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✍🏻 औरत और पर्दा ✍🏻
निसाइयात (औरत) की तारीख़ बड़ी दर्दनाक और कर्बनाक (तकलीफदह) है, ये इन्सानियत की पेशानी पर बदनुमा दाग है।
😔अफसोस ! जिसके आगोश में इन्सान ने परवरिश पाई, उसी आगोश (गोद) को जख्मी किया। जिसने बुलन्दियों पर पहुँचाया, उसी को पस्तियों में डाला।
सरज़मीने अरब में अय्यामे जाहिलीयत (जाहिलीयत के दिनों) में मुआशरे (समाज) की नज़र में खुवातीन की जो कद्र व कीमत थी उसका कुछ अन्दाज़ा एक अरब शायर के इन ख्यालात से होता है :-
1 - लड़कियों को दफ्न करना ही सबसे बड़ी फजीलत 2 - मौत औरत के हक में अजीज़ तरीन मेहमान है।
कुरआने करीम के मुतालआ (पढ़ने) से मालूम होता है कि उस जमाने में लड़कियों की विलादत मर्द के लिये अजाबे जाँ थी।
जब कोई मर्द ये खबर सुनता तो उसका चेहरा मारे गुस्से के सियाह हो जाता और वो उसी गम में कुढ़ता।
लोग लड़कियों को जिन्दा दफ्न कर दिया करते थे जिसके लिये कुरआने करीम में फ़रमाया गया कि "कयामत के दिन दफ्न होने वाली लड़की से पूछा जाएगा बता तुझे किस जुर्म की पादाश में कत्ल किया गया ?" यानी ऐसे सफ्फाक बाप को कयामत के दिन छोड़ा नहीं जाएगा।
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✍🏻 औरत और पर्दा ✍🏻
एक सहाबी ने अय्यामे जाहिलीयत में अपनी बेटी को जिन्दा दफ्न करने का दर्दनाक वाकिया सुनाया तो वो खुद भी रोए और सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम भी रोते रहे।
हिन्दुस्तान का हाल अरब से भी बद तर था, यहाँ मरने वाले शौहरों के साथ उनकी जिन्दा बीवियाँ जलाई जाती थीं, इस रस्म को " सती " के नाम से पुकारा जाता था ।
फ्रांस के मशहूर मुअरिख ( इतिहासकार / Historian ) डॉक्टर गसतावली बान ने लिखा है " ये रस्म हिन्दुस्तान में आम हो चली थी क्योंकि यूनानी मुअर्रिखों ने इसका जिक्र किया है।
इब्ने बतूता ( वफात 779 हिजरी / 1378 ई0 ) जब हिन्दुस्तान आया तो उसने ये वहशतनाक मन्ज़र खुद देखे जिसका अपने सफ़रनामे में जिक्र किया है।
ऐसा ही एक मन्ज़र देखते देखते वो बेहोश घोड़े से ज़मीन पर गिरने लगा तो लोगों ने सँभाला ।
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✍🏻 औरत और पर्दा ✍🏻
हिन्दुस्तान में एक ऐसा वाकिया पेश आया जिसमें शौहर की लाश के साथ उसकी ज़िन्दा बेवा को फूंक दिया गया।
ये खबर सारी दुनिया में हैरत से सुनी गई।
यूरोप भी इस मामले में किसी से पीछे नहीं रहा, वहाँ 1494 ई0 और 1521-1522 ई0 में जादूगरी के इल्ज़ाम में सैकड़ों औरतों और बच्चों को ज़बह कर दिया गया।
डॉक्टर स्प्रिंगर ईसाई के मुताबिक दुनिया में 90 हज़ार औरतों को मुखतलिफ औरत और पर्दा ना - माकूल इल्ज़ामात में जिन्दा जला दिया गया।
कुछ दिनों पहले बोस्निया में मुसलमान औरतों के साथ नसारा ने जो सफ्फाकाना सुलूक किया, सुन सुन कर इन्सानियत की रूह काँप उठी।
अमरीका जिसका शुमार तरक्की याफ्ता बरे आज़म ( महाद्वीप ) में किया जाता है वहाँ औरतों के साथ जो सुलूक किया जा रहा है , शायद तारीख़ ( इतिहास / History ) के किसी दौर में ऐसा सुलूक नहीं किया गया होगा।
हर पाँच मिनट के बाद एक औरत की इज्जत का दामन तार तार किया जाता है।
यानी चौबीस घण्टे में इस्मत - दरी (बलात्कार/Rape) के 288 हादसात रोनुमा होते हैं।
आप खुद अपने ज़मीर ( दिल ) से पूछे ये जन्नत है या जहन्नम ?
मुखतलिफ जराएम की तादाद इससे भी ज्यादा है।
चौबीस घण्टे में 1800 जुर्म किये जाते हैं।
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✍🏻 औरत और पर्दा ✍🏻
इस्लाम ने औरत पर बड़ा करम फ़रमाया और उसको पस्तियों से बुलन्दियों पर पहुँचाया और ऐसा रऊफ व रहीम रसूल ( सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ) भेजा जिसने दुनिया की चीजों में खुशबू और औरत को पसन्द फरमाया।
- - - रूसी फ़लसफ़ी टाल्सटाय ( वफ़ात 1910 ई0 ) ने हुजूरे अनवर अलैहि व सल्लम की सीरत पर इज़हार करते हुए ये हदीस पेश की है :
" दुनिया की चीजें सिर्फ . . व मताअ ( दौलत ) हैं और दुनिया की अच्छी मताअ नेक औरत है।
आपने औरतों पर जो करम फरमाया वो इन्सानियत की तारीख में सुनहरी हुरूफ से लिखा गया।
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✍🏻 औरत और पर्दा ✍🏻
चन्द इरशादात और वाकियात मुलाहज़ा हों
1. एक सहाबी ने अर्ज़ कियाः " या रसूलल्लाह ! सबसे ज्यादा मुझ पर किसका हक है ? " फरमायाः " तेरी माँ का' ये सवाल तीन मरतबा किया गया , आपने यही फ़रमाया , " तेरी माँ का|
फिर चौथी मरतबा अर्ज कियाः " सबसे ज्यादा मुझ पर किसका हक है ? " तो फरमायाः " तेरे बाप का "
आपने मुलाहज़ा फरमाया, इस्लाम की नज़र में " माँ " की कितनी कद्रो मंज़िलत है।
2. हजरत अली कर्रमल्लाह तआला वज - हहल करीम की वालिदा हजरत फातिमा बिन्ते असद (वफात 11 हिजरी / 632 ई०) का जब इन्तिकाल हुआ, हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी चादर शरीफ उनके कफ़न के लिये अता फरमाई और जब लहद खोदी गई तो आपने लहद में उतर कर अपने दस्ते मुबारक से बगली कब्र खोदी और मिट्टी बाहर निकाली और फिर खुद लेट कर देखा "
अल्लाहु अकबर !
इस कब्र शरीफ़ की मंजिलत का क्या कहना!
अफसोस सैकड़ो बार अफसोस जन्नतुल बकीअ शरीफ में इस कब्र शरीफ के चारो तरफ़ दीवारें चुन दी गई हैं, शायद इस लिये कि आशिकाने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) इसकी ज़ियारत से महरूम रहें।
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3 - हज़रत उम्मे सलमा रदियल्लाहु तआला अन्हा ( वफ़ात 63 हिजरी / 682 ई० ) बेवा हो गईं, आपके साथ यतीम बच्चे भी थे।
परेशानी का आलम, कोई मददगार नहीं सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने लिये पैगाम भेजा।
हज़रत उम्मे सलमा रदियल्लाहु अन्हा चूँकि अयालदार (बाल बच्चों वाली) थीं,
ख्याल आया कि शायद सरकारे दो आलम सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम बच्चों का बोझ महसूस करें,
आपने उन पेश करते हुए फरमायाः " अयालदार हूँ, यतीम बच्चे मेरे साथ हैं।
सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो जवाब इनायत फरमाया वो उन मर्दो के लिये इबरत व नसीहत है जो अयालदार बेवा औरतों का बोझ उठाने से पहलू तही करते (बचते) हैं
आपने फ़रमायाः " तुम्हारी अयाल, अल्लाह और उसके रसूल की अयाल है।
अल्लाहु अकबर !
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