़ाहिर होते रहते हैं, उन को तौबा करनी और आयिन्दा एहतियात करनी लाज़िमी है नीज़ इस से नीकर (KNICKER) पहन कर मुकम्मल घुटने और रानों का कुछ हिस्सा खुला रख कर घूमने वाले अपराद भी सबक हासिल करें और इस से तौबा करें, न खुद गुनहगार हों न दूसरों को बद निगाही की दावत दें। अगर कोई नीकर पहने हुए हो तो दूसरे मुसलमान के लिये लाज़िम है कि उस के खुले हुए घुटनों और रानों को देखने से अपने आप को बचाए।


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🤔 *सवाल 08*➖ औरतों के सित्र के बारे में भी मालूमात फ़राहम कर दीजिये और येह भी बता दीजिये कि इन को नमाज़ में क्या क्या छुपाना होगा❓

👉🏻 *जवाब*➖आज़ाद औरतों (गुलाम व लौंडी का दौर ख़त्म हुवा आज कल तमाम औरतें आज़ाद हैं) और खुन्सा मुश्किल (यानी जिस में मर्द व औरत दोनों की अलामतें पाई जाएं और येह साबित न हो कि मर्द है या औरत ) के लिये सारा बदन औरत (या 'नी छुपाने की जगह ) है। सिवा मुंह की टिकली और हथेलियों और पाउं के तल्वों के, सर के लटके हुए बाल और गरदन और कलाइयां भी औरत (या 'नी छुपाने की चीज़) हैं (और) इन का छुपाना' भी फ़र्ज़ है। बा' उलमा ने पुश्ते दस्त (या' नी हथेली की पीठ) और (पाउं के) तल्वों को औरत (यानी छुपाने की चीज़) में दाखिल नहीं किया। इतना बारीक दुपट्टा जिस से बाल की सियाही (यानी कालक) चमके, औरत ने ओढ़ कर नमाज़ पढ़ी, न होगी। जब तक उस पर कोई ऐसी चीज़ न ओढ़े जिस से बाल वगैरा का रंग छुप जाए।


🤔 *सवाल 09*➖ अगर थोड़ा सा सित्र खुला रह गया तो क्या नमाज़ हो जाएगी❓

👉🏻 *जवाब*➖हजुरते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फरमाते हैं: "वाज़ेह रहे कि जिन आ'ज़ा का सित्र (यानी छुपाना) फ़र्ज़ है उन में कोई उज्व चौथाई से कम खुल गया नमाज़ हो गई और अगर चौथाई व खुल गया और फ़ौरन छुपा लिया जब भी हो गई और अगर ब क़दर एक रुक्न यानी तीन मर्तबा सुब्हानअल्लाह कहने के खुला रहा या बिल कुस्द खोला अगर्चे फ़ौरन छुपा लिया नमाज़ जाती रही। अगर चन्द आज़ा में कुछ कुछ खुला रहा कि हर एक उस उच्च की चौथाई से कम है मगर मूआ इन का उन खुले हुए आ' जा में जो सबसे छोटा है उस की चौथाई के बराबर है नमाज़ न हुई मसलन औरत के कान का नवां हिस्सा और पिंडली का नवां हिस्सा खुला रहा तो मजमूआ दोनों का कान की चौथाई की क़दर ज़रूर है ( लिहाज़ा) नमाज़ जाती रही।


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🤔 *सवाल 10*➖ मर्द का सित्र कहां से कहां तक है❓

👉🏻 *जवाब*➖मर्द का सित्र नाफ़ के ऐन नीचे से ले कर घुटनों समेत है, नाफ सित्र में शामिल नहीं सदरुश्शरीअह, बदरुतरीकह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आ'ज़मी फ़रमाते हैं : मर्द, मर्द के हर उस हिस्सए बदन की तरफ़ नज़र कर सकता है सिवा उन आज़ा के जिन का सित्र (या 'नी छुपाना) ज़रूरी है वोह नाफ़ के नीचे से घुटने के नीचे तक है कि इस हिस्सए बदन का छुपाना फर्ज है। जिन आ'जा का छुपाना जरूरी है उन को औरत कहते हैं। कि किसी को घुटना खोले हुए देखे तो मन्अ करे और रान खोले हुए देखे तो सख्ती से मन्अ करे और शर्मगाह खोले हुए हो तो उसे सजा दी जाएगी

याद रहे ! सज़ा देना अवाम का नहीं हुक्काम का काम है । ज़रूरतन बाप औलाद पर, उस्ताज़ शागिर्द पर, पीर मुरीद पर सख्ती भी कर सकता है और सजा भी दे सकता है। चुनान्चे बहारे शरीअत जिल्द 1 सफहा 482 पर है : अगर औरते ग़लीज़ (या'नी आगे और पीछे के मख़्सूस हिस्से) खोले हुए है तो जो मारने पर क़ादिर हो मसलन बाप या हाकिम वोह मारे।


🤔 *सवाल 11*➖ क्या दूध पीते बच्चे और बच्ची के भी घुटने और रानें वगैरा छुपाना जरूरी हैं❓

👉🏻 *जवाब*➖जी नहीं, दूध पीता बच्चा पूरा ही नंगा हो तब भी उस की तरफ़ नज़र करने में कोई हरज नहीं। सदरुश्शरीअह, बदरुत्तरीक़ह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फ़रमाते हैं बहुत छोटे बच्चे के लिये औरत नहीं यानी उस के बदन के किसी हिस्से को छुपाना फ़र्ज़ नहीं, फिर जब कुछ बड़ा हो गया तो उसके आगे पीछे का मक़ाम छुपाना ज़रूरी है। फिर जब और बड़ा हो जाए दस बरस से बड़ा हो जाए तो उसके लिये बालिग का सा हुक्म है।


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🤔 *सवाल 12*➖ बहुत छोटे बच्चे की रान को छूना कैसा❓

👉🏻 *जवाब*➖छू सकता है। हां अगर देखने और छूने से शहवत आती हो तो अब एक दिन के बच्चे को भी न देख सकता है न छू सकता है। आज कल हालात बहुत नाजुक हो गए हैं दो या तीन साल की बच्चियों के साथ भी गन्दे काम होने की ख़बरें सुनी गई हैं।


🤔 *सवाल 13*➖ अम्रद को देखना जाइज़ है या नहीं ?❓

👉🏻 *जवाब*➖तफ्सील बयान करते हुए सदरुश्शरीगृह, बदरुत्तरीकह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फ़रमाते हैं: लड़का जब मुराहिक (यानी दस बरस की उम्र के बाद बालिग होने के क़रीब) हो जाए और वोह खूबसूरत न हो तो नज़र के बारे में इस का वोही हुक्म है जो मर्द का है और खूब सूरत हो तो औरत का जो हुक्म है वोह इस के लिये है यानी शहवत के साथ उस की तरफ़ नज़र करना हराम है और शहवत न हो तो उस की तरफ़ नज़र भी कर सकता है और उस के साथ तन्हाई भी जाइज़ है। शहवत न होने का मतलब यह है कि उसे यकीन हो कि नज़र करने से शहवत न होगी और अगर इस का शुबा भी हो तो हरगिज़ नज़र न करे बोसे की ख़्वाहिश का पैदा होना भी शाहवत की हद में दाखिल है।


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🤔 *सवाल 14*➖ क्या औरत, औरत के बदन के हर हिस्से को देख सकती है❓

👉🏻 *जवाब*➖जी नहीं। औरत को औरत का नाफ़ के नीचे से ले कर, घुटनों समेत का हिस्सा देखने की इजाजत नहीं चुनान्चे सदरुश्शरीअह, बदरुत्तरीक़ह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फ़रमाते. हैं: औरत का औरत को देखना, इस का वोही हुक्म है जो मर्द को मर्द की तरफ़ नज़र करने का है या' नी नाफ़ के नीचे से घुटने तक नहीं देख सकती बाक़ी आजा की तरफ़ नज़र कर सकती है बशर्ते कि शह्वत का अन्देशा न हो। औरते सालिहा (यानी हूँ नेक बीबी) को येह चाहिये कि अपने को बदकार (या 'नी जानिया व फाहिशा) औरत के देखने से बचाए यानी उस के सामने दुपट्टा वगैरा न उतारे क्यूं कि वोह उसे देख कर मर्दों के सामने उस की शक्लो सूरत का ज़िक्र करेगी।


🤔 *सवाल 15*➖ औरत गैर मर्द को देख सकती है या नहीं❓

👉🏻 *जवाब*➖न देखने में आफिय्यत ही आफिय्यत है। अलबत्ता देखने में जवाज़ की सूरत भी है मगर देखने से क़ब्ल अपने दिल पर खूब खूब और खूब गौर कर ले कहीं येह देखना गुनाहों के गार में न धकेल दे। 

फु-कहाए किरामजवाज़ की सूरत बयान करते हुए फ़रमाते हैं: "औरत का मर्दे अजनबी की तरफ़ नज़र करने का वोही हुक्म है जो मर्द का मर्द की तरफ़ नज़र करने का है और येह उस वक्त है कि औरत को यकीन के साथ मालूम हो कि उस की तरफ़ नज़र करने से शह्वत नहीं पैदा होगी और अगर इस का शुबा भी हो तो हरगिज़ नज़र न करे।"


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🤔 *सवाल 16*➖ क्या ऐसे ममालिक जहां कुफ़्फ़ार की अक्सरिय्यत होती है वहां काफ़िरा दाई से ज़चगी करवा सकते हैं या नहीं❓

👉🏻 *जवाब*➖नहीं करवा सकते। जो मुसल्मान ऐसे ममालिक में रहते हैं। उन को पहले से ऐसे अस्पताल जेहन में रखने चाहिएं जहां लेडी डॉक्टर्स, नर्सों और दाइयां मुसल्मान दस्तयाब हो जाती हों। अगर इमरजन्सी हो जाए और मुसल्मान दाई (MID WIFE) की फ़राहमी मुम्किन न हो और मुतबादिल कोई सूरत न हो तो सख्त मजबूरी की हालत में काफ़िरा से येह ख़िदमत ले ली जाए। 

सदरुश्शरी अह, बदरुत्तीकृह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फ़रमाते हैं: मुसल्मान औरत को येह भी हलाल नहीं कि काफ़िरा के सामने अपना सित्र खोले (मुसल्मान औरत का काफ़िरा से उसी तरह पर्दा है जिस तरह अजनवी मर्द से काफिरा के लिये औरत के बदन के वोह तमाम हिस्से सित्र हैं जो कि एक अजनबी मर्द के लिये हैं) घरों में काफिरा औरतें आती हैं और बीबियां उन के सामने इसी तरह मवाज़ेए सित्र खोले हुए होती हैं जिस तरह मुस्लिमा के सामने रहती हैं उन को इस से इज्तिनाब (बचना) लाज़िम है। अक्सर जगह दाइयां (MID WIFES) काफिरा होती हैं और वोह बच्चा जनाने की खिदमत अन्जाम देती हैं, अगर मुसल्मान दाइयां मिल सकें तो काफ़िरा से हरगिज़ येह काम न कराया जाए कि काफ़िरा के सामने इन आज़ा के खोलने की, इजाज़त नहीं।


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🤔 *सवाल 17*➖ क्या कोई ऐसा हिस्सए बदन भी है जिन की तरफ मियां बीवी नज़र नहीं कर सकते❓

👉🏻 *जवाब*➖नहीं, ऐसा कोई हिस्सए बदन नहीं । सदरुश्शरीअह, बदरुत्तरीक़ह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फरमाते हैं शोहर अपनी औरत की एड़ी से चोटी तक हर उज्व की तरफ़ नज़र कर सकता है. शहवत और बिला शहवत दोनों सूरतों में देख सकता है। इसी तरह ये दोनों किस्म की औरतें (या 'नी बीवी और बांदी मगर अब बांदी का दौर नहीं रहा) उस मर्द के हर उज्व को देख सकती है। हां बेहतर येह है कि (दोनों में से कोई भी एक दूसरे के मकामे मख़्सूस की तरफ़ नज़र न करे क्यूं कि इस से निस्यान पैदा होता (यानी हाफ़िज़ा कमज़ोर होता) है और नज़र में भी जो'फ पैदा होता (यानी निगाह भी कमज़ोर हो जाती है।


🤔 *सवाल 18*➖ मर्द अपने महारिम मसलन मां, बहन के किन आज़ा की तरफ़ नज़र कर सकता है❓

👉🏻 *जवाब*➖महारिम के बदन के बाज़ हिस्सों को देख सकता है और बाज को नहीं देख सकता। इस की तफ्सील बयान करते हुए सदरुश्शरीअह, बदरुत्तरीक़ह हज़रते अल्लामा मौलाना मुफ्ती मुहम्मद अमजद अली आज़मी फ़रमाते हैं जो औरत उस के महारिम में हो उस के सर, सीना, पिंडली, बाजू, कलाई, गरदन, क़दम की तरफ नज़र कर सकता है जब कि दोनों में से किसी को शहवत का अन्देशा न हो। महारिम के पेट, पीठ और रान की तरफ़ नज़र करना ना जाइज़ है। इसी तरह करवट और घुटने की तरफ़ नज़र करना भी ना जाइज़ है। (येह हुक्म उस वक्त है जब जिस्म के इन हिस्सों पर कोई कपड़ा न हो और अगर येह तमाम आ'जा मोटे कपड़े से छुपे हुए हों तो वहां नज़र करने में हरज नहीं) कान और गरदन और शाने (यानी कन्धे) और चेहरे की तरफ नज़र करना जाइज़ है। महारिम से मुराद वोह औरतें हैं जिन से हमेशा के लिये निकाह हराम है। हुरमत नसब से हो या सबब से मसलन रजाअत (दूध का रिश्ता) या मुसा हरत अगर जिना की वजह से हुरमते मुसा हरत हो जैसे मुज्निया के उसूल व फुरूअ (यानी जिस औरत से जिना किया उस की मां, नानी, परनानी...... ऊपर तक और बेटियां, नवासियां, पर नवासियों...... नीचे तक) उन की तरफ नजर का भी (ज़ानी के लिये) वोही हुक्म है।


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🤔 *सवाल 19*➖ इस्लामी भाई अपनी अम्मीजान के हाथ पाठं चूमना चाहे या दबाना चाहे तो इस की इजाज़त है या नहीं❓

👉🏻 *जवाब*➖दोनों में से किसी को शहवत न हो तो बिल्कुल इजाज़त बल्कि इस्लामी भाई के लिये इस में दोनों जहानों की सआदत है। 

मन्कूल है : जिस ने अपनी वालिदा का पाउं चूमा तो ऐसा है जैसे जन्नत की चौखट (यानी दरवाज़े) को बोसा दिया। 

हज़रत मुहम्मद अमजद अली आज़मी फ़रमाते हैं : महारिम के जिन आ'ज़ा की तरफ़ नज़र कर सकता है उन को छू भी सकता है जब कि छू दोनों में से किसी को शहवत का अन्देशा न हो। मर्द अपनी वालिदा के पाउं दबा सकता है मगर रान उस वक्त दबा सकता है जब कपड़े से छुपी हुई हो, या 'नी (दबा सकता है मगर) कपड़े के ऊपर से और बिगैर हाइल छूना जाइज् नहीं।


🤔 *सवाल 20*➖ मर्द गैर औरत के चेहरे को देख सकता है या नहीं❓

👉🏻 *जवाब*➖न देखे । अलबत्ता ज़रूरतन बा'ज कुयूदात के साथ देख सकता है। इस की बाज़ सूरतें बयान करते हुए हज़रते अमजद अली आज़मी फ़रमाते हैं: अजनबी औरत की तरफ़ नज़र करने का हुक्म यह है कि (ज़रूरत के वक़्त) उस के चेहरे और हथेली की तरफ़ नज़र करना जाइज़ है क्यूं कि इस की ज़रूरत पड़ती है कि कभी इस के मुवाफ़िक या मुखालिफ शहादत (गवाही देनी होती है या फ़ैसला करना होता है अगर उसे न देखा हो तो क्यूंकर गवाही दे सकता है कि इस ने ऐसा किया है। उस की तरफ़ देखने में भी वोही शर्त है कि शहवत का अन्देशा न हो और यूं भी ज़रूरत है कि (आज कल गलियों बाज़ारों में) बहुत सी औरतें घर से बाहर आती जाती हैं लिहाजा इस से बचना भी दुश्वार है। बाज उलमा ने क़दम की तरफ भी नज़र को जाइज कहा है।

मजीद फ़रमाते हैं: अज्नबिय्या औरत के चेहरे की तरफ़ अगर्चे नज़र जाइज़ है जब कि शहवत का अन्देशा न हो मगर येह ज़माना फ़ितने का है इस ज़माने में ऐसे लोग कहां जैसे अगले ज़माने में थे लिहाजा इस ज़माने में इस को (यानी चेहरे को) देखने की मुमानअत की जाएगी मगर गवाह व काज़ी के लिये कि ब वज्हे ज़रूरत इन के लिये नज़र करना जाइज है।


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