गुरुवार, 29 जुलाई 2021

रिसाला ए ताजियेदारी

 

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❓ पहला सवाल :- 24 सफर हिजरी 1308, क्या फ़रमाते हैं उल्माए दीन इस मसअले में कि ताज़ियादारी का क्या हुक्म है ❓

📜 जवाब :- ताजिये की अस्ल इस कद्र थी कि हुजूर शहज़ादए गुलगुं कबा इमाम हुसैन (शहीद, जुल्मो जफ़ा सलावातुल्लाहि तआला वस्सलाम अला जद्दिहिल करीम व अलैह) के रौज़ए पुर नूर की सही नकल बना कर तबर्रुक की नियत से मकान में रखना इस में शरअन कोई हर्ज न था कि तस्वीर मकानात वगैरा हर गैर जानदार की बनाना रखना सब जाएज़ और ऐसी चीजें कि बुर्जुगाने दीन की तरफ़ मन्सूब हो कर अज़मत पैदा करें उनकी तमसील (यानी उनकी मिस्ल या उन जैसी) तबर्रुक की नियत से पास रखना कतअन जाएज़ जैसे सदहा साल से अइम्मए दीन व उल्माए मोअतमदीन ने नालैन शरीफैन हुजूर सय्यदुल कौनैन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के नक्शे बनाने और उनके फ़वाएदे जलीला व मुनाफ़े जजीला पर मुस्तकिल रिसाले तसनीफ़ फ़रमाए हैं जिसे शुबा हो इमाम तिल्समानी की किताब फ़तहुल मुतआल वगैरा मुताला करे 


🔆मगर बेअक्ल जाहिलों ने इस अस्ल जाएज़ को बिल्कुल नेस्त -ओ- नाबूद करके सदहा खुराफ़ात वह तराशी कि शरीअते मुत्तहेरा से अल अमान अल अमान की सदायें आईं अव्वल तो नफीस ताजिए में रौजए मुबारक की नक्ल मलहूज न रही हर जगह नई - नई तराश नई - नई गढ़त जिसे उस नक्ल से कुछ इलाका न निसबत फिर किसी में परियों किसी में बुराक किसी में और बेहूदा तमतराक फिर कूचा -ब- कूचा व दश्त गम की इशाअत के लिए उनका गश्त और उनके गिर्द सीनाज़नी और मातम का शोर, कोई उन तस्वीरों को झुक - झुक कर सलाम कर रहा है, कोई तवाफ़ कर रहा है, कोई सजदे में गिरा है, कोई इन माए बिदआत को मआज़ अल्लाह जलवागाहे हज़रत इमाम अली जद्देही अलैहिस्सलातु वस्सलाम समझ कर उस अबरक पन्नी से मुरादें मांगता, मन्नतें मांगता है, उन्हें हाजतरवा जानता है फिर बाकी तमाशे बाजे ताशे मर्दो औरतों का रातों को मेल और तरह तरह के बेहूदा खेल इन सब पर तुर्रा हैं।


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🔆 गर्ज़ अशरा मुहर्रमुल हराम का महीना कि अगली शरीअतों से उस शरीअत पाक तक निहायत बाबरकत व महल्ले इबादत ठहरा हुआ था।

👉🏻 इन बेहूदा रस्मों ने जाहिलाना व फासकाना मेलों का ज़माना कर दिया फिर वह जोश कि खैरात को भी बतौर खैरात न रखा रिया (दिखावा) व तफाखुर (फख्र से) अलानिया होता है फिर वह भी यह नहीं कि सीधी तरह मुहताजों को दें बल्कि छतों पर बैठ कर फेंके जाते हैं। रोटियाँ ज़मीन पर गिर रही हैं रिज्के इलाही की बेअदबी होती है, पैसे रेते में गिर कर गायब हो जाते हैं, माल बर्बाद हो रहा है मगर नाम तो हो गया कि फलाँ साहब लंगर लुटा रहे हैं। 

🔆अब बहारे अशरा के फूल खिले ताशे बाजे बजते चले तरह तरह के खेलों की धूम, बाज़ारी औरतों का हर तरफ़ हुजूम, शहवानी मेलों की पूरी रसूम जश्न और इसके साथ ख़्याल यह कि गोया यह बनाई हुई तस्वीरें बेऎनिही हज़रात शोहदाए किराम रिदवानुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन के जनाज़े हैं। कुछ नोच उतार बाकी तोड़ ताड़ दफ़न कर दिए यह हर साल माल की बर्बादी का जुर्म अलग इनके सर है।

👉🏻 अल्लाह तआला सदक़ा हज़रात शोहदाए करबला अलैहिमुरिंदवान वस्सना का हमारे भाईयों को नेकियों की तौफ़ीक़ बख़्शे और बुरी बातों से तौबा अता फरमाए। आमीन

 अब ताज़ियादारी इस तरीकए नामर्जिया (गैरपसन्दीदा यानी जो शरीअत को पसन्द नहीं) का नाम है कतअन *बिदअत व नाजाएज़ व हराम है।* हाँ अगर अहले इस्लाम जाएज़ तौर पर हज़रात शोहदाए किराम अलैहिमुर्रिदवान की पाक रूहों को इसाले सवाब करते तो किस कद्र खूब व महबूब था।


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🔆 अगर नज़रे शौक व महब्बत में नकल रौज़ए अनवर की भी हाजत थी तो इसी कद्र जाएज़ पर कनाअत करते कि सही नक्ल बग़र्जे तबर्रुक व ज़ियारत अपने मकानों में और बनावटी गम व नौहाज़नी व मातमकनी व दूसरी बुरी बिदअतों से बचते, इस कद्र में कोई हर्ज न था मगर अब इस नक्ल में भी अहले बिदअत से एक मुशाबहत और ताज़ियादारी की तोहमत का ख़दशा और आइन्दा अपनी औलाद या अहले ऐतकाद के लिए इन बिदआत में मुब्तिला होने का अन्देशा है।


👉🏻 हदीस में आया है :- तर्जमा : *तोहमत की जगह से बचो* और आया है कि

👉🏻 तर्जमा : *जो अल्लाह और कयामत के दिन पर ईमान रखता है वह तोहमत की जगह न खड़ा हो।* 


 लिहाज़ा रौज़ए अकदस हुजूर सय्यदुश्शोहदा की ऐसी तस्वीर भी न बनाए बल्कि सिर्फ काग़ज़ के सही नकशे पर कनाअत करे और उसे तबर्रुक के इरादे से उन चीज़ों से बचाए जिनसे मना किया गया है जिस तरह हरमैन मोहतरमैन से काबए मुअज्जमा और रौज़ए आलिया के नकशे आते हैं या दलाएलुल खैरात शरीफ में कुबूर पुर नूर के नकशे लिखे हैं

👉🏻 तर्जमा : *सलाम हो उस पर जो हिदायत की पैरवी करे पाकी है अल्लाह तआला के लिए वही बेहतर जानता है ।* 


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🤔 दूसरा सवाल :- क्या इरशाद है दीने मतीन का इस मसअले में कि मजालिसे मीलाद शरीफ में शहादत का पढ़ना जाएज है या नहीं❓

📜 अलजवाब :- शहादतनामे नस्र ( गद्य ) या नज्म ( पद्य ) जो आजकल अवाम में राएज हैं अकसर झूटी रिवायात हैं और बेसरो - पा मंगढ़न्त झूट से भरी हुई ऐसे बयान का पढ़ना सुनना वह शहादत हो या कुछ और मजलिसे मीलाद मुबारक में हो ख़्वाह कहीं और मुतलकन हराम व नाजाएज़ है।


🔆 खुसूसन जबकि वह बयान ऐसी खुराफात से भरा हो जिनसे अवाम के अकाएद में तजलजुल पैदा हो फिर तो और भी ज्यादा जहर कातिल है ऐसी ही वजहों पर नज़र फ़रमाकर इमाम हुज्जतुल इस्लाम मुहम्मद मुहम्मद मुहम्मद ग़ज़ाली .कुद्दिसा सिरुहुल आली वगैरा अइम्मए किराम ने हुक्म फ़रमाया कि शहादत नामे पढ़ना हराम है। 

अल्लामा इब्ने हजर मक्की कुद्दिसा सिहूहू मसलकी सवाइके मुहरका में फ़रमाते हैं : तर्जमा : इमाम गजाली वगैरा ने फरमाया कि वाएज़ वगैरा पर मक़तल हुसैन की रिवायत बयान करना हराम है। 

यूंही जबकि इससे मक़सूद गमपरवरी व तसन्नो (बनावट) व हुज्न (मलाल) हो तो यह नियत भी शरीअत को नापसन्दीदा है। शरा मुत्तहेरा ने गम में सब्र व तसलीम और गम को जहाँ तक हो सके दिल से दूर करने का हुक्म दिया है ताकि वह ग़म जो अभी आया भी नहीं उसे बनावटी तौर पर लाना और इसको सवाब ठहराना ये सब राफ़ज़ियों की बहुत बुरी बिदआत हैं जिनसे सुन्नी को बचना लाज़िम हाशा।


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🔆इसमें कोई खूबी होती तो हुजूर पुर नूर सय्यदे आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वफ़ाते अकदस का ग़म मनाना सबसे ज़्यादा अहम व जुरूरी होता, देखो हुजूर -ए - अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का माहे विलादत व माहे वफ़ात वही माहे मुबारक रबीउल अव्वल शरीफ़ है फिर उल्माए उम्मत व हामियाने सुन्नत ने उसे मातम व वफात न ठहराया मौसमे शादी विलादते अकदस बनाया। (मतलब यह कि सुन्नी आलिमों ने रबीउल अव्वल शरीफ में खुशी मनाने का हुक्म दिया) 

🔆इमाम ममदूह किताबे मौसूफ में फ़रमाते हैं तर्जमा :- बचो बचो अगर मशगूल हुए उसमें यानी आशूरे के दिन राफ़ज़ियों और उन्हीं की तरह बिदअतों में यानी खुशी मनाना या नौहा व ग़म करना ये नहीं हैं मुसलमानों के इख़्लाक से वर्ना अगर ऐसा होता तो हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के विसाल के दिन बदर्जा औला होता। 


🔆अवाम मजलिस पढ़ने वाले अगचे बिलफर्ज सही रिवायात पढ़ें भी तो जो उनके हाल से आगाह है खूब जानता है कि जिक्रे शहादत शरीफ़ पढ़ने से उनका मतलब यही बनावटी रोना या लाना है और इस रोने रुलाने से रंग जमाना है तो इसकी बुराई होने में क्या शुबा। हाँ अगर ख़ास बनियत ज़िक्र शरीफ हज़रात अहले बैत तहारत सल्लल्लाहु तआला अला सय्यद हुम व अलैहिम व बारिक वसल्लम उनकेफ़ज़ाइले जलीला व मनाकिबे जमीला से सही रिवायात बयान करते और इसी में उनके फज्ले जलील सब्रे जमील के इज़हार को ज़िक्रे शहादत भी आ जाता है और ग़मपरवरी और मातम - अंगेज़ी से एहतराज़ (बचना) होता है तो इसमें हर्ज न था मगर अफ़सोस उनके तौर तरीके इस नियते खैर से जुदा हैं, ज़िक्र फ़ज़ाएल शरीफ़ मकसूद होता तो क्या इन महबूबाने ख़ुदा की फजीलत सिर्फ यही शहादत थी बेशुमार मनाकिबे अज़ीम अल्लाह अज्जावजल्ला ने उन्हें अता फ़रमाए उन्हें छोड़ कर इसी को इज्तेयार करना और उसमें तरह तरह से रिक़्क़त खेज़ अल्फाज़ों नौहा मलाल ग़म से उनका मकसद यही मालूम होता है ग़र्ज़ अवाम के लिए इसमें कोई वजह सालिम नज़र आना सख्त दुश्वार है फिर मजलिस मीलादे अकदस अज़ीम खुशी और ईद अकबर की मजलिस हैं ग़म व मातम का ज़िक्र इसमें मुनासिब नहीं। फ़कीर इसमें वफ़ात का ज़िक्र लाना भी जैसा कि बाज़ अवाम में राएज है पसन्द नहीं करता हालांकि हुजूर की हयात भी हमारे लिए खैर और हुजूर की वफात भी हमारे लिए खैर।


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🤔 तीसरा सवाल :- क्या फ़रमाते हैं उल्माए दीन इस मसअले में कि शहादतनामा पढ़ना कैसा है और उसमें और ताज़ियादारी में फ़र्के अहकाम क्या हैं ❓

📜 अलजवाब :- ज़िक्रे शहादत शरीफ़ जबकि मनगढ़त रिवायात व कलिमात और जो बातें शरीअत में मना व नियते नामशरूअ (यानी गैर शरीई नियत) से ख़ाली हों सआदत व जाएज़ हैं।

🔆 (तर्जमा : नेकों के ज़िक्र के वक्त रहमत नाज़िल होती है) 

इस की तफसीले जमील फतावा फ़कीर में है और ताज़ियादारी में हुक्म के फ़र्क के लिए एक मुकदमे की तम्हीद (भूमिका) चाहता और अल्लाह तआला की तौफीक से मैं कहता हूँ कि हर शय की एक हकीकत होती है और कुछ चीजें जाएद जो उसके लिए लाज़िम होती हैं शरई अहकाम से भरी हुई वुजूद के ऐतबार (वजह) से होती हैं सिर्फ अक्ली ऐतबार अहकामे शरई के वुजूद के लिए मकसूरे नज़र नहीं होती इस लिए फ़िक़्ह आकिल बालिग़ के काम से बहस करती है जो काम में नहीं आ सकती और वजह से ख़ारिज है। ऐतबार के बदलने से हुक्म वहीं बदलता है जहाँ वह वजह वाकयतन उस शय से अलग हो कि चीज़ कभी एक के साथ पाई जाती है कभी दूसरे के साथ तो हर वुजूद के किस्म के ऐतबार से मुख़्तलिफ़ हुक्म दिया जा सकता है और ऐसे ही सोचा जा सकता है कि अस्ले चीज़ का हुक्म उन बाज़ ऐतबार से जुदा हो मगर बाज़ जाएद चीजें जो वुजूद के लिए लाज़िम हैं उनके हुक्म से जुदा कोई हुक्मे हकीक़त के लिए जुदा न होगा इस लिए कि लाज़िम का मलजूम (जिसके लिए लाज़िम हो जैसे कि नमाज़ के लिए पाकी लाज़िम है कि बगैर पाकी के नमाज़ नहीं हो सकती) से अलग होना मुहाल है तो जब तो वो चीजें जो किसी चीज़ की हकीकत में दाखिल हों उनसे नज़र फेरना मुमकिन नहीं फिर उर्फ की हकीकत में वह शय दाख़िल है और बाज़ अजज़ा शय की हक़ीक़त के जुज़ हैं तो ऐतबार के बदलने से शय नहीं बदलती है बल्कि शय का बदलना उरफ़न है मसलन नमाज़ उर्फे शरा में मखसूस चीज़ों के मजमूआ और मखसूस हालत का नाम है अब अगर कोई इन चीजों में से अलग करके हालत ही को बदल कर एक सूरत का नाम नमाज़ रखे जो कादा से शुरू होकर कयाम पर ख़त्म हो और इसमें सजदे को रुकू से पहले कर दे तो यह हकीकतन नमाज़ ही की तबदीली होगी नाकि एक दूसरी हकीकत जो कि एक दूसरे ऐतबार से हासिल हुई।


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📜बख़िलाफ़ ताज़ियादारी कि इसकी आगाज़ अगचें यूंही सुना गया कि सुल्तान तैमूर ने देखा कि हर साल हुजूर सय्यदुश्शोहदा शहज़ादए गुलगुं कबा जद्दिहिल करीम अलैहिस्सलातु वस्सना के दरबार में हाजिरी देने से सल्तनत के कामों में खलल होता है तो शौक और तबलंक के लिए रोज़ए अकदस की तमसील बनवा ली और इसमें शरअन कोई हर्ज न था अगर कोई शख्स रौज़ए अनवर मदीनए मुनव्वरा व काबए मुअज्जमा के नक्शों की तरह कागज़ पर तमसील रौज़ए हज़रत सय्यदुश्शोहदा आइने में लगा रखे हरगिज़ न इसे ताज़िया कहेंगे न उस शख्स को ताज़ियादार हालांकि अम्र कतअन मौजूद है।

 और यह हर साल तरह - तरह को तराश खराश खपच्ची पत्तियाँ किसी में बुराक किसी में परियाँ जो गली कूचा गश्त कराई जाती हैं हर्गिज़ सय्यदुश्शोहदा के रौज़े की तमसील नहीं कि अगर उनकी मिस्ल होती तो एक ही तरह की होती नाकि मुख़्तलिफ़, इन्हें जुरूर ताज़िया और ऐसा करने वालों को ताज़ियादार कहा तो ज़ाहिर यह हुआ कि ताज़ियादारी की हकीकत इन्हीं नाजाएज़ कामों का नाम ठहरा है नाकि हकीकत में वही उर्फ में अम्र (काम) जाएज़ हो और ये नाजाएज़ उमूर (कार्य) जाएज़ और जुदा होने वाले समझे जाते हों लिहाज़ा फ़कीर ने अपने फतवे में जाएज़ मिकदार को ज़िक्र करके कहा कि जाहिलों बेअक्लों ने उस अस्ल जाएज़ को बिल्कुल नेस्त -ओ- नाबूद करके आखिर में यह जाता है।

कहा कि अब ताजियादारी इस तरीकए नामर्जिया का नाम है कतअन बिदअत व नाजाएज़ व हराम है यह उसी फर्के जलील व नफीस की तरफ़ इशारा था जो मुकदमे की तम्हीद में गुजरा बिल्जुमला शहादतनामा की हकीकत अभी तक वही अमे मुबाह व महमूद है और शनाए ज़वाएद अवारिज़ (यानी आरज़ी तौर पर जो बुरी बातें राइज है) अगर इन से ख़ाली और नियत नामहमूद से पाक हो जुरूर मुबाह है इस की नजीर पिछली उम्मतों में बुतपरस्ती का आगाज़ है। वुद, सुवाअ, यगूस, अऊक व नस्र (पिछली उम्मतों के कुछ नेक लोगों के नाम) स्वालेहीन थे उनके इन्तेकाल पर उनकी याद के लिए उनकी सूरतें तराशी, लम्बे जमाने के बाद पिछली नस्लों ने उन्हें माबूद समझ लिया तो कोई नहीं कह सकता कि उन बुतों की हालत अपनी उन्हीं शुरू की हकीकत पर बाकी थी।


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🤔 चौथा सवाल :- क्या फ़रमाते हैं उल्माए दीन इस मसअले में कि यौमे आशूरा में सबील लगाना और खाना खिलाना और लंगर लुटाने के बारे में देवबन्द के उल्मा मुमानअत करते हैं और किताबे शहादत को भी जो हुक्म शरीअत के नज़दीक हो बयान फ़रमाइये और मजलिस मुहर्रम में ज़िक्रे शहादत और मर्सिया सुनना कैसा है❓

📜 अलजवाब :- पाक रूहों को सवाब पहुँचाना मकसूद हो तो बिला शुबा बेहतर व मुस्तहब व कारे सवाब है। हदीस में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं : 

🔆तर्जमा : जब तेरे गुनाह ज़्यादा हो जायें तो पानी पर पानी पिला गुनाह झड़ जायेंगे जैसे सख्त आंधी में पत्ते। इसी तरह खाना खिलाना लंगर बाटना भी अच्छा और उसे इसका अज्र मिलेगा।

 हदीस में है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं

🔆तर्जमा : अल्लाह तआला अपने बन्दों से जो लोगों को खाना खिलाते है फ़रिश्तों के साथ मुबाहात (फ़न करना, नाज़ फ़रमाना) फ़रमाता है कि देखो यह कैसा अच्छा काम कर रहे हैं।

 मगर लंगर लुटाना जिसे कहते हैं कि लोग छतों पर बैठ कर रोटियाँ फेंकते हैं कुछ हाथों में कुछ ज़मीन पर गिर जाती हैं कुछ पांव के नीचे आती हैं यह मना है कि इसमें रिज्के इलाही की बेताज़ीमी है बहुत उल्मा ने तो रुपयों पैसों का लुटाना जिस तरह दुल्हन या दूल्हा पर निछावर करते हैं मना फ़रमाया कि रुपयों पैसों को अल्लाह तआला ने ख़ल्क की हाजतरवाई के लिए बनाया है तो उसे फेंकना नहीं चाहिए फिर रोटी का फेंकना तो सज्ज बेहूदा है, बज़्ज़ाज़िया में ऐसे ही आया है कुतुबे शहादत में जो आजकल राइज हैं अकसर मंगढन्त हिकायात व बातिल रिवायात हैं यूंही मरसिए ऐसी चीज़ों का पढ़ना सुनना गुनाह व हराम है।

 अबू दाऊद व हाकिम में अब्दुल्लाह इब्ने अबी औफ़ा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने मरसिए से मना फ़रमाया ऐसे ही ज़िक्रे शहादत को इमाम हुज्जतुल इस्लाम वगैरा उल्माए किराम मना फ़रमाते है। हाँ अगर सही रिवायात बयान की जायें और कोई कलिमा किसी नबी या मलक या अहले बैत या सहाबी की तौहीन न हो और न ही उनकी तारीफ़ में हद से ज्यादा मुबालगा करे और वहाँ बैन, झूटा रोना धोना, नौहा, सीनाकोबी, गरेबानदरी या मातम या बनावटी गम व गैर शरई बातें जो मना हैं न हों तो ज़िक्र शरीफ़ फ़ज़ाइल व मनाकिब हज़रत सय्येदिना इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु का बिलाशुबा मूजिबे सवाब व नुजूले रहमत है कि जहाँ स्वालेहीन का ज़िक्र हो वहाँ अल्लाह की रहमत नाज़िल होती है। लिहाज़ा इब्ने हजर मक्की ने भी ऐसा ही फ़रमाया।


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🤔 पांचवा सवाल :- यहाँ अशरा मुहर्रम में मुहर्रम में मजलिस मरसिया ख्वानी की होती है और मरसिया सूफ़िया किराम के पढ़े जाते हैं और सीनाकोबी व बैन नहीं होता और मजलिस करने वाला सुन्नी है तो ऐसी मजलिस में शिरकत या उसमें मरसिया - ख्वानी का क्या हुक्म है ❓ 

📜 अलजवाब :- जो मजलिस जिक्रे शरीफ़ हज़रत सय्येदिना इमाम हुसैन व अहले बैत किराम रदियल्लाहु तआला अन्हुम की हो जिसमें सही और मोतबर (ऐतबार के काबिल) रिवायात से उनके फ़ज़ाएल व मकामात व मदारिज बयान किए जायें और मातम, तजदीदे गम व ख़िलाफे शरा बातों वगैरा से पाक हो हसन व महमूद है ख़्वाह उसमें नस्र (गद्य) पढ़ें या नज्म (पद्य) अगचें नज्म को मरसिया का नाम ही दिया जाता हो कि अब यह वह नहीं कि जिसकी निसबत हदीस में मना फ़रमाया गया है।


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🤔 छटा सवाल :- 1️⃣ एक शख्स कहता है कि मैं ताजिए का चढ़ा हुआ नहीं खाता हूं हजरत इमाम हुसैन की नियाज का खाता हूं❓ 

📜 अलजवाब :- पहला शख्स अच्छी बात कहता है वाकई हज़रत इमाम के नाम की नियाज़ खानी चाहिए और ताज़िया का चढ़ा हुआ खाना न चाहिए अगर उसके कौल का यह मतलब है कि वह ताज़िया का चढ़ा हुआ इस नियत से नहीं खाता कि वह ताज़िया का चढ़ा हुआ है बल्कि इस नियत से खाता है कि वह इमाम की नियाज़ है तो यह कौल गलत और बेहूदा है। ताज़िया पर चढ़ाने से हज़रते इमाम रदियल्लाहु तआला अन्हु की नियाज़ नहीं हो जाती अगर नियाज़ या दूसरी चीजें चढ़ाई या चढ़ा कर नियाज़ दिलाई तो उसके खाने से बचना चाहिए और वह नियत का तिफर्का (फ़र्क होना) उसके मुफ़सिदा (यानी फ़ासिद होना) को दफ़ा न करेगा, मुफ़सिदा उसमें यह है कि उसके खाने से जाहिलों की नज़र में एक नाजाएज़ काम की वक़अत बढ़ानी या कम अज़ कम अपने आपको इसके ऐतकाद की तोहमत लगाना है और दोनों बातें बुरी हैं। लिहाज़ा उसके खाने पीने से बचना चाहिए। वल्लाह तआला आलम। 


2️⃣ एक शख्स कहता है ताजिए से क्या होता है चढ़ावा कोई हो मैं नहीं खाता हूं नियाज खाता हूं❓ 

📜 अलजवाब :- दूसरे शख्स की बात में ज़रा ज़्यादती है औलियाए किराम के मज़ारात पर जो शरीनी खाना लोग बनियते तसद्दूक ले जाते हैं उसे भी बाज़ लोग चढ़ावा कहते हैं उसके खाने में फ़कीर को असलन कोई हर्ज नहीं। 


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🤔 छटा सवाल :- 3️⃣ एक शख्स कहता है अशरा मुहर्रमुल हराम में जो कुछ खाने पीने वगैरा में होता है दस रोज़ तक ताज़िया का चढ़ा होता है।

4️⃣ एक शख्स कहता है ताज़िया बुत है बसबब लगाने सूरत के।

5️⃣एक शख़्स कहता है कि यह सूरत वह है जो बुराक और हूरें जन्नत में हैं।

📜 अलजवाब :- ( 3 ) तीसरे शख्स ने नियाज़ और ताज़िया के चढ़ावे में फर्क न किया यह गलत है चढ़ावा वही है जो ताज़िया पर या इसके पास ले जाकर सब के सामने नज़्रे ताज़िया की नियत से रखा जावे बाकी सब खाने शरबत वगैरा कि अशरा मुहर्रम में बनियते ईसाले सवाब हो वह चढ़ावा नहीं हो सकते। 

( 4 ) मुजस्सम तस्वीर को बुत कहते है। इस मअनी पर वह तस्वीरें कि ताज़िया में लगाई जाती है बुत हैं और मिजाज़न कुल को भी कह सकते हैं और अगर बुत से मुराद मुतलक हो तो यह सख़्त ज्यादती है इन्साफ़ यह है कि कोई जाहिल सा जाहिल भी ताज़िया को माबूद नहीं जानता।

( 5 ) इस शख्स का यह सिर्फ इफ़्तेरा है कहाँ हूर व बुराक और कहाँ यह काग़ज़ पन्नी की मूरतें जिस से कहीं ज़्यादा खूबसूरत कसगरों के यहाँ रोज़ बनती हैं और अगर हो भी तो हूर व बुराक की तस्वीरें कहाँ हलाल है।


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🤔 छटा सवाल :- 6️⃣ एक शख्स कहता है कि ताजिया और मस्जिद में कुछ फ़र्क नहीं बल्कि कहता है कि मस्जिद में क्या है वह ईट गारा ही तो हैं जो वहाँ सजदा करते हो और ताज़िया में अबरक कागज़ वगैरा हैं।

7️⃣ एक शख्स कहता है कि भाई यह बातें शरा की हैं लिख कर शरा के सुपुर्द करो आपस में झगड़ा मत करो।

8️⃣ एक शख्स कहता है कि तुम शरा नहीं समझते।

9️⃣ एक शख्स कहता है कि जिस हालत में तुम शरा को नहीं समझते हो तो मैं ताजिया के चढ़ाने को हराम समझता हूँ।

📜 अलजवाब :- ( 6 ) यह शख्स सरीह गुमराह बदअक्ल व बद्ज़बान है, मस्जिद को कोई सजदा नहीं करता न उसकी हकीकत ईंट मारा है कि वह ज़मीन कि नमाज़ व इबादते इलाही बजा लाने के लिए तमाम हुकूके इबाद से जुदा करके अल्लाह अज्जावजल्ला के हुक्म से उसकी तरफ़ तकल्ब के वास्ते ख़ास मिल्के इलाही पर छोड़ी गई अब वो शआरुल्लाह (मतलब यह कि अल्लाह की निशनियाँ) से हो गई और शआरुल्लाह की ताज़ीम का हुक्म है। अल्लाह तआला फरमाता है :- (तर्जमा)अल्लाह तआला की निशानियों की ताज़ीम करना दिलों की परहेज़गारी है।

 इन सब बिदअतों को इससे क्या मतलब मगर जहल मुरक्कब (वह शख्स जो जानता कुछ न हो और अपने आपको बहुत बड़ा जानकार या आलिम समझे उसे जहल मुरक्कब कहते हैं) सख़्त मर्ज है। वल अयाजु बिल्लाही तआला। 

( 7 ) इस शख्स ने अच्छा किया मुसलमानों को यही हुक्म है कि जो बात न जाने ख़ुद उस पर कोई हुक्म न लगायें बल्कि अहले शरा से दरयाफ्त करे। अल्लाह तआला फरमाता है :- (तर्जमा) अल्लाह तआला फरमाता है पूछो जानने वालों से अगर तुम नहीं जानते।

( 8 ) इसके कौल का अगर यही मतलब है कि तुम लोग बेइल्म हो आपस में बहस न करो अहले शरा से पूछो तो अच्छा किया और अगर यह मुराद है कि ताजिया शरअन अच्छी चीज़ नहीं तो यह बहुत बुरा कहा और शरा पर इफ्तेरा किया और अगर यह मकसूद हो कि शरअन तो मकसूद साफ़ ज़ाहिर है मगर तुम लोग नहीं समझते तो यह भी अच्छा कहा। 

( 9 ) इस का कौल हद से गुज़रा हुआ है ताज़िया का चढ़ावा खाना उन वजहों से जो हमने ज़िक्र की मकरूह व नापसन्द जरूर है मगर हराम कहना गलत है। फतावा आलमगीरी में है कि वह बकरी को जो हिन्दू ने अपने बुत के नाम पर मुसलमान से ज़िबह कराया और मुसलमान ने अल्लाह अज्जावजल्ला की तकबीर कह कर ज़िबह कर दी, तरीह फरमाई कि हलाल है मुसलमान के लिए मकरूह है जब वहाँ सिर्फ कराहत का हुक्म है तो यहाँ तहरीम क्यूँकर वल्लाह तआला आलम।


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🤔 सातवाँ सवाल :- अहले शिया की मरसिया ख्वानी की महफ़िलों में सुन्नियों का शरीक होना जाएज़ है या नहीं❓ 

📜 अलजवाब :- हराम है हदीस में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं। तर्जमा : जो किसी कौम के मजमे को बढ़ाए वह उन्हीं में से है वह बदज़बान लोग नापाक लोग अकसर तबर्रा बक जाते है। इस तरह कि जाहिल सुनने वालों को खबर भी नहीं होती और मुतावातिर सुना गया है कि सुन्नियों को जो शरबत देते हैं उसमें नजासत मिलाते हैं और कुछ न हो तो अपने यहाँ की कुल्लतैन का पानी पिलाते हैं और कुछ न हो तो वह रिवायात मौजूआ (मंगढन्त) व कलमात शनीआ (बुरे) व मातम हराम से खाली नहीं होती और देखें सुनेगे और मना न कर सकगे ऐसी जगह जाना हराम है अल्लाह तआला फरमाता तर्जमा : न बेठो मालूम होने के बाद जालिम कौम के साथ अल्लाह बहतर जानने वाला है।


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🤔 आठवाँ सवाल :- क्या फरमाते है उल्माए दीन व मुफ्तीयाने शरा मतीन इस मसअले में कि ताजिया बनाना और उस पर नज्र व नियाज करना अर्जियाँ मुराद पूरी हो जाने की उम्मीद से लटकाना और बनियत बिदअते हसना उसको दाखिले हस्नात जानना (यानी अच्छा काम जानना) और उन कामों जो इनसे मुवाफिक हों और जो इसमें नए पैदा किए गए हों उनको शरीअत के मुवाफिक जानना या जो इनके मुताल्लिक हों कितना गुनाह है और इस जमाने में जो ये ताजियादारी और अलमदारी है जैद उन्हें अहले सुन्नत के मुवाफिक तसव्वुर करे तो यह किस किस्म का गुनाह है और इस पर शरा को क्या ताज़ार लाजिम आती है और ऐसे काम करने पर शिर्के ख़फ़ी या जली में मुब्तिला है या नहीं और उसकी बीवी व इससे निकाह से बाहर हुई या नहीं, जैद इन सब बातों को जो ऊपर जिक्र हुई अहले सुन्नत के अकीदे के मुताबिक जानकर सवाब का काम समझ कर करता है।

📜 अलजवाब :- सवाल में जो बातें जिक्र की गई और जो इस जमाने में अवाम में फैली हुई हैं बिदअते सइया (बुरी बिदअत या नया बुरा काम) व ममनूअ नाजाएज हैं। इन्हें दाखिले सवाब जानना और मुवाफ़िके शरीअत व मुताबिक मजहबे अहले सुन्नत मानना सख्ततर खताए अकीदा व जहल अशद है शरई सजा हाकिमे शरा सुलतान की राए पर मफूज़ है यानी सही शरई सजा बादशाह या हाकिमे शरा ही देगा। ये सब शिर्क व कुफ्र हर्गिज नहीं न इस बिना पर औरत निकाह से बाहर हो। आर्जयाँ हाजत की उम्मीद से लटकाना महज बनियत तवस्सुल (वसीला की नियत से) है जो उसकी जहालत है कि जो काम मना हो वह तवरसुल के लाएक नहीं होते बाकी हाजतरवा बिज्जात को कलिमागो हजरत इमाम आली मकाम को भी नहीं जानता कि मआज़ अल्लाह तआला शिर्क हो यह वहाबियों का जहल व गमराही है। (कहने का मतलब यह है कि कोई भी शख्स यह नहीं मानता कि इमाम आली मकाम खुद हाजतरवा हैं यानी बिना अल्लाह के हुक्म से हाजतें पूरी कर रहे हर कलिमा पढ़ने वाला यह मानता है कि हाजत अल्लाह ही पूरी करता है बुजुर्ग तो वसोला हैं यानी हर कलिमा गो तवस्सुल का कायल है) वल्लाह तआला आलम।


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🤔 नवा सवाल :-  (1) मुहर्रम की दसवीं थी हज़रत मौलाना ममदूह एक ताज़िया के साथ हो लिए जो जुलाहों का था और मस्नूई (झूटी बनाई हुई) करबला दफ़न होने के लिए लोग ले जाते थे आपकी वजह से और खुइम व मुरीदीन भी साथ हो लिए करबला तक साथ साथ रहे बल्कि देर तक कयाम फ़रमाया कुछ दिनों बाद ख़ास मुरीदीन ने पूछा तो फरमाया कि मुझे ताज़ियों से कुछ मतलब नहीं हम तो इमाम आली मकाम को देख कर साथ हुए थे कि के उनके साथ औलियाए किराम का मजमा था।

 (2) इन्हीं बुजुर्ग का किस्सा है कि एक दिन आशूरा को मस्जिद में बैठे वुजू कर रहे थे टोपी मुबारक फसील पर रखी थी कि यकायक इसी तरह नंगे सर नीचे तशरीफ़ ले आए और एक ताजिए के साथ हो लिए इस दफ़ा लोगों ने दरयाफ़्त किया तो फ़रमाया कि हज़रत सय्यदुतुन्निसा तशरीफ़ फ़रमा थीं। ये दोनों रिवायतें कहाँ तक सही हैं। 

📜 अलजवाब :- दोनों रिवायतें महज़ गलत व बेअस्ल हैं ताज़ियादारों को न कोई दलील शरई मिलती है न कोई सही कौल मजबूर होकर हिकायत बनाते हैं। इसी तरह की हिकायत कोई शाह अब्दुल अज़ीज़ से नकल करता है  कोई मौलाना शाह फज्ले रसूल साहब से, कोई मौलवी फज्लुर्रहमान साहब से, कोई हज़रत जद्दे अमजद रहमतुल्लाहि तआला अलैह (यानी आलाहज़रत के वालिदे माजिद) से और सब बातिल व बनावटी हैं। मैं तो अभी जिन्दा हूँ मेरी निसबत कह दिया कि हमने ताज़ियां शायद अलम बताए कि उनके साथ जाते देखा और इस हिकायत का झूट तो ख़ुद इसी से रौशन कि फ़रमाया कि मुझे ताज़ियों से कुछ मतलब नहीं हम तो आली मकाम को देख कर साथ हुए थे कि उनके साथ औलिया किराम का मजमा सुब्हालल्लाह ! जब ताजिए ऐसे मुअज्जम व मकबूल वं महबूबे बारगाह हैं कि खुद हुजूर पुर नूर इमाम अनाम अली जद्दिहिल करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम बनफ़्से नफ़ीस उनकी मशइयत फरमाते हैं उनके साथ चलते हैं तो उनसे कुछ मतलब न होना अल्लाह अज्जवजल्ला के महबूब व मुअज्जम से मतलब न होना है जो वली तो वली किसी मुसलमान की शान नहीं फिर आगे आख़िर मुलाहिजा हो कि उनके साथ औलियाए किराम का मजमा वज़ाहत के लिए बयान करना तो हो नहीं सकता तालीलया है यानी यह वज़ाहत बयान करने के लिए तो नहीं हो सकता यह जुरूर सबब बयान के लिए है यानी हज़रत इमाम के साथ होने पर भी कुछ तवज्जो न होती मगर क्या कीजिए उनके साथ मजमा औलिया का था लिहाज़ा मजबूरन शामिल होना पड़ा ऐब भी करने को हुनर चाहिए हाँ खूब याद आया था यह 3 जमादुल आखिर हिजरी 27 को तिलहर से एक सवाल आया था कि तूने ताजियादारी को जाएज कर दिया , इस खबर की क्या हकीकत है एक राफजी बड़े फन से इस रिवायत का नक्ल करता है और कहता है कि मेरा और दीगर चन्द उल्माए बरेली का फतवा तैयार हुआ है कि आयते ततहार के तहत में अजवाजे मुत्तहेरात दाखिल नहीं इस फतवे को नक्ल उस राफजी के पास देखने में आई है . फकत अब फरमाइये इससे बढ़ कर और क्या सुबूत दरकार जब जिन्दों के साथ यह बरताव है तो आलमे बरजख (मरने के बाद से कयामत तक आदमी जहाँ रहेगा उसे आलमे बरजख कहते हैं) का निस्बत जो हो कम है । वल्लाह तआला आलम (फतावा रजविया )

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🤔 दसवा सवाल :- क्या फरमाते हैं उल्माए दीन व मुफ्तीयान शरहे मतीन इस मसअले में कि शोकत व दबदबए इस्लाम के लिए ताजिया का बनाना और निकालना व अलम व बुराक व मेहदो वगैरा जाएज है या नहीं ताजिया को हाजतरवा (हाजत पूरी करने वाला) समझना या कहना कि ताजिया हमारी मन्नत का हे अगर बन्द करें न बनायें तो हमारा नुकसान औलाद व माल का होगा कैसा है ताजियादार ताजिया परस्त के हाथ का जबीहा खाना दुरुस्त है या नहीं ❓ 

📜 अलजवाब :- अलम, ताजिया, बैरक मेंहदी जिस तरह राएज है बिदअत हैं और बिदअत से शौकते इस्लाम नहीं होती ताजिया को हाजतरवा यानी ज़रियाए हाजतरवा समझना जहालत पर जहालत है और उसे मन्नत जानना हिमाकत और न करने से नुकसान हो जाने का ख्याल करना जनाना वहम है। मुसलमान को ऐसी हरकत व ख्याल से बाज आना चाहिए ये सब ताजियादार मुसलमान है और उसके हाथ का जबीहा जुरूर हलाल है कोई जाहिल सा जाहिल मुसलमान भी ताजिया को माबूद नहीं जानता ताजिया - परस्त का अल्फाज़ वहाविया शिर्क - परस्त की जबानी है जिस तरह ताजीम व तकरीम मजारात तय्यबा पर मुसलमानों को कब्र - परस्त का लकब देते हैं ये सब उनका जहल व जुल्म है। वल्लाह तआला आलम (फतावा रजविया)


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🤔 ग्यारवाह सवाल :- क्या फरमाते हैं उल्माए दीन इस मसअले में कि ताजिया बनाना कैसा है और उस पर शरीनी वगैरा चढ़ाना कैसा है और बनाने वाले और ताजीम करने वाले का शरीअत के नजदीक क्या हुक्म है जो शखा नाजवाजी का काएल हो यानी नाजाएज़ होने का कायल हो उसको काफिर या मुरतद कहना और काफिर समझकर उसके पीछे नमाज़ न पढ़ना कैसा है और ताजियादारी में गुलू करने वाले के पीछे नमाज पढ़ना कैसा है❓

📜 अलजवाब :- जो ताजिया राएज है नाजाएज व बिदअत है और उसका बनाना गुनाह और उस पर शरीनी चढ़ाना महज़ जहालत है और उसकी ताज़ीम बिदअत जहालत और ताजिया को जो नाजाएज़ कहे सिर्फ इस बिना पर उसे काफ़िर या मुरतद कहना अशद अज़ीम गुनाहे कबीरा है, कहने वाले को तजदीदे इस्लाम व निकाह चाहिए, यूहीं इस वजह से उसके पीछे नमाज़नप ढ़ना मरदूद व बातिल है अलबत्ता अगर किसी वहाबी को काफिर व मुरतद कहा तो मुजाएका नहीं और वहाबी कि पीछे नमाज़ बेशक नाजाएज़ है जो ताजियादारी में गुलू रखे या उससे मारूफ हुआ अगर्चे गुलू न रखे उसके पीछे भी नमाज़ न पढ़ना चाहिए मगर पढ़ें तो हो जाएगी हाँ उसे इमाम बनाना मना है। वल्लाह तआला आलम। 

( फतावा रजविया 10 )


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🤔 बारवाह सवाल :- क्या फ़रमाते हैं उल्माए दीन मुफ्तीयाने शरा मतीन कि अव्वल यह कि अहले सुन्नत को अशरा मुहर्रम में रंज व गम करना जाएज़ है या नहीं दूसरे यह कि अशरा मुहर्रम में शिकार खेलना दुरुस्त है या नहीं तीसरे यह किं ताज़िया बनाना बिदअत सइय्या (बुरी बिदअत) है या शिर्क व गुनाह कबीरा ❓ 📜 अलजवाब :- अहले सुन्नत व जमाअत का मदारे ईमान हुजूर -ए- अकदस सय्यदुल मुरसलीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की महब्बत है जब तक अपने माँ बाप औलाद तमाम जहान से ज्यादा हुजूर की महब्बत न रखे मुसलमान नहीं, खुद हुजूर -ए- अकदस सय्यदुल मुरसलीन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं तर्जमा : तुममें कोई मुसलमान नहीं होता जब तक मैं उसके माँ बाप और औलाद और सब लोगों से ज्यादा प्यारा न होऊँ और मुहिब (महब्बत करने वाला) को महबूब की हर शय अज़ीज़ होती है यहाँ तक कि उसकी गली का कुत्ता भी

हजरत मौलाना .कुद्दिसा सिर्रुहू ने मसनवी शरीफ में हज़रते मजनून रहमतुल्लाहि तआला अलैह की हिकायत तहरीर फरमाई कि किसी ने उनको देखा कमाल महब्बत के पर एक कुत्ते के बोसे ले रहे हैं, ऐतराज़ किया कि कुत्ता नजिस है चुनी है चुना है। फ़रमाया तू नहीं जानता है कि तर्जमा : मौला का छुपा हुआ भेद है ये लैला की गली का निगेहबान है ये यह कुत्ता लैला की गली का है मुहिब्बान सादिक (सच्ची महब्बत करने वाले) का जब दुनिया के महबूबों के साथ यह हाल है जिन में एक हुस्ने फानी का कमाल सही हज़ारों ऐब व नुक्स भी होते हैं तो क्या कहना है हमारे महबूब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का जिन्हें तमाम औसाफ़े हमीदा में आला कमाल और जिनका हर कमाल अबदी और लाज़वाल (कभी न ख़त्म होने वाला) और जो हर ऐब व नुक्स से मुनज्जा (पाक) व बेमिसाल उनका हर इलाके वाला सुन्नी के सर का ताज है सहाबा हों ख्वाह अज़वाज ख्वाह अहले बैत रिदवानुल्लाहि तआला अलैहिम अजमईन फिर क्या कहना उनका जो हुजूर के जिगरपारे और अर्श की आँख के तारे हैं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं तर्जमा : हुसैन मेरा और मैं और मैं हुसैन का अल्लाह दोस्त रखे उसे जो हुसैन को दोस्त रखे हुसैन एक नस्ली सुबूत की अस्ल है।


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🔆यह हदीस किस कद्र महब्बत के रंग में डूबी हुई है। एक बार नाम लेकर तीन बार ज़मीर काफ़ी थी मगर नहीं हर बार लज्जत महब्बत के लिए नाम ही का इआदा फ़रमाया (यानी इस हदीस में कितनी महब्बत है कि यहाँ हज़रते इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु का तीन बार नाम लिया गया जबकि बाकी दो बार सर्वनाम 'वह' का इस्तेमाल किया जा सकता था मगर दो बार नामे अकदस को दोहराया)

 कौन सा सुन्नी होगा जिसे वाकियए करबला का गम नहीं या उसकी याद से उसका दिल मख़ज़न (भरा हुआ) और आँख पुर नम नहीं। हाँ मुसीबतों में हमको सब्र का हुक्म फ़रमाया जज़ा व फ़ज़ा (रोना धोना, चीख़ना चिल्लाना) को शरीअत मना फ़रमाती है और जिसे वाकई गम न हुआ उसे झूटे ग़म का इज़हार करना रिया (दिखावा) है और कसदन गमआवरी व गमपरवरी ख़िलाफ़े रज़ा है जिसे इस का ग़म न हो उसे बेगम न रहना चाहिए बल्कि उसे ग़म न होने का गम चाहिए कि उसकी महब्बत नाक़िस है जिसकी महब्बत नाकिस उसका ईमान नाकिस। वल्लाह तआला आलम।

(2) जिसे खाने या दवा के लिए किसी जानवर की हाजत है वह अगर बकरे हाजत दो एक जानवर मार लाए तो यह किसी खेल या तफरीह का फेल न होगा आयते करीमा में उसी का जिक्र है मगर बेहाजत मजकूरा तफरीह तबअ के लिए जो शिकार किया जाता है वह खुद नाजाएज़ है (यानी जिन बातों की हाजत ज़िक्र की गई उनके अलावा किसी बात के लिए शिकार किया जाता है तो वह नाजाएज़ है) कि एक लहू व लइब है लोग खुद उसे शिकार खेलना कहते हैं और खेल के लिए बेज़बानों की जान हलाक जुल्म व बेदर्दी है। अश्बाह वन्नज़ाएर में है तर्जमा : शिकार करना जाएज़ है मगर तफरीहन नहीं। इसी तरह वजीज़ कुरदरी व तनवीरुल अबसार में है "तू खेल और अशरह मुहर्रम"

(3) ताज़िया बनाना शिर्क नहीं यह वहाबिया का ख्याल है हाँ बिदअत व गुनाह है। वल्लाह तआला आलम।


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🤔 तेहरवा सवाल :- क्या फरमाते हैं उल्माए दीन इस मसअले में कि जो शख़्स ताज़िया सवाब व इबादत जान कर खुद बनाए या और लोगों को बनाने की तरगीब दे और ताज़िया देखकर ताज़ीमन खड़ा हो जाए और उस पर फ़ातिहा पढ़े और ताजिए के साथ नंगे पैर ताजीमन चले और मरसिया भी पढ़वाता जाए। शाह मौलाना अब्दुल अज़ीज़ साहब रहमतुल्लाहि तआला अलैह ने अपने फतावा की जिल्द अव्वल में लिखा है कि बिदअत को इबादत समझ कर करे वह दारए इस्लाम से खरिज है और उस पर इब्ने माजा की एक हदीस दलील लाए हैं उसका मज़मून यह है कि फ़रमाया रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बिदअती इस्लाम से ऐसा साफ़ निकल जाता है जैसे गूंधे हुए आठे से बाल साफ, तो शाह साहब के कौल ख़ारिजे इस्लाम का क्या मतलब है ऐसा शख्स काफ़िर व मुरतद है या गुमराह व राफ़ज़ी है। बहरहाल ऐसे शख्स का ज़िबह किया हुआ जानवर हराम या हलाल ऐसे शख्स की नमाज़े जनाज़ा दुरुस्त है या नहीं जो लोग ऐसे ताज़िया - परस्त के मुरीद हों उनका क्या हुक्म है ऐसे ताज़िया - परस्त और बुतपरस्त में क्या फर्क है ऐसे ताज़िया - परस्त पर लानत आई है या नहीं ? क्या बुज़ुर्गाने चिश्त से किसी बुजुर्ग ने ताज़िया बनाया बनवाया या ताजीम दी है?

📜 अलजवाब :- ताजिया जुरूर नाजाएज़ व बिदअत है मगर हाशा (ख़बरदार) कुफ्र नहीं कि नमाज़े जनाज़ा नाजाएज़ या उसका ज़बीहा मुर्दार या बुतपरस्तों में शुमार हो , इफ़रातो तफ़रीत (यानी बहुत सख्ती या बहुत नर्मी) दोनों बुरे हैं। यह हदीस इब्ने माजा में है अलावा इस बात से बहुत ज़ईफ़ है। अपने मिस्ल की तरह इस्लामे कामिल से तावील शुदा वा बिदअते मुकफ्फ़रा (यानी ऐसी बिदअत जो कुफ्र की तरफ़ ले जाने वाली हो) पर महमूर वर्ना हर बिदअत सइया (बुरी बिदअत) कुफ हो जबकि उसका करने वाला उसको अच्छा समझने लगे यही गलिब है, अक़ीदे में बिदअत मुतलकन कुफ्र हो जाना लाज़िम कि उसकी तारीफ़ ही यह है कि जो हक के ख़िलाफ़ जाहिर करे अलमुन्तहा (किताब का नाम) में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम से रिवायत है कि (तर्जमा : दीने कवी व सीधा रास्ता) जैसा कि बहरु एक में है हालांकि इजमा उम्मत से बाज़ बदमज़हबयान कुफ नहीं।


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📜फतावा खुलासा , फ़तहुल कदीर , आलमगीरी वगैरा में है

🔆 तर्जमा :- रवाफिज़ अगर अली को फजीलत दें उनके गैर पर तो वह बिदअती हैं और अगर ख़िलाफ़ते सिद्दीक का इन्कार करें तो काफ़िर हैं। खुलासा वगैरा में है 

🔆 तर्जमा :- जब कोई कहे अल्लाह के लिए हाथ है पैर है जैसा कि बन्दे के तो वह काफिर है और अगर कहे अल्लाह के लिए जिस्म है मगर जिस्मों की तरह नहीं वह बिदअती है। नीज़ उसी में है

🔆 तर्जमा :- जो शख्स हमारे किन्ने वालों में से हो और अपनी ख़्वाहिश में हद से न बढ़ा हो यहाँ तक कि उसके काफिर होने का हुक्म नहीं लगायेंगे उसके पीछे नमाज़ जाएज़ मगर मकरूह हज़ारों मसाएल इसी तफ़सील से हैं तो हुक्मे मुतलक कैसे सही हो सकता है। हाँ इन कामों का (जो सवाल में ज़िक्र हुए ) करने वाला बैअत के काबिल नहीं कि पीर के शराएत से है कि वह सुन्नी सहीउल अकीदा होने के साथ - साथ फासिके मोलिन (फासिके मोलिन वह है जो खुले आम कबीरा गुनाह करता हो जैसे नमाज़ छोड़ना या दाढ़ी मुंडाना वगैरा) न हो और लानत बहुत सख्त चीज़ है हर मुसलमान को इससे बचाया जाए बल्कि लईन काफिर पर भी लानत जाएज़ नहीं जब तक उसका कुफ्र पर मरना कुरआन व हदीस से साबित न हो। वल अयाजु बिल्लाही तआला वल्लाह तआला आलम।

👉🏻 नोट : यह मसअला भी मुश्किल है इसे भी किसी आलिम से समझें। इतना समझ लेना काफी है कि ताज़ियादारी कुफ्र नहीं क्यूँकि जाहिल से जाहिल शख्स भी ताज़िया को बुत या माबूद नहीं समझता हाँ अगर कोई शख्स ताज़िया को माबूद समझे तो बिला शुबा यह कुफ्र हुआ। वल्लाह तआला आलम।


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[10:18 am, 22/08/2021] Irfan Patel Barkati: ⩴⩴⩴⩴❀⩴❀✨﷽✨❀⩴❀⩴⩴⩴⩴

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🤔 तेरहवाँ सवाल :- क्या फ़रमाते हैं उल्माए दीन इस मसअले में कि जैद मुद्दई हनफीयत कहता है कि ताज़िया चूंकि नक्शा है सय्येदिना हज़रत इमाम हुसैन रदियल्लाहु तआला अन्हु के रौज़ए मुकद्दसा का और मन्सूब है सय्येदिना इमाम हुमाम रदियल्लाहु तआला अन्हु की तरफ़ लिहाज़ा इसका बनाना जुरूरी काम है, सवाब है, काबिले ताज़ीम और ज़रियए नजात है लिहाज़ा जो शख्स उनकी ताज़ीम बनाने का मुख़ालिफ़ वह यज़ीद है पस जैद की यह बात तहकीक तलब ( 1 ) ताज़िया बनाना सवाब है या अज़ाब। ( 2 ) इसके बनाने में किसी किस्म की इमदाद (मदद) जाएज़ है या नहीं। ( 3 ) इसका बनाने वाला फासिक राफ़ज़ियो के मुशाबे है या नहीं और इस बुनयाद पर इस हराम व बिदअत को जाएज़ समझने वाला काफ़िर है या अशद फ़ासिक। ( 4 ) मज़हबे इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाहि तआला अलैह में भी इसका सुबूत है या नहीं और इस बुनयाद पर उसका बनाने वाला मुत्तबेअ इमाम आज़म रहमतुल्लाहि तआला अलैह है या नहीं और उसका यह दावा कि हनफ़ी हूँ जिससे अवाम भी ताज़िया बनाने की तरफ रागिब होते हैं यह धोका देना है या नहीं, गुमराही है या नहीं। ( 5 ) ऐसे शख्स को हनफी लोग अपना पीर या पेशवा बना दें तो जाएज़ है या हराम और मुरीदीन पर फसल बैअत (यानी बैअत का तोड़ देना) वाजिब है या नहीं और ऐसे शख्स और ऐसे शख्स से नमाज़ पढ़वाना जाएज़ है या मकरूहे तन्जीही या मकरूहे तहरीमी या हराम है। ( 6 ) ताज़िया के इन्कार करने वाले को यज़ीद या बद्दीन कहना कैसा है अगर इन्कार करने वाले ऐसे नहीं तो यह कौल खुद कहने वाले पर पड़ता है यानहीं यानी इसका वबाल या गुनाह कहने वाले पर कितना होगा और हदीस शरीफ़ के इस कायदे के तहत दाखिल होंगे या नहीं कि अगर किसी को काफ़िर कहे और वह फ़िलवक़्त ऐसा नहीं तो कहने वाला खुद काफ़िर होता है। ( 7 ) ताज़िया बनाने वाला चूंकि आम मुसलमानों की हाज़िर होने की वजह होता है इस बुनयाद पर हराम व बिदअत हाज़रीन व बानी दोनों गुनाह में बराबर है या ज़्यादा या कम। 

📜 अलजवाब :- ताज़िया जिस तरह राएज है बिदअत ही नहीं बल्कि बिदअतों का मजमूआ है (यानी बहुत सी बिदअतें इस में इकट्ठी हैं) न वह रौज़ए मुबारक का नक्शा है और हो तो मातम सीनाकोबी और ताशे बाजों के गश्त और ख़ाक में दबाना यह क्या रौज़ए मुबारक की शान है और परियों और बुराक की तस्वीरें भी शायद रौज़ए मुबारक में होंगी। इमाम आली मकाम की तरफ अपनी गढ़ी हुई ख़्वाहिशों की निसबत इमाम रदियल्लाहु तआला अन्हु की तौहीन है क्या तौहीने इमाम काबिले ताज़ीम है। काबए मुअज्जमा में ज़मानए जाहिलियत में मुशरिकीन ने सय्येदिना इब्राहीम सय्येदिना इस्माईल अलैहिमस्सलातु वस्सलाम की तस्वीरें बनाई हाथ में पास में पांसे दिए थे जिन पर लानत फ़रमाई और उन तसवीरों को मिटा दिया, यह तो अम्बिया इज़ाम की तरफ़ निसबत थी क्या उससे वो मलऊन पांसे मुअज्जम (अज़मत वाले) हो गए या तस्वीरें बाकी रखने के काबिले और इसे .जुरूरी कहना तो और सख्त इफ्तेरा (इलज़ाम) वह भी किस पर शरा मुत्तहेरा पर।


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